ग़ायब होती सिंगल स्क्रीन सिनेमा घरों की ख़ूबसूरत दुनिया

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- Author, शेरिलान मोल्लान
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़, मुंबई
भारत के शहरों में एक समय सिंगल-स्क्रीन सिनेमा हॉल ही हुआ करते थे. मल्टीप्लेक्स के उभरने के बाद से सिंगल स्क्रीन सिनेमा का धीरे-धीरे पतन हो गया है. अब उनमें से कुछ सौ ही बचे हैं.
सिनेमेटोग्राफ़र हेमंत चतुर्वेदी इस ख़त्म होती परम्परा का दस्तावेज़ीकरण करते रहे हैं. भारत के तमाम सिंगल-स्क्रीन सिनेमा हॉल भव्य हुआ करते थे ताकि वे दर्शकों को आकर्षित कर सकें. इन्हें बनाने के लिए स्थापत्य के विविध प्रयोग किए गए थे.
2019 में हेमंत चतुर्वेदी ने अपना प्रोजेक्ट शुरू किया. उन्होंने अब तक 15 राज्यों के 950 सिनेमाघरों के फ़ोटो खींचे हैं. वो कहते हैं, "पिछले 25 सालों में सिंगल-स्क्रीन सिनेमाघरों की संख्या 24,000 से घटकर 9,000 हो गई है."
कुछ को मॉल और इमारतों के लिए जगह बनाने के लिए ढहा दिया गया. बाकी सिंगल-स्क्रीन सिनेमाघर ग्राहक खोने की वजह से खंडहर में तब्दील हो गए.
हेमंत चतुर्वेदी कहते हैं, "ये थिएटर भारत की सिनेमा देखने की संस्कृति के विकास के गवाह थे. भारत में सबसे छोटे शहरों में भी लोगों को फ़िल्मों का आनंद लेने में सिंगल-स्क्रीन सिनेमा ने मदद की."
चतुर्वेदी को इस प्रोजेक्ट का ख़्याल तब आया जब वो अपने दादा-दादी के घर इलाहबाद गए थे.
बचपन में वो इलाहाबाद के लक्ष्मी टॉकीज़ जाया करते थे. अब वो बंद हो चुका है. चतुर्वेदी जब दोबारा वहां गए तो देखा कि ढहते हुए खंडहर में देवी की एक मूर्ति बची है जिसके नाम पर थिएटर का नाम रखा गया था. प्रतिमा धूल से ढकी है और उसका एक हाथ गायब हो गया है.
हेमंत चतुर्वेदी कहते हैं कि उन्हें ये सब देखकर एहसास हुआ कि कैसे नगरीकरण की वजह से शहर अपना इतिहास खोते जा रहे हैं. वहीं से भारत के सिंगल-स्क्रीन सिनेमाघरों के दस्तावेज़ीकरण की उनकी शुरुआत हुई.

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निरंजन टॉकीज
उत्तर प्रदेश के निरंजन टॉकीज को 1940 में तैयार किया गया था, लेकिन एक ज़मीन के विवाद की वजह से 1989 में इसे बंद कर दिया गया.
अपने सुनहरे दिनों में ये टॉकीज अपने आर्ट डेको डिजाइन, सनबर्स्ट मोज़ेक फर्श और प्रभावशाली संरचना के लिए जानी जाती थी लेकिन अब ये खंडहर में बदल चुका है, लेकिन इसकी भव्यता के निशान उन जगहों पर दिखाई देते हैं जो समय की मार से बच गए हैं.
हेमंत चतुर्वेदी का मानना है कि "यह इलाहाबाद शहर का पहला एयर कंडीशन्ड सिनेमाघर था."

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वो आगे कहते हैं, "स्थानीय लोगों ने मुझे बताया कि कैसे उनके दादा-दादी फिल्म ख़़त्म होने के बाद थिएटर के बाहर इकट्ठा होते थे ताकि वे वातानुकूलित हवा का आनंद उठा सकें."
कहा जाता है कि राजस्थान के बीकानेर में गंगा टॉकीज को उस समय के शासक राजा ने बनाया था.

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विजयानंद टॉकीज
थिएटर पिछले 20 साल से बंद है. लेकिन धूल भरे कोनों और टूटी फूटी दीवारों के ऊपर यादगार ख़जाना मिलता है. दीवारों पर शम्मी कपूर की 1961 की हिट फ़िल्म 'जंगली' और नरगिस की आख़िरी फ़िल्म 'रात और दिन' (1967) के मूल पोस्टर मौजूद हैं.
पश्चिमी राज्य महाराष्ट्र में विजयानंद टॉकीज को 1914 में बनाया गया था. भारत की पहली पूरी फीचर फिल्म 'राजा हरिश्चंद्र' बनाने वाले दादासाहेब फाल्के इस थिएटर के पास एक भूखंड पर दो पेड़ों के बीच बंधे एक सफेद कपड़े पर ब्लैक एंड व्हाइट फिल्मों की स्क्रीनिंग करते थे.
हेमंत चतुर्वेदी बताते हैं कि, ''जाहिर तौर पर लोग चलती-फिरती तस्वीरों को देखकर डर गए थे और उन्हें लगा कि यह काले जादू का नतीजा है.''
वो आगे कहते हैं कि, ''स्थानीय पुलिस को एक मुहिम चलानी पड़ी, जिसके तहत उन्हें लोगों को बताना होता था कि वो (दादासाहेब फाल्के) कोई जादू टोना (काला जादू) नहीं बल्कि एक नई तकनीक दिखा रहे हैं जिसे सिनेमा कहा जाता है.''
"स्थानीय पुलिस को लोगों को यह बताने के लिए अभियान चलाना पड़ा कि वह सिनेमा नामक एक नई तकनीक दिखा रहे हैं और यह जादू टोना (काला जादू) नहीं है."

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रॉयल टॉकीज
रॉयल टॉकीज मुंबई के एक ऐसे इलाक़े में स्थित है जिसे 1800 के दशक में 'प्ले हाउस' कहा जाता था, क्योंकि इस इलाक़े में नाटकों और संगीत के लिए कई थिएटर थे.
1900 के दशक में भारत में सिनेमा आने के बाद उन्हें मूवी हॉल में बदल दिया गया.
हेमंत चतुर्वेदी कहते हैं, "जो थिएटर अभी भी खड़े हैं उनमें ग्रीन रूम एरिया और स्क्रीन के पीछे स्टेज हैं."

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दिलचस्प कहानी
वो आगे कहते हैं कि, "रॉयल टॉकीज़ में मुझे 1950 और 1962 के दो पुराने लेटर हेड मिले. उनके पास पहला और एकमात्र फिजिकल एविडेंस था जो मुझे इस इलाक़े के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले 'प्ले हाउस' शब्द का पता मिला."
गुजरात में वाधवान की एक पुरानी रियासत में एक अकेली टिकट खिड़की के साथ उबड खाबड सरंचना है जिसकी एक दिलचस्प कहानी है.
स्थानीय कहावत है कि वाधवान के राजा ने 1896 में मुंबई (तब बॉम्बे कहा जाता है) की यात्रा पर 10,000 रुपये ($121; £99) में लुमियर ब्रदर्स द्वारा आविष्कार किया गया एक प्रारंभिक फिल्म प्रोजेक्टर को बुक किया था.
प्रोजेक्टर दस साल बाद आया. चतुर्वेदी के मुताब़िक, यह ओपन एयर थिएटर में स्थापित किया गया था, जो भारत में मूक फिल्मों की स्क्रीनिंग करने वाला पहला स्क्रीनिंग हो गया. आज वहां सिर्फ थिएटर की टिकट खिड़की मौजूद है.

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भागवत चित्र मंदिर
महाराष्ट्र के शोलापुर शहर में भागवत चित्र मंदिर 1935 में बना एक भव्य नाट्यशाला है.
मालिकों का दावा है कि गायिका लता मंगेशकर ने पांच साल की उम्र में यहां पहली बार सार्वजनिक रूप से गाना गाया था.
वहां परिसर के भीतर तीन से ज़्यादा थिएटर मौजूद हैं.
हेमंत चतुर्वेदी कहते हैं, "इसके मालिक गर्व से कहते हैं कि वे भारत में मल्टीप्लेक्स अवधारणा के संस्थापक थे."
छाया मंदिर, कला मंदिर और उमा मंदिर नाम के ये तीन थिएटर डब्लयू. एम नामजोशी ने बनाया था. उन्होंने भारत में लगभग तीन दर्जन सिंगल-स्क्रीन थिएटर डिज़ाइन किए थे.
जिन्होंने भारत में लगभग तीन दर्जन सिंगल-स्क्रीन थिएटर डिज़ाइन किए थे.

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पठान से फिर सुर्खियों में सिंगल स्क्रीन थियेटर
चतुर्वेदी याद करते हुए कहते हैं, "मालिक ने मुझे बताया कि कैसे एक समय जब सभी चार थिएटर पूरी क्षमता से चलते थे और वह और उनके पिता टिकट के लिए भीड़ को तितर-बितर करने के लिए छत से पटाखे फेंकते थे."
मुंबई में निशात सिनेमा रेनोवेशन के लिए लंबे समय से बंद था और हाल ही में बॉलीवुड अभिनेता शाहरुख खान की फ़िल्म 'पठान' की स्क्रीनिंग के लिए अपने दरवाजे खोले.
थिएटर इतना भरा हुआ था कि मालिकों को पास के थिएटर से 'हाउसफुल' बोर्ड मंगवाना पड़ा, क्योंकि उन्होंने दशकों से अपना 'हाउसफुल' बोर्ड इस्तेमाल नहीं किया था और उन्हें नहीं पता था कि बोर्ड कहां है.
हेमंत चतुर्वेदी कहते हैं, "फिल्म के रिलीज़ होने के बाद कई लोगों ने मुझे मैसेज किया, यह कहते हुए कि इसने भारत में सिंगल-स्क्रीन थिएटरों को पुनर्जीवित किया है."
"मैं उनसे बस इतना ही कह सकता था कि 'पठान' के बाद क्या होता है? क्या थिएटर फिर से अंधेरे में डूब जाते हैं?"
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