पिछले 20 साल में जी-20 शिखर सम्मेलनों से दुनिया को अब तक क्या हासिल हुआ?

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- Author, प्रेरणा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
जी-20, जी-7, आसियान, ब्रिक्स, सार्क, शंघाई, नेटो, ओपेक और न जाने ऐसे कितने अंतरराष्ट्रीय समूह हैं जिनकी बैठकें आए दिन सुर्खियों में रहती हैं. इन दिनों दुनिया की शीर्ष अर्थव्यवस्थाओं के संगठन जी-20 की ख़ूब चर्चा है.
जी-20 के 18वें शिखर सम्मेलन का आयोजन इस बार नई दिल्ली में हो रहा है और इसकी तैयारियां भी लगभग पूरी हो चुकी हैं. सम्मेलन में हिस्सा लेने वाले नेताओं के यहां पहुंचने का सिलसिला भी शुरू हो गया है.
हालांकि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन इस बार सम्मेलन में शामिल नहीं हो रहे. उनकी जगह उनके प्रतिनिधि इसमें हिस्सा लेंगे.
9-10 सितंबर को नई दिल्ली में सम्मेलन की अहम बैठकें होनी हैं. बैठक का कोई तय एजेंडा नहीं है लेकिन संभवत: जलवायु परिवर्तन, वैश्विक चुनौतियां, रूस-यूक्रेन युद्ध, स्वच्छ ऊर्जा परिवर्तन और ग़रीबी जैसे मुद्दे चर्चा का हिस्सा होंगे.
जी20 ग्रुप में 19 देश शामिल हैं- अर्जेंटीना, ऑस्ट्रेलिया, ब्राज़ील, कनाडा, चीन, फ़्रांस, जर्मनी, भारत, इंडोनेशिया, इटली, जापान, रिपब्लिक ऑफ़ कोरिया, मेक्सिको, रूस, सऊदी अरब, दक्षिण अफ्रीका, तुर्की, यूनाइटेड किंगडम और अमेरिका.
ग्रुप का 20वां सदस्य है यूरोपियन यूनियन. यानी यूरोपीय देशों का मज़बूत समूह.

हर साल एक रोटेशनल सिस्टम के तहत सदस्य देशों को सम्मेलन की मेज़बानी का अवसर मिलता है.
हर साल मेज़बान देश जी-20 की बैठकों का आयोजन करते हैं. एक थीम के तहत बैठकें होती हैं और कई महत्वकांक्षी लक्ष्य तय किए जाते हैं,
लेकिन इन लक्ष्यों का क्या होता है?
साल 2008 से लेकर साल 2022 तक जी-20 की अब तक हुई 17 बैठकों का हासिल क्या रहा?
इस दौरान समूह के क्या प्रमुख एजेंडे रहे, उन एजेंडों को पूरा करने की दिशा में क्या कदम उठाए गए और उनका परिणाम क्या रहा?
क्या कहते हैं विशेषज्ञ?
विदेशी मामलों के जानकार हर्ष पंत कहते हैं कि 'जी-20 की अब तक कि सबसे बड़ी उपलब्धि साल 2008 के आर्थिक संकट को मैनेज करना था. तब आर्थिक संकट को काबू करने में इस समूह ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. वहीं जी-20 ने आईएमएफ़ और वर्ल्ड बैंक में कुछ सार्थक बदलाव भी किए.'
वो कहते हैं, ''जी-20 की बहुत ज़्यादा उपलब्धियां तो आपको नहीं मिलेंगी लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि जी-20 का गठन ही अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है. इसके गठन ने दर्शाया कि दुनिया की आर्थिक व्यवस्था में तेज़ी से बदलाव हो रहा है.''
''जैसे पहले जी-7 या जी-8 समूह बड़े वैश्विक आर्थिक मसलों पर फ़ैसला ले लिया करते थे...लेकिन जब आर्थिक व्यवस्था बदलने लगी, और 2008 की आर्थिक मंदी के दौरान इन देशों को एहसास हुआ कि उनका यानी पश्चिमी देशों का दबदबा अब उतना प्रभावी नहीं रहा कि जो आर्थिक विषमताएं आ रही थीं उनसे निपट सके तब उन्होंने इस फोरम को बनाया ताकि उभरती हुई ताकतों को भी इसमें शामिल किया जा सके. उन्हें आर्थिक फैसलों का हिस्सा बनाया जा सके.''
लेकिन चीन और रूस के राष्ट्रपति का इस तरह जी-20 की बैठक से ख़ुद दूर करना क्या जी-20 की प्रासंगिकता पर सवालिया निशान खड़ा करता है?
इस सवाल के जवाब में पंत कहते हैं, ''इस तरह के आर्थिक प्लेटफॉर्म तभी ज़्यादा कामयाब होते हैं जब दुनिया में भूराजनीतिक तनाव कम हों. अभी ऐसी स्थिति है कि ये तनाव बहुत ज़्यादा हावी है. बड़ी शक्तियां आपस में एक दूसरे के साथ काम करने को तैयार नहीं हैं. तो उन्हें साथ लाना बड़ी चुनौती होती जा रही है.''
''और ये कह देना कि इसका प्रभाव केवल जी-20 पर हुआ है, ऐसा नहीं है. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भी डेडलॉक है क्योंकि रूस-चीन एक तरफ़ हैं और पश्चिमी देश एक तरफ़ हैं. कोविड के समय विश्व स्वास्थ्य संगठन ने काम नहीं किया क्योंकि चीन ने वहां अड़ंगे लगाए. डब्ल्यूटीओ काम नहीं कर रहा...तो ये मुश्किलात हम दुनियाभर में देख रहे हैं.''

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लेकिन राहत की बात ये है कि केवल जी-20 ही एक ऐसा समूह है जो काम कर रहा है. जिसकी बीते एक साल की सभी बैठकें पूरी हुई हैं. जिसमें विकसित और विकासशील देश दोनों साथ आ रहे हैं.
चीन-रूस के प्रमुख भले न हिस्सा ले रहे हों लेकिन उनके प्रतिनिधि भारत आ रहे हैं. इसलिए इसे एक अलग नज़रिए से भी देखा जा सकता है.
लेकिन समूह कि उपलब्धि के सवाल पर वापस आएं तो दिल्ली की जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी के पूर्व प्रोफ़ेसर और अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार एसडी मुनि सीधे शब्दों में कहते हैं कि 'जी-20 से दुनिया को अब तक कुछ भी हासिल नहीं हुआ है.'
प्रोफेसर मुनी कहते हैं, ''जी-20 एक नया संगठन है, जिसमें आर्थिक हालातों को सुधारने की बात की गई है, लेकिन इसका कोई ख़ास असर हुआ हो दुनिया में, ऐसा मुझे नहीं लगता.''
''ऊपर-ऊपर देखें तो जी-20 की बैठक में आपको ख़ूब तड़क भड़क नज़र आएगा. सजावट, 20 बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देशों के प्रमुखों का जुटना, एजेंडा तय करना लेकिन गहराई से देखें तो अभी तक जी-20 से कुछ भी हासिल नहीं हुआ है.''
''और जलवायु परिवर्तन जैसे मसले हैं जिन पर पेरिस समझौते के बाद भी कुछ नहीं हुआ. जी-20 के सदस्यों पर कोई बाध्यता नहीं है कि वो जी-20 के मंच पर किए अपने किए वादों को निभाएं ही. वहीं जी-20 के पास भी ऐसा कोई साधन नहीं है, जिसके तहत इन वादों को लागू करने के लिए कुछ किया जा सके.''
वो कहते हैं, ''जैसे यूनाइटेड नेशन्स में बातचीत होती है लेकिन उनके पास धन है जिसका इस्तेमाल कुछ मामलों में किया जा सकता है. जी-20 में ऐसा नहीं है.''

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अंग्रेज़ी अख़बार 'न्यूयॉर्क टाइम्स' ने जी-20 की पृष्ठभूमि में एक रिपोर्ट प्रकाशित की है. रिपोर्ट का शीर्षक है 'बार-बार विफल होने के बावजूद भी जी-20 क्यों मायने रखता है?'
डेमियन केव ने लेख में लिखा कि 'कुछ आलोचक जी-20 की प्रासंगिकता पर सवाल उठाते हैं. इनका मानना है कि इस साल चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के सम्मेलन में शामिल नहीं होने के फैसले के बाद यह चिंता वाजिब है कि जी-20 कमज़ोर हो गया है.'
कई विदेश नीति विशेषज्ञों के हवाले से उन्होंने लिखा है कि 'प्रासंगिकता बरकरार रखने के लिए जी-20 को अपने पश्चिम परस्त दृष्टिकोण को बदलने की ज़रूरत है. अगर पश्चिम की नीतियों को बढ़ावा मिलता रहा तो सदस्य देशों में आगे सहमति नहीं बन पाएगी.'
वो लिखते हैं कि 'दिल्ली में होने जा रही बैठक के एजेंडे में जलवायु परिवर्तन, आर्थिक विकास और कम आय वाले देशों में कर्ज का बोझ कम करना, यूक्रेन में रूस के युद्ध से बढ़ी मुद्रास्फीति जैसे मुद्दे शामिल हैं. यदि सदस्य देश इनमें से किसी एक या सभी विषयों पर आम सहमति बना पाते हैं, तो वे अंत में एक आधिकारिक साझा घोषणा की जाएगी.'
'लेकिन इस घोषणा के बाद क्या? जब नतीजों की बात आती है तो अक्सर कुछ नहीं नज़र आता. 1999 में गठन के बाद से समूह के अधिकांश साझे बयान बस बयान तक ही सीमित रह गए. जैसे रोम में साल 2021 शिखर सम्मेलन के दौरान जी20 नेताओं ने कहा कि वे "सार्थक और प्रभावी कार्यों" के साथ ग्लोबल वार्मिंग को सीमित करेंगे, विदेशों में कोयला बिजली संयंत्रों के वित्तपोषण को समाप्त करेंगे.'
'बाद में साल 2022 में अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी ने बताया कि दुनिया भर में कोयला आधारित बिजली उत्पादन एक नई ऊंचाई पर पहुंच गया है. इस साल, कोयले में निवेश 10 प्रतिशत बढ़कर 150 अरब डॉलर होने की उम्मीद है.'
अख़बार ने जी-20 की कुछ उपलब्धियों पर भी नज़र दौड़ाई है.
अख़बार के अनुसार, अभी हाल ही 2021 में, जी20 ने एक बड़े टैक्स सुधार का समर्थन किया जिसमें प्रत्येक देश के लिए कम से कम 15 प्रतिशत का वैश्विक न्यूनतम कर शामिल था. इसने नए नियमों का भी समर्थन किया जिसके तहत अमेज़न जैस बड़े वैश्विक व्यवसायों को उन देशों में कर का भुगतान करना होगा जहां उनके उत्पाद बेचे जाते हैं, भले ही वहां उनके कार्यालय न हों. ग्लोबल टैक्स एग्रीमेंट एक बड़ा कदम है लेकिन अब तक ये लागू नहीं हुआ.
कब-कब और कहां-कहां हुए सम्मेलन?
यूं तो साल 1999 से जी-20 की बैठकें हो रही हैं लेकिन तब इनमें सदस्य देशों के वित्त मंत्री और सेंट्रल बैंक के गवर्नर हिस्सा लेते थे.
एशिया में आर्थिक संकट के दौरान इन्हीं ने मिलकर जी-20 का गठन किया था, इस सोच के साथ कि ग्लोबल इकनॉमिक और फाइनैंशियल मुद्दों पर चर्चा की जा सके.
पर साल 2007-08 में आए वैश्विक आर्थिक मंदी के बाद जी-20 की तस्वीर बदल गई.

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साल 2008, अमेरिका - पहली बार जी-20 के सदस्य देशों की बैठक अमेरिका के वाशिंगटन शहर में आयोजित की गई. दुनिया तब वैश्विक आर्थिक संकट से जूझ रही थी. अमेरिका के दो प्रमुख बैंक दिवालिया हो गए थे.
दुनिया के बिगड़ते आर्थिक हालातों को देखते हुए तय हुआ कि अब जी-20 की बैठक में सदस्य देशों के वित्त मंत्रियों की जगह हेड ऑफ स्टेट यानी सदस्य देशों के प्रमुख इसमें हिस्सा लेंगे.
इस सम्मेलन को ‘वित्तीय बाज़ार और विश्व अर्थव्यवस्था पर शिखर सम्मेलन’ कहा गया.
राष्ट्रों के शीर्ष नेताओं के अलावा आईएमएफ़, वर्ल्ड बैंक और यूनाइटेड नेशन के प्रमुख और स्पेन, नीदरलैंड्स भी इसमें शामिल हुए.
सम्मेलन के दौरान आर्थिक सुधारों से जुड़े कई मुद्दों पर चर्चा हुई. प्रमुख इस बात पर सहमत हुए कि वैश्विक वित्तीय बाजारों में सुधार के लिए सामान सिद्धांत होने चाहिए और उन सिद्धांतों को लागू करने के लिए एक कार्य योजना शुरू करना चाहिए.
सदस्य देशों ने व्यापार और निवेश पर 12 महीनों के लिए नई बंदिशें लगाने से परहेज करने पर सहमति व्यक्त की.

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साल 2009, ब्रिटेन – लंदन में एक साल बाद हुए सम्मेलन को फॉलो-अप बैठक की तरह देखा गया.
बैठक का एजेंडा ‘वैश्विक आर्थिक संकट’ ही था. बैठक में सदस्य देशों ने विकासशील देशों और उभरते बाज़ारों के विकास के लिए आईएमएफ़ के ऋण संसाधनों को बढ़ाकर 750 अरब डॉलर करने का वादा किया.
जी-20 ने इस सम्मेलन में उन देशों को ब्लैकलिस्ट करने पर सहमति जताई, जिन्होंने कर चोरी से निपटने के प्रयासों में सहयोग करने से इनकार या परहेज कर दिया था.
साल 2009, अमेरिका – लंदन में हुई बैठक के तुरंत बाद अमेरिका के पीटर्सबर्ग में इस बैठक की योजना बनाई गई. इसी समित में जी-20 को आधिकारिक तौर पर ‘’अंतरराष्ट्रीय आर्थिक सहयोग के लिए प्रमुख मंच’’ के रूप में परिभाषित किया गया.
साल 2010, कनाडा - टोरोंटो में हुई इस बैठक में जी-20 देशों ने ये माना कि साल 2008 की आर्थिक मंदी के बाद वैश्विक अर्थव्यवस्था की स्थिति नाजुक और अस्थिर हो गई है. मज़बूत अर्थव्यवस्था वाले देशों ने अपने बजट घाटे और बाहरी उधार में कमी लाने का वादा किया.
इसी साल दक्षिण कोरिया के सियोल में भी जी-20 की एक बैठक बुलाई गई. ये पहली बार था जब जी-8 देशों के इतर किसी देश को जी-20 की मेज़बानी मिली थी.
पहली बार ‘विकास नीति का मुद्दा’ शिखर सम्मेलन के एजेंडे में शामिल किया गया और तभी से डेवलपमेंट जी-20 के हर वार्षिक सम्मेलन का हिस्सा है.

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साल 2011, फ्रांस- कान्स में तीन और चार नवंबर के बीच जी-20 की बैठक हुई. सम्मेलन के केंद्र में आईएमएफ़ यानी अंतरराष्ट्रीय मुद्दा कोष में सुधार का मुद्दा रहा.
कृषि बाज़ार सूचना प्रणाली (एएमआईएस) की स्थापना शिखर सम्मेलन के प्रमुख परिणामों में से एक थी. एएमआईएस को कृषि के अतंर्राष्ट्रीय बाज़ार में और पारदर्शिता लाने के लिए शुरू किया गया था.
साल 2012, मेक्सिको – लोस काबोस में हुए सम्मेलन की चर्चा का केंद्र युवाओं की बेरोज़गारी, सामाजिक सुरक्षा कवरेज और उचित आय के साथ गुणवत्तापूर्वक नौकरियां पैदा करना था. साथ ही विकास, कृषि और हरित विकास भी एजेंडा में शामिल थे.
साल 2013, रूस – सेंट पीटर्सबर्ग में टैक्स चोरी से निपटने के मामलों में बड़ी प्रगति हुई. जी20 इस पर सहमत हुआ कि टैक्स से जुड़ी सूचना का स्वचालित आदान-प्रदान और बेस इरोसन और प्रॉफिट शिफ्टिंग पर कार्य योजना बनाई जाएगी.
साल 2014, ऑस्ट्रेलिया – ब्रिसबेन में नेताओं ने तय किया कि जी 20 देशों की कलेक्टिव जीडीपी को दो प्रतिशत से बढ़ाया जाए. साल 2025 तक लेबर वर्कफोर्स में जेंडर गैप को 25 प्रतिशत तक कम करने का लक्ष्य रखा गया.
साल 2015, तुर्की - बैठक के इस संस्करण में पहली बार जी20 सदस्य देशों ने प्रवासन और शरणार्थी संकट पर ध्यान केंद्रित किया. इसके अलावा वित्तीय क्षेत्र में सुधार और जलवायु परिवर्तन से निपटने की योजनाओं के समर्थन पर भी सहमति हुई. 'आतंकवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई' पर एक बयान भी जारी किया गया.

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साल 2016, चीन – सम्मेलन के दौरान हांगझोऊ में दो प्रमुख चीज़ें हुईं. डिजिटल इकोनॉमी को पहली बार जी-20 के एजेंडे में शामिल किया गया. दूसरा, 'सतत विकास के लिए 2030 एजेंडा पर जी20 कार्य योजना' को अपनाया गया.
साल 2017, जर्मनी - बैठक 7 और 8 जुलाई को जर्मनी के हैम्बर्ग में हुई. शिखर सम्मेलन के दौरान, आतंकवाद विरोधी विषय पर विशेष जोर दिया गया. शिखर सम्मेलन के अंत में जारी साझे घोषणा में पेरिस समझौते के महत्व को दोहराया गया.
साल 2018, अर्जेंटीना - ब्यूनस आयर्स में जुटे नेताओं ने तीन मुख्य संदेश दिए. सबसे पहले उन्होंने सतत विकास के लिए यूएन एजेंडा 2030 को अपने समर्थन की पुष्टि की. जलवायु परिवर्तन से निपटने के प्रयासों को तेज़ करने की आवश्यकता पर बल दिया गया.
तीसरा,जी20 नेताओं ने व्यापार के लिए बहुपक्षीय दृष्टिकोण और विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के सुधार के महत्व को पहचाना और नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को दृढ किया.
साल 2019, जापान – ओसाका में नेताओं ने आतंकवाद को लेकर इंटरनेट के इस्तेमाल पर ध्यान केंद्रित किया. जी-20 ने ऑनलाइन प्लेटफार्मों से आतंकवाद और आतंकवाद के लिए अनुकूल हिंसक उग्रवाद को बढ़ावा नहीं देने और ऐसी सामग्री को स्ट्रीम करने, अपलोड करने से रोकने का आग्रह किया.

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साल 2020, सऊदी अरब – ये पहला वर्चुअल समिट था. 21 नवंबर और 22 नवंबर को सऊदी अरब में होने वाले जी-20 शिखर सम्मेलन को कोविड महामारी के कारण वीडियो कॉन्फ्रेंस के माध्यम से आयोजित किया गया.
नेताओं ने महामारी पर काबू पाने, विकास को पटरी पर लाने और अधिक समावेशी भविष्य बनाने के लिए मिलकर काम करने का संकल्प लिया.
साल 2021, इटली – रोम में जी-20 की 16वीं बैठक में सदस्य देशों के प्रमुख ने जलवायु परिवर्तन के ख़िलाफ़ अपनी लड़ाई जारी रखने की प्रतिबद्धता दिखाई.
ग्लोबल वार्मिंग को 1.5 डिग्री तक सीमित करने का लक्ष्य रखा गया. वहीं नेताओं ने सदी के मध्य तक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को नेट ज़ीरो तक पहुंचाने का प्रण लिया.
साल 2022, इंडोनेशिया - ये कोविड महामारी और रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद पहला जी-20 सम्मेलन था.
देश की राजधानी बाली में हुए सम्मेलन में महामारी के बाद स्वास्थ्य से जुड़े वैश्विक समाधानों और अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने को लेकर चर्चा हुई. साथ ही रूस-यूक्रेन युद्ध भी इसके प्रमुख एजेंडे में शामिल रहा.
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