राहुल गांधी ने कहा- अदानी को क्लीनचिट देने वाले आज एनडीटीवी में निदेशक, क्या है पूरा मामला- प्रेस रिव्यू

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मुंबई में इंडिया गठबंधन की बैठक में शामिल होने पहुँचे कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने प्रेस कॉन्फ़्रेंस की और अदानी समूह पर छपी अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स को लेकर सरकार को घेरा.
इसी दौरान कांग्रेस सांसद ने ये भी मुद्दा उठाया कि साल 2014 में अदानी समूह के ख़िलाफ़ आरोपों की जाँच करने वाले सेबी के पूर्व शीर्ष अधिकारी को अब अदानी समूह की मीडिया कंपनी एनडीटीवी में निदेशक बना दिया गया है.
आज के कई प्रमुख अख़बारों के पहले पन्ने पर इस ख़बर को जगह दी गई है. आज प्रेस रिव्यू में सबसे पहले यही ख़बर पढ़िए.
राहुल गांधी ने प्रेस कॉन्फ़्रेंस में कहा, "जाँच हुई. सेबी (बाज़ार नियामक) को सबूत दिए गए और सेबी ने अदानी को क्लीन चिट दे दी. ये बहुत दिलचस्प है कि जिस जेंटलमेन ने अदानी को क्लीन चिट दी वो आज एनडीटीवी (अडानी ग्रुप ने जिस मीडिया समूह को ख़रीदा) के डायरेक्टर हैं. इसलिए ये बहुत ही स्पष्ट है कि इसमें कुछ तो गड़बड़ है."
राहुल गांधी ने अपने इन दावों के समर्थन में 'फ़ाइनेंशियल टाइम्स' और 'द गार्डियन' की रिपोर्ट्स दिखाईं. हालांकि, उन्होंने अधिकारी का नाम नहीं लिया.
इन रिपोर्ट्स में आरोप है कि अदानी ग्रुप ने गुपचुप तरीक़े से ख़ुद अपने शेयर ख़रीदकर शेयर बाज़ार में लाखों डॉलर का निवेश किया.
अंग्रेज़ी अख़बार, 'द टेलीग्राफ़' की ख़बर के अनुसार, फ़रवरी 2011 से लेकर फ़रवरी 2017 तक उपेंद्र कुमार सिन्हा सेबी के चेयरमैन थे. सेबी और डायरेक्टोरेट ऑफ़ रेवेन्यू इंटेलिजेंस (डीआरआई) के बीच एक-दूसरे को भेजी औपचारिक चिट्ठियों के हवाले से फ़ाइनेंशियल टाइम्स ने बताया है कि जनवरी 2014 में अदानी के ख़िलाफ़ दो अलग-अलग मामलों में जाँच चल रही थी.
अख़बार लिखता है कि तत्कालीन डीआरआई डायरेक्टर नजीब शाह ने जनवरी 2014 में सेबी के निदेशक को "स्टॉक मार्केट में अदानी समूह की कंपनियों के लेन-देन के बारे में सूचित किया था."
उनकी चिट्ठी के साथ एक सीडी भी थी जिसमें, अदानी पावर प्रोजेक्ट्स में बढ़े हुए बिलों के आरोपों की डीआरआई जांच के कथित सबूत थे.
टेलिग्राफ़ के अनुसार, इस चिट्ठी में लिखा था, "ऐसे संकेत हैं कि अदानी ग्रुप में निवेश और विनिवेश के ज़रिए कालाधन भारत के शेयर बाज़ार में पहुँच गया."
अख़बार ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, इस चिट्ठी से संकेत मिलते हैं कि सेबी अदानी के ख़िलाफ़ जनवरी 2014 में जाँच कर रहा था. ये सेबी की ओर से सुप्रीम कोर्ट की बनाई विशेषज्ञ समिति के सामने दी गई उस जानकारी पर भी सवाल खड़े करता है, जिसमें कहा गया था कि जाँच अक्टूबर 2020 में शुरू हुई थी.
सेबी की भूमिका तब से संदेह के घेरे में आ गई है जब से सुप्रीम कोर्ट की नियुक्त विशेषज्ञ समिति ने साल 2018 के बाद से विदेशी निवेशकों से जुड़े नियमों में लगातार हो रहे संशोधनों को लेकर संदेह ज़ाहिर किया है. इन बदलावों से अदानी समूह कथित तौर पर शेयर के दामों में हेरफेर, काले धन को वैध बनाने जैसे कई आरोपों से बच सकता है.
डीआरआई की साल 2014 में लिखी चिट्ठी के सामने आने के बाद से ही विपक्षी पार्टियों के नेता अदानी समूह के ख़िलाफ़ आरोपों की जाँच में तत्कालीन सेबी चीफ़ की भूमिका पर सवाल उठा रहे हैं. विपक्षी नेता इस मामले में संयुक्त संसदीय समिति से जाँच कराए जाने की मांग कर रहे हैं.

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'द टेलीग्राफ़' ने इस मामले में उपेंद्र सिन्हा से संपर्क किया.
उन्होंने जवाब में कहा, "ये सब जाँच से जुड़े विषय हैं और इसलिए बेहतर होगा कि आप सेबी से सवाल करें. नौ साल पहले क्या हुआ, ये न तो मुझे याद है और न ही मुझे याद रखने की ज़रूरत है."
एनडीटीवी में अपनी मौजूदा भूमिका के सवाल पर सिन्हा ने टेलीग्राफ़ को बताया, "मैंने ये कंपनी 2023 में ज्वाइन की है. अगर कोई ये कहना चाहता है कि मैंने नौ साल पहले किसी पर ये सोचकर एहसान किया कि इसका फायदा नौ साल बाद मिलेगा, तो फिर मैं इन आरोपों की सच्चाई तय करना मैं आप पर छोड़ता हूं."
वहीं अर्थशास्त्री प्रसेनजित बोस ने टेलीग्राफ़ से इस पूरे मामले को लेकर कहा, "सेबी की जवाबदेही बनती है कि वो ये बताए कि कैसे पत्रकारों ने इतने ठोस सबूत जुटा लिए, जबकि वो इसमें नाकाम रही."
उन्होंने ये भी कहा कि नई खोजी रिपोर्ट तो सिर्फ़ शुरुआत है. इस मामले में अदालत की निगरानी में अदानी समूह की लिस्टेड कंपनियों का स्वतंत्र ऑडिट कराया जाना चाहिए.
जॉर्ज सोरोस के स्वामित्व वाली संस्था ओसीसीआरपी की रिपोर्ट में कहा गया है कि अदानी परिवार से जुड़े लोग मॉरिशस की फ़र्म के ज़रिए सालों तक अपारदर्शी तरीक़े से अदानी ग्रुप के ही शेयर ख़रीदते रहे. ये वो समय था जब अदानी ग्रुप की कंपनी तेज़ी से आगे बढ़ रही थी और वो देश के सबसे अमीर शख़्स बन गए थे.
इस रिपोर्ट को ब्रिटिश अख़बार गार्डियन और फ़ाइनेंशिल टाइम्स ने छापा है.
अदानी समूह ने इस रिपोर्ट को ख़ारिज किया है और इसे ‘आधारहीन’ हिंडनबर्ग रिपोर्ट को पुनर्जीवित करने के लिए जॉर्ज सोरोस की संस्था और विदेशी मीडिया के एक वर्ग की कोशिश बतायी है.
अंग्रेज़ी अख़बार 'द इंडियन एक्सप्रेस' की ख़बर में बताया गया है कि संयुक्त अरब अमीर और ताइवान के दो नागरिकों ने अडानी ग्रुप के शेयरों में बड़ा हिस्सा लिया हुआ है.
अख़बार कहता है कि दोनों व्यक्तियों का संबंध बरमुडा की एक निवेश कंपनी से है और दोनों ने इस फंड से अडानी ग्रुप के शेयरों में बड़ी हिस्सेदारी लेख रखी है. आरोप ये भी है कि दोनों का संबंध गौतम अडानी के भाई विनोद अडानी से है.
विनोद अडानी से करीबी रखने वाले इन दो लोगों में यूएई के नासिर अली शबान अहली और ताइवान के चांग चुंग लींग शामिल हैं.
सज़ा का मक़सद सुधारना: सुप्रीम कोर्ट में बिलकिस बानो के दोषी का बयान

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गुजरात के बिलकिस बानो गैंगरेप मामले में सज़ा पूरी होने से पहले ही रिहा किए गए 11 दोषियों में से एक ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि आपराधिक न्याय व्यवस्था का प्रमुख मकसद सुधार लाना है. इसलिए गुजरात सरकार की ओर से उन्हें जल्द रिहा करने के फैसले में कोई गड़बड़ी नहीं है.
टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार जस्टिस बीवी नागरत्न और उजल भुयन के सामने पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा ने दोषी की ओर से ये दलील दी है.
लूथरा ने कोर्ट में ये भी कहा कि सज़ा के समय दोषियों पर लगाए गए जुर्माने की राशि न भरने से दोषियों की सज़ा माफ़ी पर कोई असर नहीं पड़ेगा.
सुप्रीम कोर्ट में बिलकिस बानो और अन्य कई याचिकाकर्ताओं ने गुजरात सरकार के दोषियों की सज़ा माफ़ी के फ़ैसले को चुनौती दी थी. याचिका में कहा गया था कि दोषियों की समय से पहले रिहाई अवैध है क्योंकि सज़ा माफ़ी के लिए तय समय तक वो कै़द में नहीं रहे और न तो जुर्माना राशि ही भरी.
वकील ने एक दोषी की पैरवी करते हुए कहा कि समयपूर्व रिहाई के लिए नक़द जुर्माना अदा करने की कोई अनिवार्य शर्त नहीं लागू होती है.
सज़ा के समय दोषी पर अदालत ने 34 हज़ार रुपये का नक़द जुर्माना लगाया था. लूथरा ने कहा कि ये जुर्माना सज़ा का हिस्सा नहीं था और अब उनके मुवक्किल ने इस विवाद को ख़त्म करने के लिए ट्रायल कोर्ट में ये जुर्माना राशि जमा कर दी है.
बीते साल 15 अगस्त के दिन बिलकिस बानो के गैंगरेप के 11 दोषियों को सज़ा पूरी होने से पहले ही गुजरात सरकार ने रिहा कर दिया था. इस फैसले के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में सीपीएम नेता सुभासिनी अली, टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा, पत्रकार रेवती लॉल और लखनऊ विश्वविद्यालय के पूर्व वाइस चांसलर रूप रेखा वर्मा सहित कई लोगों ने अर्ज़ी दी थी.
महाराष्ट्र: 'इंडिया' की बैठक के बीच देर रात सीएम आवास पर मिले एनडीए नेता

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महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के आवास पर गुरुवार देर रात बैठक रखी गई. इस बैठक में बीजेपी और उसकी सहयोगी पार्टियों ने एक प्रस्ताव पास कर अगले लोकसभा चुनाव में एकजुट होकर प्रधानमंत्री मोदी को बहुमत से जिताने का संकल्प लिया.
ये बैठक इसलिए अहम है क्योंकि कल ही मुंबई में विपक्षी दलों के गठबंधन इंडिया की भी बैठक शुरू हुई है, जो आज भी चलेगी.
अंग्रेज़ी अख़बार द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार बैठक के बाद शिंदे ने सभी नेताओं के लिए रात्रिभोज का भी आयोजन किया.
महाराष्ट्र में एनडीए की पार्टियों में बीजेपी, शिव सेना (शिंदे गुट), एनसीपी (अजित पवार गुट), आरपीआई (अठावले), आरपीआई (कावड़े), बहुजन विकास अघाड़ी, प्रहर जन शक्ति, रेयान क्रांति, राष्ट्रीय समाज पक्ष शामिल हैं.
देर रात जारी बयान में बीजेपी ने कहा, "ये बैठक 2024 में लोकसभा और विधानसभा चुनाव पर चर्चा के लिए बुलाई गई थी."
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