चीन पर जयशंकर और कांग्रेस का एक-दूसरे पर हमला, चीन-भारत संबंधों की सच्चाई क्या है?

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- Author, इक़बाल अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा है कि मोदी सरकार चीन को लेकर ना तो बचाव की मुद्रा में रहती है और ना ही चीन से डरती है.
मंगलवार को जयशंकर ने भारत की एक समाचार एजेंसी एएनआई से लंबी बातचीत की थी. उसमें चीन के मुद्दे पर उन्होंने खुलकर बात की.
विपक्ष और ख़ासकर कांग्रेस नेता राहुल गांधी गलवान घाटी की घटना के बाद से मोदी सरकार पर लगातार हमले करते रहे हैं.
राहुल गांधी का आरोप है कि मोदी सरकार चीन के प्रति सख़्त नहीं हैं और चीन ने भारत के लगभग दो हज़ार वर्गकिलोमीटर भू-क्षेत्र पर क़ब्ज़ा किया हुआ है.
जयशंकर ने ना केवल अपनी सरकार का बचाव किया बल्कि उन्होंने भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू से लेकर इंदिरा गांधी और राहुल गांधी तक को इसमें घसीटा.
उन्होंने कहा कि विपक्ष 2023 में मोदी सरकार पर आरोप लगा रहा है कि चीन उस ज़मीन पर पुल बना रहा है जिस पर चीन ने 1962 में ही क़ब्ज़ा कर लिया था.
उन्होंने कहा कि शांति काल में चीन की सीमा पर सबसे बड़ी संख्या में सैनिकों की तैनाती मोदी सरकार के दौरान हुई है.
उन्होंने दावा किया कि चीन से सटी सीमा पर इन्फ़्रास्ट्रक्चर में काफ़ी सुधार हुआ है और मोदी सरकार ने इस पर अब तक क़रीब 14 हज़ार करोड़ रुपए ख़र्च किए हैं.
जयशंकर के बयान का कांग्रेस ने बुधवार को जवाब दिया. कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने जयशंकर के बयान को 'भारतीय सेना का अपमान' तो कहा ही, उन्होंने जयशंकर को भारत का सबसे 'नाकाम विदेश मंत्री' भी क़रार दिया.
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जयशंकर किसको संबोधित कर रहे थे
चीनी मामलों की जानकार दिल्ली स्थित जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय की प्रोफ़ेसर अलका आचार्य कहती हैं कि सरकार और विपक्ष चीन के मामले में सिर्फ़ अपने नफ़े नुक़सान को देखते हुए राजनीतिक बयानबाज़ी करते हैं.
सरकार और विपक्ष एक-दूसरे पर हमले तो करते ही रहते हैं, ऐसे में यह सवाल तो उठता ही है कि विदेश मंत्री के चीन पर दिए गए बयान को कैसे देखा जाए.
प्रोफ़ेसर अलका आचार्य कहती हैं, "यह कुल मिलाकर भारत की जनता के लिए दिया गया बयान है. इसमें एक शब्द भी ऐसा नहीं है जिससे लगे कि विदेश मंत्री चीन को संबोधित कर रहे हैं. जयशंकर एक राजनेता हैं, मोदी सरकार के एक मंत्री की हैसियत से विपक्ष के आरोप का जवाब दे रहे थे."
2012 में शी जिनपिंग चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव बने और 2013 में चीन के राष्ट्रपति. 2014 में नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने. उधर शी जिनपिंग चीन की सत्ता पर क़ाबिज़ हैं तो इधर मोदी पिछले नौ साल से भारत के प्रधानमंत्री बने हुए हैं.
तो सवाल उठता है कि मोदी सरकार की चीन नीति अब तक कैसी रही है.
प्रोफ़ेसर अलका आचार्य कहती हैं, "चीन के मुद्दे पर मोदी सरकार बैकफ़ुट पर है."
जयशंकर के ताज़ा इंटरव्यू का ज़िक्र करते हुए वो कहती हैं, "अगर आप (जयशंकर) अपने प्रतिद्वन्द्वी को जवाब देते हैं तो इस तरह का बयान नहीं देते हैं. अगर चीन को संबोधित करते तो भारत की आधिकारिक पोज़िशन को दोहराते जो उन्होंने नहीं किया. लेकिन वो यह कह नहीं सकते क्योंकि इसका अर्थ होगा कि चीन भारतीय इलाक़े में घुसा हुआ है."

मोदी की चीन नीति
जेएनयू के ही प्रोफ़ेसर स्वर्ण सिंह इसे दूसरे नज़रिए से देखते हैं. उनके अनुसार, यह समझना ज़रूरी है कि चीन और भारत में पिछले कुछ सालों में तेज़ी से बदलाव आया है. दोनों बड़ी ताक़तें बनी हैं.
चीन 18 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था है. भारत की अर्थव्यवस्था बढ़ रही है और दोनों देशों की सीमा के पास इन्फ़्रास्ट्रक्चर में बहुत तरक़्क़ी हई है.
वो कहते हैं कि सीमा पर बड़े हथियारों के साथ सेना तेज़ी से आगे बढ़ सकती है और पीछे भी हट सकती है. गलवान की घटना को भी इसी नज़रिए से देखना चाहिए.
लेकिन भारत की एक तरह से तारीफ़ करते हुए प्रोफ़ेसर स्वर्ण सिंह कहते हैं, "भारत चीन का अकेला पड़ोसी देश है जो चीन के सामने डटकर खड़ा हुआ है. चीन के सारे पड़ोसी देश इसको देख रहे हैं. हालांकि चीन और भारत की ताक़त में बहुत असमानता है."
तक्षशिला इंस्टीट्यूशन में चीनी स्टडीज़ के फ़ेलो मनोज केवलरमणि कहते हैं कि गलवान के बाद से भारत की चीन नीति में एक निर्णायक बदलाव आया है.
भारत ने इस बात को एक तरह से स्वीकार कर लिया है कि चीन भारत के लिए एक सामरिक चुनौती है और उससे निपटने के लिए भारत को अपनी नीतियां बदलनी होंगी.
लेकिन वो यह भी कहते हैं कि चीन के मामले में मोदी सरकार अपनी बातों को जनता के सामने ठीक से पेश करने में उतनी सफल नहीं रही है.
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दोनों देशों की बदलती रणनीति
प्रोफ़ेसर स्वर्ण सिंह कहते हैं कि भारत के रवैये के कारण चीन की रणनीति में बदलाव आया है. पहले चीन सीमा पर दो क़दम आगे, एक क़दम पीछे की रणनीति अपनाता था लेकिन अब उससे हटकर उसने सीमा पर भारी संख्या में सैनिकों की तैनाती कर दी है. चीन के जवाब में भारत ने भी बहुत बड़ी संख्या में अपने सैनिकों को तैनात किया हुआ है.
प्रोफ़ेसर स्वर्ण सिंह कहते हैं कि सीमा पर तनाव बना हुआ है, लेकिन स्थिरता भी बरक़रार है.
वो कहते हैं, "चीन और भारत उभरती हुई शक्तियां हैं. इसलिए दोनों देश चाहेंगे कि इस तरह के किसी तनाव से दोनों की तरक़्क़ी में कोई चोट ना पहुंचे. दोनों ही देश तनाव को एक सीमा से आगे बढ़ा कर एक-दूसरे का नुक़सान नहीं करना चाहेंगे."
प्रोफ़ेसर अलका आचार्य कहती हैं कि भारत और चीन में गतिरोध जारी है और बातचीत में कोई ख़ास प्रगति नहीं हो रही है.
उनके अनुसार, मोदी सरकार ऐसा कुछ नहीं कहना या करना चाहती है जिससे स्थिति और ख़राब हो.

मनोज केवलरमणि कहते हैं कि आने वाले दिनों में भारत और चीन के रिश्तों में स्थिरता नहीं आएगी और तनाव बना रहेगा.
उनके अनुसार, अगर चीन चाहता है कि भारत से संबंध बेहतर हों तो उसे सीमा पर यथास्थिति बहाल करना होगा. एनएसजी और चरमपंथ जैसे मुद्दों पर चीन को भारत के हितों का सम्मान करना होगा.
मनोज केवलरमणि कहते हैं कि दक्षिण एशिया में जैसे-जैसे चीन का हस्तक्षेप बढ़ेगा, भारत और चीन के संबंध और जटिल ही होंगे.

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