ईसाई बहुल नगालैंड में कैसे उभर रही है बीजेपी? - ग्राउंड रिपोर्ट

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- Author, दिलनवाज़ पाशा और सेराज अली
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दीमापुर, कोहिमा से
हाथों में बाइबल, होठों पर भक्ति गीत और प्रार्थना में लीन लोग. लगभग 90 प्रतिशत ईसाई आबादी वाले नगालैंड में यह नज़ारा आम है.
जो ईसाई धर्म अब से 150 साल पहले नगालैंड पहुंचा था वो अब यहां की पहचान और संस्कृति का अहम हिस्सा बन गया है. नगालैंड में दीमापुर या कोहिमा जैसे बड़े शहर हों या फिर कोई छोटा गांव, चर्च की इमारत सबसे पहले नज़र आती है.
दीमापुर के नज़दीक तोलुवी गांव में 1953 में बने बैपटिस्ट चर्च में रविवार सुबह भारी संख्या में लोग आए हैं. यहां हर कोई प्रार्थना में लीन है. कोरस और प्रार्थना के बाद वहां मौजूद धर्म प्रचारक डॉ. हिकोटे मंच पर आते हैं और जोशीली आवाज़ में भाषण देते हैं. अपने भाषण में वो ईसाई धर्म के मूल्यों के अलावा ख़ासतौर पर क्लीन इलेक्शन मूवमेंट पर बात करते हैं.
वो लोगों से अपनी अंतरात्मा की आवाज़ सुनकर स्वच्छ और ईमानदार छवि वाले उम्मीदवार को वोट देने की अपील करते हैं. वो लोगों से कहते हैं कि वो चुनाव में किसी तरह के प्रलोभन से बचें और अपनी दिल की बात सुनकर वोट करें. नगालैंड के चर्चों में पादरियों के इस तरह के भाषण आम हैं.

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सीटों का गणित
केंद्र में सत्ताधारी बीजेपी यहां गठबंधन सरकार में हैं और स्थानीय नगा पार्टी नेशनलिस्ट डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी (एनडीपीपी) के साथ मिलकर चुनाव लड़ रही है.
60 सीटों पर एनडीपीपी ने और 20 सीटों पर बीजेपी ने उम्मीदवार उतारे हैं.
नगालैंड में कोई मज़बूत विपक्ष नहीं हैं. यहां कांग्रेस के अलावा रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया, लोक जनशक्ति पार्टी और कई अन्य क्षेत्रीय पार्टियां चुनाव लड़ रही हैं.
2018 में 60 में से 26 सीटें जीतने वाली नगा पीपुल्स फ्रंट (एनपीएफ़) को 2021 में यहां बड़ा झटका लगा था और पार्टी के 21 विधायक बाग़ी होकर एनडीपीपी के गठबंधन में चले गए थे.
इस बार एनपीएफ़ सिर्फ 22 सीटों पर चुनाव लड़ रही है. यानी नगालैंड में कोई मज़बूत विपक्ष इस बार नहीं हैं.
नगालैंड में जहां-जहां भी हम गए, सबसे ज़्यादा प्रचार भारतीय जनता पार्टी का ही दिखा.
यहां लगे चुनावी पोस्टरों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बड़ी तस्वीर छपी है. बीजेपी यहां विकास का वादा लेकर आई है, जिस पर बहुत से लोग यकीन करते दिख रहे हैं.

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विकास
दीमापुर में अपनी एक दोस्त के साथ लॉटरी स्टाल चला रहे एक युवक से हमारी बात हुई. वो एक रिसॉर्ट में पांच हजार रुपए महीना पर काम करे हैं. ग्रामीण क्षेत्र के रहने वाले ये ईसाई युवक बीजेपी के विकास के वादे से प्रभावित हैं और उसे उम्मीद है कि बीजेपी यहां विकास कर सकेगी.
विकास के मामले में नगालैंड बाकी प्रदेशों से पिछड़ा है. यहां एक भी मेडिकल कॉलेज नहीं है. राजधानी कोहिमा या दीमापुर जैसे बड़े शहरों से बाहर निकलते ही टूटी-फूटी सड़कें दिखकी हैं.
इस युवक का कहना है, "बीजेपी के आने के बाद विकास आया है, उन्होंने हमारे लिए बहुत काम किया है. मैं ईसाई हूं और मुझे बीजेपी को वोट देने में तब तक कोई दिक्कत नहीं है जब तक वो धर्म में हस्तक्षेप नहीं करते."
देश में हिंदुत्ववादी मानी जाने वाली पार्टी की पहचान रखने वाली बीजेपी के नगालैंड में अधिकतर नेता ईसाई हैं जो पूरी शिद्दत के साथ पार्टी को आगे बढ़ाने में लगे हैं.
रोज़ी यंथन 28 साल से बीजेपी से जुड़ी हैं. वो नगालैंड में बीजेपी के महिला मोर्चे की प्रमुख रही हैं.
वो कहती हैं, "बीजेपी विकास की राजनीति करने वाली पार्टी है. बीजेपी यहां विकास के लिए और लोगों को अच्छी शिक्षा और नौकरी देने के लिए आई है. यहां बीजेपी में धर्म को लेकर कोई भेदभाव नहीं है ना ही धर्म को लेकर किसी भी तरह का टकराव है. हम यहां अपने धर्म का पालन करते हैं. मैं सपना देखती थी कि एक दिन बीजेपी की सरकार आएगी और यहां विकास होगा."

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चिंताएं
लेकिन राज्य में एक हिंदुत्ववादी पार्टी के उभार ने ईसाई बहुल इस प्रदेश में कई लोगों को चिंता में डाल दिया है.
दीमापुर के पास एक गांव में चर्च से बाहर निकल रही एक महिला से जब हमने बीजेपी के बारे में सवाल किया तो वो थोड़ा संभलकर बोलीं, "नगालैंड एक ईसाई बहुल प्रदेश है. हम पर कोई दबाव नहीं है क्योंकि हम एक ईसाई राज्य हैं. लेकिन हम दूसरे राज्यों मे हो रही घटनाओं के बारे में सुनते हैं कि चर्च तोड़े जा रहे हैं और कई जगह लोग अपनी आस्था का पालन करने के लिए स्वतंत्र नहीं है. हमें भी डर लगता है कि कहीं ऐसा वक्त नगालैंड में भी ना आ जाए क्योंकि नगालैंड भी भारत में ही है."
वो कहती हैं, "यहां लोगों को बीजेपी से तब तक कोई दिक्कत नहीं है जब तक वो धर्म के मामले में सीधा हस्तक्षेप नहीं करती. लेकिन बहुत से लोगों के मन में आशंका तो है ही."

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हमले
बीते रविवार को दिल्ली में चर्च और ईसाई समुदाय से जुड़ी संस्थाओं ने ईसाइयों के ख़िलाफ़ बढ़ रही हिंसा के ख़िलाफ़ प्रदर्शन किया था.
इन ईसाई संस्थाओं का आरोप है कि भारत में चर्चों और ईसाई धर्म का पालन करने वाले लोगों पर हमले बढ़ रहे हैं.
दिल्ली में संसद भवन के पास जंतर-मंतर पर हुए इस प्रदर्शन में देशभर के चर्चों से जुड़े लोग शामिल थे.
यूनाइटेड क्रिश्चियन फ़ोरम (यूसीएफ़) का कहना है कि चर्चों पर लगातार हमले बढ़ रहे हैं. यूसीएफ़ ने एक रिपोर्ट में कहा है कि साल 2014 में देश में देश में ईसाइयों के ख़िलाफ़ हिंसा की 147 घटनाएं हुई थीं. साल 2022 में ये आंकड़ा 598 था.
यूसीएफ़ के दावों के मुताबिक़ इस अल्पसंख्यक समुदाय पर सर्वाधिक हमले उत्तर प्रदेश में, उसके बाद छत्तीसगढ़, झारखंड, कर्नाटक और तमिलनाडु में होते हैं. हालांकि नगालैंड में ईसाई धर्म से जुड़े लोगों पर कभी किसी तरह का कोई हमला नहीं हुआ है.

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पैसा
शलोम बाइबल सेमिनरी के अकादमिक डीन डॉ. विलो नलेओ क्लीन इलेक्शन मूवमेंट के समन्वयक हैं. नगालैंड बैपटिस्ट चर्च काउंसिल (एनबीसीसी) इस मूवमेंट का नेतृत्व कर रही है.
राजधानी कोहिमा से क़रीब पंद्रह किलोमीटर दूर शलोम बाइबल सेमिनरी का बड़ा कैंपस है. यहां 200 से अधिक छात्र ईसाई धर्म की शिक्षा हासिल करते हैं.
डॉ. नलेओ राज्य में बीजेपी के उभार के पीछे पैसे की शक्ति को देखते हैं.
भारतीय जनता पार्टी ने 2018 विधानसभा चुनावों में नगालैंड की 60 में से 12 सीटें हासिल की थीं. इससे पहले पार्टी सर्वाधिक 7 सीटें साल 2003 के चुनावों में हासिल कर सकी थी.
2008 में पार्टी ने राज्य में 2 और 2013 में 1 सीट जीती थी. नगालैंड की एकमात्र लोकसभा सीट पर 2019 में बीजेपी की गठबंधन पार्टी एनडीपीपी के उम्मीदवार ने जीत हासिल की थी.
विश्लेषक मानते हैं कि बीजेपी ने केंद्र की सत्ता में अपने दम पर नगालैंड में भी अपनी राजनीतिक ज़मीन मज़बूत की है.

बीजेपी के उभार का कारण बताते हुए डॉ. विलो नलेओ कहते हैं, "नगालैंड में बीजेपी का उभार सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं है. वो आदिवासी कल्याण यूनियनों की शक्ल में भी यहां आ रहे हैं."
"वो गांव में जाते हैं और स्कूल बनाते हैं. वो कुछ ग़ैर-ईसाई परिवारों को अपने साथ मिला रहे हैं. वो इन लोगों को अपनी पारंपरिक आस्था ना छोड़ने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं. वो सीधे तौर पर ईसाई धर्म के खिलाफ़ नहीं हैं लेकिन वो उन्हें वाराणासी जैसी जगहों पर पढ़ने भेज रहे हैं ताकि वो लौटकर यहां हिंदी का प्रचार कर सकें. मेरा गांव में भी ऐसा ही एक स्कूल है."
डॉ. नलेओ जिस हिंदी स्कूल की बात कर रहे थे उसे देखने देखने हम राजधानी कोहिमा से क़रीब 20 किलोमीटर दूर विस्वेमा गांव पहुंचे.
ये स्कूल यहां साल 2003 में स्थापित हुआ था. स्कूल की इमारत काफ़ी बड़ी है लेकिन यहां सिर्फ़ 10-15 ही छात्र पढ़ते हैं. इनमें से अधिकतर ईसाई हैं.

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स्कूल के पास ही एक ईसाई परिवार के घर पर हमने बीजेपी का झंडा लहराता देखा. यहां रह रहीं सुषमा राय ने बताया, "मेरी बेटी इस हिंदू स्कूल में पढ़ती है. हम बीजेपी का समर्थन करते हैं क्योंकि मेरे पति मानते हैं कि बीजेपी यहां विकास ला रही है."
मूल रूप से नेपाल की रहने वाली सुषमा राय बीजेपी की समर्थक हैं. वो कहती हैं, "बीजेपी यहां पिछड़े लोगों के लिए काम कर रही है और उसने गांव-गांव तक विकास पहुंचाने का वादा किया है. हम लगता है कि बीजेपी यहां गांवों में भी विकास करेगी इसलिए ही यहां लोग इसका समर्थन कर रहे हैं."
ख़तरा
विश्लेषक मानते हैं कि बीजेपी के नगालैंड में उभार की एक वजह ये भी है कि यहां लोग पार्टी के हिंदुत्ववादी एजेंडे को समझते नहीं है.
ओरिएंटल थियोलॉजिकल सेमिनरी के प्रिंसिपल और ईसाई धर्म के विशेषज्ञ प्रोफ़ेसर डॉ. जोशुआ लोरिन कहते हैं, "नगालैंड में अधिकतर आबादी गांवों में रहती है. मैं मानता हूं कि गांव के लोग इस बात को नहीं समझते हैं कि हिंदुत्व का अभियान और एजेंडा क्या है और इसके क्या मायने हैं. लोग इस बारे में जागरूक नहीं हैं."
हालांकि डॉ. जोशुआ राज्य में बीजेपी के उभार को लेकर बहुत चिंतित नहीं हैं. वो कहते हैं कि नगालैंड में ईसाई आस्था बहुत मज़बूत है और यहां ईसाइयों पर हमले का कभी कोई इतिहास नहीं रहा है. वो कहते हैं, "यहां बीजेपी के अधिकतर नेता भी ईसाई ही हैं. हमें अभी ये नहीं लग रहा है कि नगालैंड में ईसाई धर्म पर किसी तरह का कोई ख़तरा है."

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इतिहास
प्रोफ़ेसर डॉ. जोशुआ लोरिन कहते हैं, "नगालैंड में पहुंचे पहले ईसाई मिशीनरी डॉ. ई डब्ल्यू क्लार्क के प्रयासों से ईसाई धर्म साल 1871 में यहां पहुंचा था. असम के धर्म प्रचारक गोधुला यहां साल 1871 में पहुंचे थे और उन्होंने मोलुंगकिमोंग के स्थानीय नगा आदिवासी सुपोंगमेरेन से दोस्ती की थी और उन्हें ईसाई धर्म में शामिल किया था."
डॉ. जोशुआ कहते हैं कि नगालैंड में ईसाई धर्म के तेजी से फैलने की एक वजह ये भी है कि यहां के आदिवासी कबीले भी एक ईश्वर में आस्था रखते थे. जब मिशीनरी ईसाई धर्म और ईसा मसीह का संदेश लेकर उन तक पहुंचे तो वो इससे आकर्षित हुए.
आज ईसाई धर्म नगालैंड की पहचान बन चुका है. प्रदेश में बीजेपी के भी अधिकतर नेता ईसाई ही हैं. राज्य में बीजेपी के नेता ये संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं की बीजेपी यहां ईसाई विरोधी नहीं हैं.
वहीं नगालैंड में बीजेपी के मीडिया समन्वयक सपरालु नायेखा कहते हैं, "नगालैंड के लोगों के लिए हमारा संदेश साफ है, बीजेपी विकास के एजेंडे के साथ बढ़ रही है. हम ईसाई विरोधी नहीं हैं. हम ईसाई हैं और बीजेपी में हैं और इससे हम कम ईसाई नहीं हो जाते. नगालैंड में ईसाई धर्म सुरक्षित है और सुरक्षित रहेगा."

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विपक्ष
हालांकि कांग्रेस नगालैंड में बीजेपी के धर्म-निरपेक्ष एजेंडे को एक चाल की तरह देखती है.
कांग्रेस नेता शशि थरूर कहते हैं, "बीजेपी के उम्मीदवार भी ईसाई हैं और जिस क्षेत्रीय पार्टी के साथ मिलकर वो लड़ रही है उसके उम्मीदवार भी ईसाई हैं. भाजपा दिक्कत ये है कि जिस किस्म की राजनीति वो हिंदी भाषी प्रदेशों में करती है उस तरह की राजनीति वो यहां नहीं कर पाएगी."
थरूर कहते हैं, "वहां वो हिंदुत्व की बात करते हैं और यहां कहते हैं कि हम सभी को सुरक्षित रखेंगे, नगालैंड की संस्कृति को सुरक्षित रखेंगे. वो ये चाहते हैं कि नगालैंड उनकी हिंदुत्व राजनीति को भूल जाएं. लेकिन देश में चर्चों पर हमले हो रहे हैं, छत्तीसगढ़, झारखंड और यहां नगालैंड के पास ही असम में चर्चों पर हमले हो रहे हैं."
शशि थरूर के मुताबिक़, "भाजपा देश में धर्म आधारित राजनीति के ख़िलाफ़ कुछ नहीं बोलती है और नगालैंड में आकर धर्म निरपेक्ष हो जाती है."
हालांकि बीजेपी नगालैंड में अपने विकास के एजेंडे से लोगों को जोड़ने में कामयाब होती नज़र आती है.

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शलोम बाइबिल सेमिनरी में धर्म की शिक्षा हासिल कर रहे छात्र रोकोविले कीरे कहते हैं, "मुझे बीजेपी नगालैंड में आने से कोई दिक्क़त नहीं हैं. बीजेपी नगालैंड में सत्ता में इसलिए आ रही है क्योंकि उससे पिछली सरकारों ने अपना काम ठीक से नहीं किया. हमसे बदलाव का वादा किया गया था लेकिन वो बदलाव हम नहीं देख पाए."
कीरे बताते हैं, "अब बीजेपी विकास का वादा कर रही है और मुझे लगता है कि वो बदलाव लाना चाहते हैं. ऐसे में मुझे व्यक्तिगत तौर पर तब तक बीजेपी से तब तक कोई दिक्क़त नहीं है, जब तक वो अपने विकास के एजेंडे पर चल रही है. अगर बीजेपी अपना एजेंडा बदलती है तो ज़रूर दिक्कत होगी."

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सत्ता
बीजेपी के साथ गठबंधन सरकार चला रहे मुख्यमंत्री नेफियू रियो अपनी जनसभाओं में लोगों को सुरक्षा का भरोसा दे रहे हैं.
बीबीसी से बात करते हुए नेफियु रियो कहते हैं, "बीजेपी और भारत सरकार इस बात को जानते हैं कि नगालैंड ईसाई बहुल प्रदेश है. इसी वजह से सीटों के बंटवारे में भी उन्होंने लोगों की भावनाओं को चोट नहीं पहुंचाई. इसलिए मैं कह सकता हूं कि सब धर्म के लोग इस राज्य में पूरी तरह सुरक्षित हैं. मैं उम्मीद करता हूं कि ऐसा ही रहेगा और लोग सद्बुद्धि से काम लेंगे."
नगालैंड में विद्रोहियों ने साल 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में शांति समझौते पर हस्ताक्षर किए थे. लेकिन ये समझौता ज़मीन पर अभी पूरी तरह लागू नहीं हो सका है.
वहीं पूर्वी नगालैंड के 6 जिलों में सात नगा समुदाय अपने लिए अलग प्रदेश की मांग को लेकर मुखर हैं.
दशकों तक हिंसा से प्रभावित रहे नगालैंड में हाल के सालों में सुरक्षा हालात बेहतर हुए हैं. बीजेपी ने नगा शांति समझौते का वादा करके भी लोगों को अपनी तरफ आकर्षित किया है. नगा शांति समझौता यहां चुनावों में सबसे बड़ा मुद्दा है. पिछले चुनावों से पहले भी बीजेपी ने नगालैंड में शांति समझौता करने का वादा किया था.
नगालैंड में अलगाववादी दल केंद्र सरकार से बात कर रहे हैं. ये लंबी और जटिल प्रक्रिया है.
लेकिन मुख्यमंत्री नेफियू रियो उम्मीद ज़ाहिर करते हैं कि इस मुद्दे का समाधान हो जाएगा.
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