रोहित वेमुला: क्लोजर रिपोर्ट में ऐसा क्या कहा गया है, जो सवाल खड़े करता है

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- Author, नामदेव काटकर
- पदनाम, बीबीसी मराठी
हैदराबाद यूनिवर्सिटी के छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या मामले में तेलंगाना पुलिस की क्लोजर रिपोर्ट आखिरकार सामने आ गई है.
इस क्लोजर रिपोर्ट के मुताबिक़, रोहित वेमुला की आत्महत्या के लिए कोई भी दोषी नहीं है. साथ ही इसमें कहा गया है कि रोहित वेमुला 'दलित' नहीं थे.
तेलंगाना पुलिस की ओर से दाखिल की गई इस क्लोजर रिपोर्ट पर नया विवाद शुरू हो गया है. क्लोजर रिपोर्ट के दो बिंदु 'रोहित वेमुला दलित नहीं थे' और 'रोहित वेमुला की आत्महत्या मामले में कोई दोषी नहीं है' को लेकर अब राजनीतिक और सामाजिक हलकों से प्रतिक्रियाएं आ रही हैं.
इससे पहले कि हम इस क्लोजर रिपोर्ट के निष्कर्षों पर उठाए गए सवालों पर गौर करें, आइए जानते हैं कि रिपोर्ट क्या कहती है.
क्लोजर रिपोर्ट में क्या है?

रोहित वेमुला की आत्महत्या के बाद हैदराबाद यूनिवर्सिटी के पीएचडी छात्र डोंथा प्रशांत ने शिकायत दर्ज कराई थी. डोंथा प्रशांत की शिकायत भारतीय दंड संहिता की धारा 306, साथ ही अनुसूचित जाति और जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत दर्ज की गई थी.
इस शिकायत के बाद तेलंगाना पुलिस ने एक जांच कमेटी नियुक्त की. इसमें साइबराबाद कमिश्नरेट के तहत माधापुर डिवीजन के तत्कालीन एसीपी एम. रमन्ना कुमार, तत्कालीन एसीपी एन. श्याम प्रसाद राव और एसीपी श्राकांत शामिल थे.
इस कमेटी की जांच के बाद 21 मार्च, 2024 को क्लोजर रिपोर्ट पेश की गई. जांच में क्या मिला और उसके निष्कर्ष क्या हैं, इसे साइबराबाद के माधापुर डिवीजन के सहायक पुलिस आयुक्त ने 60 पेज की इस क्लोजर रिपोर्ट में विस्तार से पेश किया है.
इस क्लोजर रिपोर्ट के मुताबिक़, पुलिस ने कुल 59 लोगों पर मामला दर्ज किया है.
क्लोजर रिपोर्ट का सारांश यह है कि रोहित वेमुला आत्महत्या मामले में अभियुक्तों के ख़िलाफ़ 'सबूतों की कमी' है इसलिए किसी भी अभियुक्त के ख़िलाफ़ कोई आरोप पत्र दायर नहीं किया गया है.
21 मार्च, 2024 को सौंपी गई क्लोजर रिपोर्ट 3 मई, 2024 को सामने आई और इसके निष्कर्षों पर विवाद खड़ा हो गया.
क्लोजर रिपोर्ट दो मुद्दों पर केंद्रित है और यही बात इसे विवादास्पद बनाती है.
एक तो ये कि रोहित वेमुला दलित जाति से नहीं बल्कि अन्य पिछड़ा वर्ग से थे और दूसरी बात ये कि रोहित वेमुला को आत्महत्या के लिए किसी ने नहीं उकसाया.
क्या रोहित वेमुला अनुसूचित जाति के थे और क्या इस मामले में अनुसूचित जाति एवं जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम लागू हो सकता है?
इस सवाल का जवाब देते हुए पुलिस ने कहा, "रोहित वेमुला वड्डेरा जाति के थे. वड्डेरा जाति को तेलंगाना में अन्य पिछड़ा वर्ग में माना जाता है. इसलिए रोहित वेमुला अनुसूचित जाति से नहीं हैं, इसलिए उनके आत्महत्या मामले में अनुसूचित जाति और जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम लागू नहीं किया जा सकता है."
रिपोर्ट में कहा गया है, "रोहित वेमुला की जाति उनके पिछले कॉलेज में 'माला (एससी)' के रूप में दर्ज की गई थी, लेकिन बाद में आंध्र प्रदेश के गुंटूर जिले के जाति सत्यापन विभाग की जांच में पाया गया कि रोहित वेमुला 'वड्डेरा' जाति से थे."
क्लोजर रिपोर्ट में कहा गया है, "अनुसूचित जाति प्रमाणपत्र राजस्व विभाग से धोखाधड़ी से हासिल किया गया था."
'रोहित को आत्महत्या के लिए किसी ने नहीं उकसाया'

इस क्लोजर रिपोर्ट के मुताबिक़, फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (एफएसएल) ने पाया कि सुसाइड नोट की लिखावट रोहित वेमुला की लिखावट से मिलती-जुलती है.
साथ ही क्लोजर रिपोर्ट में यह भी दर्ज है कि रोहित वेमुला और अन्य सभी के ख़िलाफ़ नियमानुसार कार्रवाई की गई थी.
क्लोजर रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि रोहित वेमुला और उनके किसी साथी के ख़िलाफ़ कोई गैरकानूनी कार्रवाई नहीं की गई. रोहित वेमुला को कोई छात्रवृत्ति देने से इनकार नहीं किया गया.
हैदराबाद विश्वविद्यालय के प्री-क्लोजर रिपोर्ट में पुलिस ने इस दावे को भी ख़ारिज कर दिया कि अप्पा राव ने रोहित वेमुला को इसलिए परेशान किया क्योंकि वह अनुसूचित जाति से थे.
क्या रोहित वेमुला ने हॉस्टल से निकाले जाने के कारण आत्महत्या की?
क्लोजर रिपोर्ट में पुलिस ने रोहित वेमुला का सुसाइड नोट दाखिल किया है और कहा कि उन्होंने यूनिवर्सिटी प्रशासन पर कोई सवाल नहीं उठाया था.
रिपोर्ट में कहा गया है कि दरअसल रोहित वेमुला उन संगठनों (एएसए और एसएफआई) से नाखुश थे जिनमें वह सक्रिय थे.
क्लोजर रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि रोहित वेमुला के सुसाइड नोट से लगता है वो काफी डिप्रेशन में थे.
रोहित वेमुला की सही जाति क्या थी?

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रोहित वेमुला की मां वी. राधिका ने कहा था, "अपने पति मणि कुमार से अलग होने के बाद मैं तीनों बच्चों को लेकर चली गई थी. हमने अनुसूचित जाति की सभी परंपराओं का पालन किया है."
पुलिस ने क्लोजर रिपोर्ट में कहा है कि रोहित वेमुला का अनुसूचित जाति प्रमाणपत्र 'धोखाधड़ी' से हासिल किया गया था.
साल 2012 में एक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अगर पिता या मां में से कोई एक दलित है तो उनका बेटा भी दलित माना जाएगा.
रोहित वेमुला का केस लड़ने वाले वकील ने क्या कहा

रोहित वेमुला का केस लड़ रहे वकील जय भीम राव ने बीबीसी से कहा, "रोहित वेमुला मामले में पुलिस की ओर से दाखिल की गई क्लोजर रिपोर्ट बेहद त्रुटिपूर्ण और लापरवाही भरी है. रोहित ने अपनी मौत से पहले जो दो खत लिखे उनमें उन्होंने यूनिवर्सिटी में भेदभाव के बारे में साफ तौर पर लिखा. इसमें उन्होंने लिखा है कि उन्हें भावनात्मक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा है."
"गुंटूर के कलेक्टरेट में जाति प्रमाण पत्र की अभी भी जांच चल रही है. यह अभी तय नहीं हुआ है. जाति प्रमाणपत्र पर सवाल उठाने वाले शिक्षक गुंटूर के कलेक्टर के सामने पेश नहीं हुए हैं. दूसरी ओर, पुलिस के सामने 18 सबूत हैं जो साबित करते हैं कि रोहित वेमुला दलित थे."
जय भीम राव ने आगे कहा, "ऐसी परिस्थितियों में, मामले की जांच कर रहे पुलिस अधिकारी ने गुंटूर कलेक्टरेट में कार्यवाही की अनदेखी करते हुए लापरवाही से बिना कोई जानकारी लिए अदालत को रिपोर्ट दी है. जब तक कलेक्टर का फैसला नहीं आ जाता तब तक जाति का सवाल ही नहीं उठता."
वो कहते हैं, "चूंकि पुलिस ने अचानक इस मामले में क्लोजर रिपोर्ट पेश की है, जो 2018 से 2024 तक रुका हुआ था तो ये साफ है कि पुलिस किसी को क्लीन चिट देने के लिए ऐसा कर सकती है. पुलिस के जांच अधिकारियों ने अपने कर्तव्य की पूरी तरह से उपेक्षा की है. अपने अधिकार का दुरुपयोग किया है और अपमानजनक तरीके से रिपोर्ट की है."
वकील जय भीम राव ने भी बीबीसी से कहा, "मृतक (रोहित वेमुला) का अपमान किया गया है. क्लोजर रिपोर्ट पूरी तरह से निराधार है और लिहाजा अमान्य है. सरकार का कहना है कि हम दोबारा जांच करेंगे. तो चलिए फिर देखते हैं कि वे क्या करते हैं. वरना हम कानून के जरिये आगे बढ़ेंगे."
पुलिस की क्लोजर रिपोर्ट पर सवाल

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बीबीसी मराठी ने इस मामले में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के पूर्व अध्यक्ष डॉ. सुखदेव थोराट से बात की.
डॉ.सुखदेव थोराट ने कहा, "रोहित वेमुला दलित थे या ओबीसी यह पता लगाने में सिस्टम का समय बर्बाद करना सरासर पागलपन है. रोहित वेमुला को एक दलित होने के नाते भेदभाव का सामना करना पड़ा और उन्हें अतिवादी कदम उठाना पड़ा, इस दिशा में जांच जरूरी थी और है."
तेलंगाना के पुलिस महानिदेशक ने रोहित वेमुला के परिवार को आश्वासन दिया है कि रोहित वेमुला के मामले की दोबारा जांच की जाएगी.
इस संबंध में डाॅ. सुखदेव थोराट ने संतोष व्यक्त किया. उन्होंने कहा, "इस मामले की दोबारा पूरी जांच होनी चाहिए."
डॉ. थोराट ने कहा, "रोहित वेमुला ने अनुसूचित जाति प्रमाण पत्र के आधार पर ही विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया था, जिसके आधार पर उन्हें सभी सुविधाएं मिल रही थीं. इसका मतलब यह है कि विश्वविद्यालय प्रशासन, शिक्षक और हर कोई जानता था कि रोहित वेमुला दलित थे. क्या बाद में यह साबित करके कि वह दलित नहीं थे, उनके साथ पहले के भेदभाव को मिटाया जा सकता है?"
वो कहते हैं, "ये कहना कि रोहित वेमुला ने आत्महत्या का कदम इसलिए उठाया क्योंकि उन्हें डर था कि वह गैर-दलित के रूप में पहचान लिए जाएंगे, सरासर गलत है."
उन्होंने कहा, "यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि कुछ लोगों को बचाने के लिए रोहित वेमुला के मामले में ऐसी क्लोजर रिपोर्ट दी गई है. हालाँकि, अब जब तेलंगाना सरकार ने जांच का वादा किया है, तो उम्मीद है कि सच्चाई सामने आ जाएगी."

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पूर्व केंद्रीय मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री और दलित आंदोलन के नेता डॉ. संजय पासवान ने बीबीसी मराठी से भी बात की.
उनके मुताबिक, "मैं रोहित वेमुला मामले पर पहले दिन से नजर रख रहा हूं. जहां तक मुझे पता है, रोहित बहुत गंभीर छात्र थे. यह कहना दुस्साहसपूर्ण है कि उन्होंने अपनी जाति की पहचान उजागर होने के डर से आत्महत्या की. इस मामले की उचित जांच होनी चाहिए."
उन्होंने कहा, "मैं देख सकता हूं कि पुलिस ने इस मामले में ठीक से जांच नहीं की. जांच की दिशा सही रखनी चाहिए. अब आपने दोबारा जांच करने की तैयारी दिखाई है तो इसका मतलब है कि आपने जांच में कमी स्वीकार कर ली है. यह साबित हो गया है."
उन्होंने कहा, "इस मामले को राजनीतिक मुद्दों से परे देखा जाना चाहिए. एक मेधावी छात्र ने विश्वविद्यालय परिसर में आत्महत्या कर ली. यह गंभीर घटना है. दोबारा जांच हो समाज में सही संदेश जाना चाहिए ताकि ऐसी घटनाएं दोबारा न हों."
वरिष्ठ वकील संघराज रूपवते कहते हैं, "क्लोजर रिपोर्ट को देखते हुए मुझे लगता है कि रोहित वेमुला को सिस्टम ने दूसरी बार मारा है."
संघराज रूपवते कहते हैं, "यह भूल जाएं कि रोहित वेमुला की सामाजिक स्थिति दलित की या अन्य पिछड़ा वर्ग की है. लेकिन उनकी आत्महत्या का मामला विश्वविद्यालय परिसर के अंदर हुआ था और अगर उस मामले की पिछली घटनाओं की कोई पृष्ठभूमि है तो इसकी उचित जांच की जानी चाहिए थी. हालाँकि, यह इस क्लोजर रिपोर्ट में दिखाई नहीं देता है."
"इस तरह की क्लोजर रिपोर्ट से कानून का डर खत्म हो जाएगा और विश्वविद्यालय में कोई भी छात्र अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत नहीं करेगा. यह शैक्षणिक संस्थानों में लोकतांत्रिक माहौल के लिए अनुकूल नहीं है."
हैदराबाद यूनिवर्सिटी के प्रोफेसरों ने भी उठाए सवाल

हैदराबाद विश्वविद्यालय के सामाजिक बहिष्करण और समावेशन नीति विभाग के प्रमुख प्रो. श्रीपति रामुडु का कहना है कि अगर प्रोफेसर अप्पा राव कुलपति नहीं बनते तो रोहित जीवित होते.
वह कहते हैं, "अप्पा राव ने आसानी से हल हो सकने वाली समस्या को ख़त्म नहीं होने दिया. इसके दो कारण हैं. एक तो दलितों के प्रति उनकी नफरत, भेदभाव और दूसरा कुछ शक्तिशाली लोगों से समर्थन मिलना."
इस केस का घटनाक्रम बताते हुए प्रो. रामुडु कहते हैं, "दरअसल, यह मामला अप्पा राव के कुलपति बनने से पहले ही सुनवाई के लिए आया था. तत्कालीन वाइस चासंलर वीसी शर्मा ने कहा था कि छात्रों के दोनों समूहों की गलती थी और कड़ी चेतावनी दी थी कि अगर गलती दोहराई गई तो गंभीर परिणाम होंगे."
"मामला यहीं ख़त्म हो जाता, लेकिन शर्मा के जाने के बाद कुलपति बनकर आए अप्पा राव ने मामले को दोबारा खोल दिया. उन्होंने अपने प्रति वफादार लोगों की एक समिति बनाई और पांचों छात्रों को निलंबित कर दिया. ये पांचों अनुसूचित जाति के हैं."
उन्होंने कहा, "रोहित वेमुला ने हैदराबाद विश्वविद्यालय के कुलपति अप्पा राव को पत्र लिखकर उन्हें फांसी देने या साइनाइड देने का अनुरोध किया था, लेकिन अप्पा राव ने कोई जवाब नहीं दिया. अगर विश्वविद्यालय के प्रमुख इतने गंभीर पत्र का जवाब नहीं देते हैं तो क्या उन्हें जिम्मेदार नहीं ठहराया जाना चाहिए?"
उन्होंने कहा, "पुलिस को यह पक्ष नजर नहीं आया? यह कुछ ऐसा है जिसका जाति प्रमाण पत्र से कोई लेना-देना नहीं है. यदि कोई छात्र ऐसा पत्र लिखता है और कुलपति उसका जवाब नहीं देते हैं तो उन्हें जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए. अगर पुलिस छात्रों या उनके गुरु प्रोफेसरों से मिले बिना जांच पूरी करती है, तो इसे एक साजिश माना जाना चाहिए."
इन आरोपों पर बीबीसी से बात करते हुए अप्पा राव ने कहा कि कोई कुछ भी कहे, मैं उस पर प्रतिक्रिया नहीं देना चाहता. मुझे न्यायपालिका पर विश्वास है.
मामले की फिर से होगी जांच- तेलंगाना पुलिस

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इस बीच तेलंगाना पुलिस की क्लोजर रिपोर्ट सामने आने के बाद रोहित वेमुला की मां और भाई ने नाराजगी जाहिर की है. इसके बाद तेलंगाना के पुलिस महानिदेशक रवि गुप्ता ने एक पत्र जारी कर कहा कि हम इस मामले में आगे की जांच के लिए याचिका दायर करेंगे.
पुलिस महानिदेशक रवि गुप्ता ने कहा कि क्लोजर रिपोर्ट नवंबर 2023 से पहले तैयार की गई थी और मार्च 2024 में उच्च न्यायालय को सौंपी गई थी.
उन्होंने पत्र में आगे कहा, "इस मामले में आगे की जांच की जाएगी क्योंकि रोहित वेमुला की मां और अन्य रिश्तेदारों ने जांच पर सवाल उठाए हैं. ऐसी याचिका उच्च न्यायालय में दायर की जाएगी."
क्लोजर रिपोर्ट के बाद रोहित वेमुला की मां वी. राधिका और भाई राजा वेमुला ने तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी से मुलाकात की
इस मुलाकात के बाद रोहित वेमुला की मां ने मीडिया से कहा कि मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने हमें आश्वासन दिया है कि मामले की फिर से जांच की जाएगी.
वी. राधिका ने कहा, "हमने मुख्यमंत्री से रोहित के साथ अन्य निलंबित छात्रों के बारे में भी चर्चा की. इस केस के कारण इन छात्रों को नौकरी नहीं मिल रही है और पीएचडी छात्र होने के बावजूद इन्हें खेती करनी पड़ रही है. मुख्यमंत्री ने इस पर विचार करने का वादा किया है. हमें विश्वास है कि यह सरकार हमें न्याय देगी."
2016 में वास्तव में क्या हुआ था?

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17 जनवरी 2016 को हैदराबाद विश्वविद्यालय के पीएचडी छात्र रोहित वेमुला ने आत्महत्या कर ली थी. रोहित अम्बेडकर छात्र संघ के सदस्य थे.
आत्महत्या करने से पहले रोहित वेमुला और उनके चार दोस्तों को यूनिवर्सिटी ने हॉस्टल से निकाल दिया था.
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संबद्ध अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के एक सदस्य ने छात्रों पर हमले का आरोप लगाया था. हालांकि, यूनिवर्सिटी की पहली जांच में आरोप निराधार पाया गया, जिसके बाद रोहित और उसके अन्य साथियों को बरी कर दिया गया था.
हालाँकि, इसके बाद विश्वविद्यालय को नया कुलपति मिल गया और उनके कार्यकाल में बिना कोई ठोस कारण बताए पुराना फैसला वापस ले लिया गया. फिर रोहित और उसके दोस्तों को विश्वविद्यालय के छात्रावासों और अन्य सार्वजनिक स्थानों पर जाने पर प्रतिबंध लगा दिया गया.
वहीं, सिकंदराबाद से बीजेपी सांसद बंडारू दत्तात्रेय (वर्तमान में हरियाणा के राज्यपाल) ने तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति इरानी को पत्र लिखा था. उन्होंने यूनिवर्सिटी को 'देशद्रोही' कहा था और हस्तक्षेप की मांग की थी.
दत्तात्रेय के पत्र के बाद मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने विश्वविद्यालय को एक पैनल गठित करने का आदेश दिया, जिसने रोहित वेमुला और अन्य छात्रों को निलंबित करने का फैसला किया.
इस पत्र का हवाला देते हुए अंबेडकर छात्र संघ ने आरोप लगाया कि दत्तात्रेय के पत्र के बाद विश्वविद्यालय में समस्याएं शुरू हुईं, जिसके बाद कुछ और दलित छात्रों ने सामाजिक भेदभाव के कारण आत्महत्या कर ली.
इस मामले में बंडारू दत्तात्रेय के खिलाफ आत्महत्या का मामला दर्ज किया गया था. इसके साथ ही उनके खिलाफ एससी-एसटी एक्ट के तहत भी मामला दर्ज किया गया है.
हालांकि बाद में मीडिया से बात करते हुए दत्तात्रेय ने आरोपों से इनकार किया और कहा कि उनके द्वारा लिखे गए पत्र का रोहित वेमुला की आत्महत्या से कोई लेना-देना नहीं है.
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