चंदू चैंपियन: भारत का पहला पैरालंपिक स्वर्ण जीतने वाले मुरलीकांत पेटकर की कहानी

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- Author, वंदना
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
बात 1965 की है, जब भारत और पाकिस्तान के बीच जंग चल रही थी.
उस जंग में गोलियां लगने से बुरी तरह ज़ख़्मी हुआ एक जवान कोमा में चला गया, जब होश आया तो पाया कि वो हमेशा के लिए पैरालाइज़्ड हो गया है.
ठीक सात साल बाद 1972 में वो जवान भारत के लिए पैरालंपिक में उतरता है.
वह निजी स्पर्धा में पहली बार भारत के लिए पैरालंपिक में गोल्ड मेडल जीतकर इतिहास रच देता है और वर्ल्ड चैंपियन बनता है.
भारत के लिए इतिहास रचने वाले इन्हीं मुरलीकांत पेटकर की ज़िंदगी से प्रेरित है, निर्देशक कबीर ख़ान और अभिनेता कार्तिक आर्यन की फ़िल्म 'चंदू चैंपियन.'

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मुरलीकांत पेटकर की कहानी
वर्ल्ड चैंपियन बनने से कहीं पहले मुरलीकांत पेटकर की कहानी शुरू होती है. भारतीय सेना के एक जवान के रूप में जब वो ब्यॉज़ बटालियन में थे.
एक नवंबर 1944 के महाराष्ट्र में जन्मे मुरलीकांत पेटकर अब 82 साल के हो चुके हैं और महाराष्ट्र के पुणे में रहते हैं.
कुश्ती, हॉकी, एथलेटिक्स - खेलों में वो हमेशा से ही अव्वल आते थे.
वो बताते हैं, "1965 में भारत और पाकिस्तान के बीच लड़ाई चल रही थी और हम कश्मीर में थे. थोड़ी देर में हमें सीटी की आवाज़ सुनाई दी. हम सब नए थे और हमें लगा कि शायद टी ब्रेक के लिए सीटी बजी है. लेकिन वो हवाई हमले का अलर्ट था."
"मेरे साथ के सैनिक बंकर छोड़ के निकल गए. इतने में हमला हो गया. दोनों तरफ़ से भारी गोलीबारी हुई. मुझे भी गोलियां लगीं. एक गोली मेरी रीढ़ की हड्डी में लगी. वो गोली आज भी मेरी रीढ़ की हड्डी में है."
"गोली लगने के बाद मैं वहाँ चट्टान से गिर गया. जब नीचे गिरा तो पीछे से आ रही सेना का टैंकर मेरे ऊपर से निकल गया. मैं अस्पताल में भर्ती रहा. लंबे समय तक मुझे अपना नाम भी नहीं याद था. फिर मुझे पता चला कि मैं कमर के नीचे से पैरालाइज़ हो गया हूँ."


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'यादाश्त जा चुकी थी...'
घायल होने के बाद जिस तरह मुरलीकांत अपने होश में आए, उसका क़िस्सा वह बहुत जोश-ख़रोश से सुनाते हैं, "मैं अस्पताल में 18 महीने से कोमा में था और मेरी यादाश्त जा चुकी थी. एक दिन मैं अस्पताल में अपने बेड से गिर गया. आसपास के लोग मुझे उठाने आए. जब मैं ज़मीन पर गिरा हुआ था तो मुझे वो दिन याद आ गया जब मैं पहाड़ी से गिरा था."
"सब कुछ मुझे याद आ गया. मुझे लगा कि मैं पाकिस्तानी इलाक़े में पकड़ा गया हूँ और मैंने सामने बैठे जनरल साहब को गर्दन से पकड़ लिया. सेना में हमें सिखाया जाता है कि पहले दुश्मन को मारो फिर मरो. वो बोल रहे थे कि हम भारतीय हैं. लेकिन सैनिक होने के नाते मैं मानने को तैयार नहीं था."
"मैंने कहा आईडी दिखाओ. फिर मैंने एक नर्स को देखा. वो भारतीय सेना की नर्स थी. तब जाकर मैंने उस जनरल को छोड़ा और माफ़ी मांगी. पर उसके बाद मुझे ख़ूब मार पड़ी पर जनरल साहब ने सबको रोका."
पैरालाइज़्ड होने के बाद तैराकी मुरलीकांत के जीवन में एक टर्निंग पॉइंट की तरह आई. सेना के फीज़ियोथैरपिस्ट ने मुरलीकांत को तैराकी करने की सलाह दी ताकि वो बेहतर महसूस कर सकें.
रिहैबिलिटेशन के लिए शुरू हुई तैराकी मुरलीकांत पेटकर को पैरालंपिक तक ले गई और जर्मनी में 1972 में उन्होंने गोल्ड मेडल जीता.


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साठ के दशक में...
मुरलीकांत पेटकर कहते हैं कि उस वक़्त उनका साथ दिया भारतीय सेना ने और मशहूर क्रिकेटर विजय मर्चेंट ने जो विकलांग खिलाड़ियों के साथ बहुत शिद्द्त से काम करते थे.
वैसे खेलों में शुरुआत कैसे हुई इसकी दिलचस्प कहानी मुरलीकांत पेटकर कुछ यूँ सुनाते हैं, "गाँव में जब मैं स्कूल जाता था तो रास्ते में कुश्ती का अखाड़ा पड़ता था. मैं वहाँ बड़े घरों के पहलवानों को देखता था. उनके लिए, दूध घी वगैरह आता था. वहीं पहलवानों के लिए ठंडई बनती थी. एक दिन ठंडई बनाने वाला नहीं आया तो किसी ने कहा बच्चे ज़रा मदद कर दो."
"उसके बदले में मुझे भी बादाम मिले ठंडई मिली. मैं घर भी लेकर गया. दूसरे दिन भी ऐसा ही हुआ. ऐसा करते करते मैंने भी कुश्ती खेलना शुरू कर दिया. कोई नहीं मिलता था तो मुझे छोटू पहलवान कहके बुला लेते थे."
"जिस पहलवान की ठंडई बच जाती था, वो मेरी हो जाती थी. मेरी बॉडी भी बन गई. एक बार पास के गाँव में कुश्ती थी. कुश्ती जीतने के लिए एक पैसा मिलता था जो 60 के दशक में गाँव में बड़ी बात थी. आमतौर पर तो जीतने के बाद नारियल, बताशा मिलता था."
बातचीत के दौरान कैमरे पर एक पैसे का सिक्का दिखाते हुए मुरली पेटकर बताते हैं, "कभी देखा है आपने एक पैसा? उस दिन मैंने कुश्ती में एक पैसा जीता था. वो सिक्का आज भी मेरे पास है. ये देखिए... ये मेरी पहली कमाई थी. वहाँ से पूरा सिलसिला शुरू हुआ. जब थोड़ा बड़ा हुआ तो मुझे सेना में भेज दिया गया."
अपनी मेहनत, लगन और बाकियों की मदद से मुरलीकांत उस मंच तक पहुँचे जो किसी भी खिलाड़ी के लिए सबसे बड़ा लक्ष्य होता है – पैरालंपिक.


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युद्ध के मैदान से शुरू...
साल 1972 के उन चंद दिनों के बारे में मुरलीकांत ने बताया था, "जब हम जर्मनी पहुँचे तो वहाँ रहने वाले कई भारतीय वहाँ आए हुए थे, उन्होंने मुझे फूल दिए. मुझे विजेता बनने जैसे एहसास हुआ. फ़ाइनल में मैं बिल्कुल नर्वस नहीं था. तब मैं वर्ल्ड रिकॉर्ड के बारे में नहीं सोच रहा था."
"मुझे बाद में पता चला कि गोल्ड के साथ-साथ मैंने वर्ल्ड रिकॉर्ड भी बनाया है. वहाँ बहुत सारे सिख भाई थे जिन्होंने ख़ूब तालियाँ बजाई. जब भारतीय तिरंगा देखा तो उस दिन तो झंडे को चूमा था."
वो बताते हैं, "जब हम भारत हवाई अड्डे पर पहुँचे तो बहुत से लोग उतर गए लेकिन मुझे अपनी व्हीलचेयर का इंतज़ार करना पड़ा. वहाँ एक बच्ची आई हुई थी. पता नहीं कौन थी. उसने कहा पेटकर अंकल अपना मेडल मुझे दिखाइए."
मुरलीकांत पेटकर की कहानी युद्ध के मैदान से शुरू होती है और पैरालंपिक में खेल के मैदान पर आकर मुकाम पर पहुँचती है.
पैरालंपिक खेलों की बात करें तो इसका सीधा नाता जंग से ही है. दूसरे विश्व युद्ध के बाद बहुत सारे सैनिक जख़्मी हुए थे और कई सैनिक विकलांग भी हो गए थे.
उनके रिहैबिलिटेशन के लिए ही खेलों का आयोजन शुरू किया गया था जिसने धीरे धीरे कॉम्पिटिटिव खेलों का रूप ले लिया.
1948 में जब लंदन में ओलंपिक खेल हुए तो स्टोक मैंडिविल अस्पताल से जुड़े लुगविग गटमैन ने व्हीलचेयर खिलाड़ियों के लिए प्रतियोगिता का आयोजन किया. बाद में इसने पैरालंपिक खेलों का रूप ले लिया.
मुरलीकांत कहते हैं कि खेल ख़ुशियाँ और सकारात्मकता लेकर आता है जबकि जंग तबाही और तकलीफ़.

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कार्तिक आर्यन की प्रतिक्रिया
तैराकी के अलावा 1968 में उन्होंने पैरालंपिक खेलों में भारत का टेबल टेनिस में प्रतिनिधित्व किया.
1967 में वो महाराष्ट्र स्तर पर शॉट पुट, जैवलिन, डिस्कस थ्रो, वेटलिफ्टिंग, टेबल टेनिस और तीरंदाज़ी में चैंपियन बने.
बॉक्सिंग में वो भारत की ओर से टोक्यो भेजे गए थे.
अपनी जिंदगी पर फ़िल्म बनने पर मुरलीकांत इसलिए खुश हैं कि एक विकलांग खिलाड़ी की ज़िंदगी को इतनी अहमियत दी गई है.
अभिनेता कार्तिक आर्यन कहते हैं कि जब उन्होंने मुरलीकांत की असल कहानी के बारे में सुना तो उनकी प्रतिक्रिया थी कि क्या ये वाक़ई सच्ची कहानी है, क्या वाक़ई ऐसा हो सकता है ?
मुरलीकांत की असल जिंदगी को जितना आप जानते हैं उसे देखकर वाकई ये लगता है कि क्या वाक़ई ऐसा हो सकता है ?

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जैसा कि फ़िल्म चंदू चैंपियन में कहा गया है कि चैंपियन गिरता है लेकिन रुकता नहीं है. मुरलीकांत आज भी खिलाड़ियों के साथ सक्रिय हैं. 1972 में भारत को गोल्ड दिलाने वाले मुरलीकांत को 2021 में पदम श्री से सम्मानित किया गया.
यूँ तो ओलंपिक में निजी स्पर्धा में पहला गोल्ड मेडल जीतने के लिए भारत को 21 वीं सदी का इंतज़ार करना पड़ा था जब 2008 में अभिनव बिंद्रा ने गोल्ड जीता था और 2021 में नीरज चोपड़ा ने दूसरा गोल्ड जीता.
लेकिन तैराक मुरलीकांत पेटकर ने आज से 52 साल पहले ही भारत को पैरालंपिक में उसका पहला गोल्ड मेडल दिला दिया था.
ये वो दौर था जब भारत में पैरालंपिक के बारे में शायद ही बात होती थी.
शारीरिक रूप से विकलांग खिलाड़ियों के लिए कोई ख़ास सुविधाएँ नहीं थी. और तैराकी जैसे खेल में तो आज तक भारत ओलंपिक में कोई मेडल नहीं जीत पाया है.

















