दलित इतिहास माह: आख़िर कौन है जातिवादी, कहाँ है जातिवाद?- ब्लॉग

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    • Author, डॉ. अदिति नारायणी पासवान
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए

अप्रैल को 'दलित इतिहास माह' के तौर पर मनाया जाता है. ये महीना हर साल हम दलितों को ये याद दिलाता है कि हम अपने होने का जश्न मनाएं. ये जश्न संघर्षों और यादों का प्रतीक है.

ये महीना पूरे साल दुनियाभर में रहने वाले दलितों को एकजुटता की एक ज़िंदा मिसाल बनकर प्रेरणा देता है, चाहे वो कनाडा में रहते हों, ऑस्ट्रेलिया में, ब्रिटेन में या फिर अमेरिका में.

ऐसा नहीं है कि अप्रैल महीने में सिर्फ़ बाबा साहेब का ही जन्म हुआ था. इसी महीने में जाति व्यवस्था के ख़िलाफ़ संघर्ष करने वाले कई और नायकों ने भी जन्म लिया था. इनमें बाबू जगजीवन राम और महात्मा ज्योतिबा फुले भी शामिल हैं. 4 अप्रैल को हिंदुस्तान की आज़ादी की एक बहादुर योद्धा झलकारी बाई का बलिदान दिवस भी होता है.

दलित समुदाय के लोग अक्सर जाति व्यवस्था की गहरी दरारों में गिरकर गुम हो जाते हैं. उन्हें मुख्यधारा की शब्दावलियों और जश्नों में सदा के लिए भुला दिया जाता है, और आख़िरकार उन्हें आने वाली पीढ़ियों की यादों से भी हमेशा के लिए मिटा दिया जाता है.

अप्रैल का महीना हमें एक ऐसा झरोखा मुहैया कराता है कि हम अपने उन पुरखों की समृद्ध विरासत को याद कर सकें. हमारे इन पूर्वजों ने दलित समुदाय को हमेशा दबाकर और हाशिए पर धकेले रखने वाली जाति व्यवस्था के ख़िलाफ़ जो लड़ाइयां लड़ीं और जो क़ुर्बानियां दीं. हम इस महीने में उनके योगदान का मान-सम्मान करते हैं.

दलितों के संघर्ष का लंबा इतिहास

दलितों का प्रदर्शन

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1757 में हुआ प्लासी का युद्ध हो, जिसमें दुसाधों ने मुग़ल सम्राट के ख़िलाफ़ जंग लड़ी और उसे शिकस्त दी. या फिर, 1857 की बग़ावत. झलकारी बाई से लेकर मंगू राम और ऊदा देवी तक, इनमें से कितने लोगों के बारे में आप कितना जानते हैं?

इतिहास के पन्ने ऐसी तमाम दास्तानों से भरे पड़े हैं, जहाँ आज़ादी की लड़ाई लड़ने से लेकर, राष्ट्र निर्माण तक में हमारी भूमिकाओं की या तो अनदेखी की गई या फिर उसे मिटा दिया गया.

लेकिन दलितों का सबसे बड़ा संघर्ष तो उनका रोज़मर्रा का संघर्ष ही है. दलितों ने ये लड़ाई पानी के लिए, छुआछूत से निजात पाने के लिए, मेहनत का मान सम्मान पाने के लिए, मंदिरों में प्रवेश करने तक के लिए लड़ी हैं. मैं ये दावा तो नहीं करूंगी कि सदियों से हमारे हालात में कोई बदलाव नहीं आया है.

सामाजिक सुधारों को लेकर हमारी संस्कृति में जो मूल्य रचे बसे हैं. हमारे धर्म का जो बदलाव के मुताबिक़ ढलने का मिज़ाज है, और सबसे बड़ी बात ये कि हमारे संविधान में सामाजिक न्याय की जो बुनियाद पड़ी है, उन सबने मिलकर ये सुनिश्चित किया है कि हमें भागीदारी मिल सके.

बदलावों के बीच जातिवाद पर चर्चा

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आज जाति हमारी रोज़मर्रा की बातचीत का हिस्सा बनती जा रही है. हमारे इर्द-गिर्द जाति को लेकर हो रही चर्चाओं की वजह से आज जाति पर आधारित चेतना और उसके प्रति संवेदनशीलता बढ़ी है.

यहाँ तक कि बॉलीवुड किरदारों में भी बदलाव आते देख रहे हैं. लगान में जहाँ ‘कचरा’ का किरदार दिखाया गया था लेकिन आज बॉलीवुड फिल्मों में दलित किरदारों को अधिक जुझारू, अक़्लमंद और सक्षम इंसान के तौर पर पेश किया जा रहा है. 'चक्रव्यूह', 'मांझी दि माउंटेन मैन', 'सैराट', 'दहाड़', 'जय भीम', 'कांतारा' और 'कटहल' जैसी फिल्में इस बदलाव की मिसाल हैं.

इसके बावजूद हर दिन मैं सवर्ण-समृद्ध तबक़े से ताल्लुक़ रखने वाले ऐसे लोगों का सामना करती हूँ, जो इस बात पर ज़ोर देते हैं कि जातिवाद कोई बड़ी सामाजिक समस्या नहीं है क्योंकि उनकी नज़र में जाति आधारित भेदभाव समाप्त हो चुका है.

लेकिन जैसे ही शादी का मौक़ा आता है वे सजातीय जीवनसाथी की तलाश शुरू कर देते हैं, अँग्रेज़ी के अख़बारों में वैवाहिक विज्ञापनों के कॉलम जाति के आधार पर ही बँटे होते हैं और लोग केवल अपनी जाति के वर या वधू ढूँढते हैं, ये वही लोग हैं जो कहते हैं कि जाति के आधार पर भेदभाव नहीं करते.

ऐसे बुनियादी विरोधाभास मुझे ये सोचने पर मजबूर कर देते हैं कि लोग कैसे बेफ़िक्री से ये दावा कर लेते हैं किसी को उसकी जाति की वजह से कोई भेदभाव नहीं झेलना पड़ता, वे कहते हैं कि उन्होंने अपने ख़ानदान में कभी किसी को जातिवादी व्यवहार करते नहीं देखा.

जातिवाद को लेकर मिथ गढ़ने की कोशिशें

प्रतीकात्मक तस्वीर

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इसके अलावा जाति और उसकी ऐतिहासिक बुनियाद को लेकर भी नई कहानियाँ गढ़ी जा रही हैं. जाति को परिभाषित करने के लिए धार्मिक शास्त्रों से लेकर, जाति शब्द की उत्पत्ति का इतिहास खंगाला जा रहा है. वर्ण और जाति का अंतर बताने के लिए ढेरों किताबें लिखी जा चुकी हैं. व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी की दुनिया में ‘जाति’ शब्द की विचित्र समझ से जुड़ी जानकारियां भरी पड़ी हैं.

ज़ाहिर है, अंग्रेज़ी का कास्ट शब्द पुर्तगाली भाषा के ‘कैस्टस’ से बना है. इसी बात का चतुराई से इस्तेमाल करके कहा जाता है कि जाति एक पश्चिमी परिकल्पना है, जिसे अंग्रेज़ों ने हमें साम्राज्यवाद के पंजों में जकड़ने के लिए इस्तेमाल किया था.

वैसे मैं न तो इस शब्द की उत्पत्ति को लेकर कोई सवाल खड़ा करती हूँ और न ही इस बात से इनकार करती हूँ कि विदेशियों ने इसका दुरुपयोग किया. मुझे जो बात सबसे ज़्यादा तकलीफ़ देती है, वो दलितों की मौजूदा हालात. आज अपनी ताक़त दिखाने के लिए आख़िर कौन दलितों का बलात्कार कर रहा है? आज के समाज में हम कहां खड़े हैं?

हम अपनी ऐतिहासिक भूमिका को दोबारा हासिल करना चाहते हैं, ताकि भविष्य में हम इज़्ज़त की ज़िंदगी जी सकें.

ऐसे बहुत से लोग हैं जिनको पूरा यक़ीन है कि देश में कोई जातिवादी भेदभाव नहीं है. वो ये भी बताना नहीं भूलते कि उन्होंने अपने बुज़ुर्गों को दलितों के साथ अच्छा व्यवहार करते देखा है. मुझे तो पानी जैसी बुनियादी ज़रूरत की चीज़ के लिए अपने समुदाय का सदियों का संघर्ष अच्छी तरह याद है.

मगर कई बार उनके ऐसे दावे सुन-सुनकर दिल-दिमाग़ थक जाता है कि देश में अब जातिवादी व्यवहार नहीं होता, जब भी कोई ये कहता है कि उसने तो जातिवाद नहीं देखा, तो इस बात की पक्की संभावना होती है कि वो किसी सवर्ण-समृद्ध परिवार में पैदा हुए होंगे.

वो क्या जाने पीर पराई

जातिवाद के खिलाफ प्रदर्शन

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ऐसे में सवाल ये है कि जिस शख़्स ने कभी जाति के नाम पर होने वाले ज़ुल्म झेले ही नहीं, वो भला हमारी कई पीढ़ियों के दर्द को कैसे समझ सकेगा? आप दलितों को कहने दें कि उन्होंने जातिवाद का दर्द नहीं झेला. जो पीड़ित और शोषित रहे हैं, ज़रा वो भी तो अपनी ज़ुबान से एलान करें कि उनकी तकलीफ़ों का अंत हो गया है.

अगर किसी ने जातिवाद को नहीं झेला, तो ये उसका सौभाग्य है लेकिन ये हक़ीक़त नहीं है कि जातिवाद नहीं है. सामाजिक सच्चाइयों के प्रति ऐसी बेख़बरी तकलीफ़ पहुँचाती है. जातिवाद की बातें सुनकर और ख़ासतौर से तब, जब मैं एक दलित महिला के तौर पर अपने तजुर्बे साझा करती हूँ तो लोगों के चेहरों पर जो हैरानी का भाव उभरता है वो उनकी जहालत की गवाही दे रहा होता है.

उनकी नादानी हमारे संघर्ष को हाशिए पर धकेल देती है. और जब हम अपने तजुर्बे बयान करते हैं तो हमें ये एहसास दिलाया जाता है कि हम ये सारी बातें आरक्षण पाने के लिए कह रहे हैं. आरक्षण न तो कोई ख़ैरात है, और न ही ये पुरानी करतूतों का प्रायश्चित है. ये उस समानता और बराबरी की तरफ़ बढ़ने के लिए हमारा अधिकार है, जिसके लिए बाबासाहेब ने संघर्ष किया था, और जिसके लिए हम अब भी लड़ाई लड़ रहे हैं.

आज विदेशी ताक़तें हमारा देश छोड़कर जा चुकी हैं और हमारे देश में कोई ये नहीं कहता कि वो जाति व्यवस्था में यक़ीन करता है, या फिर जातिवादी बर्ताव करता है.

तो फिर ये सब कौन कर रहा है?

दलितों का प्रदर्शन

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ऐसे में मेरे ज़हन में सवाल उठते हैं कि फिर आख़िर दलित लड़कियों से बलात्कार करके उन्हें कौन ज़िंदा जला रहा है? सीवर साफ़ करते हुए दलित क्यों मर रहे हैं? आज भी घोड़े पर चढ़ने के लिए क्यों गोली मारी जा रही है? आज भी मूंछें रखने पर दलितों का क़त्ल क्यों हो रहा है? आज भी क्यों ताक़त दिखाने का सार्वजनिक मंच किसी दलित के शरीर को समझा जाता है? ये ज़ुल्म कौन ढा रहा है?

मैं मिसालों के ज़रिए ख़ुद को पीड़ित के तौर पर पेश करने की कोशिश नहीं कर रही हूँ लेकिन, सवाल ये है कि ऐसा कौन कर रहा है? अक्सर सुना जाता है कि फलाँ दलित नेता सत्ता का भूखा है. निश्चित रूप से हम सत्ता के केंद्र में रहना चाहते हैं. सदियों से हम हुकूमतों के हाशिए पर धकेले जाते रहे हैं. अब हम सत्ता का स्वाद चखना चाहते हैं.

हम एक ऐसा नेटवर्क, ऐसा इकोसिस्टम बनाना चाहते हैं, जहां अमेज़न में काम करने वाले, सिएटल में रहने वाले लोग हमें भी जानते हों ताकि वो हमारा बायोडेटा आगे बढ़ा सकें. हम भी कैम्ब्रिज में रहने वालों से अपना परिचय बढ़ाना चाहते हैं, जिससे वो हमें हमारे करियर में आगे बढ़ने में मदद कर सकें.

हमें इन सबसे वंचित रखा जाता रहा है. अब हम ये सब चाहते हैं और हम अपना ये अधिकार मज़बूती से जताने का इरादा भी रखते हैं.

दलित इतिहास माह में आइए स्वीकार करें कि हम सब जातिवादी हैं. हम सभी किसी न किसी रूप में जातिवादी बर्ताव करते हैं. जाति हमारी चेतना की गहराइयों में रची बसी है. एक संस्थागत व्यवस्था के रूप में जाति के गहरी जड़ें जमाए होने की इस सच्चाई को अगर हम स्वीकार नहीं कर सकते हैं, तो फिर बाबासाहेब के नाम पर सोशल मीडिया पर पोस्ट लिखना बेमानी है.

सबसे पहले हमें ये मानना होगा कि जाति का अस्तित्व है. इसको स्वीकार करना होगा, इसके प्रति संवेदनशील होना होगा. उसके बाद ही हम ख़ुद को जाति की बंदिशों से आज़ाद करने की चर्चा शुरू कर सकते हैं.

(लेखिका दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाती हैं. ये उनके निजी विचार हैं.)

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