चिराग पासवान: किसके कितने पास, किससे कितने दूर?

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- Author, चंदन कुमार जजवाड़े
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पटना से
"मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बिहार को जलता हुआ छोड़ कर ख़ुद प्रधानमंत्री बनने का सपना पूरा करने दिल्ली जा रहे हैं. जिनसे बिहार नहीं संभल रहा वो विपक्ष क्या संभालेंगे."
ये शब्द हैं एलजेपी नेता चिराग पासवान के, जो उन्होंने पिछले गुरुवार को नीतीश कुमार की दिल्ली यात्रा को लेकर कहे थे.
चिराग पासवान का बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर इस तरह का हमला किसी हैरानी की बात नहीं है. वो साल 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव के समय से लगातार नीतीश कुमार की तीखी आलोचना करते रहे हैं.
लेकिन उनके इस बयान के चार दिन पहले 9 अप्रैल को चिराग पासवान जब बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी के आवास पर इफ़्तार में पहुंचे, तो लगा कि बिहार की सियासत एक और करवट लेने को तैयार है.
उस इफ़्तार में उप-मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने चिराग का गर्मजोशी से स्वागत किया और चिराग पासवान ने भी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के पांव छूकर आशीर्वाद लिया.
ऐसी तस्वीर सामने आने के बाद से चिराग पासवान के भविष्य को लेकर कई तरह के कयास लगाए जा रहे हैं, ख़ासकर साल 2024 के लोकसभा चुनावों और 2025 के बिहार विधानसभा चुनावों को लेकर.

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बिहार में सियासत की यह तस्वीर ऐसे मौक़े पर देखने को मिली थी, जब तेजस्वी यादव की इफ़्तार के दो दिन पहले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की इफ़्तार में चिराग शामिल नहीं हुए थे.
चिराग पासवान के भविष्य को लेकर इस तरह के कयासों के पीछे दरअसल उनके ख़ुद के चाचा भी एक वजह हैं. केंद्रीय मंत्री और एलजेपी के सह-संस्थापक पशुपति कुमार पारस बार-बार चिराग पासवान से सवाल कर रहे हैं कि वो कौन-से गठबंधन में हैं.
पशुपति कुमार पारस के मुताबिक़, रामविलास पासवान कहा करते थे कि सड़क पर उन्हीं लोगों की मौत होती है, जो ये तय नहीं कर पाते कि वो किस तरफ जाएं.
साल 2021 में रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी दो हिस्सों में टूट चुकी है. इसका एक धड़ा 'राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी' उनके भाई पशुपति कुमार पारस के साथ है, जबकि दूसरा धड़ा उनके बेटे चिराग पासवान के पास.
पशुपति कुमार पारस का गुट आज भी केंद्र की एनडीए सरकार का हिस्सा है, लेकिन चाचा-भतीजे के बीच रिश्ते की कड़वाहट का आलम ये है कि पारस ख़ुद चिराग को अपना भतीजा मानने को भी तैयार नहीं हैं.
एलजेपी की इस लड़ाई में अब रामविलास पासवान के क़रीबी रहे बाहुबली नेता सूरजभान सिंह की भी एंट्री हो गई है. सूरजभान सिंह ने पार्टी बचाने के लिए पारस को चिराग के लिए ऐसे तीख़े शब्दों का इस्तेमाल न करने की सलाह दी है.
बीबीसी से बातचीत में सूरजभान सिंह ने कहा, "सबसे पहले दोनों को एक साथ आकर पार्टी के चुनाव चिह्न 'बंगला' को वापस पाने की पहल करनी चाहिए, जो चुनाव आयोग के पास गिरवी है."
हालांकि चिराग पासवान इस मुद्दे को लेकर ज़्यादा गंभीर नहीं दिखते. ख़ासकर तब जब हाल के नगालैंड विधानसभा चुनाव के नतीज़ों से पार्टी का हौसला बढ़ा हुआ है. वहां पहली बार एलजेपी (रामविलास) को दो सीटों पर जीत मिली है.
एलजेपी (रामविलास) के राष्ट्रीय प्रवक्ता धीरेंद्र कुमार मुन्ना ने इस बारे में बीबीसी से बातचीत की.
उन्होंने कहा, "पार्टी में टूट के बाद हम बिहार के अलावा नगालैंड में मान्यता प्राप्त पार्टी बन गए हैं. पार्टी बिल्कुल नए चुनाव चिह्न 'हेलिकॉप्टर' के साथ चुनाव लड़ी. उसे 8.6 फ़ीसदी वोट भी मिले. दो सीटों पर जीत के अलावा 8 सीटों पर हमारी पार्टी दूसरे नंबर पर रही है."

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राजनीतिक ताक़त
चिराग पासवान ने साल 2020 के बिहार विधानसभा में लोक जनशक्ति पार्टी को बिना किसी गठबंधन के चुनाव मैदान में उतारा था. लेकिन इसमें पार्टी को बड़ी हार का सामना करना पड़ा था.
हालांकि इन चुनावों में पार्टी को क़रीब 7 फ़ीसदी वोट ज़रूर मिले थे. उनकी पार्टी एलजेपी को बेगूसराय ज़िले की मटिहानी सीट मिली थी, जहाँ से राज कुमार सिंह जीते थे, जो बाद में जेडीयू में शामिल हो गए.
पार्टी में टूट के बाद से चिराग पासवान के गुट ने बिहार में दो जगहों पर उपचुनाव लड़े हैं. हालांकि इन दोनों सीटों पर पार्टी ने अपने उम्मीदवारों को बतौर निर्दलीय चुनाव मैदान में उतारा था.
उस वक़्त एलजेपी में टूट के कारण पार्टी की स्थिति स्पष्ट नहीं हो पाई थी. हालांकि उपचुनाव में चिराग पासवान के उम्मीदवारों को क़रीब 6 फ़ीसदी वोट मिले थे. 2021 के अंत में हुए उस चुनाव में कुशेश्वस्थान और तारापुर दोनों सीटों पर जेडीयू की जीत हुई थी.
वहीं उस टूट के बाद से, पशुपति पारस के गुट ने बिहार में अब तक कोई चुनाव नहीं लड़ा है. वो बीजेपी का साझेदार है. इसलिए उसे कहीं भी अपना उम्मीदवार उतारने का मौक़ा नहीं मिला.
ऐसे में एलजेपी के किस धड़े के पास कितनी ताक़त है, इसका कोई आंकड़ा अभी तक उपलब्ध नहीं है. हालांकि एलजेपी (रामविलास) प्रवक्ता धीरेंद्र मुन्ना कहते हैं कि पिता की विरासत बेटे को ही मिलती है.
पशुपति पारस की तल्ख़ी पर धीरेंद्र मुन्ना आरोप लगाते हुए कहते हैं, "जो लोग ज़िंदा हैं, वही सड़क पार करते हैं, जो अपाहिज़ हैं, वो एक ही जगह बैठे रहते हैं. उसे न तो देश की चिंता है और न बिहार की. (उनकी) पार्टी में कोई मज़बूती नहीं है और संगठन नाम की कोई चीज़ ही नहीं है."
माना जाता था कि बिहार में रामविलास पासवान की पार्टी एलजेपी के पास हमेशा 6 फ़ीसदी वोट होता था. उन्होंने अपने वोट बैंक का हमेशा राजनीतिक चतुराई से इस्तेमाल किया.
चिराग पासवान के पास भी वोट की तक़रीबन इतनी ही ताक़त दिख रही है. ऐसे में उनके अगले क़दम का बिहार के किसी भी गठबंधन पर असर पड़ सकता है.
चिराग अभी बिहार की जमुई लोकसभा सीट से सांसद हैं. फ़िलहाल वे अपनी पार्टी के अकेले सांसद हैं. साल 2019 में जब एलजेपी एक थी, तब पार्टी को छह सीटों पर सफलता मिली थी.

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महागठबंधन पर असर
पटना के एएन सिन्हा इंस्टीट्यूट के पूर्व निदेशक और राजनीतिक मामलों के जानकार डीएम दिवाकर कहते हैं, "चिराग पासवान की बिहार की राजनीति में कोई साफ़ तस्वीर नहीं दिख रही है. बीजेपी ने उनका इस्तेमाल किया है. पार्टी की सारी मलाई पशुपति पारस लेकर चले गए और चिराग पासवान नीतीश के भरोसे से भी चले गए."
माना जाता है कि पार्टी टूटने की वजह से चिराग पासवान के मन में बीजेपी को लेकर एक नाराज़गी रही है. कहा जाता है कि चिराग पासवान को ऐसा लगता है कि बीजेपी पहल करती, तो शायद एलजेपी को टूटने से बचाया जा सकता था.
वरिष्ठ पत्रकार नचिकेता नारायण मानते हैं कि पार्टी में टूट से चिराग पासवान को बड़ा नुक़सान हुआ, क्योंकि सारे सांसद पशुपति पारस के साथ चले गए. हालांकि रामविलास पासवान का नाम अभी भी चिराग के साथ ही चलता है.
ऐसे में चिराग पासवान अगर महागठबंधन की तरफ आते हैं, तो इसका क्या असर हो सकता है?
राज्य के वरिष्ठ पत्रकार कन्हैया भेलारी मानते हैं कि महागठबंधन के पास बिहार में फ़िलहाल क़रीब 45 फ़ीसदी वोट है, जबकि बीजेपी के पास महज़ 24 फ़ीसदी वोट है. राजनीति में हालांकि मतदाताओं का मन कब किस तरह से बदल सकता है, इसका अंदाज़ा लगाना बहुत आसान नहीं होता, लेकिन मौजूदा हालात में महागठबंधन के वोट बीजेपी पर भारी दिखते हैं.
अगर बीजेपी के पास चिराग गुट के वोट आ जाते हैं, तो इससे बीजेपी को फ़ायदा ज़रूर होगा, लेकिन फिर भी वो महागठबंन से पीछे ही दिखती है.
आरजेडी के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव और तेजस्वी यादव भी कई बार चिराग पासवान को अपने साथ जोड़ने का न्योता दे चुके हैं. अगर ऐसा होता है तो नीतीश, तेजस्वी और चिराग का गठबंधन बिहार में बीजेपी के किसी भी गठबंधन पर बहुत भारी पड़ सकता है.
डीएम दिवाकर का मानना है कि तेजस्वी के साथ चिराग की दोस्ती हो सकती है, लेकिन यह राजनीति की क़ीमत पर नहीं होगी. तेजस्वी के सामने चिराग का राजनीतिक क़द काफ़ी छोटा है.

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उनके मुताबिक़, लालू प्रसाद यादव के वोट बैंक को तेजस्वी ने सफलतापूर्वक अपनी तरफ कर लिया है. राष्ट्रीय स्तर पर अब वो एक स्थापित नेता हो चुके हैं. चिराग में इसकी कमी है.
वहीं नचिकेता नारायण मानते हैं कि तेजस्वी बिहार की राजनीति नहीं छोड़ सकते और चिराग पासवान दिल्ली से दूर नहीं रह सकते. वहीं चिराग को दिल्ली में जगह देने के लिए आरजेडी अभी नीतीश को नहीं छोड़ सकता.
यह भी माना जाता है कि नीतीश कुमार के बाद बिहार की राजनीति में बड़ा बदलाव आ सकता है. ऐसे में हो सकता है चिराग को भविष्य में बिहार की राजनीति में अपने लिए जगह दिख रही हो.
इसलिए 2005 से मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे नीतीश कुमार उनके निशाने पर होते हैं. यह स्थिति बिहार में महागठबंधन के साथ जुड़ने से उन्हें रोक सकती है.
चिराग की नाराज़गी की एक बड़ी वजह नीतीश की महादलित वोटों पर नज़र, भी मानी जाती है. इस वोट बैंक में सेंध लगाने पर रामविलास पासवान भी नीतीश से नाराज़ रहते थे.
2014 के लोकसभा चुनावों के बाद नीतीश कुमार ने जीतन राम मांझी को बिहार का मुख्यमंत्री बना दिया था. उस क़दम को महादलित वोट बैंक को साधने की नीतीश कुमार की एक चाल के तौर पर देखा गया था.
नचिकेता नारायण मानते हैं, "किसी की सलाह पर साल 2020 में चिराग ने नीतीश कुमार के ख़िलाफ़ मोर्चा खोला था. अपने पिताजी की तरह वे भी मानते हैं कि नीतीश की नज़र महादलित वोटों पर है."
डीएम दिवाकर कहते हैं, "रामविलास पासवान अगर नीतीश के ख़िलाफ़ भी थे तो नीतीश से उनकी कोई व्यक्तिगत रंज़िश नहीं थी. शब्दों की शालीनता कभी नहीं खोई. इससे वे सभी राजनीतिक दलों के बीच लोकप्रिय बनकर रहे."
हालांकि नचिकेता नारायण इसे ही चिराग की ताक़त मानते हैं.
उनके मुताबिक़, "चिराग पासवान जिस तरह से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर हमला करते हैं, वैसा कोई और नहीं कर पाता. यहां तक कि बीजेपी के हमलों में भी वैसी धार नहीं होती."

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बीजेपी पर असर
वरिष्ठ पत्रकार मणिकांत ठाकुर ने भी कुछ दिन पहले बीबीसी को बताया था कि अगर आरजेडी और जेडीयू सच में सारे मतभेद भुला कर और एकजुट होकर चुनाव लड़ें, तो बिहार में बीजेपी का क्या हाल होगा? यह आशंका बीजेपी को हमेशा घेरे रहती है.
चिराग पासवान ने पिछले साल के अंत में मोकामा, गोपालगंज और कुढ़नी विधानसभा उपचुनाव में बीजेपी का समर्थन किया था. कुढ़नी में चिराग ने बीजेपी के लिए चुनाव प्रचार भी किया था.
इनमें से दो सीटों गोपालगंज और कुढ़नी में बीजेपी को जीत मिली थी, जबकि मोकामा सीट वापस आरजेडी के खाते में गई थी.
धीरेंद्र मुन्ना के मुताबिक़, नीतीश कुमार से इफ़्तार में मिलने से कोई गठबंधन नहीं बनता है, चिराग पासवान से बीजेपी ने तीन उपचुनावों में समर्थन मांगा और चिराग ने समर्थन दिया. इस तरह चिराग पासवान को पार्टी के लोग बीजेपी के ज़्यादा क़रीब देख रहे हैं.
असल में, बीजेपी को चिराग पासवान की राजनीतिक ताक़त का अंदाज़ा है. एक तरफ जहां केंद्र सरकार ने चिराग को ज़ेड कैटेगरी की सुरक्षा दे रखी है, वहीं बीजेपी के नेता भी चिराग के लगातार संपर्क में रहते हैं.
पिछले हफ़्ते ही केंद्रीय मंत्री और बीजेपी नेता नित्यानंद राय ने चिराग पासवान से पटना में मुलाक़ात की. इससे पहले भी बीजेपी के कई नेता चिराग पासवान से मिल चुके हैं.
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पिछले दिनों मोकामा में एक कार्यक्रम में चिराग पासवान के लिए भारी भीड़ उमड़ी थी. भले पशुपति पारस ज़्यादा अनुभवी हैं, लेकिन उनके लिए ऐसी भीड़ कभी नहीं देखी गई.
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नचिकेता नारायण के मुताबिक़ चिराग पासवान में अभी इतनी ताक़त है कि उन्हें एनडीए या महागठबंधन कोई भी अपने साथ ले सकता है, लेकिन इसके लिए चिराग कोई शर्त नहीं रख सकते.
नारायण कहते हैं, "वे एनडीए जाने के लिए पशुपति पारस को बाहर करने की शर्त नहीं रख सकते, क्योंकि पशुपति पारस अगर महागठबंधन के साथ हो गए तो इससे बीजेपी को नुक़सान हो सकता है."
नचिकेता नारायण कहते हैं कि चिराग पासवान अगर महागठबंधन में आना चाहें, तो उन्हें अपनी अकड़ को किनारे रखना होगा. अगर वे एनडीए में जाना चाहें, तो उनके चाचा पशुपति पारस को अपना अभिमान छोड़ना होगा.

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स्वतंत्र राजनीति
चिराग पासवान फ़िलहाल बिहार की राजनीति में अपने लिए संभावाना तलाश रहे हैं, लेकिन हाल के समय में बिहार में बिना किसी बड़ी पार्टी के सहारे चलने वाले नेताओं और पार्टियों को बड़ा झटका लगा है.
डीएम दिवाकर का मानना है कि बिहार बीजेपी में कलह के साथ नेतृत्व का भी संकट है, जिसके कारण यहां उसका कोई मुख्यमंत्री का चेहरा नहीं बन पा रहा है. यही वजह है कि बिना नीतीश कुमार के बिहार में बीजेपी खड़ी नहीं हो सकी.
उनके मुताबिक़, बीजेपी इस बात को समझ गई है, इसलिए अब वह स्वतंत्र राजनीति की बात करती है. और स्वतंत्र राजनीति में चिराग पासवान के लिए कोई जगह नहीं है.
डीएम दिवाकर कहते हैं, "चिराग पासवान जिस तरह की राजनीति करना चाहते हैं, बिहार में वह इतना आसान नहीं है. ओवैसी ने बिहार में बीजेपी की ही मदद की, लेकिन बाद में उनका क्या हाल हुआ, सबने देखा."
बिहार में ख़ुद के दम पर राजनीति करने की कोशिश उपेंद्र कुशवाहा, मुकेश सहनी और जीतन राम मांझी ने भी की, लेकिन इससे तीनों की राजनीतिक हैसियत कम ही हुई है.
2020 के विधानसभा चुनाव में मुकेश सहनी की 'विकासशील इंसान पार्टी' के तीन विधायक जीते, लेकिन सहनी ख़ुद चुनाव हार गए. मार्च 2022 में तो वीआईपी के तीनों विधायक बीजेपी में शामिल हो गए.
यही हाल उपेंद्र कुशवाहा का है. उन्होंने जेडीयू से बग़ावत कर अपनी नई पार्टी 'राष्ट्रीय लोक जनता दल' बनाई है. कुशवाहा की पार्टी के पास न तो बिहार विधानसभा में और न ही संसद में कोई प्रतिनिधित्व हासिल है.
वहीं जीतन राम मांझी को नीतीश कुमार ने 2014 में मुख्यमंत्री बनाया था. आरोप लगा कि नीतीश को भरोसे में लिए बिना वे शासन चलाने की कोशिश कर रहे हैं. इस कारण मांझी को अपनी कुर्सी गंवानी पड़ी.
नचिकेता नारायण भी इस बात से सहमत हैं कि चिराग पासवान, अकेले दम पर राजनीति नहीं कर सकते.
उनके मुताबिक़, "चिराग पासवान के साथ दिक्कत ये है कि वे स्वतंत्र राजनीति नहीं कर सकते. स्वतंत्र राजनीति उनके पिताजी ने भी नहीं की. इसलिए चिराग को दो में से एक चुनना होगा."
नचिकेता का मानना है कि चिराग पासवान की धार अभी ख़त्म नहीं हुई है. पिछले साल मोकामा विधानसभा उपचुनाव में बीजेपी समर्थन के लिए उन्हें मना रही थी. अगर उनकी धार ख़त्म हो गई होती, तो ऐसा नहीं होता.
लेकिन जैसे रामविलास पासवान के पास लालू जैसा जनाधार नहीं था, वैसे ही चिराग के पास तेजस्वी वाला जनाधार नहीं है.
नचिकेता कहते हैं, "लोग 'बिहार फ़र्स्ट, बिहारी फ़र्स्ट' जैसे स्लोगन से बहुत प्रभावित नहीं होते. चिराग के लिए अगला चुनाव काफ़ी अहम है, यदि वे सफल नहीं रहते, तो लोग भूलने में भी समय नहीं लगाते. आप हमेशा वोट काटने वाले ही बने रहेंगे, तो आपको कौन गंभीरता से लेगा."
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