क्या अमेरिका और यूरोप के दबदबे का दौर अब खत्म होने वाला है?

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    • Author, ज़ुबैर अहमद
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

यूक्रेन पर रूस के हमले का दूसरा साल शुरू हो चुका है. ऐसा लगता है कि इस युद्ध ने विकसित और विकासशील देशों के बीच की खाई को और गहरा कर दिया है. पश्चिमी देशों के राजनेता कहते हैं कि इस जंग से मौजूदा विश्व व्यवस्था या वर्ल्ड ऑर्डर को बहुत ज़्यादा ख़तरा पैदा हो गया है.

उनका कहना है कि ये विश्व व्यवस्था नियमों पर आधारित है और उन नियमों में बदलाव के साफ़ संकेत दिख रहे हैं.

विकसित देश (अमेरिका और यूरोपीय देश) भारत, चीन, दक्षिण अफ़्रीका और ब्राज़ील जैसे विकासशील देशों को इस बात के लिए राज़ी करने की पुरज़ोर कोशिश कर रहे हैं कि वो रूसी आक्रमण के ख़िलाफ़ मोार्चाबंदी में उनके साथ आ जाएँ.

पश्चिमी देश, यूक्रेन पर रूस के हमले को न केवल यूरोप पर हमला बता रहे हैं, बल्कि इसे लोकतांत्रिक दुनिया पर आक्रमण बता रहे हैं, और इसीलिए वो चाहते हैं कि दुनिया की उभरती हुई ताक़तें यूक्रेन पर हमले के लिए रूस की निंदा करें.

लेकिन भारत और चीन के साथ-साथ, कई दूसरे विकासशील देश भी रूस और यूक्रेन के युद्ध को पूरी दुनिया के सिरदर्द के तौर पर नहीं देखते हैं. ये देश इस जंग को मोटे तौर पर यूरोप की समस्या मानते हैं.

पिछले साल, स्लोवाकिया में एक सम्मेलन में शिरकत करते हुए, भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने यूरोप से गुज़ारिश की थी वो इस मानसिकता से ऊपर उठे कि, "यूरोप की समस्या तो पूरी दुनिया का सिरदर्द है. मगर बाक़ी दुनिया की समस्याओं से यूरोप को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता है."

यूरोप और अमेरिका में विशेषज्ञ तर्क देते हैं कि रूस के राष्ट्रपति पुतिन को इस जंग के लिए जवाबदेह बनाने से भारत और चीन के इनकार ने नियमों पर आधारित मौजूदा विश्व व्यवस्था के अस्तित्व को ही ख़तरे में डाल दिया है.

वो कहते हैं कि ज़्यादातर विकासशील देशों ने यूक्रेन में युद्ध को लेकर बहुत सोची-समझी निरपेक्षता का रास्ता चुना है जिससे अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों और स्थिरता के बजाय उनके अपने हित सधते हैं. और ग़ैर-पश्चिमी देशों का ये रवैया आख़िर में रूस को फ़ायदा पहुँचाने वाला साबित हो रहा है.

सीरिया में फ़्रांस के राजदूत रह चुके और पेरिस स्थित एक थिंक टैंक 'इंस्टीट्यूट मोंटेन्या' के विशेष सलाहकार मिशेल डुक्लो कहते हैं, "आर्थिक मोर्चे पर रूस को उस सियासत से फ़ायदा हो रहा है, जिस पर भारत और सऊदी अरब जैसे देश चल रहे हैं."

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अमेरिकी विद्वान जी जॉन इकेनबेरी दावा करते हैं कि अमेरिका की अगुवाई वाली मौजूदा विश्व व्यवस्था गहरे संकट में है.

इकेनबेरी कहते हैं, "अमेरिका ने मौजूदा विश्व व्यवस्था, दूसरे विश्व युद्ध के बाद के दौर में खड़ी की थी. पिछले 70 साल से ये विश्व व्यवस्था ही पश्चिम पर केंद्रित उदारवादी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की अगुवाई कर रही है, जिसे खुलेपन, वैश्विक नियमों और बहुपक्षीय सहयोग की बुनियाद पर खड़ा किया गया था."

वे कहते हैं, "आज ये अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था भयंकर संकट की शिकार है. मध्य पूर्व, पूर्वी एशिया और यहाँ तक कि पश्चिमी यूरोप में लंबे समय से चली आ रही क्षेत्रीय व्यवस्थाओं में या तो बदलाव आ रहा है, या वो टूटकर बिखर रही हैं. ऐसा लग रहा है कि व्यापार, हथियार नियंत्रण और पर्यावरण से लेकर मानव अधिकार तक के वैश्विक अंतरराष्ट्रीय समझौते और संस्थाएँ कमज़ोर हो रहे हैं."

हालांकि, यूक्रेन में युद्ध की शुरुआत से बहुत पहले से ही मौजूदा विश्व व्यवस्था को चीन जैसी उभरती हुई वैश्विक शक्तियों से चुनौती मिल रही थी. और, भारत जैसे देश ये सवाल उठा रहे थे कि आख़िर संयुक्त राष्ट्र जैसी वैश्विक संस्थाओं में उभरती हुई ताक़तों का प्रतिनिधित्व क्यों नहीं हो?

अमेरिका-चीन

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दिलचस्प बात ये है कि विकासशील देशों के जानकार ये मानते हैं कि अमेरिका की अगुवाई वाली अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के इस संकट से उभरते हुए देशों के लिए नए अवसर पैदा होंगे. ख़ास तौर से चीन, भारत और दूसरे ग़ैर पश्चिमी विकासशील देशों के लिए. इन मौक़ों की मदद से ये विकासशील देश विश्व व्यवस्था को नए स्वरूप में ढाल सकेंगे.

इन देशों में नई विश्व व्यवस्था की माँग करने वाली आवाज़ें बुलंद होती जा रही हैं. पिछले साल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद में एलान किया था कि, "मैं साफ़ तौर पर देख सकता हूं कि कोरोना की महामारी के बाद हम बड़ी तेज़ी से एक नई विश्व व्यवस्था, एक नए समीकरण की तरफ़ बढ़ रहे हैं. ये इतना अहम मोड़ है कि भारतीय के तौर पर हम इस मौक़े को गंवाना नहीं चाहते हैं. दुनिया के मुख्य मंच पर भारत की आवाज़ बुलंद और स्पष्ट रूप से सुनाई देनी चाहिए."

लेकिन, बड़ा सवाल ये है कि क्या नई विश्व व्यवस्था बनाने के लिए उभरते हुए देश, दूसरे विश्व युद्ध के बाद के नियमों और संस्थानों को सुधारने और पुनर्गठित करने का प्रयास कर रहे हैं? या फिर वो मौजूदा विश्व व्यवस्था की सत्ता में साझेदारी हासिल करना चाह रहे हैं? बीबीसी ने विकासशील देशों के कुछ क़ाबिल और तजुर्बेकार जानकारों से बात करके उनकी राय जानने की कोशिश की है.

एम. जे. अकबर

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एमजे अकबर, लेखक, पत्रकार और पूर्व विदेश राज्य मंत्री

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क्या रूस और यूक्रेन का युद्ध वाक़ई मौजूदा विश्व व्यवस्था के ख़ात्मे का आग़ाज़ है?

जब आप एक विश्व व्यवस्था कहते हैं, तो दुनिया की कोई भी व्यवस्था संपूर्ण विश्व व्यवस्था नहीं है. हर 'वर्ल्ड ऑर्डर' एक आंशिक विश्व व्यवस्था है. दुनिया के मौजूदा नियम क़ायदे दूसरे विश्व युद्ध के विजेताओं ने तय किए थे. पश्चिम भी अपने आप में कभी एकजुट नहीं रहा है. आख़िर रूस भी तो पश्चिम का ही एक हिस्सा है.

मौजूदा विश्व व्यवस्था में कभी भी पूरा यूरोप शामिल नहीं रहा था. ये एक आंशिक विश्व व्यवस्था थी और ये जस की तस बनी रहेगी. इस वक़्त आप जो कुछ देख रहे हैं (यूक्रेन पर रूस का हमला) वो असल में पुराने टकराव के उसी सिलसिले की एक नई कड़ी है, जिसे मैं तीसरा विश्व युद्ध कहना चाहूँगा. शीत युद्ध असल में तीसरा विश्व युद्ध ही था. इसे तीसरा विश्व युद्ध कहा गया, क्योंकि इसमें यूरोप ने कभी जंग नहीं लड़ी. लेकिन, ये युद्ध वियतनाम में ख़ूब लड़ा गया.

अफ़्रीका और लैटिन अमेरिका भी इस जंग के मैदान बने. और अब, ये जंग यूरोप लौट आई है.

रूस यूक्रेन युद्ध

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क्या मौजूदा विश्व व्यवस्था के बिखर जाने का ख़तरा है?

अमेरिका का दबदबा केवल दो वजहों से है: उसकी सेना और टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में उसके शानदार आविष्कार और तरक़्क़ी. अमेरिकी ताक़त के ये दो सबसे मज़बूत स्तंभ हैं. बाक़ी बातें इन्हीं से जुड़ी हुई हैं- चाहे वो उसकी फ़िल्में हों या मीडिया की सॉफ़्ट पावर हो.

चीन के अलावा आज बाक़ी दुनिया का सारा का सारा संचार और संवाद, पाँच अमेरिकी कंपनियों के क़ब्ज़े में है.

आज, यूक्रेन युद्ध वास्तव में कौन लड़ रहा है? यूक्रेन युद्ध में सबसे अहम किरदार एलन मस्क के स्टारलिंक सैटेलाइट अदा कर रहे हैं. ये अमेरिकियों की तकनीकी तरक़्क़ी ही है, जिसके चलते अमेरिका ने अपने निजी क्षेत्र के ज़रिए भी उतनी ही उपलब्धियां हासिल की हैं, जितनी अपनी सरकारी ताक़त के दम पर पाई हैं.

क्या एक नई विश्व व्यवस्था उभर रही है?

अब जो असली व्यवस्था उभर रही है वो यूरेशियाई विश्व व्यवस्था है. अगर आप इसमें रूस और चीन के ज़मीनी इलाक़े जोड़ दें, जो इस वक़्त सदी के सबसे अहम साझेदार बन रहे हैं, तो ये ज़मीनी इलाक़ा पोलैंड की सीमा से भारत तक फैला हुआ है. ये नई विश्व व्यवस्था है. इस विश्व व्यवस्था में आप मध्य-पूर्व के साथी देशों के साथ ईरान और सीरिया को भी जोड़ सकते हैं.

यूक्रेन युद्ध का ख़ात्मा निश्चित रूप से दुनिया के सामरिक नक़्शे को नए सिरे से बनाएगा. मैंने पहले भी कहा है कि इस जंग का असर एशिया पर भी पड़ने वाला है. अगर ये युद्ध रूस के ख़िलाफ़ जाता है, तो इसका नतीजा पूरे उत्तरी एशिया पर नज़र आएगा. अगर जंग का फ़ैसला रूस के हक़ में जाता है, वो अपने दम पर खड़े रहने में सफल होता है, और चीन के साथ अपने रिश्ते और मज़बूत बना लेता है, तो हो सकता है कि एशिया के सामरिक समीकरण किसी और दिशा में आगे बढ़ जाएँ.

हालांकि ये बड़े बदलाव होने के लिए उस धुरी को अपनी जगह बदलनी होगी, जो पूरे माहौल को अपने क़ाबू में रखती है. आम तौर पर ये बदलाव किसी युद्ध के बाद ही आता है.

अब ये है तो अफ़सोस की बात, मगर विश्व व्यवस्था को बदलने के लिए बदक़िस्मती से आपको एक बड़े युद्ध, एक व्यापक संघर्ष की दरकार होगी. हालांकि, ज़रूरी नहीं है कि ये जंग तोपख़ानों की टक्कर की शक्ल में ही हो. ये युद्ध एक साथ कई मोर्चों पर लड़ा जाएगा. जैसे कि ये जंग आसमान या अंतरिक्ष में लड़ी जा सकती है. संचार की दुनिया में हो सकती है. ये जंग अर्थव्यवस्था, व्यापार या फिर दुनिया में डॉलर के दबदबे के ख़िलाफ़ लड़ी जा सकती है.

संयुक्त राष्ट्र

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क्या भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता मिलेगी?

मौजूदा विश्व व्यवस्था के ख़िलाफ़ शिकायतों का एक इतिहास है. इसकी बड़ी वजह संयुक्त राष्ट्र और सुरक्षा परिषद की बनावट भी है. केवल पांच देशों को ही वीटो का अधिकार क्यों मिलना चाहिए?

संयुक्त राष्ट्र दुनिया नए आर्थिक बदलावों और उन देशों के सामरिक प्रभावों की नुमाइंदगी नहीं करता, जो उपनिवेशवाद के बाद की दुनिया में उभरे हैं, ख़ास तौर से भारत की नुमाइंदगी.

भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का सदस्य बनाना आगे बढ़ने का एक रास्ता हो सकता है. किसी-न-किसी तरह की नई व्यवस्था तो बनानी ही होगी. जब तक सुरक्षा परिषद में सुधार नहीं होगा, तब तक उस विश्व व्यवस्था को चुनौती मिलती रहेगी, जिसे आप अमेरिका के नेतृत्व वाली दुनिया कहते हैं.

भारत और चीन, दोनों देश दुनिया की प्रमुख ताक़तें हैं. दुनिया को ये मानना पड़ेगा कि ये 1946 नहीं है. लेकिन, चीन का मामला अलग है, क्योंकि चीन तो सुरक्षा परिषद का एक स्थायी सदस्य है.

एक तरह से देखें तो चीन की मौजूदगी उसकी ताक़त की तुलना में ज़्यादा है, क्योंकि, अभी हाल के वर्षों तक, अभी पिछली सदी के आख़िर तक, चीन के पास न तो आज जैसी आर्थिक शक्ति थी, और न ही सियासी प्रभाव था. लेकिन, चीन ने भी अमेरिका के दबदबे को मानने से इनकार कर दिया था.

चंद्रन नायर

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चंद्रन नायर, हॉन्गकॉन्ग और कुआला लम्पुर स्थित स्वतंत्र एशियाई थिंक टैंक 'ग्लोबल इंस्टीट्यूट फॉर टुमारो' के संस्थापक और CEO और 'डिस्मैंटलिंग ग्लोबल व्हाइट प्रिविलेज' पुस्तक के लेखक

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क्या रूस और यूक्रेन के युद्ध से सच में मौजूदा विश्व व्यवस्था के ख़ात्मे की शुरुआत हो गई है?

यूरोप सोचता है कि वो अमेरिका के साथ इस ब्रह्मांड का केंद्र है, और ये युद्ध एक निर्णायक मोड़ है. लेकिन, ये कोई अहम मोड़ नहीं है. ये एक ग़ैर-ज़रूरी जंग है. लेकिन, जब आप इसकी तुलना इराक़ या अफ़ग़ानिस्तान पर थोपे गए युद्धों से करते हैं, तो ये बहुत छोटी-सी लड़ाई लगती है. ये बात आपको इन युद्धों में मारे गए लोगों की तादाद से समझ में आ जाती है.

भारत के विदेश मंत्री बार-बार कहते रहे हैं कि, "हम किसी का पक्ष नहीं ले रहे हैं लेकिन अपनी जनता के हितों का ख़्याल रखना हमारी ज़िम्मेदारी है. अगर रूस से सस्ता तेल मिलता है, तो हम उसे ख़रीदेंगे."

रूस से जितना तेल यूरोप ख़रीदता है, उसकी तुलना में भारत तो बहुत मामूली मात्रा में तेल ख़रीदता है. अगर ये युद्ध एक निर्णायक मोड़ है, तो ये दो तरह से है: पहले तो ये कि दुनिया अब इस झूठ से वाक़िफ़ हो गई है कि युद्ध हमेशा पश्चिमी देशों के हितों की वजह से नहीं शुरू होते. दूसरा ये कि डॉलर के दबदबे पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं. तो, असल बदलाव ये है. मुझे लगता है कि पश्चिमी देशों के पाखंड का पर्दाफ़ाश हो गया है.

उपनिवेशवाद के बाद के दौर में कूटनयिकों को समझना होगा कि उन्हें सत्ता बाक़ी दुनिया से साझा करनी ही होगी. ये बात स्वीकार कर पाने में उनकी नाकामी ही उनके पतन का कारण बनेगी. और, बदक़िस्मती से ये सोच सदियों के दबदबे और ख़ुद को बेहतर समझने की उस सोच का नतीजा है, जिसे अब उदारवाद का मुखौटा पहना दिया गया है. लेकिन अब ये मुखौटा उतार दिया गया है और अपने अमेरिकी और यूरोपीय दोस्तों को मेरी सलाह यही होगी कि वो अपनी नस्लवादी सोच से छुटकारा पा लें. आपको दूसरों के साथ बाँटकर खाना सीखना होगा.

दूसरे विश्व युद्ध की सांकेतिक तस्वीर

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क्या मौजूदा विश्व व्यवस्था के बिखर जाने का ख़तरा है?

मुझे नहीं लगता है कि इस पर बिखरने का ख़तरा मंडरा रहा है. इसको बदलने की ज़रूरत है. आपने दूसरे विश्व युद्ध की शक्ल में एक महायुद्ध को जन्म दिया. इसके बाद आपने शांति की व्यूह रचना की और ये ढांचा, ये विश्व व्यवस्था खड़ी की. इसके बाद आपने समृद्धि के एक दौर की शुरुआत की, जिसमें उपनिवेशों का ख़ात्मा हुआ. और अब, 'सबसे पहले हम, बाक़ी बाद में' की जिस सोच की बुनियाद पर ये ढांचा खड़ा किया गया, वो बना नहीं रह सकता है.

भारत, चीन और दूसरे विकासशील देश एक अलग विश्व व्यवस्था चाहते हैं. लेकिन हमें इस बात को लेकर भी सावधान रहना होगा कि लोग एशियाई सदी चाहते हैं. मैं कहता हूं कि एशियाई सदी का विचार ही तबाही लाने वाला है. क्योंकि, एशियाई सदी ठीक वैसी ही सोच है, जो विकसित ताक़तों की थी. दुनिया ने सौ साल तक ब्रितानी सदी का दौर देखा. उसके बाद हमने अमेरिकी सदी को भुगता. और अब हम एशियाई सदी चाहते हैं. इस तरह तो हम दुनिया को बर्बाद कर देंगे क्योंकि हम बहुत बड़े और विशाल हैं.

क्या एक नई विश्व व्यवस्था उभर रही है?

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क्या एक नई विश्व व्यवस्था उभर रही है?

विकासशील देश सुधार चाहते हैं. हम ये नहीं कह सकते कि नियमों पर आधारित व्यवस्था पूरी तरह बेकार है. मिसाल के तौर पर मैंने तर्क दिया है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों (पी-5) में भारत को भी शामिल किया जाना चाहिए. क्योंकि ये दुनिया की सबसे ज़्यादा आबादी वाला देश है. चीन को चाहिए कि वो भारत को सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनाने का प्रस्ताव रखे. आप सुरक्षा परिषद में भारत को ले आएं और फिर आप अफ़्रीकी संघ को भी शामिल करें. यानी आप इसके सात स्थायी सदस्य (P7) बनाएँ. ऐसे बहुत से वैश्विक संगठन हैं, जिनमें सुधार लाने की ज़रूरत है. जैसे कि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक और विश्व व्यापार संगठन में.

हर देश की अपनी राजनीतिक व्यवस्था होती है और वहाँ ज़बरदस्ती लोकतंत्र को बढ़ावा देना या थोपना अच्छा नहीं है. हाल में मैं जकार्ता में था, जहाँ लोगों ने कहा कि एक व्यवस्था में असली अहमियत तो नुमाइंदगी को दी जानी चाहिए. चीन की कम्युनिस्ट पार्टी सबसे लोकप्रिय है और उसकी लोकप्रियता पश्चिमी देशों के किसी भी सियासी दल से कहीं ज़्यादा है. उन्हें पता है कि उन्हें अपनी जनता को वो सुविधाएँ देनी होंगी, जिसे वो बुनियादी अधिकार कहते हैं. शिक्षा का अधिकार, स्वास्थ्य की सुविधा, मकान, नौकरियां वग़ैरह. वो प्रदर्शन करने और इमारतें जलाकर ख़ाक करने का अधिकार नहीं देने वाले हैं. चीन की हुकूमत इसे बर्दाश्त नहीं करेगी.

चूंकि भारत की आबादी डेढ़ अरब के करीब पहुँच रही है, तो मेरी नज़र में भारत के लिए चुनौती ये है कि वो लोकतांत्रिक व्यवस्था के दायरे में ये अधिकार कैसे दे पाएगा? ये काम बहुत मुश्किल है. सामूहिक हित को व्यक्तिगत हित पर तरजीह दी जानी चाहिए.

अब अमेरिकी लोकतंत्र को देखिए, जहाँ लोग कहते हैं कि वो अपने पास हथियार रखेंगे, चाहे वो जितने लोगों को गोली मार दें. क्योंकि, वो एक महान लोकतांत्रिक देश हैं और उन्हें बंदूक रखने का पूरा अधिकार है.

न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र संघ का मुख्यालय

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क्या भारत को सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता मिलेगी?

मुझे लगता है कि अगले तीन साल में, या फिर ज़्यादा से ज़्यादा पांच वर्षों में भारत को सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बन जाना चाहिए. लेकिन उन्हें अफ़्रीकी संघ को भी शामिल करना चाहिए.

लेकिन, क्या आपको पता है कि भारत के लिए सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनने से भी बड़ी चुनौती क्या है? भारत को एक ऐसे आर्थिक और सियासी मॉडल की ज़रूरत है, जिससे उसका विज़न यूं ही बरक़रार रहे और देश में सियासी स्थिति जारी रहे. मेरी नज़र में इसी में एक बड़ा सवाल छिपा है: मोदी के बाद कौन आएगा? किसके पास अगले 30 बरस की योजना है?

आप पाँच बरस के चक्र से अपनी चुनौतियों का सामना नहीं कर सकते हैं. आपको 30 बरस चाहिए तो अगले तीन से पांच बरस में भारत सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य तो बन जाएगा. लेकिन, उसे अपने विज़न को अगले 30 साल तक बनाए रखने की ज़रूरत है.

भारत की आबादी के एक बड़े हिस्से को रोज़मर्रा की बड़ी समस्याओं से निजात दिलाने की ज़रूरत है. और, मेरी नज़र में ये बात इससे ज़्यादा अहम है कि हम जीडीपी का आकलन कैसे करते हैं. सवाल ये है कि क्या भारत ख़ुद को बेड़ियों से छुड़ाकर अगले 20 वर्षों में अपनी 50 करोड़ आबादी को तकलीफ़देह जीवन से निजात दिला सकता है? इसके लिए दूरगामी आर्थिक नीतियों की ज़रूरत है. चीनियों ने यही करके दिखाया है, और इस चुनौती से छुटकारे का कोई रास्ता है नहीं.

प्रोफ़ेसर हैप्पीमॉन जैकब

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प्रोफ़ेसर हैप्पीमॉन जैकब, सेंटर फॉर इंटरनेशनल पॉलिटिक्स,ऑर्गेनाइज़ेशन ऐंड डिसआर्मामेंट, जेएनयू

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क्या रूस और यूक्रेन का युद्ध वास्तव में मौजूदा विश्व व्यवस्था के पतन की शुरुआत है?

मौजूदा व्यवस्था न तो अंतरराष्ट्रीय है और न ही व्यवस्थित है. ये तो दूसरे विश्व युद्ध के विजेताओं के लिए रची गई अमेरिका पर केंद्रित व्यवस्था थी. लेकिन, मुझे नहीं लगता कि इस वक़्त एक ओर अमेरिका की अगुवाई वाली विश्व व्यवस्था और दूसरी तरफ़ चीन, मध्य एशियाई देशों, रूस और तुर्की वग़ैरह की अगुवाई वाली व्यवस्था के बीच से कोई नई भू-राजनीतिक व्यवस्था उभर रही है.

मुझे दोनों के बीच वो दरार स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं देती है, जिसका हवाला एमजे अकबर ने दिया. ऐसा क्यों? इसलिए क्योंकि पहले तो मुझे लगता है कि इस युद्ध के बाद रूस बेहद कमज़ोर हो जाएगा और दूसरा चीन इतना मूर्ख नहीं है कि वो पूरी तरह रूस के साथ हो जाए. यही वजह है कि चीन बहुत फूंक-फूंक कर क़दम आगे बढ़ा रहा है. मध्य पूर्व दुनिया का ऐसा हिस्सा है, जिसने अभी ये फ़ैसला नहीं किया है कि वो किस ओर जाएगा.

मैं चीन और भारत को एक ही खांचे में नहीं रखूंगा. वो देश अब तीसरी दुनिया नहीं रहे, जिन्हें पहले तीसरी दुनिया के देश कहा जाता था. उस जुमले की उपयोगिता अब ख़त्म हो चुकी है. चीन बहुत आगे निकल चुका है. आज चीन 18 खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था है. उसका रहन सहन बहुत ऊपर जा चुका है. ग़रीबी को नाटकीय ढंग से कम किया गया है.

चीन किसी औसत विकासशील देश जैसा भी नहीं रहा. हालांकि मैं भारत, ब्राज़ील, दक्षिण अफ्रीका और अफ्रीका के ज़्यादातर हिस्से को विकासशील देशों के खांचे में रखूंगा. मेरी नज़र में इसकी वजह उनका वो तरीक़ा है, जिसके ज़रिए वो अंतरराष्ट्रीय मसलों पर अपनी बात रखने और मनवाने की कोशिश कर रहे हैं.

क्या एक नई विश्व व्यवस्था उभर रही है?

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क्या मौजूदा विश्व व्यवस्था के बिखरने का अंदेशा है?

भारत तो दिल ही दिल में लंबे समय से इस विश्व व्यवस्था को लेकर चिंतित या नाख़ुश रहा है. या फिर ये भी कह सकते हैं कि वो इसे बदल डालने की ख़्वाहिश रखता है. सच तो ये है कि भारत 1947 से ही इसी सोच के साथ आगे बढ़ा है. मिसाल के तौर पर जो नई अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था बनी या फिर परमाणु हथियारों की बात करें, तो जहां तक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की बात है, उसे लेकर भारत का रवैया हमेशा से ही एंटी-स्टैब्लिशमेंट रहा है. हालांकि, ये भी विडम्बना ही है कि भारत एक बहुत ही यथास्थितिवादी देश है.

भारत बदल डालने वाली ज़ुबान इस्तेमाल तो करता है, लेकिन अपने बर्ताव में ऐसा नहीं है. भारत विश्व व्यवस्था के ख़िलाफ़ बात ज़रूर करता है, लेकिन वो इस व्यवस्था को बदलने के लिए पूरी ताक़त से कोशिश नहीं करता. आज ये बात होती है कि सुरक्षा परिषद में पर्याप्त नुमाइंदगी नहीं है, और ये भेदभाव से भरी है. लेकिन, कल को जब आप भारत को सुरक्षा परिषद का सदस्य बना देंगे तो वो इससे ख़ुश हो जाएगा. भारत बदलाव लाने की बोली इसलिए बोलता है, क्योंकि वो विश्व व्यवस्था का हिस्सा बनना चाहता है.

आप इस बात को ऐसे समझिए. भारत, मौजूदा अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को पसंद नहीं करता, क्योंकि वो मौजूदा विश्व व्यवस्था में एक भागीदार नहीं है. अगर भारत को इसमें शामिल कर लिया जाए, तो फिर उससे इससे कोई शिकायत नहीं रहेगी. भारत को लगता है कि आज उसकी ताक़त बढ़ गई है. उसकी जीडीपी बढ़ गई है. उसकी सेना की शक्ति बढ़ गई है. अब वो एटमी राष्ट्र है. अब उसका विदेशी मुद्रा भंडार भी बहुत बढ़ गया है. लेकिन, विश्व व्यवस्था में उसकी हैसियत उसकी इस प्रगति के अनुरूप नहीं बढ़ी है. समस्या यही है.

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क्या एक नई विश्व व्यवस्था उभर रही है?

अगर दुनिया में वैसा कोई बंटवारा है भी, जिसकी तरफ़ एमजे अकबर ने इशारा किया है, तो मुझे नहीं लगता कि भारत, चीन या रूस से नज़दीकी बढ़ाएगा. रूस से दूर जाने का भारत का सफ़र शुरू हो चुका है. भारत के अमेरिका और पश्चिमी देशों के क़रीब जाने का सिलसिला तो पहले ही शुरू हो चुका था. अमेरिका के जितना क़रीब भारत आज है, उतना पहले कभी नहीं रहा था. तो ये तो बस वक़्त की बात है कि भारत पश्चिमी देशों और अपने पश्चिमी साथियों के और क़रीब हो जाएगा.

मुझे लगता है कि अमेरिका और पश्चिमी देशों को इस क्षेत्र में एक साझेदार के तौर पर भारत की उतनी ही ज़रूरत है, जितनी भारत को इस क्षेत्र या अन्य इलाक़ों में उनके क़रीब जाने की दरकार है. मुझे लगता है कि भारत और पश्चिमी देशों और अमेरिका के हित कहीं न कहीं आपस में मिलते हैं, या एक दूसरे के पूरक हैं. ये तो मुख्य रूप से चीन की वजह से है. कई मामलों में भारत के अमेरिका विरोध में ये कमी, पिछले 15-20 वर्षों में चीन के उभार से जुड़ी हुई है. तो पिछले लगभग 20 वर्षों में उस दिशा में बहुत प्रगति हुई है और चीन बहुत बड़ा कारण है जिसने भारत को उस दिशा में धकेला है. तो, चीन की ताक़त में जितना इज़ाफ़ा होगा, भारत उतना ही पश्चिमी देशों के पाले में जाएगा.

चीन की सेना

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इमेज कैप्शन, चीनी सैनिक

चीन आज जिस तरह से इस क्षेत्र और बाक़ी दुनिया में अपना प्रभाव बढ़ाने वाली नीतियों पर ज़ोर दे रहा है, उससे ये बात और भी साफ़ हो जाती है, जिस तरह चीन ने अपनी फौजी ताक़त बढ़ाई है और जिस तरह वो अलग अलग मंचों पर अमेरिका को चुनौती दे रहा है. चीन पूरी दुनिया में अलायन्स बना रहा है या फिर दोस्तियां गांठ रहा है. ये सारी बातें एक ही तरफ़ इशारा करती हैं कि चीन, अमेरिका की अगुवाई वाली एकध्रुवीय विश्व व्यवस्था से ख़ुश नहीं है और वो इसे चुनौती देना चाहता है. वो एक वैकल्पिक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के रूप में अमेरिका को चुनौती देना चाहते हैं.

मेरे ज़हन में इस बात को लेकर कोई शक नहीं है कि आगे चलकर विश्व व्यवस्था को किसी-न-किसी तरह से बदलना ही होगा. ये भी संभव है कि इस व्यवस्था को चीन से मिल रही चुनौती का फ़ायदा, भारत जैसे देश को मिल जाए. चीन, मौजूदा विश्व व्यवस्था को जितनी तगड़ी चुनौती देगा, पश्चिमी देश उतनी ही शिद्दत से भारत से नज़दीकी बढ़ाना चाहेंगे.

भारत की शिकायतें दूर करके उसे किसी-न-किसी तरह से इस व्यवस्था में साझीदार बनाना चाहेंगे. तो, ये तो भारत के लिए अच्छी ख़बर है. मुझे लगता है कि आज से 10-15 साल बाद दुनिया वैसी नहीं रहेगी, जैसी आज है. मुझे लगता है कि इसमें बदलाव होगा.

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद

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क्या भारत को सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता मिलेगी?

मौजूदा हालात में सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों में बढ़ोत्तरी की संभावना नहीं के बराबर है. चीन न तो भारत को सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनने दे रहा है और न ही उसे एनएसजी में शामिल होने दे रहा है. इसी वजह से मुझे नहीं लगता कि भारत के सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनने की ख़्वाहिश निकट भविष्य में पूरी होने वाली है.

अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के मौजूदा प्रशासन की कोई वैधता नहीं है, और इसका कोई असर भी नहीं बचा है. ये व्यवस्था यूक्रेन पर रूस के हमले के ख़िलाफ़ कुछ भी कह पाने, या कोई भरोसा जगाने वाला क़दम उठा पाने में पूरी तरह नाकाम रही है.

ये तो मौजूदा विश्व व्यवस्था या फिर इस व्यवस्था के प्रशासनिक ढांचे के बिखर जाने की गवाही है. अब अगर मौजूदा विश्व व्यवस्था का प्रशासनिक ढांचा ढह गया है, और अब अगर बड़ी ताक़तों के बीच इस बात पर सहमति बनती है कि कोई नया ढांचा खड़ा किया जाए या फिर कोई नई प्रशासनिक रूप-रेखा बनाई जाए, तो भारत उसका हिस्सा बनेगा. लेकिन मुझे नहीं लगता कि मौजूदा व्यवस्था में भारत को शामिल किया जाएगा.

प्रोफ़ेसर हुआंग
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प्रोफ़ेसर हुआंग युनसॉन्ग, एसोसिएट डीन, स्कूल ऑफ़ इंटरनेशनल स्टडीज़, सिचुआन यूनिवर्सिटी, चेंगडू, चीन

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क्या रूस और यूक्रेन के युद्ध से सच में मौजूदा विश्व व्यवस्था के पतन की शुरुआत हो गई है?

विकसित और विकासशील देशों के बंटवारे की जड़, सत्ता और विश्व व्यवस्था में विकसित औद्योगिक देशों के एकाधिकार में है. इसी का नतीजा है कि देशों के बीच दुनिया के संसाधनों और संपत्तियों के वितरण में बराबरी नहीं है. पश्चिमी देश जिस तरह यूक्रेन और रूस के युद्ध की आग में घी डालने का काम कर रहे हैं, और जिस तरह उन्होंने रूस पर प्रतिबंध लगाए हैं, उससे विकसित और विकासशील देशों के बीच दूरी की सीधी सच्ची अभिव्यक्ति नहीं होती है.

इसके बजाय, ज़्यादातर विकासशील देश अपनी क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता को लेकर चिंतित हैं क्योंकि उनके मन में मुख्य रूप से अमेरिका की अगुवाई वाले पश्चिमी देशों के दुनिया पर दबदबे और ज़रूरत से ज़्यादा भू-सामरिक विस्तार को लेकर आशंकाएं हैं.

जैसे-जैसे दुनिया में ख़ास तौर से राजनीतिक, आर्थिक और तकनीकी मोर्चों पर बहुध्रुवीय व्यवस्था की जड़ें गहरी हो रही हैं, ऐसा लग रहा है कि अमेरिका की अगुवाई वाली विश्व व्यवस्था उसी अनुपात में, इक्कीसवीं सदी की शुरुआत से ही बिखरती जा रही है.

रूस और ईरान जैसे देशों पर अमेरिका और यूरोपीय प्रतिबंधों का असर लगातार कमज़ोर और हल्का होता जा रहा है. इससे पता चलता है कि अमेरिका की अगुवाई वाली विश्व व्यवस्था में पड़ी दरारें और गहरी और पेंचदार होती जा रही हैं. इसके साथ विश्व व्यवस्था के लोकतंत्रीकरण की रफ़्तार तेज़ हो गई है और किसी एक महाशक्ति के विश्व व्यवस्था पर दबदबे का दौर अपने ख़ात्मे की ओर बढ़ रहा है.

मौजूदा विश्व व्यवस्था

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क्या मौजूदा विश्व व्यवस्था के बिखर जाने का डर है?

मौजूदा विश्व व्यवस्था, अमेरिका के इशारे पर चलती है और इसमें एक बुनियादी कमी है. ये कमी औद्योगिक पश्चिमी देशों के दबदबे को बनाए रखने वाला इसका बुनियादी सिद्धांत है. ज़ाहिर है कि पश्चिमी देशों के सिवा, बाक़ी देशों को ज़्यादातर मौक़ों पर इसकी भारी क़ीमत चुकानी पड़ती रही है.

पहला तो विकासशील देशों के विकसित और समृद्ध होने के अधिकारों का हनन हुआ है. दूसरा, किसी भी देश के आर्थिक, राजनीतिक, सैन्य या फिर तकनीकी क्षेत्र में अमेरिका की बराबरी करने या उससे आगे निकलने की संभावना की, किसी न किसी रूप में क़ुर्बानी दे दी जाती है.

सपाट लफ़्ज़ों में कहें तो मौजूदा विश्व व्यवस्था ग़ैर-पश्चिमी देशों को खुलकर तरक़्क़ी करने की इजाज़त नहीं देती. निश्चित रूप से ये बात इस हक़ीक़त से टकराती है कि दुनिया भर में कई विकासशील देश आज तेज़ी से उभर रहे हैं. इसमें कोई शक नहीं कि चीन इसकी सबसे शानदार मिसाल है. यही कारण है कि स्थापित विश्व व्यवस्था का बिखरना तय है.

लोकतंत्र

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क्या एक नई विश्व व्यवस्था उभर रही है?

ऐसा लगता है कि मौजूदा संकट लगातार बिगड़ते आ रहे सिलसिले की ही एक कड़ी है. जहां हमें दूर दूर तक कोई व्यवहारिक समाधान नहीं दिख रहा है. सवाल ये है कि अमरीका जो भरोसे के क़ाबिल नहीं है और यूरोप जो तबाह हो चुका है, क्या वो मिलकर उस गंभीर समस्या का समाधान निकाल सकते हैं, जो उनकी क्षमता के बाहर की बात है --जब भी वो उदारवादी विश्व व्यवस्था की उम्र बहुत लंबी होने की डींगें हांकते हैं, तो ये सवाल पैदा हो जाता है.

एक आधुनिक राष्ट्र के प्रशासन की पश्चिमी परिकल्पनाओं को अपनाते हुए भी चीन ने एक ऐसी राजनीतिक व्यवस्था को चुना है, जिसका एक लंबा इतिहास और विशाल सांस्कृतिक विरासत है. और चीन एक न्यायोचित विश्व व्यवस्था के लिए भी काम कर रहा है.

मौजूदा विश्व व्यवस्था को उसका आकार देने के लिए पश्चिमी लोकतांत्रिक देश बाक़ी दुनिया से बहुत तानाशाही और क्रूरता से पेश आए हैं. और, उन्होंने ही इस व्यवस्था से सबसे ज़्यादा फ़ायदा भी उठाया है. चीन जैसे विकासशील देशों को दबाने और उनका शोषण करने के लिए पश्चिमी देशों को लोकतंत्र और नियमों पर आधारित विश्व व्यवस्था के जुमलों को बहाना या औज़ार नहीं बनाना चाहिए.

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एक प्राचीन सभ्यता के तौर पर भारत के पास प्रशासन का एक अच्छा अनुभव है और उसे अंतरराष्ट्रीय संबंधों की एक चतुर समझ भी है. इक्कीसवीं सदी चीन और भारत दोनों की है. और,दोनों देशों के पास विश्व का नेतृत्व करने के लिए पर्याप्त प्राचीन ज्ञान भी है.

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