जिस दलित युवा छगनलाल की प्रतिभा को गांधी ने पहचाना था

इमेज स्रोत, Kiran Thaker
- Author, डॉक्टर रिज़वान क़ादरी
- पदनाम, इतिहासकार, बीबीसी के लिए
महात्मा गांधी ने जब 12 मार्च 1930 को दांडी यात्रा शुरू की तो दुनिया भर के पत्रकार इस ऐतिहासिक पल का गवाह बनने सत्याग्रह आश्रम साबरमती पहुंचे थे.
इस ऐतिहासिक मौक़े पर उस वक़्त 27 साल के छगनलाल जाधव भी मौजूद थे. उन्होंने इस पूरी ऐतिहासिक यात्रा को रेखाचित्रों के ज़रिए दर्ज किया था. छगनलाल जाधव के रेखाचित्रों की पूरी कड़ी अब किताब के रूप में आ गई है.

इमेज स्रोत, Kiran Thaker
ये रेखाचित्र आख़िर मिले कैसे?
मुझे ये रेखाचित्र अहमदाबाद के साप्ताहिक हाट गुजरी बाज़ार में मिले. वहीं पता चला कि इन रेखाचित्रों का संबंध छगनलाल से है. मैं इन रेखाचित्रों को देखकर हैरान था. इन्हें देखते हुए ऐसा लगता है कि गांधी युग फिर ज़िंदा हो गया हो.

इमेज स्रोत, RIZWAN QADRI
छगनलाल के ज़्यादातर रेखाचित्र 'शोक धारा', 'प्रकाश', 'प्राती', 'गुणहित', 'विश्वरूप', 'निर्णय क्षण', 'मंगल प्रभात' से जुड़े हैं. गांधी से जुड़े दुनिया भर के संग्रहालयों में दांडी यात्रा से जुड़ी चीज़ें तो मिल जाती हैं, लेकिन ये रेखाचित्र लंबे समय तक गुमनाम रहे थे.
जब अहमदाबाद के गुजरी बाज़ार में छगनलाल के रेखाचित्रों की किताब मिली तो हम हैरान रह गए थे. जाने-माने लेखक निरंजन भगत तो इसे देख चकित रह गए. उन्होंने इसे देखते ही कहा, ''अरे, ये तो दांडी यात्रा के रेखाचित्र हैं. छगनभाई ने मुझसे अपने रेखाचित्रों के शौक के बारे में कई बार बताया था.''

इमेज स्रोत, Kiran Thaker
छगनलाल के शिष्य रहे कलाकार अमित अंबालाल याद करते हुए बताते हैं, ''मैंने इन रेखाचित्रों के संग्रह को उनकी डायरी में देखा था. अगर उनकी डायरी मिल जाए तो इससे जुड़ी कई नई सूचनाएं मिल सकती हैं.''
छगनलाल अरुणोदय टुकड़ी का हिस्सा थे. अरुणोदय यात्राओं का आयोजन करता था. वो जब इस ऐतिहासिक पल के गवाह बने तो पूरी यात्रा को रेखाचित्रों में समेट लिया.''

इमेज स्रोत, Kiran Thaker
गांधीजी ने कभी नहीं सोचा था कि जिस अंत्यज रात्रिशाला की स्थापना उन्होंने की थी उसका एक छात्र छगनलाल होगा और वो उनकी ऐतिहासिक यात्रा को ख़ुद के बनाए रेखाचित्रों में क़ैद कर लेगा.
11 सितंबर 1935 को इसे लोगों के विरोध का सामना करना पड़ा था. बापू दूधाभाई नाम के एक दलित को सत्याग्रह आश्रम में लाए थे. इसी दौरान आश्रम के बगल के गांव कोचराब में एक अंत्यज रात्रिशाला (नाइट स्कूल) की स्थापना की थी.

इमेज स्रोत, Kiran Thaker
12 साल के छगन जाधव एक दलित स्टूडेंट थे और वो अहमदाबाद में वदाज से चार से पांच किलोमीटर पैदल चलकर कोचराब आते थे.
इस रात्रिशाला में परीक्षितलाल मजूमदार एक शिक्षक थे. ऐसा कहा जाता है कि छगनलाल के साथ मजूमदार को भी गांधीजी का आशीर्वाद मिला था. छगन जाधव गांधीजी के मार्गदर्शन में पले-बढ़े और आगे चलकर छगनलाल बने. गांधीजी ने ही छगनलाल की रचनात्मक प्रतिभा को पहचाना था.

इमेज स्रोत, Kiran Thaker
छगनलाल के जीवन में मुश्किलें भी आईं. नौकरी छोड़ उन्होंने रात्रिशाला जॉइन की और यहीं पढ़ाई की. बाद में वो इसी स्कूल में शिक्षक बन गए. छगनलाल कोई प्रशिक्षित कलाकार नहीं थे, लेकिन गांधीजी को उनकी कला की परख थी. गुजरात विद्यापीठ में उन्हें छात्रवृत्ति मिली.
गुजरात विद्यापीठ में ही वो जाने-माने कलाकार कनु देसाई के स्टूडेंट बन गए. छगनलाल को गांधीजी ने कला गुरु रविशंकर रावल से भी मिलवाया था. 31 जुलाई को आख़िरी बार गांधीजी आश्रम गए और प्रार्थना सभा में शामिल हुए.

इमेज स्रोत, Kiran Thaker
जब बापू आश्रम छोड़ने लगे तो भावुक हो गए थे. इन सारे पलों को छगनलाल ने अपने रेखाचित्र में समेटा है. एक रेखाचित्र पर तो गांधी जी ने अपना हस्ताक्षर किया है.
छगनलाल की पहचान आधुनिक गुजरात के जनक के रूप में है. कलाकार प्यार से इन्हें छगन काका कहते हैं. छगनलाल का 84 साल की उम्र में 12 अप्रैल, 1978 को निधन हो गया था. छगनलाल भले इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उन्होंने बापू को अपनी कला में ज़िंदा रखा है.

इस रेखाचित्र की किताब में गांधी के नेतृत्व में स्वतंत्रता संग्राम के 1930 से 38 तक का दौर देखा जा सकता है. यह एक ऐसा दस्तावेज़ है जो दांडी यात्रा के उत्साह और उसके महत्व से परिचित कराता है. इस किताब का नाम है दांडी यात्रा के अनदेखे रेखाचित्र.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)












