चीन नैंसी पेलोसी से आख़िर इतना क्यों चिढ़ा रहता है?

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- Author, मेलिशा जु
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
अमेरिकी संसद के निचले सदन हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स की स्पीकर नैंसी पेलोसी के ताइवान पहुँचने से अमेरिका और चीन के बीच तनाव चरम पर है.
चीन पहले से ही धमकी दे रहा था कि नैंसी पेलोसी ताइवान आएंगी तो इसके गंभीर नतीजे होंगे. लेकिन सवाल उठता है कि चीन नैंसी पेलोसी के ताइवान आने से इतना क्यों चिढ़ा हुआ है?
बीजिंग में 1989 में एक बड़े विरोध-प्रदर्शन को चीन की सरकार ने बल-पूर्वक दबा दिया था. इसके दो साल बाद 1991 में नैंसी पेलोसी तिएनेन्मन स्क्वायर गई थीं और वहाँ उन्होंने चीनी सुरक्षाबलों के हाथों मारे गए प्रदर्शनकारियों के समर्थन में बैनर लहराया था.
यह कोई रहस्य नहीं है कि चीन पेलोसी को लेकर इतना आक्रामक और चिढ़ा क्यों रहता है. चीन नैंसी पेलोसी पर झूठ बोलने का आरोप लगाता रहा है.
चीन स्वशासित ताइवान को एक अलग प्रांत के तौर पर देखता है. चीन यह भी कहता है कि ज़रूरत पड़ी तो वह बल का इस्तेमाल कर ताइवान को अपने में मिला लेगा.
ताइवान को एक स्वतंत्र देश के तौर पर मान्यता देने वालों मुल्कों के ख़िलाफ़ भी चीन काफ़ी मुखर रहा है.
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नैंसी पेलोसी को अमेरिका की उपराष्ट्रपति कमला हैरिस के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति के रेस में दूसरे नंबर पर माना जाता है. 1997 में अपने पूर्ववर्ती न्यूट गिंगरिच के ताइवान दौरे के बाद नैंसी पेलोसी अमेरिका की सबसे वरिष्ठ नेता हैं, जिन्होंने इस द्वीप का दौरा किया.
नैंसी पेलोसी के ताइवान दौरे की योजना पर चर्चा भले थी लेकिन इसकी औपचारिक पुष्टि नहीं की गई थी. नैंसी पेलोसी अमेरिकी कांग्रेस के पाँच सदस्यों के प्रतिनिधिमंडल के साथ सिंगापुर, जापान, दक्षिण कोरिया और मलेशिया पहुँची थीं.
मंगलवार की रात नैंसी पेलोसी की अगुआई वाला यही प्रतिनिधिमंडल ताइवान भी पहुँच गया.
कहा जा रहा है कि नैंसी पेलोसी के इस दौरे का अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने समर्थन नहीं किया है. चीन इस दौरे को लेकर काफ़ी नाराज़ है और उसका कहना है कि पेलोसी को रोकना जो बाइडन की ज़िम्मेदारी थी.
कहा जा रहा है कि पेलोसी को रोकने की कोशिश व्हाइट हाउस ने की थी. हाल ही में राष्ट्रपति बाइडन ने कहा था, सेना का मानना है कि यह कोई अच्छा आइडिया नहीं है.
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1991 तिअनान्मन स्केवयर पर दौरा
बीजिंग में तिएनेन्मन स्क्वायर पर कम्युनिस्ट पार्टी ने जिस तरह से प्रदर्शनकारियों का दमन किया था, उसे लेकर नैंसी पेलोसी काफ़ी आक्रामक रही हैं. 1991 में नैंसी पेलोसी ने तिएनेन्मन का दौरा किया था.
इस दौरे में पेलोसी ने अपने साथ आए अमेरिकी कांग्रेस के दो सदस्यों से अलग रुख़ अपनाया था. पेलोसी इन दोनों को छोड़ तिएनेन्मन गई थीं. इसके लिए उन्होंने चीनी मेज़बान से अनुमति भी नहीं ली थी.
तिएनेन्मन पर तब पेलोसी ने एक पेंटिंग्स लहराई थी, जिस पर लिखा था- 'जिन्होंने चीन में लोकतंत्र के लिए जान दे दी, उनके लिए'. तब वहाँ पुलिस भी तत्काल पहुँच गई थी और इस घटना को कवर करने वाले पत्रकारों को पकड़ लिया था.
चीन के विदेश मंत्रालय ने तब पेलोसी की निंदा की थी और इसे पूर्वनियोजित तमाशा बताया था. तब कई लोगों ने पेलोसी के इस रुख़ की आलोचना की थी.
बीजिंग में सीएनएन के पूर्व ब्यूरो प्रमुख माइक चिनॉय ने फॉरन पॉलिसी में एक लेख लिखा है और कहा है कि पेलोसी की वजह से मौक़े पर उनकी गिरफ़्तारी हुई थी.
चिनॉय ने लिखा है कि उन्हें बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि पेलोसी तिएनेन्मन स्क्वायर पर कुछ ऐसा करने वाली हैं. चिनॉय ने लिखा है कि वह घंटों तक पुलिस की हिरासत में रहे थे. चिनॉय के अनुसार, ''पेलोसी का चीन की सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी को प्रति जो रुख़ था, उससे पहली बार उनका परिचय इसी वाक़ये में हुआ था.''

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पेलोसी का पुराना रुख़
1989 में पेलोसी ने तिएनेन्मन स्क्वायर पर हुई हिंसा को लेकर अमेरिका में निंदा प्रस्ताव लाने में मदद की थी. पेलोसी इस हिंसा को लेकर चीन पर लगातार हमला करती रही हैं.
सबसे हाल में तिएनेन्मन स्क्वायर पर हुई हिंसा की 33वीं बरसी पर इस साल पेलोसी ने एक बयान जारी किया था. उन्होंने उस विरोध-प्रदर्शन को राजनीतिक साहस का सबसे मुखर मिसाल बताया था और चीन में कम्युनिस्ट शासन को अत्याचारी बताया था.
2002 में चीन के तत्कालीन उपराष्ट्रपति हु जिंताओ के साथ एक बैठक में पेलोसी ने चार पत्र सौंपने की कोशिश की थी. इन पत्रों में चीन और तिब्बत में मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ़्तारी पर चिंता जताई गई थी और उनकी रिहाई की मांग की गई थी. हालाँकि हु जिंताओं ने उन पत्रों को स्वीकार नहीं किया था.
कहा जाता है कि सात साल बाद पेलोसी ने हु जिंताओं को दूसरे पत्र भेजे. तब वह राष्ट्रपति बन चुके थे. इस पत्र में भी पेलोसी ने राजनीतिक क़ैदियों को रिहा करने की मांग की थी. इन क़ैदियों में लियु शिआबो भी शामिल थे. 2010 में लियु को शांति का नोबेल सम्मान मिला था. लेकिन उन्हें नॉर्वे जाकर अवॉर्ड लेने की अनुमति नहीं मिली थी.

पेलोसी से नाराज़ चीन
मानवाधिकारों के उल्लंघन का हवाला देते हुए पेलोसी लंबे समय से चीन में ओलंपिक खेलों के आयोजन का विरोध करती रही हैं.
पेलोसी ने अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश से 2008 में चीन में समर ओलंपिक्स के उद्घाटन समारोह का बहिष्कार करने की मांग की थी. तब राष्ट्रपति बुश ने भी इसे अनसुना कर दिया था.
इस साल भी पेलोसी ने बीजिंग में विंटर ओलंपिक्स के राजनयिक बहिष्कार की मुहिम चलाई थी. पेलोसी चीन में विगर मुसलमानों का मुद्दा भी ज़ोर शोर से उठाती रही हैं.
विंटर ओलंपिक्स के बहिष्कार की मुहिम को भी उन्होंने वीगर मुसलमानों से जोड़ा था. अमेरिका ने इस बार बीजिंग विंटर ओलंपिक का राजनयिक बहिष्कार किया भी था.
पेलोसी ने बीजिंग विंटर ओलंपिक्स के बहिष्कार का समर्थन करते हुए कहा था, ''चीन में एक तरफ़ जनसंहार चल रहा है और इस बीच दुनिया भर के राष्ट्राध्यक्ष जाएंगे. ऐसे में मानवाधिकारों को लेकर बोलने का आपके पास कोई अधिकार नहीं रह जाता है.''
चीन में अमेरिकी दूतावास के एक प्रवक्ता ने कहा था कि चीन की बेवजह आलोचना का कोई मतलब नहीं है. विश्व व्यापार संगठन में भी पेलोसी चीन को मानवाधिकारों के मुद्दे पर घेरती रही हैं.
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