वर्ल्ड कप: अफ़ग़ानिस्तान क्रिकेट टीम जिसने दिखाया कि हर चीज़ मुमकिन है

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- Author, ज़ोया मतीन
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
क्रिकेट वर्ल्ड कप में अफ़ग़ानिस्तान की हैरतअंगेज़ दौड़ बददस्तूर जारी है. डिफ़ेडिंग चैंपियन इंग्लैंड, पाकिस्तान और श्रीलंका को हराते हुए टीम ने कई क्रिकेट प्रेमियों को अपना मुरीद बना लिया है.
मंगलवार को ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ हुए रोमांचक मैच में मिली हार के बाद भले ही टीम सेमीफ़ाइनल के रेस बाहर हो गई हो लेकिन सभी ने इस युवा टीम का लोहा माना है.
ये एक ऐसे देश की टीम है जहां की सरकार को दुनिया का कोई देश मान्यता नहीं देता.
मंगलवार को मुबंई के वानखेड़े स्टेडियम में अफ़ग़ान टीम एक ओर चमत्कार करने वाली थी.
इस युवा टीम के 15 में 11 सदस्य 25 वर्ष से कम उम्र के हैं. अपना तीसरा वर्ल्ड कप खेल रही टीम ने ऑस्ट्रेलिया को लगभग हरा ही दिया था. पांच बार वर्ल्ड चैंपियन रही ऑस्ट्रेलिया एक वक्त पर 292 रनों का पीछा करते हुए 91 रन पर सात विकेट खो चुकी थी.
'ये अविश्वसनीय है...'

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लेकिन इसके बाद ऑस्ट्रेलिया के धुआंधार बल्लेबाज़ ग्लैन मैक्सवेल ग़ज़ब की पारी खेलते हुए अफ़ग़ानिस्तान की टीम के हाथ से जीत खींच ली.
मैच के बाद अफ़ग़ानिस्तान के कप्तान हशमतुल्लाह शाहिदी ने मीडिया को बताया, "बेहद निराश हूँ, क्रिकेट एक 'फ़नी गेम' है, ये अविश्वसनीय है."
लेकिन क्रिकेट की दुनिया में कुछ अविश्वसनीय है तो वो है अफ़ग़ानिस्तान की क्रिकेट टीम का ऊंचाइयां छूना. मौजूदा वर्ल्ड कप से पहले अफ़ग़ानिस्तान ने सिर्फ 2015 के वर्ल्ड कप में एक जीत हासिल की थी.
लेकिन इस बार टीम चार मैच जीत चुकी है जिनमें से एक डिफेडिंग चैंपियन इंग्लैंड के ख़िलाफ़ मिली जीत है.
अफ़ग़ानिस्तान की टीम के कई लोग पाकिस्तान के रिफ़्यूजी कैंपों में रहे हैं. ये टीम इस वर्ल्ड कप में पाकिस्तान को भी हरा चुकी है.
तालिबान की सरकार

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क्रिकेट पर लिखने वाले सिद्धार्थ मोंगा ने बीबीसी को बताया, "उनकी प्रोग्रेस कमाल की ही है. अफ़ग़ानिस्तान ने जो बीते 25 साल में हासिल किया है उसे पाने के लिए बाक़ी टीमों को 60-70 साल लगे हैं."
अफ़ग़ान टीम अजीबोग़रीब हालात के बीच क्रिकेट खेलती है. वो जिस परचम तले खेलते हैं और मैदान पर जो राष्ट्रगान गाते हैं- वो दोनों अफ़ग़ानिस्तान की उस सरकार से जुड़े हैं जो अब सत्ता में ही नहीं.
उस सरकार को तो अगस्त 2021 तालिबान ने उखाड़ फेंका था.
पुराने झंडे और राष्ट्रगान के बावजूद तालिबान की सरकार टीम और क्रिकेट बोर्ड को मान्यता देती है.
अफ़ग़ानिस्तान क्रिकेट बोर्ड के सीईओ नसीब ख़ान ने बीबीसी को बताया, "तालिबान ने हमें खुली छूट दी है. पिछले साल जब हम आर्थिक दिक्कतों से गुज़र रहे थे तो उन्होंने हमे 12 लाख अमेरिकी डॉलर की मदद दी थी."
चुनौतियों के बावजूद अफ़ग़ानिस्तान ने इस वर्ल्ड कप में कई चमत्कार किए हैं.
बेहतरीन बॉलिंग अटैक

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मंगलवार को 21 वर्षीय इब्राहिम ज़ादरान वर्ल्ड कप में सेंचुरी बनाने वाले पहले बल्लेबाज़ बन गए हैं. उस मैच के पहले सचिन तेंदुलकर ने अफ़ग़ान टीम से बात की थी.
इसके अलावा वो इंग्लैंड को हराकर भी भारी उलटफेर कर चुके हैं.
टीम के असिस्टेंट कोच और पहले कप्तान रह चुके रईस अहमदज़ई कहते हैं कि ये प्रदर्शन सिर्फ़ किस्मत के भरोसे नहीं है.
अहमदज़ई कहते हैं, "अफ़ग़ान इस खेल से रूहानी तौर से जुड़े हैं. यही प्यार है जो हमें गाइड करता है."
सिद्धार्थ मोंगा कहते हैं साल 2001 में टीम के गठन के बाद से ही उनके पास एक बेहतरीन बॉलिंग अटैक था. टीम को चिंता थी तो बस बल्लेबाज़ों की.
अब अफ़ग़ानिस्तान के बल्लेबाज़ों ने परिपक्वता दिखाना शुरू कर दिया है. अब वे पारी को बनाना और शांत रह कर बड़े स्कोर चेज़ करना सीख गए हैं.
दशकों की मेहनत का नतीजा

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अब पाकिस्तान के साथ हुए मैच को ही लीजिए. अफ़ग़ानिस्तान 282 के ठीक-ठाक स्कोर का पीछा कर रहा था. और पाकिस्तान का गेंदबाज़ी अटैक में मामूली नहीं है.
एक धुआंधार शुरुआत के बाद शाहिदी ने बीचे के ओवरों में संयम से खेलना शुरू किया. वे बिना रिस्क लिए टार्गेट की ओर बढ़ रहे थे. आख़िर में अफ़ग़ानिस्तान ने ये मैच आठ विकेट से जीता.
सिद्धार्थ मोंगा कहते हैं, "टीम की ख़ास बात ये है कि इसमें कोई तीन या चार बड़े स्टार नहीं हैं बल्कि सभी खिलाड़ी टीम की जीत में भागीदारी करते हैं. उनकी जीत कोई हैरान करने वाली नहीं है."
टीम के खेल में सुधार दशकों की मेहनत का नतीजा है. इसमें घरेलू स्तर पर खेल के बुनियादी ढांचे और बढ़ते अंतरराष्ट्रीय अनुभव की भूमिका है.
अफ़ग़ानिस्तान के 34 प्रांतों में हज़ारों क्रिकेट क्लब हैं. वहां स्कूल के स्तर पर टी-20 टूर्नामेंट रहे हैं. घरेलू सिरीज़ के मैच काबुल, जलालाबाद और ख़ोस्त के पांच स्टेडियमों मे खेले जाते हैं.
इसके अलावा देश 15 छोटे मैदान भी हैं.
'शपागीज़ा' यानी 'छह रन'

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देश की सबसे पॉपुलर लीग नाम है 'शपागीज़ा' यानी 'छह रन'. ये काबुल में होने वाला आठ टीमों का टूर्नामेंट है जिसे देखने के लिए भारी भीड़ उमड़ती है.
अफ़ग़ान टीम के कई खिलाड़ी भारत, बांग्लादेश और पाकिस्तान में होने वाली क्रिकेट लीग्स में शिरकत करते हैं.
अफ़ग़ानिस्तान क्रिकेट बोर्ड के सीईओ नसीब ख़ान कहते हैं कि टीम के देश के भीतर बेहतर होती सुविधाओं का ख़ूब फ़ायदा हुआ है.
पहले तो अफ़ग़ान टीम भारत या यूएई में ट्रेनिंग करती थी. ख़ान कहते हैं कि अब टीम देश के भीतर रहती है वहां मौजूद बेहतरीन सुविधाएं का लाभ उठाती है.
नसीब अहमदज़ई कहते हैं, "टीम के हर खिलाड़ी को घरेलू मैच खेलने होते हैं. क्लब क्रिकेट के रास्ते से कई युवा खिलाड़ी सामने आते हैं."
क्रिकेट की लोकप्रियता

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इसी की मिसाल हैं- अफ़ग़ान टीम के 18 वर्षीय खिलाड़ी नूर अहमद. नूर टीम के 38 वर्षीय मोहम्मद नबी के साथ मैदान पर उतरते हैं यानी अनुवभ के साथ युवा जोश.
अहमदज़ई कहते हैं कि टीम की प्रगति का अफ़ग़ानिस्तान में क्रिकेट की बढ़ती ख्याति से गहरा रिश्ता है.
वे कहते हैं, "हमने क्रिकेट देश के बाहर रहकर सीखा. हमारे पास कोई सुविधा नहीं थी, सिर्फ़ एक सपना था. लेकिन ये पीढ़ी अफ़ग़ानिस्तान से निकली है. इन सब ने घर पर रहकर खेलना सीखा है."
भारत और पाकिस्तान की तुलना में, अफ़ग़ानिस्तान में क्रिकेट की लोकप्रियता नई-नई है.
अफ़ग़ानिस्तान की पहली पीढ़ी के खिलाड़ियों ने 1979 में देश में सोवियत यूनियन के हमले के बाद पाकिस्तान के रिफ़्यूजी कैंपों में खेल के हुनर सीखे थे.
जब ये लोग वापस लौटे तो अफ़ग़ानिस्तान में क्रिकेट खेलना आसान नहीं था. ये खिलाड़ी एक ऐसे देश में लौटे थे जो एक गृहयुद्ध की चपेट में था.
युवा अफ़ग़ान

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1990 के दशक में पहली बार तालिबान ने देश की सत्ता पर कब्ज़ा किया. उन्होंने लोगों को क्रिकेट खेलने से नहीं रोका.
सिद्धार्थ मोंगा कहते हैं कि शायद क्रिकेटर ठीक-ठाक कपड़े पहनते थे इसलिए उन्हें रोका नहीं गया.
मौजूदा दौर में खिलाड़ी सेलेब्रेटी बन चुके हैं. उनके पोस्टर और बैनर सारे देश में लगते हैं. युवा अफ़ग़ान इनसे प्रेरित होते हैं.
अहमदज़ई के बेटे एक दिन राशिद ख़ान की तरह एक लैग-स्पिनर बनना चाहते हैं.
भारत में रह रहे अफ़ग़ान नागरिकों को भी ये टीम काफ़ी पसंद है.
तीन साल पहले दिल्ली आए फ़र्शीद मोहम्मद कहते हैं, "जब हमारी टीम खेलती है तो हमें उम्मीद होती है… एक मुसीबत से घिरे देश के लोगों में भी उत्साह होता है."
अफ़ग़ानिस्तान में तबाही और निराशा

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मोहम्मद ने अपने बचपन में क्रिकेट नहीं खेली थी लेकिन उनके 16 वर्षीय बेटे को अपनी टीम के बारे ख़ूब जानकारी है.
मोहम्मद कहते हैं, "मेरे बच्चे अफ़ग़ानिस्तान में तबाही और निराशा के बारे में ही जानते हैं लेकिन उनके लिए ये वर्ल्ड कप एक उम्मीद की किरण है."
अफ़ग़ानिस्तान की टीम द्विपक्षीय श्रृंखलाएं खेलना चाहती है लेकिन बहुत से क्रिकेट बोर्ड शायद इसके लिए राज़ी न हों.
इसकी वजह है कि अफ़ग़ानिस्तान महिला क्रिकेट टीम के गठन की अनुमति नहीं देता.
तालिबान के शासन में महिलाओं के अधिकारों का दमन हुआ है. देश की महिला क्रिकेट टीम जान बचाकर ऑस्ट्रेलिया भाग चुकी है.

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सिद्धार्थ मोंगा कहते हैं, "लेकिन एक बात तो पक्की है- अफ़ग़ानिस्तान क्रिकेट के पास इस खेल को बहुत आगे ले जाने की सारी सामग्री मौजूद है. एक बड़ी युवा आबादी इस खेल के ज़रिए अपना जीवन बदल सकती है."
शुक्रवार को अफ़ग़ानिस्तान का अगला मैच दक्षिण अफ़्रीका से है. दुनिया को एक ओर चमत्कार की उम्मीद है.
और अफ़ग़ानिस्तान ने इस टूर्नामेंट ये तो दिखा ही दिया है कि उनकी टीम के लिए हर चीज़ मुमकिन है.
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