स्वप्निल कुसाले: उधार लेकर प्रैक्टिस, अब पेरिस ओलंपिक में जीता कांस्य पदक

स्वप्निल कुसाले

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    • Author, गणेश पोल और जाह्नवी मूले
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

पेरिस ओलंपिक में गुरुवार को भारत के निशानेबाज़ स्वप्निल कुसाले ने शूटिंग के50 मीटर एयर राइफ़ल 3 पोज़िशन प्रतिस्पर्धा में कांस्य पदक जीत लिया है. इसी के साथ भारत के खाते में कुल तीन ओलंपिक पदक जुड़ गए हैं.

स्वप्निल कुसाले से पहले ही पदक की उम्मीद की जा रही थी.

28 वर्षीय स्वप्निल कोल्हापुर के राधानगरी के रहने वाले हैं. उन्होंने शूटिंग की ट्रेनिंग नासिक के स्पोर्ट्स एकेडमी से ली थी और फ़िलहाल पुणे में रेलवे की नौकरी में है.

स्वप्निल इससे पहले 2022 एशियाई खेलों के टीम इवेंट में गोल्ड मेडल जीतने वाली टीम में शामिल रहे हैं. उनका नाम महाराष्ट्र में शूटिंग की दुनिया के लिए नया नहीं है. पिछले 10-12 सालों में, स्वप्निल राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट में कामयाबी हासिल करते रहे हैं.

लेकिन इस साल उन्होंने पहली बार ओलंपिक में प्रवेश किया और सीधे फाइनल राउंड तक पहुंचने में कामयाब रहे. कोल्हापुर के राधानगरी से पेरिस ओलंपिक तक का उनका सफ़र बेहद दिलचस्प रहा है.

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'बुलेट ख़रीदने के लिए बैंक से उधार लिया'

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स्वप्निल कुसाले के पिता सुरेश कुसाले ने बीबीसी मराठी को बताया, "मुझे याद नहीं कि वह कभी शूटिंग को लेकर बोर हुए हों. वह इसका अभ्यास करने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं. स्वप्निल बेहद शांत और अनुशासित हैं."

सुरेश का परिवार राधानगरी के कंबलवाड़ी गांव का रहने वाला है. स्वप्निल के पिता पेशे से शिक्षक हैं और उनकी मां अनीता कंबलवाड़ी गांव की सरपंच हैं.

अपने बेटे की खेल में रुचि को देखते हुए उन्होंने स्वप्निल को नासिक के स्पोर्ट्स सेंटर में दाखिला दिलाया था. वहां स्वप्निल ने शूटिंग को चुना और उसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा.

स्वप्निल साल 2009 यानी 14 साल की उम्र से निशानेबाज़ी का अभ्यास कर रहे हैं.

यहां ये भी जानना ज़रूरी है कि शूटिंग सीखना ख़र्चीला होता है. राइफ़ल और अन्य उपकरणों पर काफ़ी पैसे ख़र्च करने पड़ते हैं. अभ्यास में दागे जाने वाली प्रत्येक गोली का भी ख़र्च होता है.

एक समय था जब अभ्यास के लिए गोलियां खरीदने के लिए स्वप्निल के पास पर्याप्त पैसे नहीं थे. लेकिन पिता ने कर्ज़ लेकर अपने बेटे को खेलने के लिए प्रोत्साहित किया.

स्वप्निल ने पेरिस ओलंपिक से पहले मीडिया को बताया, "मेरे पिता ने बैंक से कर्ज लिया और उससे गोलियां खरीदी ताकि मेरी प्रैक्टिस बंद न हो. उस समय एक बुलेट की कीमत 120 रुपये थी. इसलिए मैंने शूटिंग की प्रैक्टिस करते समय हर गोली का सावधानी से इस्तेमाल किया. क्योंकि पैसे नहीं थे. जब मैंने गेम खेलना शुरू किया, तो मेरे पास पूरा सामान भी नहीं था."

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स्वप्निल ने कहा कि उनके माता-पिता के साथ-साथ उनकी कोच दीपाली देशपांडे ने भी उनकी सफलता में बड़ी भूमिका निभाई है.

उन्होंने कहा था, "दीपाली मैम ने मुझे जीवन और खेल में सही अनुशासन दिया. उन्होंने मुझे यह भी सिखाया कि बिना शूटिंग के एक इंसान के तौर पर कैसा बर्ताव रखा जाए."

वर्ष 2013 के अंत तक स्वप्निल ने शूटिंग में अपनी काबिलियत दिखानी शुरू की. तब टारगेट स्पोर्ट्स जैसी संस्था उनके मदद के लिए साथ थी. बाद में रेलवे ने स्वप्निल को नौकरी भी दे दी. वह 2015 से मध्य रेलवे के पुणे डिवीजन में यात्री टिकट निरीक्षक (टीटीई) के रूप में काम कर रहे हैं.

रेलवे की नौकरी के बाद उन्होंने बालेवाड़ी में छत्रपति शिवाजी महाराज स्पोटर्स एकेडमी में प्रशिक्षण लिया है. इस दौरान उन्हें निशानेबाज़ विश्वजीत शिंदे और दीपाली देशपांडे ने मेंटॉर किया है.

स्वप्निल के बारे में बात करते हुए उनके कोच विश्वजीत शिंदे ने कहा, "स्वप्निल बहुत शांत लड़का है और वह कभी फ़िज़ूल बातों पर ध्यान नहीं देता. वह सिर्फ़ और सिर्फ़ अपनी प्रैक्टिस पर फ़ोकस रखता है."

शूटिंग में नेशनल लेवल पर पहुंचने के बाद भी स्वप्निल का सफ़र आसान नहीं रहा है.

उन्हें शारीरिक तकलीफ़ों का सामना करना पड़ा है. रह रहकर शारीरिक दर्द, बुखार और कमजोरी ने उन्हें बहुत परेशान किया. कभी-कभी टॉन्सिल से होने वाले दर्द की असहनीय पीड़ा भी झेलनी पड़ती थी. ऐसा क्यों हो रहा है, इसका पता नहीं चल रहा था, लिहाजा उन्हें दर्द के साथ अभ्यास करना होता था.

अंत में, दिसंबर 2023 में, इस समस्या की वजह का पता डॉक्टरों ने लगा लिया. स्वप्निल को दूध से एलर्जी पाई गई और दूध में लैक्टोज की समस्या के कारण स्वप्निल को दूध और डेयरी उत्पादों का सेवन बंद करना पड़ा. इसके बाद उनकी सेहत में भी सुधार हुआ है.

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क्यों टिकी थी स्वप्निल पर उम्मीदें?

स्वप्निल को अंतरराष्ट्रीय मैचों का ज्यादा अनुभव नहीं है. लेकिन हर टूर्नामेंट में जहां वह फाइनल में पहुंचे, वहां उन्होंने शानदार प्रदर्शन किया है. उन्होंने फाइनल में पहुंचने के बाद से कई बार टूर्नामेंट जीते हैं. ऐसे में पेरिस ओलंपिक में भी उनसे मेडल की उम्मीद की जा रही थी.

ओलंपिक क्वालिफ़ायर में कई उतार-चढ़ाव को पार करने के बाद स्वप्निल 7वें स्थान पर आए और उन्होंने फाइनल का टिकट हासिल किया था.

उस समय उनके पिता सुरेश कुसाले ने उम्मीद जताते हुए कहा था, "स्वप्निल ने इस लक्ष्य के लिए अब तक कड़ी मेहनत की है. उसका आत्मविश्वास मज़बूत है. उसकी तपस्या निश्चित रूप से रंग लाएगी."

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स्वप्निल शूटिंग के किस गेम में खेले

शूटिंग के तीन मुख्य प्रकार हैं: राइफ़ल, पिस्तौल और बन्दूक. ये इस्तेमाल की जा रही बंदूकों के आधार पर बंटी हुई है.

स्वप्निल ने 50 मीटर राइफल थ्री पोजिशन स्पर्धा में ओलंपिक पदक के लिए चुनौती पेश की. थ्री पोज़िशन का मतलब ये है कि निशानेबाज़ को घुटने के बल बैठकर, लेट कर (प्रोन) और खड़े रहकर निशाना लगाना होता है.

स्वप्निल के कोच विश्वजीत शिंदे का कहना है कि यह स्पर्धा, निशानेबाज़ी की दूसरी प्रतिस्पर्धाओं की तुलना में अधिक चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि तीन अलग-अलग पोज़िशन में निशाना साधना मुश्किल होता है.

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