अदानी-हिंडनबर्ग विवाद: क्या है शॉर्ट सेलिंग, एफ़पीओ और स्टॉक से छेड़छाड़ का मतलब

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    • Author, मानसी कपूर
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

अमेरिकी रिसर्च एजेंसी हिंडनबर्ग की अदानी समूह को लेकर रिपोर्ट आने के बाद बाज़ार या वित्त से जुड़े कई ऐसे शब्दों का इस्तेमाल हो रहा है जो आम बोल-चाल में सुनाई नहीं पड़ते.

लेकिन, अदानी मामले को समझने के लिए इन शब्दों के मतलब को समझना भी ज़रूरी है.

ऐसे ही शब्द हैं शॉर्ट सेलिंग, मार्केट कैपिटलाइज़ेशन, एफ़पीओ, आईपीओ और स्टॉक मैनिप्यूलेशन जिनका इस्तेमाल कई बार हुआ है. हिंडनबर्ग ख़ुद को 'शॉर्ट सेलर' बताती है और उस पर भी मुनाफ़ा भुनाने के लिए ये रिपोर्ट जारी करने के आरोप लग रहे हैं.

वहीं, हिंडनबर्ग ने अपनी रिपोर्ट में अदानी समूह पर धोखाधड़ी और स्टॉक मैनिप्यूलेशन के आरोप लगाए हैं. ये रिपोर्ट आने के बाद अदानी ग्रुप के निवेशकों में खलबली मच गई है और शेयरों में भारी गिरावट आई है. यहां तक कि अदानी समूह को बैंकों से मिले कर्ज़ को लेकर भी चिंता जताई जा रही है.

फिलहाल वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और भारतीय रिज़र्व बैंक ने आश्वासन दिया है कि निवेशकों को कोई ख़तरा नहीं है और इस मामले पर नियामक निगरानी बनाए हुए हैं.

अदानी समूह का मामला भारतीय मीडिया, आम लोगों से लेकर राजनेताओं के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है. संसद में भी इसकी गूंज सुनाई दे रही है. ऐसे में इस मामले को समझने के लिए जानते हैं बाज़ार से जुड़े कुछ अहम शब्दों के मायने-

गौतम अदानी

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शॉर्ट सेलिंग क्या है?

सामान्य तौर पर शेयर बाज़ार में आप उस कंपनी के शेयर खरीदते हैं जिसके शेयरों के दाम भविष्य में बढ़ने वाले होते हैं. जब शेयर के दाम बढ़ जाते हैं तो आप उन्हें बेच देते हैं.

लेकिन, शॉर्ट सेलिंग में शेयर की खरीद और बिक्री तब की जाती है जब उनके दाम भविष्य में गिरने की संभावना होती है. ऐसे में शॉर्ट सेलर अपने पास शेयर न होते हुए भी इन्हें बेचता है. लेकिन, वो शेयर खरीदकर नहीं बेचता बल्कि उधार लेकर बेचता है.

इसे उदाहरण से समझिए- जैसे अगर एक शॉर्ट सेलर को उम्मीद है कि 100 रुपये का शेयर 60 रुपये तक के स्तर तक टूट सकता है तो वह ब्रोकर से शेयर उधार लेकर इसे उन दूसरे निवेशकों को बेच देगा, जो इसे 100 रुपये के भाव पर ख़रीदने को तैयार हैं. जब यह शेयर 60 के स्तर तक गिर जाएगा तो शॉर्ट सेलर इसे ख़रीदकर ब्रोकर को लौटा देगा. इस तरह हर शेयर पर वह 40 रुपये मुनाफ़ा कमा सकता है.

शॉर्ट सेलिंग शेयर की खरीद-बिक्री का वैध तरीक़ा है लेकिन इसमें जोखिम बहुत होता है. हालांकि, जोखिम का अनुमान लगाकर सही रणनीति के साथ की गई शॉर्ट सेलिंग में मुनाफ़ा भी होता है.

इसमें बहुत ज़्यादा मुनाफ़ा और नुक़सान दोनों हो सकते हैं. नुक़सान तब हो सकता है जब शेयर के दाम घटने के बजाए बढ़ जाएं तो शॉर्ट सेलर को उन्हें ऊंची कीमत पर खरीदकर उधार के शेयर वापस करने पड़ेंगे.

इसका इस्तेमाल अधिकतर विशेषज्ञ करते हैं जो इसमें गहन विश्लेषण और शोध कर पाते हैं. साथी ही जिनमें नुक़सान सहने की क्षमता होती है.

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शॉर्ट सेलर शेयर खरीदने की बजाय उधार क्यों लेता है?

जब शेयर खरीदते हैं तो आप उसके लिए एक तय कीमत का भुगतान करते हैं. वहीं, जब आप शेयर उधार लेते हैं तो इसमें सिर्फ़ शेयर लौटाने होते हैं और आप शेयर के दामों में हुए बदलावों से पूरा मुनाफ़ा कमा सकते हैं.

इनिशियल पब्लिक ऑफरिंग (आईपीओ) क्या है?

जब एक निजी कंपनी पैसा जुटाना चाहती है तो वह लोगों को अपने शेयर बेचती है. ये प्रकिया पूरी तरह से विनियमित होती है और किसी कंपनी के पहली बार अपने शेयर बेचने को ही इनिशियल पब्लिक ऑफ़रिंग या मेडेन ऑफ़र कहा जाता है.

आईपीओ के बाद कंपनी स्टॉक एक्सचेंज में लिस्ट कर ली जाती है जिस पर ट्रेडिंग हो सकती है.

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फॉलो-ऑन पब्लिक ऑफ़रिंग (एफ़पीओ) क्या है?

पहले से ही स्टॉक एक्सचेंज में लिस्ट या आईपीओ वाली कोई कंपनी अगर पैसा जुटाना चाहती है तो वो फिर से अपने नए शेयरों को लोगों के बीच बिक्री के लिए लाती है.

इसे फॉलो-ऑन पब्लिक ऑफ़रिंग कहते हैं. ये पैसा अमूमन कर्ज़ भुगतान के लिए या फंड बढ़ाने के लिए इकट्ठा किया जाता है.

आईपीओ के मुक़ाबले एफ़पीओ में कम जोखिम होता है क्योंकि कंपनी की वित्तीय स्थिति की जानकारी पहले से सार्वजनिक होती है.

शेल कंपनी क्या है?

शेल कंपनी उसे कहते हैं जो सिर्फ़ कागज़ों पर मौजूद होती है लेकिन वो कोई कारोबार नहीं करती. भारत में आपके पास शेल कंपनी होना गैर-क़ानूनी नहीं है क्योंकि ये वैध तरीक़े से कई व्यवसायिक उद्देश्यों में काम आ सकती है.

हालांकि, कई बार शेल कंपनियों का इस्तेमाल अवैध तरीक़े से भी होता है जैसे कर देने से बचने और स्टॉक से छेड़छाड़ के लिए. इनका वैध इस्तेमाल भी होता है जैसे अधिग्रहण और पब्लिक लिस्टिंग में किसी कारोबार के मालिकाना हक की जानकारी गुमनाम रखने के लिए.

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शेयर की कीमतों से या बाज़ार से छेड़छाड़ क्या है?

किसी भी शेयर की कीमत उसकी आपूर्ति और मांग पर निर्भर करती है. अगर ज़्यादा लोग किसी शेयर को खरीदना चाहते हैं यानी उसकी मांग ज़्यादा होती है तो उसे बेचा (आपूर्ति करना) जाने लगता है और उसके दाम बढ़ जाते हैं.

वहीं, किसी शेयर की मांग कितनी बढ़ेगी ये कंपनी की बुनियाद और उसके प्रदर्शन से जुड़ी होती है. अगर कोई कंपनी अच्छा प्रदर्शन करती है या उसके अच्छा करने की संभावना होती है तो उसके शेयरों की मांग बढ़ जाती है जिससे की उनकी कीमत भी बढ़ जाती है.

वैसे तो शेयरों की मांग, आपूर्ति और दाम घटने-बढ़ने की प्रक्रिया स्वाभाविक तौर पर चलती रहती है लेकिन जब इसमें जानबूझकर दखल दिया जाता है तो उसे शेयर की कीमत से छेड़छाड़ करना कहते हैं.

शेयर की कीमत से छेड़छाड़ करने का मतलब है कि जब कोई शेयर के दाम बढ़ाने या घटने के लिए बनावटी तरीक़े से शेयर की मांग या आपूर्ति को प्रभावित करता है.

ऐसा कंपनी के बारे में गलत जानकारी फैलाकर या नकली मांग-आपूर्ति दिखाने के लिए अकेले किसी कंपनी के शेयर खरीद-बिक्री करके किया जा सकता है. इससे शेयर के दाम बढ़वाए य घटवाए जा सकते हैं.

ऐसा करना गैर-क़ानूनी है लेकिन इसे पकड़ पाना और साबित करना बहुत मुश्किल है. शेल कंपनियों और अनैतिक ब्रोकर के ज़रिए शेयर की कीमत से छेड़छाड़ की जा सकती है.

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मार्केट कैपिटलाइजेशन या कंपनी की मार्केट वैल्यू क्या है?

मार्केट कैपिटलाइजेशन (बाज़ार पूंजीकरण) या किसी कंपनी की मार्केट वैल्यू (बाज़ार मूल्य) उस कंपनी के सभी शेयरों की कुल कीमत होती है.

इसे एक शेयर की कीमत को बाकी शेयरों से गुणा करके निकाला जाता है. उदाहरण के लिए, एक कंपनी के 10 करोड़ शेयर हैं और एक शेयर की कीमत 100 रुपये है तो इस कंपनी की मार्केट कैपिटलाइजेशन या मार्केट वैल्यू 1000 करोड़ रुपये होगी.

निवेशक मार्केट कैपिटलाइजेशन के ज़रिए कंपनी में निवेश के जोखिम और फायदे का आकलन करते हैं. कंपनी की मार्केट कैपिटलाइजेशन में बदलाव उसके शेयरों की कीमत में होने वाले बदलावों से जुड़ा होता है. लेकिन, नए शेयर जारी करने पर भी कैपिटलाइजेशन में बदलाव आ सकता है.

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अगर मार्केट कैपिटलाइजेशन या मार्केट वैल्यू अचानक गिर जाए तो?

कंपनियां अक्सर फंड जुटाने के लिए मार्केट कैपिटलाइजेशन या मार्केट वैल्यू का गारंटी के तौर पर इस्तेमाल करती हैं. जब कैपिटलाइजेशन गिरता है तो कंपनी को गारंटी की कीमत में आई गिरावट को पूरा करने के लिए अतिरिक्त फंड देना ज़रूरी होता है.

टैक्स हैवन क्या होता है?

टैक्स हैवन ऐसे देश या स्वतंत्र इलाक़े को कहा जाता है जहां विदेशी कंपनियों और व्यक्ति को बिल्कुल कर नहीं देना पड़ता या बहुत ही कम कर देना होता है.

वैसे तो टैक्स हैवन वैध होते हैं लेकिन, कंपनियां या अमीर लोग कर बचाने, धन शोधन और धोखाधड़ी के लिए इनका अवैध तरीक़े से इस्तेमाल करते हैं.

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