जी-20 शिखर सम्मेलन: भारत ने पहले दिन ही घोषणा-पत्र पर आम सहमति कैसे बनाई?

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- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी हिंदी, जी20 मीडिया केंद्र, दिल्ली
मेज़बान भारत की अध्यक्षता में नई दिल्ली जी-20 शिखर सम्मेलन का पहला दिन भारत के नाम रहा.
आमतौर से इस सालाना शिखर सम्मेलन के अंत में घोषणा पत्र जारी किया जाता है लेकिन ऐसा पहली बार हुआ कि इस पर सहमति का एलान पहले दिन ही कर दिया गया.
जैसे ही जी-20 के मीडिया सेंटर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बयान आया कि जी-20 लीडर्स घोषणा पत्र पर सभी देशों की सहमति बन गई है, यहाँ मौजूद पत्रकारों ने तालियों से इस ख़बर का स्वागत किया.
इसके बाद विदेश मंत्री एस. जयशंकर और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने मीडिया सेंटर में एक प्रेस कांफ्रेंस करके इस पर और भी विस्तार से बातचीत की.
इस बारे में सबसे पहले ख़ुद प्रधानमंत्री मोदी ने जानकारी दी. अपने एक बयान में उन्होंने कहा, "मेरा प्रस्ताव है कि इस लीडर्स डिक्लेरेशन को भी एडॉप्ट किया जाए. मैं इस डिक्लेरेशन को अडॉप्ट करने की घोषणा करता हूं."
दरअसल घोषणा पत्र पर सभी देशों की सहमति इस सम्मेलन की सबसे बड़ी चुनौती थी, ख़ासतौर से रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर.

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पिछले साल बाली सम्मेलन के घोषणा पत्र में रूस के यूक्रेन पर आक्रमण की कड़े शब्दों में निंदा की गई थी. बाद में रूस और चीन ने जी-20 के मंच से रूस की निंदा पर आपत्ति जताना शुरू कर दिया.
इसके बाद जी-20 अध्यक्षता भारत को सौंपी गई. तब से ये अटकलें लगाई जा रही थीं कि सम्मेलन के घोषणा पत्र पर सभी देशों की सहमति बनाना मेज़बान भारत के लिए काफ़ी कठिन होगा.
भारत की अध्यक्षता में जी-20 के वित्त मंत्रियों और विदेश मंत्रियों के सम्मेलनों के बाद घोषणा पत्र पर सहमति नहीं बन सकी थी.
पश्चिमी देश चाहते थे कि यूक्रेन पर हमले को लेकर रूस की सभी सदस्य देश कड़ी निंदा करें. लेकिन रूस और चीन ने इसका विरोध किया था जिसके कारण सामूहिक तौर पर घोषणा पत्र जारी नहीं किया जा सका था.
भारत के शेरपा अमिताभ कांत ने भी साफ़ कर दिया था कि जी-20 के मंच को यूक्रेन में जारी जंग को मुद्दा न बनाया जाए.
उनका कहना था कि यूक्रेन की जंग यूरोप की जंग है, विकासशील देशों के मुद्दे आर्थिक संकट हैं.

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प्रधानमंत्री मोदी की कूटनीति की जीत
वरिष्ठ पत्रकार केवी प्रसाद ने कहा, "लोग हम पर (भारत पर) शक कर रहे थे लेकिन हम शिखर पर पहुँच गए."
यहाँ मौजूद कई पत्रकारों ने कहा कि ये मेज़बान भारत की जीत है और ये संभव हुआ है प्रधानमंत्री मोदी की विदेश नीतियों के कारण.
केवी प्रसाद ने कहा, "बीस राष्ट्रों के नेताओं को मनाकर एक मुद्दे पर सहमति बनाना एक कठिन काम होता है और ये भारत की पहल से संभव हो पाया."
भारतीय पत्रकारों की आम राय थी कि ये "मोदी की कूटनीतिक सफलता है और राजनीतिक इच्छाशक्ति की भी सफलता है."
भारत ने यूक्रेन पर हमले के लिए रूस की खुलकर कभी निंदा नहीं की है. इसने पश्चिमी देशों और रूस के बीच संतुलन बनाकर रखा और कहा कि शांति स्थापित करना ही समय की ज़रूरत है.

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रूस इस ड्राफ्ट पर सहमत कैसे हुआ?
जानकारों के मुताबिक़, यूक्रेन में युद्ध को लेकर रूस की निंदा जिस तरह से बाली शिखर सम्मेलन में की गई थी रूस और चीन को वो पसंद नहीं आया था.
इस बार डिक्लेरेशन के शब्दों में फेरबदल करके रूस को भारत ने राज़ी कर लिया.
नई दिल्ली घोषणा पत्र में इस्तेमाल किए गए शब्दों में कूटनीति का इस्तेमाल करके भाषा का ऐसा इस्तेमाल किया गया है कि रूस और चीन उस पर राज़ी हो गए.
दक्षिणपंथी विचारक और विदेशी मामलों के जानकार डॉ सुवरोकमल दत्ता ने कहा, "भारतीय प्रधानमंत्री मोदी के गतिशील और वैश्विक नेतृत्व में भारत की ऐतिहासिक जीत है. इस बात पर सभी पूरी तरह से सहमत थे कि 21वीं सदी शांति और वैश्विक समुदाय के समग्र विकास का युग है जिसमें पूरी दुनिया को एक परिवार के रूप में एकजुट होना चाहिए."
मीडिया सेंटर में मौजूद ऑस्ट्रेलिया के ‘सिडनी मॉर्निंग हेराल्ड’ अख़बार के एक पत्रकार ने कहा कि वो हैरान हैं कि कैसे इस पर सर्वसहमति बन पाई.
वो इस बात से भी हैरान थे कि इसकी घोषणा दो दिनों तक चलने वाले सम्मेलन के पहले दिन ही कर दी गई, "अब कल, सम्मेलन के आखिरी दिन कुछ कवर करने को बचेगा नहीं."
यहाँ मौजूद अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, सम्मेलन के आखिरी दिन यानी रविवार की सुबह अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन और ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथोनी अल्बानीज़ दिल्ली से रवाना हो जायेंगे, इसलिए आज ही यानी शनिवार को ही इसकी घोषणा कर दी गई.
अंतरराष्ट्रीय मामलों के विश्लेषक ये कह रहे थे कि दिल्ली के शिखर सम्मेलन में पश्चिमी देशों की तरफ से पूरी कोशिश होगी कि सम्मेलन में पिछले साल की तरह इस साल भी यूक्रेन का मुद्दा प्राथमिकता ले.
लेकिन मेज़बान भारत ने ऐसा होने नहीं दिया.
अमेरिकी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता मार्गरेट मैकलियोड का कहना था कि 'शुक्रवार की शाम नरेंद्र मोदी की राष्ट्रपति बाइडन के साथ मुलाक़ात बहुत अहम थी. अमेरिका के राष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री को आश्वासन दिया कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत को स्थाई सदस्यता दिलाने में अमेरिका पूरी सहायता करेगा.'
एक अमेरिकी पत्रकार का ख्याल था कि 'इसी मुलाक़ात में प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्रपति बाइडन से सम्मेलन के घोषणा पत्र पर उनकी सहमति ले ली होगी.'

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जी-20 अब जी-21
शनिवार को सम्मेलन के शुरू होते ही प्रधानमंत्री ने ये ख़बर दी कि अफ़्रीकी संघ अब जी-20 परिवार में शामिल हो गया है और इस तरह अफ़्रीका की लंबे समय से चली आ रही मांग पूरी हो गई. अफ़्रीकी संघ के 55 सदस्य देशों में इस पर सकारात्मक प्रतिक्रियाएं आ रही हैं.
इसका सेहरा भी भारत के सिर बांधा जा रहा है.
प्रधानमंत्री ने अफ़्रीकी संघ की सदस्यता की भरपूर वकालत की है और हाल में उन्होंने जी-20 के सदस्यों को लिखा था कि "अब समय आ गया है कि अफ़्रीका के देशों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता."
वरिष्ठ पत्रकार केवी प्रसाद के मुताबिक़ "अगर यूरोपी संघ जी-20 का सदस्य हो सकता है तो अफ़्रीकी संघ क्यों नहीं?"
उनका कहना था कि अफ़्रीकी देशों की जीत भारत की भी जीत है. वो कहते हैं, "पहले से ही कई अफ़्रीकी देश इस बात की हिमायत करते रहे हैं कि भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् का परमानेंट मेंबर बने, अब अफ़्रीका के सभी देश इस पर सहमत होंगे."
अफ़्रीका के कई देशों में खाद्य सुरक्षा एक बड़ा मुद्दा है.
भारत ने शनिवार को इस तरफ सदस्यों का ध्यान आकर्षित किया और इस बात पर ज़ोर दिया कि ग़रीब और अमीर देशों में बढ़ती खाई को कम करने के लिए वैश्विक आर्थिक संकट पर सामूहिक तरीके से काबू पाना ज़रूरी है.
डॉ सुवरोकमल दत्ता का मानना है कि भारत आगे चल कर जी-22 की वकालत करे.
वो कहते हैं, "भारत की जी-20 की अध्यक्षता के तहत, इसमें विशाल अफ्रीकी संघ को शामिल करने के साथ ग्लोबल साउथ के व्यापक और बड़े प्रतिनिधित्व में भारी वृद्धि हुई है, जिससे जी-21 के एक नए युग की शुरुआत हुई है. अब भारत के माध्यम से अगले साल के शिखर सम्मेलन में 2024 में जी-21 को जी-22 बनाने के लिए 2024 में प्रशांत महासागर द्वीप के देशों को शामिल करने पर ज़ोर दिया जाना चाहिए."

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अफ़्रीकी संघ को शामिल करने से भारत को बढ़त
अफ़्रीकी संघ की सदस्यता से भारत को कई और फायदे हैं. अफ़्रीकी संघ की जी-20 में शामिल होने की वकालत करके ये साबित किया है कि उसका ग्लोबल साउथ कहे जाने वाले विकासशील देशों का नेतृत्व करने का दावा ग़लत नहीं है.
उधर अफ़्रीका भर में चीन, रूस, तुर्की और अमेरिका समेत भारत ने काफ़ी निवेश किया है. अफ़्रीकी महाद्वीप में इन देशों के बीच इस बात की होड़ है कि अफ़्रीका पर कौन कितना असर बनाने में कामयाब हो सकता है.
विशेषज्ञ कहते हैं कि अफ़्रीकी महाद्वीप को जी-20 में शामिल करके भारत ने शायद ये दौड़ जीत ली है.
जी-20 की स्थापना 1997 में आये एक बड़े आर्थिक संकट के बाद हुई थी. लेकिन 2008 में एक वैश्विक आर्थिक मंदी के दौरान इसे शिखर सम्मेलन का दर्जा दिया गया.
ये शिखर सम्मेलन साल में एक बार होता है. हर साल एक मेंबर देश को अध्यक्ष बनाया जाता है जिसकी अध्यक्षता में शिखर सम्मेलन होता है.
पिछले साल यह सम्मलेन इंडोनेशिया में हुआ था. भारत इस साल के अंत में इसकी अध्यक्षता ब्राज़ील को सौंपने वाला है और अगला शिखर सम्मेलन ब्राज़ील में ही होगा.
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