अफ़ग़ानिस्तानी क्रिकेट टीम का रिफ्यूजी कैंप से दुनिया को चौंकाने वाला सफ़र

अफगानिस्तान

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    • Author, पराग फाटक
    • पदनाम, बीबीसी मराठी

एशियाई महाद्वीप की पिचों की कंडीशंस के मुताबिक ही चटगांव टेस्ट में पांचवें दिन का खेल शुरू होना था.

अफ़ग़ानिस्तान की नज़रें अपने से कहीं ताक़तवर मानी जाने वाली टीम के ख़िलाफ़ पहली टेस्ट जीत हासिल करने पर टिकी थीं वहीं दूसरी ओर मेजबान बांग्लादेशी टीम की कोशिश किसी तरह मैच ड्रॉ करा लेने की थी. अफ़ग़ानिस्तान को जीत के लिए चार विकेट चाहिए थे वहीं दूसरी ओर बांग्लादेश का सारा दारोमदार टीम के कप्तान और अनुभवी खिलाड़ी साकिब अल हसन के बल्ले पर था.

लेकिन दिन की शुरुआत चटगांव में बारिश से हुई और पहले सत्र में कोई खेल नहीं हो पाया. लंच के बाद खेल शुरू हुआ और कुछ ही देर में बरसात होने लगी और खेल बाधित हो गया. समय से पहले चाय का ब्रेक लेना पड़ा. आख़िर में बरसात थमी लेकिन आसमान में घने बादल थे और रोशनी तेज़ी से कम होती जा रही थी.

उस वक्त ऐसा लगने लगा था कि अफ़ग़ानिस्तान और ऐतिहासिक जीत के बीच में बरसात खड़ी हो चुकी है. लेकिन अंपायरों ने आख़िरकार खेल शुरू कराने का फ़ैसला लिया, यह तय हुआ कि अधिकतम 18 ओवरों का खेल संभव हो पाएगा.

अफ़ग़ानिस्तान के ज़हीर ख़ान ने साकिब अल हसन को जल्दी ही पवेलियन भेज दिया, यह बांग्लादेश की उम्मीदों के लिए बड़ा झटका था. वहीं दूसरी ओर अफ़ग़ानिस्तानी टीम के हौसले बुलंद हो गए.

इसके बाद टीम के कप्तान और स्टार गेंदबाज़ राशिद ख़ान ने बांग्लादेशी पारी को समेटने में देर नहीं लगाई. बांग्लादेश के चार विकेट 16 ओवर के खेल में ही गिर गए. कप्तान के तौर पर अपने पहले ही टेस्ट मैच में राशिद ख़ान ने 11 विकेट चटकाए. कप्तान के तौर पर पहले टेस्ट मैच में 10 से ज़्यादा विकेट और हॉफ़ सेंचुरी लगाने वाले वे दुनिया के पहले क्रिकेटर बन गए हैं.

इस टेस्ट मैच में अफ़ग़ानिस्तान ने टॉस जीतने के बाद पहले बल्लेबाज़ी का फ़ैसला लिया. पहली पारी में रहमत शाह के शानदार शतक की बदौलत अफ़ग़ानिस्तान ने 342 रन बनाए. इसके जवाब में बांग्लादेश की पहली पारी महज 205 रनों पर सिमट गई. राशिद ने पहली पारी में पांच विकेट लिए. पहली पारी में 137 रन की बढ़त लेने के बाद अफ़ग़ानिस्तान ने अपनी दूसरी पारी में 260 रन बनाए. युवा बल्लेबाज इब्राहिम जादरान ने विकेट पर टिकते हुए 87 रनों की पारी खेली.

मेजबान टीम को जीत के लिए चौथी पारी में 398 रन बनाए थे. इस विशाल चुनौती के सामने बांग्लादेशी टीम महज 173 रनों पर सिमट गई. राशिद ख़ान ने दूसरी पारी में छह विकेट चटकाए.

रिफ्यूज़ी कैंप में क्रिकेट खेलते बच्चे

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अफ़ग़ान क्रिकेटरों की कहानी

अफ़ग़ानिस्तान की क्रिकेट टीम की ये उपलब्धि इसलिए भी बेमिसाल है क्योंकि टीम के ज़्यादातर खिलाड़ियों का बचपन शरणार्थी शिविरों में गुजरा है.

किसी भी रिफ्यूजी कैंप में रहना आसान नहीं होता, आपको कई तरह की पाबंदियों में रहना होता है और हर दिन के भोजन के लिए संघर्ष करना होता है. कैंपों में रहने वाले हर दिन इससे बाहर निकलने की प्रार्थना करते हैं.

अफ़ग़ानिस्तान के ज़्यादातर क्रिकेटर इन्हीं रिफ्यूजी कैंपों से निकले हैं. इन कैंपों से निकलकर अफ़ग़ानिस्तान के क्रिकेटर वर्ल्ड कप तक पहुंचे हैं. वैसे क्रिकेट का खेल अफ़ग़ानिस्तान के लिए कोई नया खेल नहीं है.

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ऐतिहासिक रिकॉर्ड के मुताबिक ब्रिटेश सैनिक अफ़ग़ानिस्तान में 1839 में क्रिकेट खेला करते थे. लेकिन ब्रिटेन के दूसरे उपनिवेशों के उलट क्रिकेट अफ़ग़ानिस्तान में अपनी जड़ें मजबूत नहीं कर पाया.

अगर आप युद्ध में घायल हो गए हों, किसी तरह जान बची हो, भूख और गरीबी की चपेट में हों तब तो रिफ्यूजी कैंप में थोड़ी मदद मिल सकती है लेकिन जहां रोजाना अस्तित्व का संकट हो, वहां के लड़के क्रिकेट के बारे में कैसे सोच पाएंगे ? ये असंभव ज़रूर दिखता है लेकिन नामुमकिन नहीं है क्योंकि अफ़ग़ानिस्तान की मौजूदा क्रिकेट टीम के अधिकांश खिलाड़ियों ने यह कर दिखाया है.

रिफ्यूजी कैंपों में क्यों रहना पड़ा?

अफ़ग़ानिस्तान एशिया के पश्चिमी और दक्षिणी हिस्से के बीचोंबीच स्थित है. कोल्ड वार के दौरान अमरीका और रूस, दोनों की नजरें अफ़ग़ानिस्तान पर थीं. 1979 में सोवियत संघ ने अफगानिस्तान पर कब्जा करने की कोशिश भी की.

अफ़ग़ानिस्तान ने रूस की आक्रामकता का पुरजोर विरोध किया. दोनों देशों के बीच 10 साल तक संघर्ष चला. इस दौरान सोवियत संघ के विरोधी अमरीका ने अफ़ग़ानिस्तान के कबिलायाई लोगों की मदद की. जब सोवियत संघ को पता चल गया कि अफ़ग़ानिस्तान का जीतना संभव नहीं होगा तब जाकर 1989 में उसने अपनी सेना को वापस बुला लिया. यह वह दौर था जब अफ़ग़ानिस्तान में अमरीका की भी दिलचस्पी कम होने लगी थी.

रिफ्यूज़ी कैंप में क्रिकेट खेलते बच्चे

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अमरीका और सोवियत संघ की दिलचस्पी अफ़ग़ानिस्तान में नहीं रही, ऐसे में वहां कोई सक्षम सरकार बनने से पहले कट्टरपंथी जमात ने पूरे देश पर कब्जा कर लिया. 1996 से 2001 के बीच में अफ़ग़ानिस्तान पर तालिबानियों का शासन रहा.

अफ़ग़ानिस्तान कट्टरपंथियों का ठिकाना बनाता गया. सितंबर, 2011 में अमरीकी वर्ल्ड ट्रेड टॉवर पर हुए चरमपंथी हमले के बाद स्थिति बदल गई. इस हमले का बदला लेने के लिए अमरीका ने नेटो देशों की सेना के साथ अफ़ग़ानिस्तान पर हमला कर दिया और तालिबान को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाया. 2014 के बाद से अमरीका ने अफ़ग़ानिस्तान में तैनात अपने सैनिकों को वापस बुलाना शुरू किया.

युद्ध और तालिबानी शासन के दौरान, अफ़ग़ानिस्तान के हज़ारों लोगों को पाकिस्तान में शरण लेनी पड़ी वहीं कुछ लोगों को सीमा के दूसरी तरफ़ बने रिफ्यूजी कैंपों में शरुण मिली. यह उनकी ज़िंदगी बन चुकी थी.

इन सबमें क्रिकेट कहां से आया ?

इसी तरह पाकिस्तान स्थित रिफ्यूजी कैंप में अफ़ग़ानिस्तान के युवा ताज मलिक ने अफ़ग़ान क्रिकेट क्लब की शुरुआत की. यह एक तरह की शुरुआत थी, जिसने आगे चलकर अफ़ग़ान क्रिकेट टीम का रूप लिया.

1990 के दशक में अफगानिस्तान में तालिबान का शासन था. तालिबानियों के एजेंडे में कभी खेल-कूद नहीं था. क्रिकेट के खेल में खिलाड़ियों का कोई शारीरिक संपर्क नहीं होता है और इसकी ड्रेस, तालिबानी ड्रेस कोड से काफ़ी मिलती जुलती है (मतलब फुल ट्राउज़र एवं टीशर्ट) लिहाजा इस खेल को देश के अंदर खेलने की अनुमति मिल गई. इसके बाद ही 1995 में अला दाद नूर ने अफ़ग़ान क्रिकेट संघ की शुरुआत की थी.

अफगानिस्तान क्रिकेट फैन

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यह केवल शुरुआत भर थी. अफ़ग़ानिस्तान क्रिकेट संघ को इंटरनेशनल क्रिकेट काउंसिल यानी आईसीसी से संबंद्धता मिलने के लिए छह साल का इंतज़ार करना पड़ा था, आईसीसी के प्रावधानों के मुताबिक कम से कम तीसरे लेवल पर पहुंचने के बाद ही टीम को संबंद्धता दी जाती है.

उधर पाकिस्तानी रिफ्यूजी कैंप में ताज मलिक को एक ओर अपनी आजीविका के लिए रोजाना संघर्ष करना पड़ रहा था वहीं दूसरी ओर उनके कंधों पर टीम को कोचिंग देने की ज़िम्मेदारी भी थी. अफ़ग़ानिस्तान के क्रिकेटरों में अपनी मजदूरी के साथ साथ क्रिकेट खेलना जारी रखा. इन खिलाड़ियों के पास ना तो अभ्यास की सुविधाएं थीं और ना ही प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने की सुविधा. लेकिन इन खिलाड़ियों में जन्मजात टैलेंट था और उन्होंने अपनी कड़ी मेहनत से टैलेंट को निखारा भी.

दुनिया भर की कई देश आईसीसी से संबंद्ध टीम के तौर पर क्रिकेट खेलते हैं. उन्हें प्रतियोगिताओं में खेलने का मौका मिलता है. इन टीमों के साथ खेलना इतना आसान नहीं होता लेकिन अफ़ग़ानिस्तान ने अपना संघर्ष जारी रखा. 2008 में अफ़ग़ानिस्तान टीम का चयन वर्ल्ड क्रिकेट लीग के डिविजन 5 में खेलने के लिए हुआ.

अगले ही साल, उन्हें 2011 वर्ल्ड कप में हिस्सा लेने के लिए दावेदारी करने का मौका मिल गया. हालांकि कनाडा के ख़िलाफ़ पात्रता मैच हार जाने के चलते उन्हें 2011 के वर्ल्ड कप में हिस्सा लेने का मौका नहीं मिल पाया. लेकिन अफ़ग़ानिस्तान के लगातार अच्छे प्रदर्शन के चलते आईसीसी ने टीम को वनडे खेलने की पात्रता दे दी.

2010 में टीम ने वर्ल्ड ट्वेंटी-20 में खेलने की पात्रता हासिल कर ली. टीम इस टूर्नामेंट के शुरुआती दौर से आगे नहीं बढ़ पाई थी लेकिन कुछ खिलाड़ियों के प्रदर्शन पर दुनिया भर की नज़रें गईं थीं.

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क्रिकेट को बढ़ावा देने के लिए आईसीसी अपने नए सदस्य देशों को पैसा भी मुहैया कराती है. अफ़ग़ानिस्तान ने इन पैसों का पॉजिटिव ढंग से इस्तेमाल शुरू कर दिया था.

2013 में आईसीसी ने अफगानिस्तान का दर्जा बढ़ाकर उसे एसोसिएट सदस्य बना दिया. पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड ने अफगानिस्तान के साथ एक समझौता किया, जिसके तहत वह अफ़ग़ानिस्तान में ट्रेनिंग कैंप, अंपायरिंग और पिच क्यूरेट करने के लिए कैंप लागाने के साथ साथ प्रतिभाओं की तलाश के लिए कार्यक्रम चलाने के लिए तैयार था.

दो साल के अंदर, 2015 में अफ़ग़ानिस्तान को वर्ल्ड कप टूर्नामेंट में हिस्सा लेने की पात्रता मिल गई. यह पहला मौका था जब अफ़ग़ानिस्तान के खिलाड़ियों को दुनिया की बड़ी क्रिकेट टीमों के सामने खेलने का मौका मिला था.

शुरुआती चरण के छह मैचों में टीम पांच मैच हार गई. हालांकि टीम को स्कॉटलैंड को हराने में कामयाबी मिली. इसे औसत प्रदर्शन ही माना जाएगा लेकिन महज 20 साल पहले जिस देश में क्रिकेट की शुरुआत हुई हो उस टीम का क्रिकेट के सबसे बड़े टूर्नामेंट में हिस्सा लेना भी बड़ी उपलब्धि से कम नहीं है.

अफ़ग़ानिस्तान टीम का प्रदर्शन लगातार बेहतर रहा, इसे देखते हुए 22 जून, 2017 को आईसीसी ने उसे टेस्ट खेलने की पात्रता भी दे दी. पिछले साल 14 से 18 जून के बीच बेंगलुरु में अफ़ग़ानिस्तान ने भारत के ख़िलाफ़ अपना पहला टेस्ट मैच खेला था. अफ़ग़ानिस्तान महज दो दिनों के अंदर यह टेस्ट पारी और 262 रनों से हार गया था. लेकिन उसके बाद टीम ने दो टेस्ट मैचों में शानदार जीत हासिल की है.

रशिद ख़ान

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इमेज कैप्शन, राशिद ख़ान अफ़ग़ानिस्तान क्रिकेट टीम के कप्तान हैं

दांबुला से देहरादून

सुरक्षा कारणों के अलावा आईसीसी के स्तर वाले स्टेडियम मौजूद नहीं होने के चलते अफ़ग़ानिस्तान को अपनी मेजबानी वाले मैचों का आयोजन किसी तीसरे देश में कराना पड़ रहा है. अपने घरेलू मैदान में खेलने का महत्वपूर्ण फ़ायदा हर टीम को होता है. मेजबान टीम अपने हिसाब से पिच बना सकती है. अमूमन विपक्षी टीमों की कमजोरियों को देखते हुए पिचें तैयार की जाती हैं ताकि घरेलू टीम को फायदा हो.

अपने मैदानों पर खेलने से घरेलू दर्शकों का सपोर्ट भी मिलता है. स्टेडियम भरे हुए होते हैं. मेजबान क्रिकेट बोर्ड को टिकट बेचने से आर्थिक फायदा भी होता है. लेकिन अफ़ग़ानिस्तान को अभी तक यह सब फ़ायदा नहीं हुआ है, क्योंकि उसने तीसरे देश में मैचों की मेजबानी की है.

शुरुआती दौर में, अफ़ग़ानिस्तान की टीम को श्रीलंका के दांबुला के रणगिरी इंटरनेशनल स्टेडियम में खेलने का मौका मिला. इसके बाद शारजाह में स्पिन की मदद वाली पिच को देखते हुए टीम ने कुछ मैचों का आयोजन वहां किया लेकिन यह भी अस्थायी ही रहा.

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इसके बाद अफ़ग़ानिस्तान क्रिकेट बोर्ड और भारतीय क्रिकेट बोर्ड के बीच समझौता हुआ जिसके तहत बीसीसीआई अफ़ग़ानिस्तानी क्रिकेट टीम को मैच और अभ्यास के लिए स्टेडियम मुहैया कराती है.

अफ़ग़ानिस्तान की क्रिकेट टीम ने पहले ग्रेटर नोएडा के शहीद विजय सिंह पथिक स्पोर्ट्स कांप्लैक्स में खेलना शुरू किया था. यहां की बेहतरीन सुविधाओं को देखते हुए अफ़ग़ानिस्तान क्रिकेट बोर्ड ने इसे अपना घरेलू मैदान घोषित कर दिया था.

2017 में अफ़ग़ानिस्तान क्रिकेट बोर्ड ने इसी मैदान पर आयरलैंड के साथ पांच मैचों की सिरीज़ का आयोजन किया था. इसी मैदान पर अफ़ग़ानिस्तान ने नामीबिया के साथ कुछ अभ्यास मैच भी खेले लेकिन यह सिलसिला लंबा नहीं चल पाया. बीसीसीआई ने इस मैदान पर प्राइवेट लीग के आयोजन का हवाला देते हुए उनसे यह मैदान ले लिया. इसके बाद अफ़ग़ानिस्तान बोर्ड के सामने फिर से अपने लिए घरेलू मैदान की तलाश की चुनौती थी.

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ये तलाश देहरादून के राजीव गांधी इंटरनेशनल क्रिकेट स्टेडियम पर जाकर पूरी हुई है, अब यह मैदान टीम का घरेलू मैदान है. हालांकि कई प्रशंसकों को इस मैदान के बारे में जानकारी नहीं है क्योंकि यह एक नया स्टेडियम है. देहरादून के शांत इलाक़े से अफ़ग़ानिस्तान की टीम ने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में पूर्ण दर्जा वाला सफ़र शुरू किया है. देहरादून कभी अपने आवासीय स्कूलों के लिए मशहूर रहा है, लेकिन अब यह अफ़ग़ानिस्तान क्रिकेट टीम का भी ठिकाना बन चुका है.

इस स्टेडियम में अफ़ग़ानिस्तान की टीम बांग्लादेश और आयरलैंड के खिलाफ सिरीज़ खेल चुकी है. टीम को अपने देश के समर्थकों के सामने खेलने का मौका नहीं मिल रहा है लेकिन वे उपलब्ध विकल्पों पॉजिटिव नजरिए से अपना बेहतरीन प्रदर्शन दे रहा हैं.

अफ़ग़ानिस्तान के ढेरों लोगों को प्रवासियों जैसी ज़िंदगी बितानी पड़ी है और कमोबेश यही हाल अफ़ग़ानिस्तानी क्रिकेट टीम का भी है. उनका सफर श्रीलंका के दांबुला क्रिकेट स्टेडियम से शुरू होकर अब भारत के देहरादून तक पहुंचा है. अगर उनके अपने देश में हालात बेहतर होते हैं और वहां इंटरनेशनल क्रिकेट मैचों का आयोजन शुरू होता है तब जाकर अफ़ग़ानिस्तान क्रिकेट को एक ठिकाने से दूसरे ठिकाने तक पहुंचने का सफ़र पूरा होगा.

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