ताइवान पर अमेरिका और चीन में क्या हो सकता है युद्ध ?- दुनिया जहान

अमेरिकी प्रतिनिधि सभा की स्पीकर नैंसी पेलोसी के साथ ताइवान की राष्ट्रपति साई इंग-वेन

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ताइवान की राजधानी ताइपे के लिए सोमवार का ये दिन बाकी दिनों से अलग था.

दोपहर के वक्त सालाना 'एयर रेड ड्रिल' शुरू हो गई. इस ड्रिल का उद्देश्य ताइवान के लोगों को चीन के संभावित हमले के लिए तैयार करना होता है.

ताइवान का पड़ोसी चीन दुनिया में 'सुपरपावर' की हैसियत रखता है.

अमेरिकी प्रतिनिधि सभा की स्पीकर नैन्सी पेलोसी की यात्रा के बाद से चीन नाराज़ है और यहां तनाव चरम पर है.

इस बीच, अमेरिका ने ताइवान के करीब चीन की सैन्य गतिविधि को 'उकसावे वाली कार्रवाई' बताया है और आरोप लगाया है कि इससे क्षेत्र में ख़तरे की स्थिति बन रही है.

दूसरी तरफ़ चीन ने अमेरिका से कहा है कि वो 'आग से नहीं खेले.'

बढ़ते तनाव के बीच ये सवाल भी पूछा जा रहा है कि क्या ताइवान को लेकर अमेरिका और चीन में युद्ध छिड़ सकता है?

बीबीसी ने इस सवाल का जवाब पाने के लिए चार एक्सपर्ट से बात की

च्यांग काई शेक

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अधूरा अभियान

महाशक्तियों के बीच संघर्ष में ताइवान इतना अहम क्यों हो गया है, ये समझने के लिए हमें करीब 70 साल पीछे जाना होगा.

उस वक़्त चीन में गृह युद्ध छिड़ा था. एक तरफ माओत्से तुंग की अगुवाई में कम्युनिस्ट थे. दूसरी तरफ च्यांग काई शेक के नेतृत्व में राष्ट्रवादी ताक़तें थीं.

साल 1949 आते आते राष्ट्रवादी बुरी तरह पराजित होने लगे. तब च्यांग काई शेक को तय करना था कि वो अपनी सेना को कहां ले जाएं.

वाशिंटगन स्टेट यूनिवर्सिटी से जुड़े और ताइवान के इतिहास के जानकार जेम्स लिन बताते हैं, " वो एक ऐसे इलाके में चले जाना चाहते थे जहां फिर से ताक़त बटोर सकें. एक ऐसी जगह जहां वो फिर से खड़े हो सकें और जो बड़ा इलाका उन्होंने गंवा दिया है, उसे फिर से हासिल कर सकें."

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वो बताते हैं कि उस वक्त च्यांग काई शेक के पास सीमित विकल्प थे.

जेम्स लिन के मुताबिक, " वो सोचते थे कि कम्युनिस्ट राष्ट्र से सुरक्षा के हिसाब से ताइवान की क्षमता शायद सबसे अच्छी है. कम्युनिस्टों के पास सेना को ताइवान ले जाने के लिए संसाधन नहीं थे. इसीलिए काई शेक ताइवान गए. निर्वासन में रहते हुए उन्होंने वहां सरकार गठित की. कम्युनिस्ट अब तक ताइवान को अपने अधिकार में नहीं ले पाए हैं."

चीन के लिए ताइवान हमेशा से ऐसा अभियान रहा, जो पूरा नहीं हो पाया है. शुरुआती दिनों में यहां की पूंजीवादी सरकार ने ताइवान के 'असली चीन' होने का दावा किया. अमेरिका ने पूरी मजबूती से ताइवान का समर्थन किया और इसे 'आज़ाद चीन' बताया.

लेकिन हकीकत में ये उस तरह आज़ाद नहीं था. चेंग काई शेक किसी तानाशाह की तरह थे. उन्होंने 'मार्शल लॉ' लागू किया था.

जेम्स लिन बताते हैं, " अमेरिका का ताइवान को समर्थन इसके लोकतांत्रिक होने को लेकर नहीं था. समर्थन की वजह थी चीन के करीब इसकी रणनीतिक स्थिति. तब से ताइवान अमेरिकी विदेश नीति का बेशकीमती साझेदार बन गया."

ताइवान में चीन के ख़िलाफ़ प्रदर्शन

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ताइवान में लोकतंत्र चार दशक बाद आया. 1990 के दशक से यहां राष्ट्रपति का सीधा चुनाव होता है. तब से ताइवान में ऐसे लोगों की संख्या लगातार घट रही है जो खुद को चीनी बताते हैं. हाल में हुए एक सर्वे के मुताबिक ऐसे लोगों की संख्या सिर्फ तीन प्रतिशत है.

जेम्स लिन कहते हैं, "1990 के दशक से ताइवान की अलग पहचान उभरने लगी. बीजिंग को ये बात ख़तरे की तरह लगती है. ये अब अनसुलझे गृह युद्ध की बात नहीं रह गई. ताइवान के लोग अपनी पहचान चीन से अलग देखने लगे हैं. चीन इसे अलगाववाद की तरह देखता है."

लेकिन ताइवान के लिए उसकी ऐतिहासिक, भौगोलिक और वैचारिक स्थिति एक त्रासदी बन गई है. वहां के लोग जो सोचते हैं, वैसा हाल फिलहाल होना मुश्किल है.

ईस्ट चाइना सी स्थित ये द्वीप अमेरिका और चीन दोनों के लिए बहुत अहम है.

जिमी कार्टर और डेंग शियाओपिंग

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रणनीति

साल 1941 में जापान ने पर्ल हार्बर पर हमला किया और अमेरिका को दूसरे विश्व युद्ध में खींच लिया. जापान का हमला अमेरिका के लिए बड़े झटके की तरह था. तब तक अमेरिकी मानते थे कि प्रशांत और अटलांटिक महासागर उन्हें विदेशी हमलों से बचाते रहेंगे.

फिर अमेरिका को लगा कि उसे अपनी सुरक्षा के लिए और उपाय करने होंगे. चीन और सोवियत समर्थन वाली कम्युनिस्ट सरकारों से अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिका ने दक्षिण पूर्व और पूर्वी एशिया में द्वीपों की पहली चेन तैयार की. ताइवान इस चेन की अहम कड़ी बना हुआ है.

लंदन स्थित थिंक टैंक "चैटम हाउस" की सीनियर रिसर्च फेलो डॉक्टर यू जे बताती हैं, "साल 1954 में पहली बार ठोस भरोसा दिया गया कि अगर मेनलैंड चीन की ओर से ताइवान पर कोई ख़तरा आता है तो अमेरिका उसे सैन्य मदद मुहैया कराएगा."

वो बताती हैं कि दूसरा कदम था 1979 का 'ताइवान एक्ट'. इसके मुताबिक अगर बीजिंग एकतरफा तरीके से यथास्थिति बदलने की कोशिश करता है तो अमेरिका सैन्य सहायता देगा.

डॉक्टर यू जे ये भी कहती हैं कि ताइवान को लेकर अमेरिका और चीन के संबंधों में दो धारा हैं. इनमें 'ताइवान रिलेशन्स एक्ट' के साथ 'स्ट्रैटज़िक एम्बीग्यूटी' यानी 'रणनीतिक पेंच' वाली नीति भी है.

इनके सिरे अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन के फ़ैसले से जाकर जुड़ते हैं. साल 1972 में निक्सन ने चीन के साथ मेलजोल बढ़ाना शुरू किया. 'शंघाई घोषणापत्र' तभी सामने आया. इसी ने 'वन चाइना पॉलिसी' स्थापित की.

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इसके मुताबिक अमेरिका ये मानता है कि ताइवान स्ट्रेट के दोनों तरफ चीनी हैं. वो ये भी मानता है कि चीन एक है और ताइवान चीन का हिस्सा है.

ये नीति अमल में आई और ताइवान ने संयुक्त राष्ट्र में अपनी सीट गंवा दी. 1970 के दशक के आखिर तक अमेरिका के चीन के साथ पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित हो गए.

अमेरिका हमेशा कहता रहा है कि ये नीति सिर्फ़ बीजिंग के ताइवान पर दावे को मानती है, लेकिन इसे मंज़ूरी या मान्यता नहीं देती.

चीन 'वन चाइना सिद्धांत' की बात करना पसंद करता है. जो ताइवान को चीन का हिस्सा बताता है और यहां एक शब्द भर से पूरी दुनिया बदल जाती है.

डॉक्टर यू जे कहती हैं, " वन चाइना पॉलिसी का मतलब है कि अमेरिका बीजिंग को पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना की वैध सरकार मानता है. 'वन चाइना प्रिंसिपल' का मतलब है कि अमेरिका को ये मान्यता देनी चाहिए कि सिर्फ़ बीजिंग की सरकार ही संयुक्त राष्ट्र या किसी दूसरे अंतरराष्ट्रीय मंच पर चीन का प्रतिनिधित्व करने वाली इकलौती सरकार है."

ताइवान को भरोसा देने के लिए अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने 1979 में 'ताइवान रिलेशन्स एक्ट' पर हस्ताक्षर किए. इसमें ताइवान को हथियार बेचने का वादा किया गया ताकि वो अपनी रक्षा कर सके.

ताइवान के ख़िलाफ़ बल प्रयोग या ज़ोर ज़बरदस्ती को लेकर भी इसमें चेतावनी दी गई है. लेकिन इसमें ये साफ़ नहीं है कि अगर चीन ने हमला किया तो क्या अमेरिका ताइवान की रक्षा के लिए आगे आएगा?

जो बाइडन और नैंसी पेलोसी

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तब से अमेरिका की जो आधिकारिक नीति रही है, उसमें ये एक अहम 'रणनीतिक पेंच' है.

डॉक्टर यू जे कहती हैं, " 40 साल पीछे जाएं तो इस एक्ट के जरिए मकसद पूरा हुआ लेकिन मुझे लगता है कि अब चीन उभार पर है. जो किसी हद तक अमेरिका के दबदबे को चुनौती देता है और अमेरिका को लगता है कि शायद ताइवान के मुद्दे को अब ज़्यादा देर तक परे नहीं रखा जा सकता. इसे लेकर और ज़्यादा स्पष्टता लाने की ज़रूरत है."

अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ताइवान के मुद्दे पर कई बार अंतरराष्ट्रीय समुदाय में सिहरन की स्थिति पैदा कर चुके हैं.

हाल में जो बाइडन के जापान के दौरे के दौरान ऐसा देखने को मिला था.

वीडियो कैप्शन, चीन के मुक़ाबले ताइवान के पास कितने हथियार हैं?

अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडन विदेश नीति के मामले में कोई नौसिखिए नहीं हैं.

वो बरसों तक सीनेट की विदेश नीति समिति के प्रमुख रहे हैं. लेकिन कई बार चूक कर जाना भी उनकी आदत में शुमार है.

डॉक्टर यू जे कहती हैं, " उनके प्रशासन के कुछ सीनियर सदस्यों ने ये कहते हुए उनके बयान से पीछे हटने की कोशिश की कि 'वन चाइना पॉलिसी' का सम्मान किया जाना चाहिए. मुझे लगता है कि आगे बढ़ने की दिशा को लेकर बाइडन प्रशासन के बीच असहमति है और जब तक इस मामले में कोई सहमति नहीं बन जाती है तब तक आप अलग अलग सदस्यों से अलग अलग बात सुनते रहेंगे."

एक और क्षेत्र ऐसा है जहां अमेरिकी प्रशासन की बातों को गौर से परखा जा रहा है. वो है ताइवान के करीब चीन की गतिविधियां. अमेरिकी प्रशासन के एक अधिकारी के मुताबिक वहां कभी भी कोई हादसा या घटना हो सकती है.

लड़ाकू विमान

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चीन की शक्ति

जब कोई उभरती शक्ति किसी 'सुपरपावर' को चुनौती देती है तो नतीजा युद्ध के रूप में सामने आता है.

चीन आर्थिक, राजनीतिक और सैन्य तौर पर एक उभरती शक्ति है, इसे लेकर कोई शक या सवाल नहीं है.

स्टैनफ़र्ड यूनिवर्सिटी की फेलो ओरियाना स्काइलर मैस्ट्रो बताती हैं, "अगर आप 1990 के दशक के मध्य के दिनों पर गौर करें तो चाहे वो पनडुब्बी हों, फाइटर जेट हों या जहाज हों, उनमें से शून्य से चार प्रतिशत तक ही आधुनिक थे. इस वक़्त कम से कम 50 या कुछ मामलों में 70 से 80 प्रतिशत तक उपकरण आधुनिक हैं."

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बीते दो दशक के दौरान चीन की क्षमता पूरी तरह बदल गई है. इस वजह से चीन दुनिया के कारोबारी संगठनों और अंतरराष्ट्रीय संस्थानों में दबदबा दिखाने लगा. वो अपने पड़ोस में संप्रभुता को लेकर कहीं ज़्यादा आ्क्रामक तरह से दावेदारी करने लगा.

ओरियाना बताती हैं कि चीन ने अपनी ताक़त में बेशुमार इजाफ़ा कर लिया है. उसके पास सैकड़ों जहाज हैं. संख्या में वो अमेरिका से भी आगे है. आधुनिक विमानों के मामले में वो अमेरिका के बराबर हैं.

ओरियाना ये भी कहती हैं कि चीनी सेना ने ताक़त भले ही बढ़ा ली हो लेकिन अमेरिकी सेना अब भी कहीं बेहतर है. हालांकि ताइवान के मामले में चीन के पास घरेलू परिस्थिति का फायदा है. ताइवान के करीब अमेरिका का सिर्फ़ एक एयरबेस है. वहीं चीन के पास 39 अड्डे हैं.

ओरियाना स्काइलर मैस्ट्रो बताती हैं, " ताइवान को लेकर चीन की सेना प्रमुख तौर पर चार तरह के हमलों की तैयारी करती मालूम होती है. पहला है ताकत से जुड़ा अभियान. मसलन वो तब तक ताइवान पर मिसाइल दागेंगे जब तक कि नेतृत्व घुटने न टेक दे. इसके अलावा वो तब तक नाकेबंदी कर सकते हैं जब तक कि ताइवान का नेतृत्व शी जिनपिंग की मांग के आगे हथियार न डाल दे. वो एयर रेड कर सकते हैं. वो इस इलाके के अमेरिकी ठिकानों को निशाना बना सकते हैं. चौथा अभियान चौतरफा हमला हो सकता है. ज़्यादातर सैन्य विशेषज्ञों की राय है कि चीन शुरुआती तीन विकल्पों को तो आज़मा सकता है लेकिन विशेषज्ञों के बीच बहस इस बात पर होती है कि क्या चीन चौथे विकल्प को आजमाएगा?"

जो बाइडन और शी जिनपिंग

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अमेरिकी रणनीतिकार बीते एक दशक से इन तमाम परिदृश्यों पर गौर करते हुए समाधान तलाशने में जुटे हैं.

ओरियाना बताती हैं कि चीन क्रूज़ और बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम के मामले में दुनिया में सबसे आगे है.

वो कहती हैं कि बहस ये भी होती है कि क्या अमेरिका को चीन के करीब लड़ाई करनी चाहिए या फिर उसे द्वीपों की दूसरी श्रंखला तैयार करनी चाहिए. जिसमें ताइवान से आगे का इलाका शामिल हो. मसलन गुआम और पैसिफिक आइलैंड. यानी कोशिश लड़ाई को चीनी सीमा से दूर से रखने की हो.

दोनों ही पक्ष अनुमान लगाने में जुटे हैं और स्थिति बेहद विस्फोटक हो गई है. लेकिन क्या जंग भी छिड़ सकती है, इस सवाल पर ओरियाना कहती हैं, "मुझे लगता है कि हमारे पास तीन से चार साल हैं, लेकिन उसके बाद मुझे ऐसी परिस्थिति दिखाई नहीं देती कि ये जंग न हो. मेरी तरह ही इस मामले पर नज़र रखने वाले मेरे साथी मानते हैं कि चीन के पास ताइवान से भी ज़रूरी मुद्दे होने चाहिए. लेकिन मैं यही कह सकती हूं कि कम्युनिस्ट पार्टी के लिए ताइवान सबसे अहम मुद्दा है."

ओरियाना कहती हैं कि चीन की सरकार के रूख को बड़े पैमाने पर जनसमर्थन भी हासिल है.

ओरियाना बताती हैं, " सेना की रणनीति, आर्थिक रूख और विदेश नीति के लिहाज से वो स्मार्ट है और ये तय कर रहे हैं कि बोझ असहनीय न हो जाए. विरोध की मूल बात ये ही है कि ताइवान एक आज़ाद देश की तरह बर्ताव कर रहा है और चीन को ये मंजूर नहीं है. अमेरिका ताइवान की रक्षा से जुड़ा है तो मुझे तब तक और कोई रास्ता दिखाई नहीं देता जब तक कि कोई अप्रत्याशित बदलाव ही न हो जाए."

रूस के यूक्रेन पर हमले के बाद से ताइवान के भविष्य को लेकर बहस और तेज़ हो गई. क्या चीन इससे प्रोत्साहित होगा या फिर ऐसी कार्रवाई से जुड़े ख़तरों से सबक सीखेगा.

ताइवान के लोग

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यूक्रेन जैसा नहीं है ताइवान

'यूनाइटेड स्टेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ़ पीस' के फेलो एंड्रयू स्कोबेल कहते हैं, " बुनियादी बात ये है कि यूक्रेन भौगोलिक रूप से रूस के साथ जुड़ा हुआ है. इसके उलट चीन और ताइवान के बीच करीब सौ किलोमीटर से ज़्यादा का समुद्री फासला है."

एंड्रयू स्कोबेल कहते हैं, " इस द्वीप के ख़िलाफ़ सैन्य अभियान शुरू करना चीन के लिए बड़ी चुनौती है. बीते कुछ दशकों के दौरान रूस दुनिया भर में कई सैन्य कार्रवाई में शामिल रहा है जैसे कि सीरिया में. इसके विपरीत चीन ने 1979 के बाद कोई बड़ी जंग नहीं लड़ी है. तब उन्होंने वियतनाम पर हमला किया था."

सैन्य गणना एक बात है लेकिन यूक्रेन के मुक़ाबले ताइवान की रणनीतिक और कूटनीतिक स्थिति अलग होने से जुड़ा हिसाब भी चीन को लगाना होगा.

एंड्रयू स्कोबेल कहते हैं, "चीन के लिहाज से यूक्रेन और ताइवान के बीच अहम अंतर ये है कि यूक्रेन नैटो का सदस्य नहीं है. व्लादिमीर पुतिन ने ये अनुमान लगाते हुए यूक्रेन पर हमला किया कि अमेरिका और नैटो सीधे तौर पर सैन्य हस्तक्षेप नहीं करेंगे. और ऐसा ही हुआ. वहीं, चीन ताइवान को लेकर अनुमान लगाता है कि ताइवान स्ट्रेट में कोई सैन्य संघर्ष छिड़ा तो अमेरिका की सेना ताइवान की मदद के लिए आएगी."

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एंड्रयू समेत कई विश्लेषक मानते हैं कि न तो अमेरिका और न ही चीन ताइवान को लेकर युद्ध करना चाहते हैं.

एंड्रयू स्कोबेल कहते हैं, " ये अच्छी ख़बर है. बुरी ख़बर ये है कि इलाके में तनाव बढ़ गया है. अमेरिका और चीन के रिश्ते बीते कई दशकों के मुकाबले सबसे ख़राब दौर में हैं. बहुत सी गलतफहमी और संदेह की स्थिति बनी हुई है. मुझे ये फिक्र है कि किसी बेइरादा आक्रामक कार्रवाई या संघर्ष की स्थिति में दोनों पक्ष अनचाही लड़ाई में फंस सकते हैं."

ताइवान मामले में शांति बनी रहे, अगर आप ये सोच रहे हैं और मन में निराशावादी विचार न आएं तो इसके लिए पुरज़ोर कोशिश करनी होगी.

चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की 20वीं नेशनल कांग्रेस में शी जिनपिंग को अगले पांच साल के लिए नेता चुना जाएगा. ये उनका तीसरा कार्यकाल होगा. उसी दौरान बीजिंग प्रशासन पर दवाब होगा कि ताइवान को लेकर वो कड़ा रूख अपनाएं.

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लौटते हैं उसी सवाल पर क्या ताइवान को लेकर अमेरिका और चीन में युद्ध छिड़ सकता है?

कई विशेषज्ञों की राय है कि जंग चीन और अमेरिका के लिए तर्कसंगत नहीं होगी. इससे बड़ी तबाही हो सकती है. वो भी उस वक़्त जब दुनिया की ये दो महाशक्तियां आर्थिक चुनौतियों से जूझ रही हैं.

हालांकि, ये एक दुधारी तलवार जैसी स्थिति है. विशेषज्ञ मानते हैं कि कई बार जंग ही किसी समस्या का समाधान होती है. उन्हें अभी ये लग रहा है कि दोनों देश तलवार की धार के बहुत करीब पहुंच रहे हैं.

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