पुतिन और किम जोंग उन की नज़दीकियां किसके लिए बन रही हैं सिरदर्द

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- Author, अताहुआल्पा अमेराइज़
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़ वर्ल्ड
रूस और उत्तर कोरिया के बीच एक ज़माने बाद नज़दीकियां बढ़ती हुई दिख रही हैं. शीत युद्ध के ज़माने में उत्तर कोरिया और सोवियत संघ एक दूसरे के काफी करीब हुआ करते थे.
हाल ही में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने उत्तर कोरिया के शासक किम जोंग उन को एक चिट्ठी लिखी है जिसमें दोनों के रिश्तों को और मजबूत बनाने का वादा किया गया है.
किम जोंग उन की ओर से इस चिट्ठी का जवाब भी दिया गया है जिसमें उन्होंने कहा है, "विरोधी ताक़तों के ख़िलाफ़ साझा हितों के लिए दोनों देशों के बीच सहयोग अपने उच्चतम स्तर पर है."
साल 2019 में पूर्वी रूस के शहर व्लादिवोस्तोक में एक ऐतिहासिक शिखर सम्मेलन हुआ था जिसमें दोनों नेताओं रूस-उत्तर कोरिया की नई दोस्ती पर मुहर लगाई थी.
इसके बाद से ही किम जोंग उन हर विवादास्पद मामले में मॉस्को के लिए अपने समर्थन का खुलेआम एलान करते रहे हैं. यूक्रेन पर जब रूस ने धावा बोला तब भी उत्तर कोरिया ने रूस के लिए अपनी वफादारी दिखलाई.
यूक्रेन के डोनेट्स्क और लुहांस्क क्षेत्रों को जब रूस ने जुलाई के महीने में अपने नियंत्रण में लेने की घोषणा की तो इसका समर्थन करने वाला उत्तर कोरिया तीसरा देश था.
रूस और व्लादिमीर पुतिन की तारीफ़ में किम जोंग उन हमेशा सक्रिय रहे हैं. उत्तर कोरिया के सरकारी मीडिया में रूस से जुड़ी ख़बरों को खासी तवज्जो मिलती रही है.
बीबीसी की मुंडो सेवा ने रूस और उत्तर कोरिया के संबंधों को समझने के लिए कई विशेषज्ञों से बात की है.

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दोनों देशों का इतिहास
वॉशिंगटन डीसी स्थित थिंकटैंक विल्सन सेंटर के एक्सपर्ट सैमुअल वेल्स बीबीसी मुंडो से कहते हैं, "सोवियत संघ के विघटन के बाद प्योंगयांग और मॉस्को के संबंध काफी कमज़ोर हो गए थे. उस लिहाज से देखें तो अब दोनों देशों के रिश्तों में काफी सुधार हो रहा है."
प्योंगयांग और मॉस्को के संबंधों की शुरुआत साल 1948 में उत्तर कोरिया की स्थापना के साथ ही शुरू हो गई थी.
द्वितीय विश्व युद्ध के ख़त्म होने के बाद सोवियत संघ के तत्कालीन नेता जोसेफ स्तालिन ने किम इल सुंग को उत्तर कोरिया की सत्ता में स्थापित करने में काफी मदद की थी. वहां ऐसा निज़ाम स्थापित किया गया जो कोरियाई संस्कृति और परंपरा के मुताबिक़ और सोवियत संघ के अनुकूल था.
किम इल सुंग उत्तर कोरिया के मौजूदा शासक किम जोंग उन के दादा थे.

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साल 1950-53 के दौरान हुए कोरियाई युद्ध में दक्षिण कोरिया के ख़िलाफ़ सोवियत संघ ने उत्तर का साथ दिया. सहयोग का ये सिलसिला कोरियाई युद्ध के बाद भी जारी रहा. बाद में चीन ने भी किम की हुकूमत को हर तरह के संसाधनों के साथ मदद पहुंचाई.
न्यूज़ एजेंसी ईएफ़ई के लिए उत्तर कोरिया में 14 सालों तक रिपोर्टिंग कर चुके एंड्रेस सांचेज़ बारुन उत्तर कोरिया, रूस और चीन के संबंधों पर लंबा अनुभव रखते हैं.
उन्होंने बीबीसी मुंडो को बताया, "शीत युद्ध के समय किम इल सुंग रूस और चीन के साथ संबंधों में संतुलन साधने में हमेशा कामयाब रहे. बिना किसी पर विशेष रूप से निर्भर हुए वे रूस और चीन दोनों के अच्छे दोस्त बने रहे. साल 1953 में ख्रुश्चेव के सत्ता में आने के बाद रूस और चीन के संबंधों में आई दूरियों का भी उन्होंने फ़ायदा उठाने की कोशिश की."
लेकिन दोनों सहयोगी देशों के बीच उत्तर कोरिया को ज़्यादा मदद सोवियत संघ से मिली. वो चाहे खाने-पीने की चीज़ें हों या फिर ईंधन हो या मशीनरी हो या फिर टेक्नीकल ट्रेनिंग. यहां तक कि रूस ने उत्तर कोरिया से वो चीज़ें भी खरीदीं जिसकी उसे ज़रूरत नहीं थी.

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किम जोंग उन की रणनीति
लेकिन साल 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद सब कुछ बदल गया.
पहले बोरिस येल्तसिन और उनके बाद व्लादिमीर पुतिन की नई सरकारों के दौर में रूस और उत्तर कोरिया के संबधों में ठंडापन बना रहा. ऐसे वक़्त में उत्तर कोरिया के पास केवल एक ताक़तवर सहयोगी रह गया था और वो था- चीन.
परमाणु और मिसाइल परीक्षणों के बाद उत्तर कोरिया और रूस के बीच दूरियां बढ़ने लगी. साल 2017 में जब उत्तर कोरिया के न्यूक्लियर टेस्ट और लंबी दूरी की मिसाइल परीक्षणों के लिए प्रतिबंध लगाए गए तो रूस ने ऐसे फ़ैसलों में शामिल होने से हिचक नहीं दिखाई.
एंड्रेस सांचेज़ बारुन बताते हैं, "उत्तर कोरिया परमाणु हथियारों के परीक्षण कर रहा था. वो बड़ी मिसाइलों टेक्नोलॉजी जुटा रहा था. तब रूस नहीं चाहता था कि परमाणु शक्ति संपन्न देशों के ताक़तवर क्लब में और देश शामिल हों. रूस को इस तरह की अस्थिरता से कोई फ़ायदा नहीं होने वाला था."

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उत्तर कोरिया पर जो पाबंदियां लगाई गईं, उसका मक़सद किम जोंग उन की सत्ता को आर्थिक रूप से कमज़ोर करना था. इसका नतीज़ा ये हुआ कि उत्तर कोरिया के कारोबारी रिश्ते सिर्फ़ और सिर्फ़ चीन के साथ सिमट कर रह गए हैं.
महामारी ने उत्तर कोरिया को और अलग-थलग कर दिया है. किम जोंग उन ने अपने देश की सीमाएं सील कर रखी हैं. केवल उन्हीं चीज़ों की आमद-रफ़्त की इज़ाजत है जो देश के उद्योगों और लगभग ढ़ाई करोड़ आम लोगों के ज़रूरी हैं.
एंड्रेस सांचेज़ बारुन कहते हैं, "उत्तर कोरिया चाहता है कि रूस उसके साथ रहे. दो साल से उसकी अर्थव्यवस्था ठहराव की स्थिति में है. उत्तर कोरिया ये भी नहीं चाहता कि वो रूस या चीन में किसी एक पर पूरी तरह से निर्भर हो. इसलिए किम जोंग उन ने अपने दादा की रणनीति अपनाई है ताकि वो दोनों के क़रीब रह सकें और संतुलन की स्थिति बनी रहे."

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पुतिन और किम जोंग-उन की जुगलबंदी
किम जोंग उन और व्लादिमीर पुतिन दोनों ही नेताओं को इस नई दोस्ती से फ़ायदे की उम्मीद है. लेकिन कैसे?
विशेषज्ञों का नज़रिया इस मामले में साफ है. रूस से ईंधन और खाद्यान्न की सप्लाई उत्तर कोरिया के संकट को काफी हद तक दूर कर सकती है. इस कम्युनिस्ट देश में इस वक्त खाद्यान्न, औद्योगिक मशीनरी, पुर्जे, हथियार और दूसरी सप्लाई की जो किल्लत बनी हुई है उसमें रूसी मदद से काफी राहत मिल सकती है.
उत्तर कोरिया की आर्थिक हालत भले ही नाजुक हो लेकिन ये भी कई चीजें दे सकता है.
सैमुअल वेल्स ने बीबीसी मुंडो को बताया, "उत्तर कोरिया संयुक्त राष्ट्र में रूस को राजनयिक समर्थन देता है. रूस को अपने यहां के कामगार भी मुहैया कराता है. हजारों उत्तर कोरियाई वहां काम करते हैं. रूस को उत्तर कोरिया कामगार और कुछ रेयर अर्थ मैटेरियल भी मुहैया करा सकता है."
जॉन हॉपकिन्स स्कूल ऑफ एडवांस्ड स्टडीज के शीत युद्ध इतिहासकार सर्गेई रेडचेनको कहते हैं, "इसमें दोनों का फायदा है. रूस को काबिल और सस्ते कामगार मिलते हैं और उत्तर कोरिया को अहम विदेशी मुद्रा."

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यूक्रेन युद्ध का असर
कई विश्लेषकों के मुताबिक यूक्रेन युद्ध ने रूस और उत्तर कोरिया को रिश्तों को और मजबूत किया है.
सर्गेई रेडचेनको कहते हैं, "सहयोगी और मित्र देशों से फायदा उठाने का उत्तर कोरिया का काफी लंबा इतिहास रहा है. किम जोंग-उन को पता है कि अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों की वजह इस वक्त रूस अलग-थलग पड़ा है. लिहाजा किम जोंन-उन ने हालात का फायदा उठाने में देर नहीं लगाई."
उत्तर कोरिया में रूसी राजदूत एलेक्जेंडर मेत्सेगोरा ने हाल ही में दावा किया था कि किम जोंग-उन डोनेट्स्क और लुहांस्क में युद्ध से क्षतिग्रस्त इलाकों के पुनर्निर्माण के लिए अपने लोगों को भेज सकते हैं.
उन्होंने कहा कि उत्तर कोरिया सोवियत काल की बड़ी मशीनों के कलपुर्जों खरीदने में दिलचस्पी रखता है. ये मशीनों अभी भी डोनेट्स्क और लुहांस्क जैसे पूर्वी यूक्रेनी शहरों में बनते हैं. स्लोविएंस्क में भी ये पुर्जे बनते हैं और इस पर अभी भी यूक्रेन का कब्जा है. लिहाजा उत्तर कोरिया वहां अपने कामगारों को भेज सकता है ताकि इन्फ्रास्ट्रक्चर का काम हो सके.

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दूसरी ओर, रूस समर्थक पत्रकार इगोर कोर्तोचेन्को ने अगस्त की शुरुआत में कहा कि उत्तर कोरिया ने यूक्रेन युद्ध में रूसी सेनाओं के साथ मिलकर लड़ने के लिए अपने एक लाख सैनिकों को भेजने की योजना बनाई है.
हालांकि विशेषज्ञों को इसमें संदेह है लेकिन ना तो रूस और ना ही उत्तर कोरिया ने इसका खंडन किया है.
सैमुअल वेल्स कहते हैं, "मुझे नहीं लगता कि उत्तर कोरिया यूक्रेन में रूस की मदद के लिए सैनिक भेजेगा. यह काम वह कभी नहीं करेगा. उत्तर कोरिया की क्षेत्रीय अस्थिरता में अपनी भूमिका है. कुछ साल पहले रूस को यह नापसंद हो सकता था लेकिन आज की तारीख में उसे इससे ज्यादा और क्या चाहिए?"
वह कहते हैं, "उत्तर कोरिया ज़्यादा से ज़्यादा हथियार जमा करता जा रहा है. मिसाइलों का परीक्षण करके भी वह धमकाता रहता है. उसके मिसाइल परीक्षण अमेरिका के लिए सिर दर्द बना हुआ है. खास कर ऐसे वक्त जब रूस-यूक्रेन संघर्ष पर वह पूरी तरह अपना ध्यान केंद्रित किए रखना चाहता है. इसके अलावा ताइवान और मध्य पूर्व में भी ये संघर्ष में फंसता नजर आ रहा है."

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चीन की प्रतिक्रिया
चीन अब भी उत्तर कोरिया का प्रमुख ट्रेड पार्टनर है. ऑब्ज़रवेटॉरी ऑफ़ इकोनॉमिक कॉम्प्लेक्सिटी यानी ओईसी नाम की एक अंतरराष्ट्रीय संस्था के मुताबिक कोविड महामारी शुरू से पहले, साल 2019 में उत्तर कोरिया का 90 फ़ीसदी फ़ोरेन ट्रेड चीन के साथ हो रहा था.
चीन उत्तर कोरिया को, दक्षिण कोरिया में मौजूद अमेरिका के सैन्य ठिकानों और करीब 28 हज़ार सैनिकों के दरम्यिान एक अहम बफ़र मानता है.
उत्तर कोरिया की चीन पर जितनी आर्थिक निर्भरता बढ़ेगी, चीन का उत्तर कोरिया पर राजनीतिक प्रभाव उसी अनुपात में बढ़ेगा.
और चीन अक्सर अपने प्रभाव का प्रयोग किम जोंग उन के गु़स्से, मिसाइल या परमाणु हमलों की धमकियों को कम करने के लिए कर सकता हैं. इसकी वजह ये है कि उत्तर कोरिया की धमकियों के कारण क्षेत्र अमेरिकी सेना की गतिविधियां बढ़ जाती हैं.
इसलिए रेडचेनको मानते हैं कि उत्तर कोरिया और रूस के बीच रोमांस से चीन बिल्कुल ख़ुश नहीं होगा.
रेडचेनको ने कहा, "चीन हमेशा उत्तर कोरिया में रूसी दख़ल से नाख़ुश रहता है. उसे मालूम है कि इन दोनों देशों के बीच अगर रिश्ते बेहतर होते हैं तो उत्तर कोरिया चीन के साथ रिश्तों में मज़बूत स्थिति में आ जाएगा."
वेल्स की सोच भी कुछ ऐसी ही है, "अगर नज़दीकियां बढ़ती हैं तो चीन अपनी नराज़गी सीधे उत्तर कोरिया में दर्ज करवा सकता है या फिर अप्रत्यक्ष रूप से अनाज और ऊर्जा की सप्लाई को धीमा कर सकता है."

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