चिराग पासवान की ज़रूरत वाक़ई बीजेपी या आरजेडी को बिहार में है?

चिराग पासवान

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    • Author, चंदन कुमार जजवाड़े
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पटना

रामविलास पासवान को लालू प्रसाद यादव मौसम विज्ञानी कहते थे. पासवान इस बात का अनुमान लगा लेते थे कि सत्ता किस पार्टी के पास आने वाली है और वह उसी गठबंधन का हिस्सा बन जाते थे.

रामविलास पासवान जब तक ज़िंदा रहे सत्ता के क़रीब रहे लेकिन उनके बेटे चिराग पासवान एक सांसद से ज़्यादा सत्ता का स्वाद नहीं चख पाए हैं. वह बीजेपी के क़रीब रहना चाहते हैं लेकिन बीजेपी को अपने पिता की तरह साधने में अब तक सफल नहीं रहे हैं.

2024 का आम चुनाव कुछ ही हफ़्तों में होने वाला है और चिराग का ठिकाना कहाँ होगा, अभी तक साफ़ नहीं है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या चिराग पासवान अपने पिता की तरह बिहार में प्रासंगिक हैं?

चिराग नहीं चाहते थे कि एनडीए में नीतीश कुमार की वापसी हो लेकिन उनकी वापसी से समीकरण जटिल हो गया है. नीतीश कुमार के आने के बाद चिराग की पार्टी को छह सीटें मिलना बहुत कठिन हो गया है.

जिस दलित वोट पर चिराग पासवान दावा करते हैं, नीतीश कुमार ने उसी दलित समुदाय में महादलित की श्रेणी बनाई थी जो कि रामविलास पासवान को कभी पसंद नहीं आया था. नीतीश कुमार ने पहले पासवान जाति को महादलित से बाहर रखा था. रामविलास पासवान को लगता था कि महादलित की श्रेणी दलितों को बाँटने की नीति है.

चिराग पासवान ने रविवार को अपनी जनसभा में स्पष्ट तौर पर कहा कि उनका गठबंधन बिहार की जनता के साथ है.

गठबंधन के तौर पर ‘एनडीए’ का नाम नहीं लेना क्या एनडीए और बीजेपी के लिए चिराग पासवान की तरफ़ से कोई इशारा है?

फ़िलहाल बिहार की राजनीति में कई तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं और इसी बीच मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी अपना विदेश दौरा बीच में छोड़ कर वापस लौट आ गए हैं.

नीतीश कुमार यूरोप के दौरे पर थे. जनता दल यूनाइटेड के प्रवक्ता नीरज कुमार के मुताबिक़ नीतीश कुमार को 13 मार्च को भारत लौटना था.

माना जाता है कि बिहार में सीटों का बँटवारा नहीं होने से छोटे दलों में असमंजस की स्थिति है.

ऐसी अटकलें भी हैं कि बिहार के छोटे क्षेत्रीय दल अंतिम समय में कोई भी चौंकाने वाला फ़ैसला कर सकते हैं.

वरिष्ठ पत्रकार नवेंदु के मुताबिक़ तीन मार्च को पटना के गांधी मैदान में महागठबंधन की बड़ी रैली के बाद बिहार में ज़मीनी हालात बदल गए हैं.

उनका कहना है, “जहाँ तक छोटे दलों की बात है तो उनके लिए कोई सिद्धांत नहीं होता है, उन्हें जिस गठबंधन में फ़ायदा दिखता है, उसके साथ जुड़ जाते हैं.”

रामविलास की विरासत किसके पास

राम विलास पासवान की राजनीतिक विरासत को लेकर पशुपति पारस और चिराग पासवान दोनों का दावा रहा है. फ़ाइल फ़ोटो

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रामविलास पासवान के निधन के बाद साल 2021 में उनकी लोक जनशक्ति पार्टी दो हिस्सों में टूट गई थी. इसका एक धड़ा 'राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी' उनके भाई पशुपति कुमार पारस के साथ है जबकि दूसरा धड़ा उनके बेटे चिराग पासवान के पास.

लोक जनशक्ति पार्टी को साल 2019 के लोकसभा चुनाव में एनडीए में साझेदारी के तहत 6 सीटें मिली थीं. इन सभी छह सीटों पर एलजेपी की जीत हुई थी.

पार्टी में टूट के बाद पशुपति कुमार पारस के साथ एलजेपी के पाँच सांसद हैं. वहीं जमुई सीट से सांसद चिराग पासवान हैं.

हालाँकि चिराग पासवान इसके बाद भी अपने धड़े एलजेपी (आर) को राम विलास पासवान की मूल पार्टी बताते हैं. उनके पास इसके लिए कई तर्क हैं.

पिछले साल हुए नगालैंड विधानसभा चुनाव में पहली बार एलजेपी (राम विलास) को दो सीटों पर जीत मिली थी और वो 8 सीटों पर दूसरे नंबर पर रही थी.

चिराग पासवान ने साल 2020 के बिहार विधानसभा में लोक जनशक्ति पार्टी को बिना किसी गठबंधन के चुनाव मैदान में उतारा था. उन चुनावों में पार्टी को केवल एक जीत मिली थी लेकिन क़रीब सात फ़ीसदी वोट मिले थे.

क्या कहते हैं आँकड़े

राम विलास पासवान बिहार में दलितों के सबसे बड़े नेता माने जाते थे

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पार्टी में टूट के बाद से चिराग पासवान के गुट ने साल 2021 के अंत में बिहार में दो सीटों पर विधानसभा उपचुनाव लड़े थे.

इन दोनों सीटों पर पार्टी ने अपने उम्मीदवारों को बतौर निर्दलीय चुनाव मैदान में उतारा था और उन्हें क़रीब 6 फ़ीसदी वोट मिले थे.

रामविलास पासवान को बिहार में दलितों का सबसे बड़ा नेता माना जाता रहा है.

उनकी पार्टी एलजेपी के पास क़रीब 6 फ़ीसदी वोट रहा है. उन्होंने अपने वोट बैंक का हमेशा राजनीतिक चतुराई से इस्तेमाल किया था.

वरिष्ठ पत्रकार नचिकेता नारायण मानते हैं, “एलजेपी मे टूट के समय बीजेपी यह समझ पाने में नाकाम रही थी कि जनता की सहानुभूति चिराग पासवान के साथ हो जाएगी. इसके साथ ही चिराग पासवान अपने चाचा के मुक़ाबले ज़मीन पर भी ज़्यादा सक्रिय दिखते हैं. इसने अब बीजेपी को उलझन में डाल दिया है.”

एलजेपी में टूट के बाद से पशुपति पारस का गुट बिहार में बीजेपी की साझेदार है. इसलिए उसे कहीं भी अपना उम्मीदवार उतारने का मौक़ा नहीं मिला है. ऐसे में उनके धड़े के पास कितनी ताक़त है, इसका कोई आंकड़ा उपलब्ध नहीं है.

साल 2019 के लोकसभा चुनावों के आँकड़ों पर गौर करें तो एलजेपी को उन चुनावों में क़रीब 8 फ़ीसदी वोट मिले थे जबकि इसके क़रीब डेढ़ साल बाद हुए बिहार विधानसभा चुनावों में एलजेपी को क़रीब 6% वोट मिले थे.

दो चुनावों के बीच वोटों के इसी अंतर में एनडीए और ‘इंडिया’ के लिए लोकसभा चुनावों का भविष्य भी देखा जाता है.

बीजेपी और तेजस्वी यादव के लिए चिराग की अहमियत

चिराग नीतीश के शपथ ग्रहण में शामिल हुए थे, लेकिन नरेंद्र मोदी की हाल की सभा में शामिल नहीं हुए

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मौजूदा समय में बिहार में एनडीए में शामिल दलों को, साल 2019 के लोकसभा चुनावों के आधार पर देखें तो उन्हें क़रीब 60% वोट मिले थे. जिसमें बीजेपी 24% और जेडीयू 22% के साथ बड़ी हिस्सेदारी थी.

इसके अलावा उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी आरएलएसपी को 3.6% और जीतनराम मांझी की पार्टी हम (सेक्युलर) को क़रीब 2% वोट मिले थे.

पिछले लोकसभा चुनावों में आरजेडी, कांग्रेस और वाम दलों ने मिलकर क़रीब 25% फ़ीसदी वोट हासिल किए थे.

बिहार की हालिया सियासी तस्वीर में साल 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में बड़ा बदलाव देखा गया है.

उन चुनावों में आज के महागठबंधन के घटक दलों (इंडिया) को क़रीब 37 फ़ीसदी वोट मिले थे.

आरजेडी फ़िलहाल एनडीए में रहने या न रहने के चिराग पासवान के फ़ैसले का इंतज़ार करती दिखती है. हालाँकि एलजेपी में टूट के बाद से लालू प्रसाद यादव ख़ुद भी चिराग पासवान को तेजस्वी के साथ आने की अपील कर चुके हैं.

लालू प्रसाद यादव और रामविलास पासवान के बीच भी पुरानी मित्रता रही है. साल 2009 के लोकसभा चुनाव में रामविलास की हार के बाद उनको राज्यसभा भेजने में लालू ने काफ़ी अहम भूमिका निभाई थी.

चिराग पासवान भी लालू परिवार के साथ पुराने रिश्ते के बारे में बोलते रहे हैं और तेजस्वी यादव से उनकी क़रीबी की चर्चा भी सियासी गलियारों में होती है. दोनों ही नेताओं ने एक-दूसरे के ख़िलाफ़ कभी बयानबाज़ी नहीं की है.

एनडीए की उलझन

तेजस्वी यादव और चिराग पासवान के संबंध काफ़ी मधुर रहे हैं.

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माना जाता है कि बिहार में विपक्षी गठबंधन के पास ज़्यादातर वोट पिछड़े, दलितों और मुस्लिम समुदाय का है और चिराग पासवान के जुड़ जाने से विपक्ष को इसका बड़ा फ़ायदा हो सकता है.

सोमवार को पत्रकारों ने चिराग पासवान के मुद्दे पर तेजस्वी यादव से सवाल भी किया तो तेजस्वी ने इस पर कुछ भी खुलकर बोलने से इनकार कर दिया.

इस बीच केंद्रीय गृह राज्य मंत्री और बीजेपी नेता नित्यानंद राय ने दावा किया है चिराग पासवान एनडीए के साथ हैं और एनडीए के साथ ही रहेंगे.

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हालाँकि वैशाली की सभा में चिराग पासवान के जो तेवर थे, उसे उनके शक्ति प्रदर्शन के तौर पर भी देखा गया है और माना जाता है कि चिराग पासवान अपनी शर्तों को आसानी से छोड़ने वाले नहीं हैं.

एलजेपी (आर) के प्रवक्ता धीरेंद्र कुमार मुन्ना के मुताबिक़, “हमारे पास क्या आधार है, यह किसी से छिपा नहीं है. हमें पिछली बार साझेदारी में 6 लोकसभा सीटें और एक राज्यसभा की सीट मिली थी. आज भी हम इसी पर कायम हैं.”

इन छह सीटों में एक सीट हाजीपुर की भी है, जो राम विलास पासवान की सीट रही है और अब चिराग के चाचा पशुपति कुमार पारस वहाँ से सांसद हैं. फ़िलहाल पशुपति पारस किसी भी हाल में यह सीट छोड़ने को तैयार नहीं है.

धीरेंद्र कुमार मुन्ना कहते हैं, “बिहार में बहुत से दल हैं और कौन क्या कहता है, उस पर कुछ नहीं कहना है. हम अपनी बात कर सकते हैं. जब हमारी एनडीए में वापसी हुई थी तब भी बीजेपी ने कहा था कि वो हमारे सम्मान का ध्यान रखेंगे.”

माना जाता है कि एलजेपी में टूट की वजह से चिराग पासवान के मन में बीजेपी को लेकर एक नाराज़गी रही है. कहा जाता है कि बीजेपी कोशिश करती तो शायद एलजेपी को टूटने से बचाया जा सकता था.

रामविलास पासवान की तरह चिराग पासवान में भी नीतीश की महादलित वोटों पर नज़र होने की वजह से एक तरह की नाराज़गी देखी जाती है

नीतीश और चिराग के रिश्ते

माना जाता है कि नीतीश की वापसी के साथ ही बिहार में एनडीए के बीच सीटों की साझेदारी में मुश्किलें बढ़ी हैं.

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2014 के लोकसभा चुनावों के बाद नीतीश कुमार ने जीतन राम मांझी को बिहार का मुख्यमंत्री बना दिया था, इसे महादलित वोट को साधने की नीतीश कुमार की एक चाल के तौर पर देखा गया था.

लेकिन नीतीश और चिराग के बीच रिश्तों में बड़ी तल्ख़ी साल 2020 के विधानसभा चुनावों के दौरान आई थी. उस वक़्त एनडीए का हिस्सा होते हुए भी चिराग पासवान ने जेडीयू के उम्मीदवारों के ख़िलाफ़ अपने उम्मीदवार उतारे थे.

जेडीयू का मानना रहा है कि इससे उसे सीटों का बड़ा नुक़सान हुआ और वो बिहार विधानसभा में महज़ 43 सीटें जीत पाई.

अब नीतीश की एनडीए में वापसी के बाद एक बार फिर से नीतीश-चिराग संबंधों को लेकर सियासी चर्चा चल रही है.

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नचिकेता नारायण कहते हैं, “साल 2020 के विधानसभा चुनाव में चिराग पासवान ने नीतीश के लिए जिन तीखे शब्दों का इस्तेमाल किया था, वैसा कभी किसी विपक्षी नेता ने नहीं किया है. नीतीश के बारे में कहा जाता है कि वो अपने विरोधी को माफ़ नहीं करते हैं. एनडीए में नीतीश की वापसी से बीजेपी के लिए भी उलझन खड़ी हुई है. ”

माना जा रहा है कि नीतीश कुमार की विदेश से वापसी के बाद एनडीए में बिहार में सीटों की साझेदारी को लेकर फ़ैसले में तेज़ी आ सकती है.

अभी एनडीए में बीजेपी, जेडीयू, एलजेपीआर, रालोजपा, हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा और उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक मोर्चा शामिल है.

पिछले लोकसभा चुनावों में बिहार में बीजेपी ने 17 और जेडीयू ने 16 सीटों पर जीत हासिल की थी.

एनडीए में बिहार की 40 लोकसभा सीटों के बँटवारे के बाद चिराग पासवान को लेकर भी तस्वीर साफ हो सकती है और माना जाता है कि उसके बाद ही ‘इंडिया’ गठबंधन में भी सीटों की साझेदारी पर फ़ैसला होगा.

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