पीएम मोदी की सरकारी कंपनियों में निवेश की अपील में कितना दम

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- Author, अंशुल सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
बीते गुरुवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पर बोलते हुए सरकारी कंपनियों में निवेश की वकालत की है.
पीएम मोदी ने इस दौरान भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी), हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) से लेकर सावर्जनिक क्षेत्र के बैंकों का ज़िक्र किया था.
मोदी ने कहा कि विपक्ष ने लोगों को शेयर में निवेश का फॉर्मूला दिया है. उनका कहना था कि विपक्ष जिन कंपनियों की आलोचना करे, लोगों को उन कंपनियों पर दांव लगा देना चाहिए.
इसके अलावा मोदी ने फिर से बीजेपी सरकार आने पर भारत को दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनाने की बात भी कही है.
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एलआईसी पर मोदी का बयान और आंकड़े
पीएम मोदी ने एलआईसी पर बोलते हुए कहा, ''आप जानते हैं एलआईसी के लिए क्या-क्या कहा गया था. एलआईसी बर्बाद हो गई, गरीबों के पैसे डूब रहे हैं, गरीब कहां जाएगा, बेचारे ने बड़ी मेहनत से एलआईसी में पैसा डाला था, क्या-क्या- जितनी उनकी कल्पना शक्ति थी, जितने उनके दरबारियों ने कागज पकड़ा दिए थे, सारे बोले लेते थे. लेकिन आज एलआईसी लगातार मज़बूत हो रही है. शेयर मार्केट में रुचि रखने वालों को भी ये गुरु मंत्र है कि जो सरकारी कंपनियों को गाली दें ना, आप उसमें दांव लगा दीजिए, सब अच्छा ही होगा.''
मोदी के दावे से इतर एलआईसी के आंकड़े कुछ और ही कहानी बयां कर रहे हैं.
एलआईसी ने 10 अगस्त को वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही के नतीजे जारी किए हैं.
नतीजों में कंपनी के मुनाफे में बढ़ोतरी देखी गई है. अप्रैल-जून तिमाही में कंपनी का नेट प्रॉफिट 1299 फीसदी बढ़कर 9543 करोड़ रुपए हो गया है.
एक साल पहले की समान अवधि में कंपनी का मुनाफ़ा 682 करोड़ रुपये था. निवेश से होने वाली आय की वजह से कंपनी के मुनाफे़ में यह उछाल देखने को मिला है. तिमाही के दौरान निवेश से होने वाली आय पिछले साल के 69570 करोड़ रुपये से बढ़कर 90309 करोड़ रुपये हो गई है.
तिमाही के दौरान कंपनी के प्रीमियम आय में गिरावट आई है. नतीजों के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस में एलआईसी के सीईओ और एमडी सिद्धार्थ मोहंती ने इसे लेकर चिंता भी जताई है.
हालांकि, एलआईसी के आईपीओ निवेशक अब भी घाटे में हैं. पिछले साल 4 मई को भारतीय जीवन बीमा निगम यानी एलआईसी का आईपीओ आया था.
एलआईसी भारतीय इतिहास का सबसे बड़ा आईपीओ था क्योंकि भारत सरकार ने 21 हज़ार करोड़ रुपये से थोड़ा अधिक जुटाने के लिए अपनी 3.5 प्रतिशत हिस्सेदारी या कंपनी के 22.13 करोड़ इक्विटी शेयरों को 902-949 रुपए तक प्रति शेयर पर बेच दिया था.
बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज पर उपलब्ध जानकारी के मुताबिक़, शुक्रवार को एलआईसी के एक शेयर की कीमत 662 रुपए है. मौजूदा कीमत के हिसाब से निवेशक अब भी हर शेयर पर 287 रुपये के घाटे में हैं. इसका मतलब है कि आईपीओ निवेशक 30 फ़ीसदी घाटे में हैं.
अदानी समूह पर अमेरिकी फ़ॉरेंसिक फ़ाइनैंशियल एजेंसी हिंडनबर्ग की रिपोर्ट आने के बाद फ़रवरी, 2023 में कंपनी के एक शेयर की कीमत घटकर 582 रुपए तक जा पहुंची थी. बीते एक साल में एलआईसी का शेयर 530 रुपए से लेकर 754 रुपए के बीच घूमता रहा. वर्तमान में कंपनी का मार्केट कैप छह लाख करोड़ रुपए से घटकर 4.18 लाख करोड़ रुपए रह गया है.

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एलआईसी में निवेश करना कितना सही?
एलआईसी में निवेश के सवाल को बीबीसी ने प्रॉफ़िटमार्ट सिक्योरिटीज़ के प्रमुख अविनाश गोरक्षकर और स्वतंत्र बाज़ार विश्लेषक अरुण केजरीवाल से बात की.
निवेश को लेकर अविनाश गोरक्षकर कहते हैं, ''अगर एलआईसी के शेयर में कम समय के लिए निवेश कर मुनाफ़ा कमाना चाहते हैं तो शायद ये मुश्किल है. लेकिन अगर आप अगले दो साल को देखते हुए निवेश करेंगे तो वर्तमान भाव पर खोने के लिए कुछ नहीं है. बाज़ार तेज़ी से चला है लेकिन एलआईसी का स्टॉक अपने आईपीओ की कीमत भी नहीं वसूल पाया है. हालांकि ये भी सच है कि बाज़ार में ट्रेंड बदलने में टाइम नहीं लगता है. उनका मुनाफ़ा भी कम था क्योंकि एलआईसी कम प्रीमियम और कम लाभ पॉलिसी बेचते थे. अब मैनेजमैंट ने कहा है कि वो प्राइवेट पॉलिसी कंपनियों के मुकाबले स्वयं में बदलाव करेगा.''
एलआईसी की वर्तमान स्थिति को लेकर अविनाश कहते हैं, ''एलआईसी में अभी 98 प्रतिशत तक हिस्सेदारी सरकार की है और दो प्रतिशत हिस्सेदारी शेयरधारकों की है. इस दो प्रतिशत में भी ज़्यादातर हिस्सेदार उनके कर्मचारी और रिटेलर हैं. जब तक एलआईसी में संस्थागत फंड नहीं आता है तब तक इसकी बाज़ार में स्थिति नहीं बदलेगी. रिटेल के पास इतनी ताकत नहीं है कि वो शेयर को ऊपर ले जाए. एलआईसी प्रचार-प्रसार और कम्युनिकेशन पर भी उतना ध्यान नहीं दे रहा है. इसलिए जनता को उतना भरोसा नहीं है कि सरकार गंभीर है.''
एलआईसी में निवेश को लेकर स्वतंत्र बाज़ार विश्लेषक अरुण केजरीवाल की राय अविनाश गोरक्षकर से मिलती-जुलती है.
अरुण केजरीवाल का कहना है, ''पॉलिसी मार्केट का निजीकरण हुए 18 साल हो गए हैं और आज भी 60 फ़ीसद से ज़्यादा इसमें एलआईसी की हिस्सेदारी है. इसका सीधा मतलब है कि भारत के नागरिक का एलआईसी पर भरोसा क़ायम है. जब आपके पास सिर्फ़ पॉलिसी धारक होते हैं तो आपकी नीतियां अलग होती हैं लेकिन अब आपके पास पॉलिसी धारक भी हैं और शेयरहोल्डर भी हैं. ऐसी परिस्थितियों में आपकी नीतियां अलग होती हैं. अब इनकी नीति अंतरराष्ट्रीय पॉलिसी कंपनी के हिसाब से होती हैं. ये पिछले साल से शुरू हुआ है और अब इसका असर शेयरहोल्डर को मुनाफे़ के रूप में दिखेगा.''

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एचएएल के बारे में क्या बोले मोदी?
हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) को लेकर पीएम मोदी ने कहा, ''आज एचएएल सफलता की नई बुलंदियों को छू रहा है. एचएएल ने अपना हाईएस्ट एवर रेवेन्यू रजिस्टर किया है. इनके जी भर के गंभीर आरोप के बावजूद भी वहां के कामगारों को, वहां के कर्मचारियों को उकसाने की भरपूर कोशिश के बावजूद भी आज एचएएल देश की आन-बान-शान बनकर उभरा है.''
आंकड़ों के लिहाज़ से हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड ने वित्तीय वर्ष 2022-23 में कुल 26,927 करोड़ रुपए के रूप में अब तक का सबसे बड़ा राजस्व दर्ज किया है. पिछले साल यह आंकड़ा 24,620 करोड़ रुपए था. डिफेंस सेक्टर से जुड़ी इस सरकारी कंपनी ने साल 2022 के मुकाबले 2021 में आठ प्रतिशत की राजस्व वृद्धि हासिल की थी.
मुनाफ़े की बात करें तो, साल 2022 में कंपनी का मुनाफा 5086 करोड़ रुपए था और साल 2023 में यह आंकड़ा 5811 करोड़ रुपए हो गया था. यह कुल 14.25 फ़ीसद की वृद्धि दर्ज की गई है.
पिछले पांच सालों में एचएएल के शेयरों ने अच्छा ख़ासा रिटर्न दिया है. 17 अगस्त, 2018 को शेयर बाज़ार में एचएएल के एक शेयर की कीमत 935 रुपए थी जबकि 10 अगस्त, 2023 को एक शेयर की कीमत 3851 रुपए थी. यानी पिछले पांच सालों में एचएएल के शेयरों में तीन सौ फ़ीसद से ज़्यादा की तेज़ी दर्ज की गई है.
हालांकि, कंपनी के शेयर में बीते दो सालों में ज़बरदस्त उछाल देखा गया है. 1 अप्रैल, 2021 को कंपनी के एक शेयर की कीमत 1035 रुपए थी और 1 अप्रैल, 2023 को यह कीमत 2731 रुपए हो गई थी.

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एचएएल को लेकर जानकारों की राय
एचएएल को लेकर अरुण केजरीवाल का कहना है कि एचएएल के शेयर की कीमतें ही एचएएल के बारे में सब बताती हैं.
अरुण केजरीवाल बताते हैं, ''पांच साल पहले एचएएल के शेयर की कीमत हज़ार रुपए से कम थी और देखते-देखते आज तीन हजार रुपए प्रति शेयर कीमत है. इसका बनाए हुआ एयरक्राफ़्ट सफल हो गया है. इस कंपनी में दम है और शानदार प्रदर्शन कर रही है.''
वहीं अविनाश गोरक्षकर कहते हैं, ''मोदी अभी फ़्रांस और अमेरिका गए थे. वहां पर रक्षा क्षेत्र से जुड़ीं जो भी डील होती हैं उसका पहले फ़ायदा एचएएल और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स को मिलता है. डिफेंस का मामला सीधे देश से जुड़ा होता है इसलिए भारत सरकार भी चाहती है कि एचएएल परफॉर्म करे. रक्षा क्षेत्र से जुड़ीं कंपनियों के आज और दो साल पहले के भाव देखेंगे तो ज़मीन-आसमान का अंतर पाएंगे. आज नंबर अच्छा है इसलिए जनता भी दमदारी से शेयर खरीदती है.''

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सरकारी कंपनियों का शेयर बाज़ार में प्रदर्शन कैसा है?
बीते सालों में सरकारी कंपनियों का शेयर बाज़ार में कैसा प्रदर्शन रहा है? बीबीसी ने जानकारों ने इस सवाल का जवाब जानने की कोशिश की है.
सवाल पर अविनाश गोरक्षकर कहते हैं, ''पिछले दो सालों में चाहे रेल विकास निगम लिमिटेड (आरवीएनएल) हो, रेलटेल हो या इरकॉन हो ज़्यादातर सरकारी कंपनियां नंबर के हिसाब से अच्छा प्रदर्शन कर रही हैं. इन कंपनियों को लोग इस नज़र से देखते थे कि सरकारी कंपनी है, क्या ही कर पाएगी लेकिन उल्टा हो गया है. आरवीएनएल के आईपीओ की कीमत बीस रुपए थी आज 125 रुपए हो गया है. सोचिए जिसने 20 रुपए लगाया था उसने कितने पैसे बना लिए होंगे.''
सरकारी कंपनियों में निवेश को लेकर अरुण केजरीवाल मजबूती से रेलवे और डिफ़ेंस सेक्टर का जिक्र करते हैं.
अरुण कहते हैं, ''रेलवे और डिफ़ेस सेक्टर में ऐसी कोई कंपनी नहीं है जिसका भाव पिछले बारह से अट्ठारह महीने में दोगुना नहीं हुआ है. इनके भाव जिस तेजी से बढ़े हैं उसके बारे में आप सोच नहीं सकते हैं. मझगांव डॉक का उदाहरण लीजिए, इसका शेयर 250 रुपए में आया था आज 1800-2000 रुपए के बीच में चल रहा है. रेलवे सेक्टर के आईआरएफ़सी का 25 रुपए के आसपास आईपीओ आया था और आज 50 रुपए के आसपास चल रहा है. आरवीएनएल का शेयर लगभग 20 रुपए था, अब ये शेयर 100 रुपए के ऊपर चला गया है.''
अरुण केजरीवाल का कहना है कि सरकार की कंपनियों में जिसने निवेश किया, उसका पैसा बढ़ा.

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क्या सरकारी कंपनियों में निवेश करना चाहिए?
पीएम नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण में कहा था, ''शेयर मार्केट में रुचि रखने वालों को भी ये गुरु मंत्र है कि जो सरकारी कंपनियों के लोग गाली दें ना, आप उसमें दांव लगा दीजिए, सब अच्छा ही होगा.''
अब सवाल उठता है कि क्या ये सरकारी कंपनियों में निवेश करने का सही समय है?
इस सवाल के जवाब में अविनाश गोरक्षकर कहते हैं, ''धीरे-धीरे लोगों को समझ आ रहा है कि निजी और सार्वजनिक क्षेत्र के बीच तालमेल निश्चित रूप से बाज़ार में अच्छा प्रदर्शन होगा. आप डिफ़ेंस सेक्टर की कंपनियों को देखिए. एचएएल, बीईएल और मझगांव डॉक ये कंपनियां अच्छा मुनाफ़ा दे रही हैं. ये कंपनियां तीन हजार करोड़ से लेकर पचास हज़ार करोड़ के ऑर्डर बुक पर बैठे हैं. मेरे ख़्याल से बहुत कम कंपनियां हैं जो अच्छा प्रदर्शन नहीं कर रही हैं, जैसे बीएचईल है. बीएचईल का नंबर अच्छा नहीं है. इसकी समस्या है कि बीएचईल के पास ऑर्डर है लेकिन इसका कार्यान्वयन बहुत धीमा है.''
''हां, एक बात मार्केट को पसंद नहीं है वो है ओएफ़एस यानी ऑफ़र फ़ॉर सेल. इसको ऐसे समझिए कि सरकार को कंपनी से अपना हिस्सा बेचना है. ये पैसा कंपनी को नहीं जाएगा, सरकार को जाएगा. जब ओएफ़एस की घोषणा होती है तो वह शेयर की कीमत से कुछ कम होती है. तो उस टाइम पर शेयरहोल्डर को झटका लगता है क्योंकि वो पैसा कंपनी को न जाकर सरकार को जाता है.''
चाहे अविनाश गोरक्षकर हों या अरुण केजरीवाल दोनों ही विशेषज्ञों का मानना है कि सरकारी कंपनियां भी पहले से ज्यादा प्रोफ़ेशनल हुई हैं और इससे उन्हें शेयर बाजार में भी फ़ायदा पहुंचा है.
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