नगालैंड: 60 साल में पहली बार दो महिलाएं बनीं विधायक

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- Author, सुशीला सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
नगालैंड में दो महिला उम्मीदवारों ने विधानसभा चुनाव जीत कर इतिहास रच दिया है.
60 विधानसभा सीटों वाले नगालैंड को 1963 में राज्य का दर्जा मिला था लेकिन यह पहली बार है जब राज्य के विधानसभा चुनाव में किसी महिला को जीत मिली है. हालांकि यहां की महिलाएं देश की संसद में राज्य का प्रतिनिधित्व पहले ही कर चुकी हैं.
इस बार नगालैंड विधानसभा चुनाव में कुल 183 प्रत्याशी चुनाव मैदान में उतरे जिनमें महिलाओं की संख्या केवल चार थी.
इनमें से दो महिला प्रत्याशियों हेकानी जाखलू (दीमापुर-तृतीय सीट) और सलहौतुओनुओ (पश्चिमी अंगामी सीट) को सत्ताधारी नेशनलिस्ट डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी (एनडीपीपी) ने मैदान में उतारा.
वहीं कांग्रेस ने तेनिंग विधानसभा सीट से रोज़ी थॉम्सन और बीजेपी ने अटोइजू विधानसभा सीट से काहुली सेमा को मैदान में उतारा.
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बीजेपी और कांग्रेस की महिला प्रत्याशी चुनाव नहीं जीत सकीं लेकिन सत्ताधारी एनडीपीपी की दोनों महिला उम्मीदवार हेखनी जाखलू और सलहौतुओनुओ न केवल चुनाव जीतने में कामयाब रहीं बल्कि राज्य से विधायक चुनी जाने वाली पहली महिला होने का तमगा भी हासिल किया.
नगालैंड में बीजेपी और स्थानीय नगा पार्टी नेशनलिस्ट डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी (एनडीपीपी) मिलकर चुनाव मैदान में उतरीं.

एनडीपीपी 40 सीटों पर तो बीजेपी ने 20 सीटों पर अपनी उम्मीदवार खड़े किए.
बीते दिनों नगालैंड के मुख्यमंत्री नेफ़ियू रियो ने कहा था कि नगा लोगों को अपनी इस सोच को बदलना होगा कि नगा महिलाएं निर्णय लेने वाली संस्थाओं में नहीं हो सकती हैं.
वहीं राज्य में महिला अधिकारों और लैंगिक समानता को लेकर काम कर रही संस्थाएं राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की मांग करती रही हैं.
इन महिलाओं की जीत के बाद नगालैंड के मुख्यमंत्री नेफ़ियू रियो ने ट्वीट कर बधाई दी और लिखा, "आप चेंजमेकर्स और रोल मॉडल के रूप में महिलाओं और आने वाली पीढ़ियों की उम्मीदों को आगे ले जा रही हैं. मुझे उम्मीद है कि आप ऐसी ही जुनूनी और साहसी बनी रहेंगी."
वहीं हेकानी जाखलू ने अपनी जीत पर कहा, "यह मेरे लोगों की जीत है जिन्होंने अपनी उम्मीदों और आकांक्षाओं को लेकर मुझ पर अपना विश्वास जताया. मैं अपनी जीत को भगवान को समर्पित करती हूं और पूरी ईमानदारी और सत्यनिष्ठा के साथ अपने क्षेत्र की सेवा करने का संकल्प लेती हूं."
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महिलाओं की जीत ऐतिहासिक
नगालैंड एक आदिवासी राज्य है जहां का समाज पितृसत्तात्मक है.
छह दशकों में पहली बार दो महिलाओं के चुनाव जीतने को जानकार ऐतिहासिक बताते हैं.
कोहिमा से वरिष्ठ पत्रकार मोनालिसा चांगकिजा कहती हैं कि दोनों महिलाओं का चुनाव जीतना नगालैंड के इतिहास में मील का पत्थर साबित हुआ है.
वो कहती हैं, "भले ही राज्य में साक्षरता की दर महिलाओं में ज़्यादा है लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि समाज में उन्हें समान अधिकार मिले हुए हैं. यहां अब भी महिलाओं को पैतृक संपत्ति में अधिकार नहीं दिया जाता है. लेकिन इन महिलाओं की जीत से एक रास्ता खुला है."
दोनों उम्मीदवारों की जीत की वजह पर चर्चा करते हुए वो कहती हैं, "पार्टी का विनेबिलिटी फैक्टर होने के साथ-साथ इन महिलाओं का ज़मीन पर काम करना भी आया है. इनमें से एक पूर्व विधायक की विधवा हैं जिन्होंने अपने पति की मौत के बाद मज़बूती से उनकी ज़मीन संभाल ली तो दूसरी महिला एक वकील रह चुकी हैं. दोनों ही मज़बूत महिलाएं रही हैं."
मोनालिसा कहती हैं कि बीजेपी की तरफ़ से मैदान में उतारी गईं उम्मीदवार ने भी कड़ी टक्कर दी, जो दर्शाता है कि अगर महिलाओं को मौक़ा दिया जाए तो लोगों की सोच बदलने में मदद मिलेगी.
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क्या रहीं चुनौती?
'डेक्कन क्रोनिकल' अख़बार में वरिष्ठ पत्रकार मनोज आनंद कहते हैं कि नगालैंड के समाज में महिलाओं का ख़ासा योगदान रहा है और वे काफ़ी सक्रिय भी हैं.
उनके अनुसार, "नगा मदर्स एसोसिएशन शांति और हिंसा के ख़िलाफ़ काफ़ी आवाज़ें उठा चुकी हैं लेकिन जब यहां निकाय चुनाव में महिलाओं को 33 फ़ीसद आरक्षण देने का फ़ैसला लिया गया तो जनजातीय समूहों ने विरोध प्रदर्शन किया."
वो बताते हैं कि इस दौरान हिंसक झड़प भी हुईं जिसके बाद समूहों और सरकार के बीच गतिरोध ख़त्म करने के लिए मुख्यमंत्री टीआर ज़ेलियांग ने पद से इस्तीफ़ा दे दिया था. हालांकि संस्थाएं इस मामले को सुप्रीम कोर्ट लेकर गईं और सरकार का कहना है कि वो आरक्षण लागू करेगी.
मनोज आनंद के मुताबिक़, "नगालैंड में महिलाओं का वोट प्रतिशत पुरुषों से ज़्यादा है, इसके बावजूद आज से पहले यहां महिलाएं नहीं जीती थीं. ऐसे में दो महिलाओं का विधानसभा चुनाव जीतना एक अच्छी शुरुआत माना जा सकता है."

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2018 के विधानसभा चुनाव में क्या हुआ था?
2018 के विधानसभा चुनाव में पांच महिलाओं ने किस्मत आज़माई थी.
साल 2018 में अवान कोनयक इतिहास बनाने से चूक गईं थीं.
तब वे एनडीपीपी की टिकट से चुनाव लड़ी थीं लेकिन महज़ 905 मतों के अंतर से नगा पीपल्स फ़्रंट (एनपीएफ़) के उम्मीदवार से हार गई थीं.
विधानसभा से पहले संसद पहुंच गईं नगालैंड की महिला
1977 में यूनाइटेड डेमोक्रेटिक पार्टी की तरफ़ से रानो एम शाजिया लोकसभा पहुंचने में कामयाब रही थीं.
वहीं पिछले साल एस फान्गनॉन कोन्याक नगालैंड से राज्यसभा की पहली महिला सांसद चुनी गई थीं.
बीजेपी की तरफ़ से चुनी गई कोन्याक काफ़ी तेज़-तर्रार महिला मानी जाती हैं. उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी से स्नातक की पढ़ाई की है.
जानकार मानते हैं पहले नगालैंड से बाहर बहुत कम ही महिलाएं जाती थीं लेकिन अब वो निकलने लगीं है जिससे सोच में भी धीरे-धीरे बदलाव आ रहा है. ऐसे में जब वे फ़ैसला लेने वाले पदों पर भी वे आएंगी तो यहां की पुरुष प्रधान राजनीति में भी बदलाव आएगा.
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