नज़रिया: 'सामाजिक व्यवस्था के चलते रोहित ने की आत्महत्या'

रोहित वेमुला

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    • Author, उदित राज
    • पदनाम, सांसद, भारतीय जनता पार्टी

हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय से पीएचडी कर रहे दलित छात्र रोहित वेमुला ने 17 जनवरी 2016 को आत्महत्या कर ली थी.

इस मौक़े पर बीबीसी हिंदी की ख़ास पेशकश में पढ़िए दूसरी कड़ी.

17 जनवरी को रोहित वेमुला की मौत को एक साल पूरा हो रहा है. सवाल अब भी वही है आख़िर रोहित वेमुला ने ऐसा क्यों किया?

इसका जवाब अभी तक नहीं मिला और न जाने कितने दशक और सदियों तक इंतज़ार करना पड़ेगा? हैदराबाद यूनिवर्सिटी में 17 जनवरी 2016 को रोहित वेमुला ने आत्महत्या करते समय एक लम्बा नोट छोड़ा था और उसमें बड़े सारे प्रश्न किए थे.

बाबा साहब आंबेडकर की फ़ोटो ले जाने वाले रोहित वेमुला की तस्वीर तेज़ी से घर-घर पहुँचने लगी. फ़ोटो ने तो एक सवाल का जवाब दे दिया कि जो भी पढ़ा लिखा दलित होता है वह बरबस आंबेडकरवादी बन ही जाता है.

रोहित वेमुला पहले वामपंथी थे और बाद में आंबेडकरवादी हुए. वर्ष पूरा होने जा रहा है जगह-जगह पर भारतीय जनता पार्टी की आलोचना करने के लिए तैयारियां हो रही हैं.

संसद में नियम 193 के तहत बहस हो चुकी है. बहस की शुरुआत मुझसे ही की गई थी. मैंने शुरुआत में ही विपक्ष से अनुरोध किया कि दलित हत्या, उत्पीड़न, बलात्कार और ग़रीबी को आंकड़ो की भेंट न चढ़ाया जाए. महज़ ये साबित करने के लिए कि इसके लिए सत्ता पक्ष ज़िम्मेदार है और ऐसा उनकी सरकार के वक़्त कम हुआ.

कभी-कभी हम इतने अबोध हो जाते हैं कि कुछ दशकों के इतिहास को जैसे जानते ही नहीं. सदियों से जाति व्यवस्था के तहत अन्याय होता आ रहा है और ये अभी जारी भी रहेगा. इसलिए सत्ता पक्ष को आत्महत्या का कारण मान लेने से प्रश्न का जवाब ढ़ूंढने की कोशिश की बजाय उसे उलझाने के समान होगा.

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उस विश्ववद्यालय के प्रांगण में यह नौवां आत्महत्या का मामला है और उनमें से ज़्यादातर उस समय हुए हैं जब वहां भाजपा की सरकार नहीं थी. अभी तक संसद में जो हुई चर्चा हुई है उसमें इसका कारण ढूँढने की कोशिश ईमानदारी से नहीं हो पाई है. निकट भविष्य में भी होने की संभावना नहीं के समान है.

इसके लिए किसी पार्टी विशेष को ज़िम्मेदार ठहराना, समस्या की जड़ में जाने से ध्यान का बंटवारा करने जैसा होगा.

जब हम स्वतंत्र हुए तो जनतांत्रिक शासन प्रणाली को अपनाया. जनतंत्र का जन्म यूरोप में हुआ था और वो वहीं जवान भी हुआ. वहां की समस्याएं भिन्न है.

यूरोप ने अपने अनुसार राज्य के चरित्र को कल्याणकारी बनाया यानी शहरियों को रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, रोज़गार और स्वास्थ्य वग़ैरह हासिल हों. उनके यहाँ सामाजिक भेदभाव की खाई नहीं थी इसलिए वहां के राज्य लोगों के हित में काम कर सके.

हमारे यहाँ जाति और लिंगभेद सदियों की सामाजिक समस्या है. इसे संबोधित करने के लिए राज्य को ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए थी लेकिन ऐसा नहीं हुआ. न जाने किसके ऊपर यह ज़िम्मेदारी सौंपी गई थी, इसे सोचना महत्वपूर्ण है.

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इस समस्या का समाधान अभी भी कोई करने को तैयार नहीं है. इस चुनौती को सरकार भी स्वीकार कर सकती है लेकिन यह असंभव लगता है.

चुनाव में उम्मीदवार की छंटाई से लेकर मत पड़ने तक में जाति की भूमिका अहम रहती है और शासन-प्रशासन भी इससे ज़्यादा ऊपर उठकर किया नहीं जाता.

अगर सरकार इस चुनौती को नहीं उठाने को तैयार है तो इसकी कोशिश शिक्षा व्यवस्था के माध्यम से हो. सिविल सोसाइटी भी आ सकती है. वर्तमान को देखते हुए इन तीनों में जाति एवं लिंगभेद जैसे दैत्य से लड़ने की क्षमता दिखती नहीं.

इस दैत्य को मारने के लिए एक भीषण युद्ध होना होगा, इससे हानि नहीं बल्कि लाभ होगा. लेकिन आख़िर वो करेगा कौन? दलित और पिछड़े करना भी चाहें तो भी उसकी सीमा है.

तथाकथित अगड़ों के अगुवाई के बग़ैर यह संभव नहीं है पर उनमें से जो आगे आएगा, हो सकता है मार दिया जाए. अमरीका के महानतम राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने अपनी बिरादरी से बग़ावत कर जब 1865 में कालों को आज़ाद किया तो उन्हें मौत के घाट उतार दिया गया.

यहाँ भी जो उसकी कोशिश करेगा चाहे उसे मौत को गले न लगाना पड़े, लेकिन भारी क़ुर्बानी देनी होगी. ज़्यादातर अगड़ों के घर-घर की कहानी है कि आरक्षण वाले अयोग्य होते हैं और इसकी वजह से उनके बच्चे नौकरी पाने से वंचित हो जाते हैं.

यह पूर्वाग्रह शिक्षण संस्थाओं में काम करता रहता है. मेडिकल और इंजीनियरिंग में जहाँ आंतरिक मूल्यांकन होता है वहां पर दलित-आदिवासी और पिछड़े छात्रों के साथ भेदभाव अक्सर देखा जाता है. यहाँ तक कि संघ लोक सेवा आयोग में भी ये सरेआम किया जाता है.

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इनके साक्षात्कार के लिए अलग बोर्ड बनाया जाता है ताकि भेदभाव न हो लेकिन अब इसकी वजह से भेदभाव करना आसान हो जाता है क्योंकि सबको सारी बातें मालूम होती हैं.

जो लोग सोचते हैं कि आरक्षण से हानि होती है, उन्हें यह समझने की ज़रूरत है कि ये देश को जोड़ने और उसकी तरक्क़ी के लिए सबसे ताक़तवर कड़ी है. सैकड़ों और हज़ारों की संख्या में जब बाहरी आक्रमणकारी आते थे, आसानी से भारत पर विजय प्राप्त कर लेते थे तो क्या हम समझें कि हमारे बाज़ुओं में ताक़त नहीं थी, या उनसे दिमाग़ कम था.

हमलावर आएं या जाएं, नाई को तो बाल काटना था, लोहार को लोहे का काम, धोबी का कपड़ा, खटिक पासी का सूअर और सब्जी इत्यादि का काम और चमार को चमड़े का काम करना था. इस तरह से लोग जातियों में बंटें रहें और सोच वहीं तक सीमित थी. राष्ट्र और देश क्या है, यह अहसास कहाँ से होता?

आज़ादी के बाद यह बंधन कमज़ोर हुए हैं. आरक्षण से थोड़ा-बहुत सबको शासन-प्रशासन में भागीदारी मिली और भारतीय होने की सोच पैदा होने लगी.

जो लोग सोचते हैं कि इससे उत्पादन और दक्षता में प्रतिकूल असर पड़ेगा उन्हें अंदर झांकना होगा. इतनी बड़ी आबादी को भागीदारी नहीं दी जाएगी तो क्रय शक्ति कहाँ से आएगी जिसका सीधा संबंध उत्पादन और देश के विकास से है.

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लाखों स्कूल, हज़ारों कॉलेज और सैकड़ों विश्वविद्यालय, लाखों पत्रकार, लेखक, कवि, की इतनी बड़ी बुद्धजीवी व्यवस्था है लेकिन क्या वह अपने छात्रों को यह नहीं सिखा सकते कि स्वच्छ रहा जाए!

क्या इसके लिए प्रधानमंत्री को आह्वाहन करने की ज़रुरत थी? पढ़े-लिखे लोग भी लड़की छेड़ते हैं और पुरुषवादी हैं. शिक्षा का मतलब दिमाग़ी कटोरा में अलग-अलग विषयों की जानकारी जमा कर केवल नौकरी लेना भर नहीं है.

रोहित वेमुला ने जिस प्रश्न का उत्तर खोजा वह इसी सामाजिक व्यवस्था में उलझा हुआ है और देखते हैं कि कब तक सुलझता है?

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