शांभवी चौधरी बोलीं- लोग पूछते हैं कि सवर्ण से शादी कर दलितों का भला कैसे करूंगी

अपने माता-पिता और पति के साथ मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से मिलतीं शांभवी चौधरी.

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    • Author, विष्णु नारायण
    • पदनाम, बीबीसी हिन्दी के लिए

क़रीब 26 साल की शांभवी चौधरी किसी राजनीतिक पार्टी की आम कार्यकर्ता होतीं और सब कुछ उनके पक्ष में होता तब भी इस उम्र में सत्ताधारी गठबंधन का टिकट शायद ही उन्हें मिल पाता.

शांभवी के पिता अशोक चौधरी जेडीयू नेता हैं और नीतीश कुमार की सरकार में मंत्री हैं. शांभवी को समस्तीपुर से लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) ने उम्मीदवार बनाया है.

पिता जेडीयू से नीतीश सरकार में मंत्री और बेटी चिराग पासवान की पार्टी की लोकसभा उम्मीदवार.

चिराग और नीतीश कुमार दोनों ही बीजेपी की अगुआई वाले एनडीए गठबंधन का हिस्सा हैं.

समस्तीपुर से अभी चिराग पासवान के चचेरे भाई प्रिंस राज सांसद हैं.

लेकिन 2021 में पार्टी तोड़कर चिराग से अलग हो जाने के कारण प्रिंस इस बार टिकट नहीं पा सके.

शांभवी चौधरी को जब टिकट मिला तो वह ख़ुशी से दौड़ती हुई आईं और अपने पिता से गले लगकर रोने लगीं.

अशोक चौधरी ने अपनी बेटी से पूछा- “तुम रो क्यों रही हो. ये तो तुम्हारा ड्रीम था. तुम्हारा ड्रीम पूरा हो रहा है. “

अशोक चौधरी और शांभवी का यह वीडियो सोशल मीडिया पर ख़ूब वायरल हुआ.

वीडियो कैप्शन, शाम्भवी चौधरी कौन हैं, जिन्हें चिराग पासवान ने चचेरे भाई के ख़िलाफ़ टिकट दिया
अपने पति, पिता, ससुर, सास और मां के साथ शांभवी चौधरी (बाएं से दाएं).

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तीसरी पीढ़ी की नेता हैं शांभवी

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शांभवी बिहार की उन चंद लड़कियों में से हैं, जिनके पिता ड्रीम पूरा करने की हैसियत रखते हैं.

जेडीयू में आने से पहले अशोक चौधरी कांग्रेस में थे. वे कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष भी रहे. लेकिन बिहार कांग्रेस में कोई नेता लंबे समय तक टिकता नहीं है, अशोक चौधरी भी नहीं टिके.

अशोक चौधरी बिहार के प्रमुख दलित नेता हैं, लेकिन उन्होंने जातीय बंधन तोड़ा भी है. अशोक चौधरी ने जाति से बाहर शादी की और उनकी बेटी शांभवी ने भी ऐसा ही किया.

शांभवी की शादी बिहार के चर्चित आईपीएस अधिकारी किशोर कुणाल के बेटे सायण कुणाल से हुई है. सायण कुणाल भूमिहार जाति से ताल्लुक रखते हैं.

किशोर कुणाल 80 के दशक में ​पटना के एसएसपी थे, तब वहां हुए बॉबी हत्याकांड की जांच के कारण वे बहुत चर्चित हुए थे.

उन्होंने अपनी धार्मिक और सामाजिक गतिविधियों से भी बिहार में एक ख़ास पहचान बनाई है. वह पटना के प्रसिद्ध महावीर मंदिर से सालों से जुड़े रहे हैं. यह मंदिर अपने ट्रस्ट के ज़रिए पटना में कई अस्पतालों का संचालन करता है.

अशोक चौधरी बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के क़रीबियों में से एक हैं. कहा जा रहा है कि सायण कुणाल ख़ुद ही चुनाव लड़ना चाहते थे, लेकिन स्थिति ऐसी बनी कि शांभवी को मैदान में उतरना पड़ा.

शांभवी चौधरी के दादा महावीर चौधरी भी राजनीति में थे. वे कांग्रेस के नेता थे और बिहार विधानसभा के लिए 9 बार चुने गए. वे राज्य की कई सरकारों में मंत्री रहे. मई 2014 में उनका निधन हुआ.

लोजपा (रामविलास) के अध्यक्ष चिराग पासवान, वैशाली से उम्मीदवार वीणा देवी (सबसे बाएं) और खगड़िया से उम्मीदवार राजेश वर्मा (शांभवी के पीछे) के साथ शांभवी चौधरी.

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पति सायण और चिराग की दोस्ती काम आई

शांभवी हाल में राजनीति में आईं. पहली बार किसी राजनीतिक पार्टी की सदस्य बनीं और उन्हें लोकसभा का टिकट मिल गया.

उनसे जब इसे विशेषाधिकार के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा, ''मेरी पैदाइश एक राजनीतिक परिवार में हुई है. मैंने अपने बचपन से ही दादाजी और पिताजी को लोगों की सेवा करते देखा. मेरी भी हमेशा से ऐसी इच्छा रही कि बड़े होकर इस लायक़ बनूँ कि जनता की सेवा कर सकूँ.''

वो कहती हैं, ''वहीं से मेरी राजनीतिक दिलचस्पी शुरू हुई. हाँ, एक बात ज़रूर रही कि मैंने यह कभी नहीं सोचा था कि मुझे इतनी जल्दी पॉलिटिकल ब्रेक मिल जाएगा.''

शांभवी चौधरी

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शांभवी कहती हैं, ''चिराग मुझे भी अच्छी तरह से जानते हैं. हालाँकि शुरुआत में राजनीतिक बातें नहीं होती थीं, लेकिन चुनाव नज़दीक आने पर हमने अपनी इच्छा उनके सामने प्रकट की और उन्होंने मुझे मौक़ा दे दिया. उन्होंने समस्तीपुर से मुझे अपना उम्मीदवार बनाया लेकिन ये एक दिन में नहीं हो गया. कई बार बातचीत हुई. पार्टी के सर्वे भी हुए. इसके लिए मैं उनका शुक्रगुज़ार हूँ.''

सायण लॉ में ग्रैजुएशन और मास्टर करने के बाद पटना से संचालित ज्ञान निकेतन बॉयज़ स्कूल के निदेशक भी हैं. इस स्कूल की स्थापना उनके पिता किशोर कुणाल ने की थी.

हाल के दिनों में सायण राजनीतिक मंचों पर भी दिखाई दिए. बीते वर्ष जेडीयू की ओर से आयोजित भीम संसद में उनके नाम की तख़्तियाँ भी देखी गईं. ससुर (अशोक चौधरी) की उपस्थिति में सायण ने ख़ुद को फ़्रंट से लीड करने के बजाय पीछे ही रखा.

पति सायण के साथ शांभवी.

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अंतरजातीय विवाह पर क्या बोलीं शांभवी

पटना के आभिजात्य कॉन्वेन्ट स्कूलों में शुमार ‘नॉट्रेडैम एकेडमी’ से शुरुआती पढ़ाई के बाद शांभवी चौधरी ने दिल्ली विश्वविद्यालय के लेडी श्री राम कॉलेज से ग्रैजुएशन और दिल्ली स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स से मास्टर्स की डिग्री हासिल की है.

शांभवी फ़िलहाल अपने पति के ज्ञान निकेतन गर्ल्स स्कूल की निदेशक हैं.

अंतरजातीय विवाह के बारे में शांभवी कहती हैं, ''मैं अपने अनुभव की तुलना दूसरी महिलाओं से नहीं कर सकती. मैं एक ऐसे परिवार से आती हूँ, जहाँ सभी शिक्षित हैं. मेरे माता-पिता की शादी भी अंतरजातीय ही थी. मेरे परिवार में तो अंतरधार्मिक शादी भी हुई है. मेरे ससुराल पक्ष के लोग भी बहुत अच्छे हैं. मेरी सास भी बाहर काम करती हैं. ऐसे में मुझे पढ़ाई या फिर बाक़ी चीज़ों के लिए वैसी लड़ाई नहीं लड़नी पड़ी.''

शांभवी चौधरी कहती हैं, ''हमने अपने इर्द-गिर्द हमेशा देखा है कि महिलाओं को दो शिफ़्ट में काम करना पड़ता है, लेकिन उसकी गिनती नहीं होती. मेरे रिश्तेदारों के फोन आ रहे हैं कि मेरे बजाय सायण को राजनीति में जाना चाहिए था. ऐसी स्थिति में मैं परिवार को कैसे मैनेज करूँगी? मेरे मन में सवाल उठता है कि क्या यह सवाल कभी पुरुषों से पूछे जाते हैं?''

अपनी मां, पिता, ससुर, सास और पति के साथ शांभवी चौधरी.

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जाति से बाहर विवाह करने के बाद सुरक्षित (एससी) सीट से उम्मीदवारी के सवाल पर वो कहती हैं, ''मैं इस बात को समझती हूँ कि कैसे राजनीति में जातियों को एकजुट रखने की बातें कही जाती हैं. मुझसे भी ऐसे सवाल होते हैं कि मैं दलितों का काम कैसे करूँगी जबकि मैंने सवर्ण से शादी की है.''

उन्होंने कहा, ''सायण से भी सवाल होते हैं कि वो भूमिहारों की आवाज़ कैसे बनेंगे जबकि उन्होंने एक दलित से शादी की है. यह एक ग़लत सोच है. लोगों को ऐसा फ़ीड कर दिया जाता है कि सिर्फ़ संबंधित जाति के लोग ही उस जाति के हितों की रक्षा करेंगे. यह एक सेट नैरेटिव है और हमने तो शादी इंसान देखकर की है न कि जाति देखकर.''

शांभवी कहती हैं कि उनके लिए चिराग पासवान और पिता अशोक चौधरी उनके आदर्श हैं.

शांभवी चौधरी कहती हैं, ''सबसे पहले तो मेरे पिता ही मेरे लिए आदर्श हैं. किसी भी बेटी के लिए उसके माता-पिता की भूमिका अलग ही होती है. आज मेरे कुछ भी होने के पीछे वो बड़ी वजह हैं. मैं उनसे ही प्रेरणा लेती हूँ कि कैसे किसी भी परिस्थिति में वे लोगों के लिए खड़े रहते हैं.''

शांभवी कहती हैं, ''बात आज की राजनीति और अन्य चीज़ों को लेकर करें तो चिराग भैया ने मुझे बहुत प्रभावित किया है. राज्य को लेकर उनके विज़न ‘बिहार फर्स्ट, बिहारी फर्स्ट’ से मैं बहुत प्रभावित हूँ.''

''जिस तरीक़े से उन्होंने अपनी पार्टी और ख़ुद को बाहर निकाला, वो भी इतने बड़े झटके के बाद, ये तो क़ाबिल-ए-तारीफ़ है. मैं ईश्वर से तो सिर्फ़ प्रार्थना कर सकती हूँ कि वो मुझे भी चिराग भैया की तरह राजनीति करने की ताक़त दे. वह ख़ुद को शून्य से शिखर की ओर ले गए हैं.''

शांभवी के लिए समस्तीपुर में कितनी संभावना

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शांभवी की उम्मीदवारी लगभग वैसी ही दिखाई दे रही जैसी पिछले आम चुनाव में कांग्रेस नेता और फ़िलहाल कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश प्रसाद सिंह के बेटे आकाश कुमार सिंह की थी.

2019 में अखिलेश प्रसाद सिंह कांग्रेस में रहते हुए अपने बेटे को महागठबंधन के घटक दल उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक समता पार्टी से मोतिहारी लोकसभा सीट से उम्मीदवार बनाने में सफल रहे थे. हालाँकि तब आकाश बीजेपी के राधामोहन सिंह से चुनाव हार गए थे.

इस बार यह सीट कांग्रेस को मिली है और कांग्रेस ने अभी तक यहाँ अपने उम्मीदवार की घोषणा नहीं की है.

शांभवी को भले टिकट मिल गया है लेकिन उनकी लड़ाई एकतरफ़ा नहीं है. समस्तीपुर में कई लोग शांभवी को बाहरी उम्मीदवार होने का मुद्दा उठा सकते हैं. समस्तीपुर के सामाजिक कार्यकर्ता डीएस पुष्पेंद्र कहते हैं, ''यहाँ लंबे समय से मांग रही है कि प्रत्याशी स्थानीय हो. लेकिन एनडीए पिछले दो बार से बाहरी प्रत्याशी थोप रहा है. प्रिंस राज भी समस्तीपुर के नहीं थे और शांभवी भी यहाँ से नहीं हैं. जो बाहरी होते हैं, उन्हें स्थानीय समस्याओं और मुद्दों की समझ नहीं होती है.''

समस्तीपुर में ओबीसी मतदाता तादाद में सबसे ज़्यादा हैं. इनमें यादव और कुशवाहा मतदाताओं का दबदबा माना जाता है. पारंपरिक रूप से यादव राष्ट्रीय जनता दल को वोट करते रहे हैं और कुशवाहा नीतीश कुमार की जेडीयू को. ऐसे में शांभवी को कुशवाहा वोटरों का मत तो मिल सकता है लेकिन यादवों को अपने पाले में करना बड़ी चुनौती होगी.

यहाँ मुस्लिम मतदाता भी 12 फ़ीसदी से ज़्यादा हैं. शांभवी के लिए मुसलमानों को भी लुभाना आसान नहीं होगा. समस्तीपुर में दलित मतदाता 19 फ़ीसदी से ज़्यादा हैं लेकिन दलितों का वोट भी कई उपजातियों में बँटा है. दूसरी तरफ़ सवर्ण से शादी के कारण शांभवी की दलित पहचान को लेकर भी कई लोग सवाल उठाते हैं.

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