क्या भारत अमेरिका से व्यापार में चीन को पछाड़ देगा?

ज़़ुबैर अहमद

बीबीसी संवाददाता

बाइडन और मोदी

इमेज स्रोत, REUTERS/Elizabeth Frantz

23 जून को अमेरिका के व्हाइट हाउस में हुई प्रेस वार्ता में अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन ने कहा कि भारत और अमेरिका के बीच आर्थिक संबंध तेज़ी से बढ़ रहा है.

उन्होंने कहा, "पिछले एक दशक में दोनों देशों के बीच व्यापार दोगुना होकर 191 अरब डॉलर से अधिक हो गया है."

इस पर भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस बात पर ज़ोर दिया, "भारत और अमेरिका के बीच व्यापार और निवेश साझेदारी न केवल दोनों देशों के लिए, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए भी महत्वपूर्ण है."

मोदी की यात्रा के दौरान जनरल इलेक्ट्रिक (जीई) और हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) ने भारत में एफ़414 जेट इंजन का निर्माण मिलकर करने के एक समझौते पर हस्ताक्षर किए.

इस इंजन का इस्तेमाल लड़ाकू विमानों में किया जाता है. भारत ने एमक्यू-9बी प्रिडेटर ड्रोन हासिल करने के लिए जनरल एटॉमिक्स के साथ एक समझौते पर भी हस्ताक्षर किए, जिसका उद्देश्य भारत की निगरानी क्षमताओं को मज़बूत करना है, ख़ास तौर पर चीन से लगने वाली इसकी सीमा पर. ये ड्रोन मिसाइल ले जाने में सक्षम है.

बाद में जारी एक संयुक्त बयान में कहा गया, "नेताओं ने भारत में एक नई सेमीकंडक्टर असेंबली और परीक्षण सुविधा बनाने के लिए 825 मिलियन डॉलर तक निवेश करने की माइक्रॉन टेक्नोलॉजी की घोषणा का स्वागत किया."

बाइडन और मोदी

इमेज स्रोत, MICHAEL REYNOLDS/EPA-EFE/REX/Shutterstoc

अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि ने एक बयान में कहा, "आज का समझौता हमारे आर्थिक और व्यापार संबंधों को गहरा करने के लिए अमेरिका-भारत व्यापार नीति फोरम सहित पिछले दो सालों में गहन द्विपक्षीय साझेदारी की मेहनत का नतीजा है."

पीएम मोदी की अमेरिका की राजकीय यात्रा के दौरान, दर्जनों अमेरिकी व्यवसायियों और कंपनियों के सीईओ से उनक मुलाक़ात हुई. इनमें टेस्ला के एलन मस्क, एडोबी सिस्टम्स के सीईओ शांतनु नारायण, वीज़ा के सीईओ रयान मैकइनर्नी, मास्टरकार्ड के सीईओ माइकल मीबैक और कोका कोला के सीईओ जेम्स क्विंसी शामिल थे.

वॉशिंगटन के कैनेडी सेंटर में होने वाले मोदी के कार्यक्रम के लिए डेढ़ हज़ार से अधिक निमंत्रण भेजे गए, जिनमें कुछ जानेमाने कंपनियों के सीईओ और बिज़नेस लीडर शामिल थे.

पीएम मोदी के दौरे को कई जानकार मील का पत्थर बता रहे हैं. उनका कहना है कि इस दौरान दोनों मुल्कों के रक्षा संबंध गहरे हुए, तकनीक के क्षेत्र में साझेदारी मज़बूत हुई, द्विपक्षीय व्यापार में कुछ ख़ास तो नहीं हुआ लेकिन इसे नई ऊंचाई पर पहुंचाने का वादा ज़रूर किया गया.

मोदी का अमेरिका दौरा

अमेरिका और चीन के व्यापारिक रिश्ते

छोड़कर पॉडकास्ट आगे बढ़ें
कहानी ज़िंदगी की

मशहूर हस्तियों की कहानी पूरी तसल्ली और इत्मीनान से इरफ़ान के साथ.

एपिसोड

समाप्त

मोदी-बाइडन मुलाक़ात और इस दौरान हुए समझौते साल 2000 की उस घटना की याद दिलाते हैं जब अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की अथक कोशिशों के बाद 2001 में चीन विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) में शामिल हुआ.

क्लिंटन को उम्मीद थी कि इससे दुनिया के सबसे अधिक आबादी वाले देश के साथ अमेरिक के संबंधों में सुधार होगा और साथ ही अमेरिका की विदेश नीति के हितों को आगे बढ़ाने के लिए फ़्री ट्रेड का इस्तेमाल करने की उनकी अपनी विरासत भी मज़बूत होगी.

उस वक्त इस क़दम का कई सांसदों और ट्रेड यूनियनों ने विरोध किया था. लेकिन देश की बड़ी कंपनियों के सीईओ चीन में निवेश करने और भारी मुनाफ़ा कमाने की संभावनाओं को लेकर बेहद उत्साहित थे.

उनकी इन कोशिशों से वैश्विक उत्पादन केंद्र और दुनिया का नंबर वन निर्यातक बनने चीन को काफी मदद मिली, लेकिन राष्ट्रपति क्लिंटन की आशा के अनुरूप चीन ने अपनी विदेश नीति में कोई बदलाव नहीं किया.

आज के दौर को देखा जाए तो चीन अमेरिका का सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी बनकर उभरा है. क्लिंटन की आलोचना करने वाले कई अमेरिकी विशेषज्ञ कहते हैं कि पूर्व राष्ट्रपति ने चीन की मदद करके एक ऐसा 'दानव' खड़ा कर दिया है जो अमेरिका को सीधे-सीधे चुनौती दे रहा है.

मोदी के इस बार के अमेरिका दौरे में ऐसा दिखता है कि अमेरिका खुली बाहों से भारत का स्वागत कर रहा है. ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि क्या अगले 10-15 सालों में अमेरिका की आर्थिक, व्यापारिक और सियासी भागीदारी से भारत भी चीन की तरह एक आर्थिक शक्ति बन सकता है?

क्या है भारत की प्राथमिकता?

बाइडन और शी जिनपिंग

इमेज स्रोत, REUTERS/Kevin Lamarque

स्टीव एच. हैंके अमेरिका की जॉन्स हॉपकिन्स विश्वविद्यालय में एप्लायड इकोनॉमिक्स के प्रोफ़ेसर हैं. उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन की आर्थिक सलाहकार परिषद में भी काम किया है.

इस सवाल के उत्तर में वो कहते हैं, "व्यापार हमेशा दो मुल्कों के संबंधों को नरम बनाता है. जहां तक दानव की बात है, उसकी उत्पत्ति कहीं और से होती है."

प्रोफ़ेसर हर्ष वी. पंत ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन में फ़ॉरेन पॉलिसी विभाग में उपाध्यक्ष हैं. वो कहते हैं कि वो दिन अभी दूर है जब भारत अमेरिका के लिए चुनौती बन जाए.

वो कहते हैं, "अभी भारत की चिंता चीन है, अगले 10-20 सालों में चीन कहीं जाने वाला नहीं. अगर आप शॉर्ट से मीडियम टर्म में देखेंगे तो मुझे लगता है कि इसकी संभावना कम है कि भारत अमेरिका को चुनौती देगा. भारत की पहली प्राथमिकता घरेलू विकास है और अगले 20 सालों में उसका फ़ोकस यही रहेगा."

लेकिन क्या लंबे अरसे में ये संभव कि भारत अमेरिका को चुनौती दे?

प्रोफ़सर हर्ष पंत कहते हैं, "लंबी अवधि में कुछ नहीं कहा जा सकता कि अगर भारत वैश्विक स्तर पर खड़ा होता है तो क्या वो अमेरिका के वर्चस्व को चुनौती दे सकेगा. वैसे पहले की तुलना में अमेरिका की ताक़त भी अब घट रही है. ऐसे में अमेरिका के लिए भी ज़रूरी है कि उसके नए साझीदार बनें और नए पार्टनर के तौर पर भारत उसके लिए अहम है."

भारत की अर्थव्यवस्था विश्व भर में सबसे तेज़ रफ़्तार से आगे बढ़ रही है. ख़ुद मोदी ने अमेरिकी कांग्रेस के संयुक्त सत्र को संबोधित करते हुए भारतीय अर्थव्यवस्था की ताक़त को रेखांकित किया.

उन्होंने कहा, "जब मैंने प्रधानमंत्री के रूप में पहली बार अमेरिका का दौरा किया (2014 में) तो भारत दुनिया की दसवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था थी. आज भारत पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है. और जल्द ही भारत तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा, हमारा न केवल विकास हो रहा है बल्कि तेज़ी से विकास हो रहा है."

सबसे बड़ा व्यापारिक साझीदार

वीडियो कैप्शन, टेस्ला के सीईओ बोले, 'मैं भारतीय प्रधानमंत्री मोदी का फैन हूं...'

दो साल पहले चीन को पीछे छोड़कर अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार बन गया, यानी भारत के साथ व्यापारिक लेन-देन के मामले में अमेरिका चीन से आगे निकल गया है.

दोनों देशों के बीच गुड्स और सर्विसेज़ को जोड़कर द्विपक्षीय व्यापार पिछले वर्ष 190 अरब डॉलर का रहा. सिर्फ़ सामानों के व्यापार की बात करें तो ये 130 अरब डॉलर का था. लेकिन ज़रा इस पर निगाह डालें, पिछले साल चीन और अमेरिका के बीच आपसी व्यापार 700 अरब डॉलर का था.

ये साफ़ है कि भारत-अमेरिका आर्थिक और व्यापारिक भागीदारी को चीन-अमेरिकी की भागीदारी तक पहुंचने में काफी वक़्त लगेगा. हालांकि पिछले साल एक बयान में वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने विश्वास जताया था कि गुड्स एंड सर्विसेज़ में भारत-अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार 2030 तक 500-600 अरब डॉलर तक पहुंच जाएगा.

लेकिन विशेषज्ञों के मुताबिक़ ये एक अति-महत्वाकांक्षी लक्ष्य हो सकता है. दोनों देशों के फलते-फूलते रिश्तों के बावजूद व्यापारिक तनाव और मतभेद ढेर सारे हैं जो व्यापारिक रिश्तों के आगे बढ़ने में बाधा साबित हो रहे हैं.

व्यापारिक मतभेदों की एक लंबी दास्तान

मोदी का अमेरिका दौरा

जैसे-जैसे अमेरिका और भारत के बीच व्यापार बढ़ा है, वैसे-वैसे व्यापारिक तनाव भी बढ़ा है. अमेरिकी और भारतीय अधिकारी सालों से टैरिफ़ और विदेशी निवेश सीमाओं के साथ-साथ अन्य जटिल मुद्दों पर भी असहमत हैं, खासकर कृषि व्यापार में.

बौद्धिक संपदा अधिकारों (आईपीआर) की चिंता अमेरिका में तीस वर्षों से है, जबकि चिकित्सा उपकरणों और तेज़ी से बढ़ती डिजिटल अर्थव्यवस्था से संबंधित मुद्दे हाल ही में उभरे हैं.

इसके शीर्ष पर, पूर्व राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के प्रशासन ने नई दुविधाएं पैदा करके तनाव को और भी बढ़ा दिया था, जिसमें द्विपक्षीय व्यापार घाटे पर ध्यान केंद्रित करना और नए टैरिफ़ लागू करना शामिल है, जिससे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार को जवाबी कार्रवाई करनी पड़ी थी.

ऐतिहासिक रूप से, दोनों देशों के बीच अंतरराष्ट्रीय आर्थिक मामलों में मतभेद चला आ रहा है जिसकी वजह से दोनों देशों के बीच व्यापार संबंधों को नुकसान हुआ है.

उदाहरण के लिए हाल ही में, भारत के ऊर्जा मंत्री आरके सिंह ने बाइडन प्रशासन के मुद्रास्फ़ीति कटौती अधिनियम को शुद्ध संरक्षणवाद बताया था जो विकासशील देशों को हरित ऊर्जा के क्षेत्र में सब्सिडी देने में असमर्थ बनाता है.

लेकिन अमेरिका का तर्क है कि भारत संरक्षणवाद से अछूता नहीं है.

पिछले साल, भारत ने सोलर पैनल आयात पर 40 प्रतिशत टैरिफ़ लागू किया था, जिसे घरेलू क्षमता में कमी के बाद आधा करने पर विचार किया जा रहा है. भारत अमेरिका से बड़े पैमाने पर सोलर पैनल का आयात करता है.

भारत अमेरिका व्यापार में दिक्कतें

व्हाइट हाउस

इमेज स्रोत, REUTERS/Kevin Lamarque

प्रोफ़ेसर हर्ष पंत की राय में दोनों देशों के बीच ये व्यापारिक मतभेद "इतनी आसानी से सुलझने वाले नहीं हैं. वो बने रहेंगे क्योंकि कई तरीक़े से कई सेक्टर्स में हम अपने उद्योग और व्यापार को प्रोटेक्ट करना चाहते हैं और कुछ क्षेत्र ऐसे हैं, जैसे कि कृषि का क्षेत्र, जहां अमेरिका अपने हितों को सुरक्षित करना चाहता है. बाद में इन मामलों को लेकर आप कोर्ट में जाते हैं."

वो कहते हैं, "दोनों देशों में अर्थव्यवस्था सबसे बड़ा मुद्दा बनकर उभरा है. हम कई क्षेत्रों में पहुंच चाहते हैं लेकिन अमेरिका देता नहीं है, अमेरिका ऐसी काफ़ी क्षेत्रों में भारत में आना चाहता है जिसकी इजाज़त हम नहीं देते."

अमेरिका के व्यापारिक मतभेद चीन और भारत से अलग-अलग हैं, प्रोफ़ेसर हर्ष पंत कहते कहते हैं, "फ़र्क़ ये है कि अमेरिका का अभी तक ये मानना है कि भारत एक क़ानून पर चलने वाला देश है. तो अगर कोई मतभेद होता है, विवाद होता है तो वह विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) में जाएगा. उस सेटलमेंट को भारत भी मानेगा और अमेरिका भी मानेगा. फ़र्क़ ये है कि चीन डब्ल्यूटीओ की बात मानता ही नहीं है. अमेरिका और भारत के बीच भरोसा इतना है कि अगर हमारे बीच मतभेद भी है तो हम उनको संस्थाओं के ज़रिये हल कर लेंगे."

वे कहते हैं, "चीन और अमेरिका के बीच जो विवाद हैं वो इतने बड़े हैं कि इसने उनके रिश्ते को खटाई में डाल दिया है. ये बात भारत के साथ लागू नहीं होती तो व्यापार के क्षेत्र में विवाद और मतभेद चलते रहेंगे. ये ट्रेड डिस्प्यूट तो अमेरिका और यूरोपीय संघ के बीच में भी है."

अमेरिका और भारत के बीच में व्यापर को लेकर मोदी के दौर में प्रोफ़सर स्टीव एच. हैंके कहते हैं, "व्यापार को लेकर अमेरिका और भारत के बीच जो मतभेद हैं, उन्हें नज़रअंदाज़ कर दिया जाएगा या दरकिनार कर दिया जाएगा."

22 जून को दोनों नेताओं के बीच बातचीत के बाद ये खबर आई कि दोनों देश डब्लूटीओ में छह लंबित विवादों को समाप्त करने पर सहमत हो गए हैं. ये मामले डब्ल्यूटीओ की अदालत में चल रहे थे लेकिन अब अदालत के बाहर मामला सुलझाने पर सहमति हो गई है.

अमेरिका ने कुछ समय से चीन से व्यापार और आर्थिक रिश्तों पर जो नीति अपनाई है उसे 'डी-रिस्किंग' का नाम दिया जा रहा है.

अमेरिकी विदेश मंत्रालय के मुताबिक़ डी-रिस्किंग का मतलब वित्तीय संस्थानों के जोखिम को कम करना है.

अमेरिका को चीन के बजाय एक नए पार्टनर की तलाश है और भारत में उसे वो साझीदार नज़र आता है.

अमेरिका में भारत की पूर्व राजदूत मीरा शंकर कहती हैं, "जैसा कि अमेरिका वैश्विक अर्थव्यवस्था को चीन के जोखिम से मुक्त करने के लिए नई व्यवस्था बनाना चाहता है, मुझे लगता है कि ये भारत और अमेरिका के लिए एक साथ काम करने का अवसर है."

वो कहती हैं कि "शायद दोनों के लिए ये एक नए दौर का आग़ाज़ हो."

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)