शी जिनपिंग: चीन के सर्वोच्च नेता की कैसे बढ़ने जा रही है ताक़त

- Author, डेविड ब्राउन
- पदनाम, बीबीसी न्यूज, विज़ुअल जर्नलिज़्म
चीन की सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी राष्ट्रपति शी जिनपिंग को पांच और साल के लिए सर्वोच्च पद सौंप सकती है.
शी जिनपिंग चीन में माओत्से तुंग के बाद सबसे शक्तिशाली नेता हैं. 2018 में चीन में दो कार्यकाल के नियम को बदल दिया गया था. उसी के बाद कम्युनिस्ट पार्टी ये निर्णय करने जा रही है.
अब ये निश्चित माना जा रहा है कि शी जिनपिंग की चीन पर पकड़ और भी मज़बूत हो जाएगी.
ये भी संभव है कि 69 साल के जिनपिंग आजीवन चीन की सत्ता पर बने रहें. 16 अक्टूबर (सोमवार) को राजधानी बीजिंग में कम्युनिस्ट पार्टी की महत्वपूर्ण कांग्रेस शुरू हो रही है.
इसी में ये ऐतिहासिक फ़ैसला लिया जा सकता है.
इसे पार्टी इतिहास की सबसे अहम बैठकों में से एक बताया जा रहा है.

शी जिनपिंग के पास हैं तीन शीर्ष पद
- महासचिव के रूप में वो चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के प्रमुख हैं
- राष्ट्रपति के रूप में वो चीन के राष्ट्राध्यक्ष हैं
- चीन के सेंट्रल मिलिट्री कमीशन के चेयरमैन की हैसियत से वो चीन के सैन्यबलों के कमांडर हैं


पार्टी की कांग्रेस में क्या होता है?
शी जिनपिंग को 'पैरामाउंट' या 'सर्वोच्च नेता' भी कहा जाता है.
पार्टी महासचिव और सेंट्रल मिलिट्री कमीशन प्रमुख के पद पर शी जिनिपिंग के बने रहने का फ़ैसला शायद पार्टी की कांग्रेस में ही हो जाएगा. कांग्रेस का आयोजन हर पांच साल में एक बार होता है.
वहीं राष्ट्रपति पद पर उनके बने रहने का फ़ैसला सालाना नेशनल पीपुल्स कांग्रेस में हो सकता है. इसका आयोजन 2023 में होना है.
पार्टी कांग्रेस के लिए थियानमेन चौक के ग्रेट हॉल में क़रीब 2300 प्रतिनिधि एक सप्ताह तक जुटेंगे.
इनमें से क़रीब दो सौ को पार्टी की केंद्रीय समिति में शामिल किया जाएगा. इनके अलावा 170 वैकल्पिक सदस्य भी होंगे.
केंद्रीय समिति 25 लोगों को पार्टी के पोलित ब्यूरो के लिए चुनेगी. पोलित ब्यूरो फिर अपनी स्थाई समिति के सदस्यों को चुनेगी.
ये लोग शीर्ष में से शीर्ष होते हैं. अभी स्टैंडिंग समिति में सात सदस्य हैं जिनमें राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी शामिल हैं.
ये सभी पुरुष ही होते हैं. हालांकि सबकुछ पार्टी कांग्रेस में ही नहीं होता है.
मुख्य कांग्रेस के समाप्त होने के एक दिन बाद केंद्रीय समिति की बैठक हो सकती है.

फ़ैसले की अहमियत
शी जिनपिंग दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और सबसे शक्तिशाली सेनाओं में से एक का नेतृत्व कर रहे हैं.
कुछ विश्लेषकों का कहना है कि तीसरे कार्यकाल के दौरान शी जिनपिंग चीन को और अधिक अधिनायकवादी राजनीति की तरफ ले जाएंगे.
लंदन यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ़ ओरिएंटल एंड अफ़्रीकन स्टडीज़ (एसओएएस) के प्रोफ़ेसर स्टीव सांग कहते हैं, "शी जिनपिंग के नेतृत्व में चीन अधिनायकवाद की दिशा में बढ़ रहा है."
प्रोफ़ेसर स्टीव कहते हैं, "माओ के नेतृत्व में चीन पूरी तरह अधिनायकवादी व्यवस्था था, अभी चीन वहां नहीं पहुंचा है लेकिन उसी दिशा में आगे बढ़ रहा है."

प्रोफ़ेसर स्टीव सांग कहते हैं कि पार्टी की कांग्रेस में संविधान में भी संशोधन किया जा सकता है. शी जिनपिंग की विचारधारा को पार्टी के मार्गदर्शक दर्शन के रूप में आगे बढ़ाया जा सकता है.
'शी जिनपिंग के विचार' शी जिनपिंग का चीनी समाजवाद है जो कि एक मुखर राष्ट्रवादी विचारधारा है जो निजी उद्योगों की आलोचक है.
शी जिनपिंग के नेतृत्व में चीन ने कई क्षेत्रों में काम कर रही शक्तिशाली कंपनियों की नकेल कसने की कोशिश की है और कई बड़े कारोबारियों को भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ कार्रवाई में निशाने पर लिया है.
प्रोफ़ेसर सांग कहते हैं कि अगर ऐसा होता है तो शी जिनपिंग 'प्रभावी रूप से तानाशाह बन जाएंगे.'
चीन भविष्य में क्या दिशा लेगा इसके संकेतों पर दुनियाभर की नज़रें हैं. ख़ासकर आर्थिक, राजनीतिक, कूटनीतिक और पर्यावरण के मुद्दों पर अहम चुनौतियों पर चीन क्या रुख़ अपनाता है, ये जानने में दुनिया की दिलचस्पी है.

चीन की आर्थिक चुनौतियां
हाल के दशकों में चीन की अर्थव्यवस्था आगे बढ़ रही थी.
लेकिन कोविड महामारी, बढ़ती क़ीमतों और रियल स्टेट सेक्टर में गिरावट की वजह से चीन की अर्थव्यवस्था के सामने बड़ी चनौतियां हैं.
यूक्रेन युद्ध की वजह से वैश्विक मंदी की आशंका ने चीन के विश्वास को और भी कमज़ोर किया है.
शी जिनपिंग के नेतृत्व में चीन ने पूर्ववर्ती राष्ट्रपतियों हू जिंताओं और जियांग जेमिन के कार्यकाल के मुक़ाबले कम दर से आर्थिक प्रगति की है.
कुछ विश्लेषकों का मानना है कि चीन की कम्युनिस्ट सरकार को लोगों और कामगारों का भरोसा क़ायम रखने के लिए अधिक नौकरियां देनी होंगी और लोगों की आय बढ़ानी होगी.
ऐसे में अगर अगले पांच सालों में चीन आर्थिक मोर्चे पर जूझता है तो ये शी जिनपिंग के लिए राजनीतिक दिक्कतें पैदा कर सकता है.
कांग्रेस के दौरान चीन में प्रमुख आर्थिक पदों पर भी बदलाव के लिए मंच तैयार हो सकता है. जैसे सेंट्रल बैंक के गवर्नर और प्रीमियर को बदला जा सकता है.

ज़ीरो कोविड नीति
कोविड महामारी के प्रति चीन की 'ज़ीरो कोविड नीति' शी जिनपिंग के सबसे ऐतिहासिक फ़ैसलों में एक है.
दुनिया सामान्य स्थिति की ओर लौट रही है लेकिन चीन सरकार ने कोविड संक्रमण फैलने से रोकने के प्रयासों को बढ़ा दिया है. सख्त लॉकडाउन लागू किए गए, बड़े पैमानों पर लोगों का टेस्ट किया गया और लंबे समय तक लोगों को क्वारंटीन में रखा गया.
रिपोर्टों के मुताबिक हाल के सप्ताह तक शेनजेन और चेंगडू समेत 70 से अधिक शहर लॉकडाउन में थे. इससे करोड़ों नागरिक प्रभावित हुए. बड़े पैमाने पर कारोबार प्रभावित हुए और लोगों में आक्रोश की भी ख़बरें थीं.

इमेज स्रोत, Getty Images
शी जिनपिंग ने कहा था कि अगर किसी भी कार्य या कथन से उनकी कोविड नीति को नकारा जाएगा या उस पर शक़ किया जाएगा तो उसके ख़िलाफ सख़्त कार्रवाई की जाएगी.
अगर कांग्रेस से पहले या उसके दौरान चीन में कोविड के मामले सामने आते हैं तो यह शी जिनपिंग की कार्यक्षमता पर सवाल खड़े करेगा और उनकी छवि भी प्रभावित होगी.
कुछ विश्लेषकों का मानना है कि पार्टी कांग्रेस के दौरान कोविड पर जीत की घोषणा करते हुए ज़ीरो कोविड नीति को समाप्त कर सकती है.
इसके उलट, पार्टी ये तर्क दे सकती है कि चीन अर्थव्यवस्था से अधिक लोगों के जीवन को महत्व दे सकता है और इस स्थिति में कोविड नीति जारी रह सकती है.

ताइवान और पश्चिमी देश
शी जिनपिंग ने पश्चिम के साथ रिश्तों को लेकर भी सख़्त रवैये का समर्थन किया है. ख़ासकर ताइवान के मुद्दे पर.
अमेरिकी प्रतिनिधि सभा की स्पीकर नैंसी पेलोसी की ताइवान यात्रा के बाद चीन ने ताइवान की घेराबंदी करते हुए बड़े पैमाने पर सैन्याभ्यास किया और मिसाइलें भी दागीं.
चीन ताइवान को अपने हिस्से के ही रूप में देखता है जो अलग हो गया था. चीन का मानना है कि एक दिन ताइवान उसके नियंत्रण में होगा.
वहीं ताइवान अपने आप को चीन से अलग एक स्वतंत्र देश के रूप में देखता है.
शी जिनपिंग कह चुके हैं, "2049 में पीपुल्स रिपब्लिक के 100 साल पूरे होने के मौके पर ताइवान का चीन में एकीकरण पूरा हो ही जाना चाहिए.''
ये उद्देश्य हासिल करने के लिए शी जिनपिंग ने सेना के इस्तेमाल की संभावना को भी खारिज नहीं किया है.
सुरक्षा विश्लेषकों के मुताबिक यदि ताइवान चीन के नियंत्रण में आ जाता है तो 'पश्चिमी प्रशांत महासागर और इसके परे अमेरिका की शक्ति चकनाचूर हो जाएगी.'
ताइवान तथाकथित फ़र्स्ट आइलैंड चेन का हिस्सा है और पश्चिमी देशों के लिए रणनीतिक रूप से बेहद अहम है.
फ़र्स्ट आइलैंड चेन में वो द्वीप और क्षेत्र रहे हैं जो दशकों से अमेरिका के सहयोगी हैं.
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