गुजरात: बारात में हुई घुड़चढ़ी तो दलितों का किया बहिष्कार

इमेज स्रोत, MANUBHAI PARMAR
- Author, रॉक्सी गागडेकर छारा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, मेहसाणा से
गुजरात के मेहसाणा में एक दलित की घुड़चढ़ी के बाद पूरे दलित समुदाय को सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ रहा है.
यहां तक कि इस मामले को सुलझाने के लिए गुजरात के उप-मुख्यमंत्री नितिन पटेल को मेहसाणा के कडी तालुका के ल्हौर गांव आना पड़ा.
लेकिन विडंबना ये है कि जिस समय वो दोनों समुदायों में समझौते की घोषणा कर रहे थे, उसी दौरान तीन दलित लड़कियों को गांव की आटा चक्की से आटा देने से मना किया जा रहा था.
भले ही लोकसभा चुनाव के बाकी दो चरणों और गुजरात में पानी की कमी की ख़बरें सुर्ख़ियों में हैं लेकिन गुजरात के उप-मुख्यमंत्री ने शुक्रवार को दिन भर दलितों को मनाने में बिताया.
राजनीति पर नज़र रखने वालों का कहना है कि इस गांव में उप-मुख्यमंत्री का पूरा दिन बिताना दिखाता है कि बाकी बचे दो चरणों में इसके असर को लेकर वो गंभीर हैं.
पटेल पहले गांव के सभी लोगों से मिले और उसके बाद उन्होंने दलित मोहल्ले का दौरा किया. शाम को उन्होंने दोनों पक्षों में समझौते की भी घोषणा की.
हालांकि, दलितों के अधिकारों के लिए काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता कौशिक परमार ने बीबीसी को बताया कि कोई समझौता नहीं हुआ, "हमने समाज के नेताओं के सामने पांच मांगें रखी हैं, जब तक मांगें पूरी नहीं होतीं, सुलह संभव नहीं है."
क्या हैं मांगें?
कौशिक परमार का कहना है कि हमारी पहली मांग है कि गाँव के नेता इस बात का लिखित आश्वासन दें कि दलित समुदाय के साथ कोई छुआछूत नहीं होगी.
इसके अलावा दलितों पर झूठे आरोप न लगाए जाएं. नितिन पटेल के बाद वडगाम के विधायक जिग्नेश मेवाणी भी दलित परिवार से मिलने पहुंचे.
मीडिया से बात करते हुए, जिग्नेश मेवाणी ने कहा कि किसी भी समाज का नुकसान न हो, सरकार को ऐसा एक फ़ॉर्मूला बनाना चाहिए.

क्या है मामला?
24 वर्षीय मेहुल परमार पिछले तीन सालों से अहमदाबाद में काम कर रहे हैं. जब शादी तय हुई तो उन्होंने फ़ैसला किया कि वो अपनी बारात में घोड़े पर चढ़ेंगे.
हालाँकि, इस गांव में पहले ऐसा नहीं हुआ था.
इस गाँव में दलितों को घोड़े पर बैठना मना है, लेकिन मेहुल की मंशा थी कि अगर दूसरे लोग घोड़े पर बैठ सकते हैं, तो वो क्यों नहीं?
मामला मीडिया और पुलिस तक पहुंच गया और 7 मई, 2019 को मेहुल घोड़े पर अपनी बारात लेकर निकले, लेकिन दूसरे दिन से ही गाँव के सभी दलितों को सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ा.
8 मई की सुबह से, दलितों को किसी भी दुकान से कोई भी राशन, दूध या कोई अन्य सामान नहीं दिया गया.
उन्हें आटा चक्की पर गेहूं पीसने से भी मना कर दिया गया, लोगों ने दलितों से बात बंद कर दी. सामाजिक बहिष्कार के बाद मनुभाई परमार ने पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज की.
पुलिस ने सरपंच, उप-सरपंच सहित गांव के पांच लोगों को गिरफ़्तार किया, जिनमें सरपंच विजू ठाकोर, उप-सरपंच बलदेव ठाकोर, भूपा ठाकोर, गाबाजी ठाकोर और मनुभाई बारोट शामिल हैं.
सभी को कोर्ट में पेश करने के बाद जेल भेज दिया गया. उनके ख़िलाफ़ एससी-एसटी एक्ट की धारा 3 (1), 3 (2) 5 ए और आईपीसी की धारा 143, 504 और 506 के तहत मामला दर्ज किया गया है.
केवल 2,500 की आबादी वाले इस गांव में ठाकोर, मुस्लिम, रबारी, ब्राह्मण और दलित समुदाय के लोग रहते हैं. दलितों के बहिष्कार के बाद इस गांव में तनाव व्याप्त है.

दलित कार्यकर्ता मार्टिन मैक्वान ने कहा कि डॉ. भीमराव अंबेडकर के विचार के अनुसार, दलित अब बहुत कुछ सीख रहे हैं, वे अपनी आजीविका में सुधार कर रहे हैं, वे अब कानून को ठीक से समझते हैं और उसका इस्तेमाल करते हैं.
वह कहते हैं, "इस वजह से, अन्य समुदायों के लोग हैरान हैं. पूरे देश में, दलित अब अन्याय के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा रहे हैं."
गाँव में प्रवेश करने के साथ ही एहसास होता है कि यहाँ कुछ भी ठीक नहीं है. प्रवेश द्वार के पास एक बड़ा मंदिर है, जहाँ आगंतुकों की जगह एसआरपी के जवान दिखते हैं. गाँव की लगभग हर सड़क पर सशस्त्र पुलिस और उनकी गाड़ियां दिखाई देती हैं.
पंचायत के कार्यालय के बाहर भारी संख्या में पुलिसकर्मी मौजूद हैं. इस गाँव में ट्रैक्टर से ज़्यादा पुलिस की गाड़ियां दिखाई दे रही हैं.
बीबीसी गुजराती से बात करते हुए मेहसाणा की पुलिस उपाधीक्षक मंजीता वंजारा ने कहा कि एसआरपी (लगभग 90 पुलिस कर्मियों) की एक टीम, और स्थानीय पुलिस को गांव में तैनात किया गया है.
वह कहती हैं, "गांव में स्थिति नियंत्रण में है और जब तक पूर्ण शांति स्थापित नहीं हो जाती, पुलिस नहीं हटाई जाएगी."

हालांकि, ज़मीनी हालात कुछ और दिखाई देते हैं. एक तरफ़ दलित खुलकर अपना आक्रोश ज़ाहिर कर रहे थे और वे हर मीडियाकर्मी को अपने साथ होने वाले भेदभाव के बारे में बता रहे थे.
दूसरी ओर, ग़ैर दलित मानते हैं कि दलितों ने शिकायत कर गांव का नाम बदनाम किया है.
उप-मुख्यमंत्री का दौरा
शुक्रवार सुबह मीडियाकर्मियों को एक संदेश मिला कि जिग्नेश मेवाणी शाम को ल्हौर गांव के दलित समुदाय से मिलने जाएंगे.
हालांकि जिग्नेश मेवाणी के पहुंचने से पहले नितिन पटेल परिवार के साथ चर्चा करने पहुंच गए थे.
इसके अलावा कांग्रेस नेता नौशाद सोलंकी भी गांव पहुंचे.
सुबह-सुबह जब हम ग्राम पंचायत कार्यालय पहुँचे, तो सरकारी कर्मचारी कार्यालय की जाँच कर रहे थे.
कुर्सियां साफ की जा रही थीं और नितिनभाई की मुलाक़ात की तैयारी सुबह से चल रही थी.

लगभग 11.30 बजे वो पहुंचे और 45 से 50 मिनट तक बात करने के बाद कर्मचारियों से बोले, "चलो अब हरिजन बस्ती चलते हैं."
उन्होंने घुड़चढ़ी के कारण सामाजिक बहिष्कार के मुद्दे के अलावा कोई और शिकायत नहीं सुनी.
कई लोगों ने पीने के पानी और सड़कों की शिकायत की, लेकिन इन पर उन्होंने ध्यान नहीं दिया और कहा कि सामाजिक बहिष्कार के दोषियों को जेल भेज दिया गया है.
नितिन पटेल ने दावा किया कि गुजरात में दलितों की स्थिति अन्य राज्यों की तुलना में बेहतर है और इस तरह की घटनाएं बहुत कम हैं, लेकिन उन्हें बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है.
हालांकि, दलित कार्यकर्ता मार्टिन मैक्वान का कहना है कि गुजरात उन प्रमुख पांच राज्यों में से एक है, जहां देश भर में दलितों का उत्पीड़न बढ़ा है.
वह कहते हैं, "सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, साल 2013 से 2017 के दौरान राज्य में दलितों पर अत्याचार में 32% बढ़ोत्तरी हुई है."
सामाजिक कार्यकर्ता कांतिलाल परमार ने गुजरात पुलिस के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि जुलाई 2011 से जुलाई 2016 तक राज्य में दलितों पर अत्याचार के 6,000 से अधिक मामले सामने आए हैं. जिसमें 131 हत्या के और 346 बलात्कार के मामले हैं.
इस गांव में रहने वाले लगभग 200 दलित लोग हर दिन छुआछूत का सामना करते हैं.

जब हमने यहां की महिलाओं से बात करने की कोशिश की, तो उन्होंने इस बारे में खुलकर बात की.
सीमा परमार नाम की एक लड़की ने कहा कि उन्हें नवरात्रि में गरबा खेलने से मना कर दिया गया बल्कि देखने की भी अनुमति भी नहीं दी गई.
खेतिहर महिला मज़दूरों ने बताया कि पानी पीने के लिए उन्हें अपने घर से ग्लास लाना पड़ता है.
वीनाबेन परमार कहती हैं, "अगर आप ग्लास लेकर नहीं गए तो अपने हाथों से पानी पीना होगा. वे हमारे हाथों पर पानी डालेंगे और हमें इस तरह से पानी पीना पड़ता है."
भरत परमार दलित हैं और वह रिक्शा चलाते हैं. उन्होंने कहा कि गांव का कोई भी नाई उनके बाल नहीं काटता. बाल काटने के लिए उन्हें शहर जाना पड़ता है.
वह कहते हैं कि "बाल कटाने से अधिक तो किराया लग जाता है."
मार्टिन मैक्वान के अनुसार, "2010 में हमारे शोध के अनुसार, गुजरात के गांवों में 98 तरह के अलग-अलग छुआछूत बरते जाते हैं."
उल्लेखनीय है कि इस रिपोर्ट को गुजरात सरकार ने ख़ारिज कर दिया था.
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