अदानी 'साम्राज्य' में आए भूचाल पर विदेशी मीडिया ने क्या लिखा है

गौतम अदानी

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अदानी समूह ने बुधवार शाम को भारतीय बाज़ार में उतारा अपना एफ़पीओ (फ़ॉलो-ऑन पब्लिक ऑफ़र) वापस ले लिया और कहा कि निवेशकों को इसमें लगाए गए पैसे वापस किए जाएंगे.

कंपनी ने एक बयान जारी कर कहा, "आज स्टॉक मार्केट में कंपनी के शेयरों में गिरावट देखी गई. इस तरह की अभूतपूर्व स्थिति को देखते हुए बोर्ड ने ये तय किया है कि इस एफ़पीओ के साथ आगे बढ़ना नैतिक तौर पर ग़लत होगा. निवेशकों का हित हमारे लिए सर्वोपरि है, उन्हें हम किसी तरह के संभावित नुक़सान से बचाना चाहेंगे. ऐसे में बोर्ड ने इस एफ़पीओ के साथ आगे न बढ़ने का फ़ैसला किया है."

कंपनी ने कहा कि एक बार बाज़ार में ठहराव आ जाए उसके बाद कंपनी अपनी कैपिटल मार्केट स्ट्रैटेजी पर फिर से विचार करेगी.

बुधवार को देश की संसद में बजट सत्र चल रहा था और सवेरे से शेयर बाज़ार में तेज़ी देखी जा रही थी, लेकिन रात-होते-होते अदानी का एफ़पीओ वापस लेने की ख़बर से जैसे बाज़ार में तहलका मच गया.

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गुरुवार को ये ख़बर भारतीय अख़बारों में छाई रही. अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने भी अडानी एंटरप्राइज़ेज़ में आए भूचाल की ख़बर को प्राथमिकता से छापा है.

अधिकतर मीडिया रिपोर्ट्स में अदानी एंटरप्राइज़ेज़ लिमिटेड के इस फ़ैसले को हैरानी से देखा जा रहा था, लेकिन ये भी कहा जा रहा था कि भारत के अरबपति अदानी के समर्थन में आए थे और अबू धाबी के शाही परिवार से जुड़ी एक कंपनी ने भी ऐसे वक्त कंपनी में निवेश की घोषणा की थी.

समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने इसे अदानी के लिए बड़ा झटका बताया है और कहा है कि अदानी समूह का ये एफ़पीओ 2.5 अरब डॉलर मूल्य का यानी 20 हज़ार करोड़ रुपये का था.

एजेंसी ने न्यूयॉर्क स्थित ओएएनडीए ब्रोकरेज कंपनी के एक वरिष्ठ बाज़ार विश्लेषक एडवर्ड मोया के हवाले से कहा है कि 'अदानी कंपनी को क़रारा झटका लगा है, ऐसे में एफ़पीओ वापस लेना हैरानी वाली बात है. ये एफ़पीओ ये दिखाने की कोशिश थी कि कंपनी अभी भी भरोसेमंद बनी हुई है और निवेशकों के लिए इसमें निवेश फ़ायदे का सौदा है.'

एडवर्ड ने रॉयटर्स से कहा कि "शेयर बाज़ार में एफ़पीओ उतारने, उसे बेचने के लिए इतनी मुश्किलों से गुज़रने और फिर उसे आख़िरी घड़ी में रद्द कर देने से कई तरह के और सवाल भी उठते हैं."

हालांकि एजेंसी ने जब इस पर ट्रेडिंग कंपनी क्रॉससीज़ कैपिटल सर्विसेस के मुख्य अधाकारी राजेश बहेटी से बात की तो उन्होंने कहा, "मैं नहीं जानता कि कम वक्त में बाज़ार किस तरह प्रतिक्रिया देते हैं. लेकिन ये क़दम कंपनी की रेपुटेशन बढ़ाने के लिए लिया गया है क्योंकि निवेशकों को शेयर अलॉट हों, उससे पहले ये 30 फ़ीसदी के नुक़सान में जा रहे थे."

एजेंसी ने कहा है कि ये एफ़पीओ कंपनी के लिए दो स्तर पर महत्वपूर्ण था. पहला तो ये कि कंपनी पर क़र्ज़ कम करने के लिए ये ज़रूरी था. दूसरा, कई जानकार मानते हैं कि ये कंपनी पर निवेशकों का भरोसा बनाए रखने की भी क़वायद थी.

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कब-कब क्या-क्या हुआ?

  • 24 जनवरी 2023 - हिंडनबर्ग ने अदानी से जुड़ी अपनी रिपोर्ट 'अदानी ग्रुपः हाउ द वर्ल्ड्स थर्ड रिचेस्ट मैन इज़ पुलिंग द लार्जेस्ट कॉन इन कॉर्पोरेट हिस्ट्री' जारी की.
  • 26 जनवरी 2023 - अदानी ने हिंडनबर्ग की रिपोर्ट को सिरे से खारिज किया. कंपनी ने कहा कि वो क़ानूनी कार्रवाई के बारे में विचार कर रही है.
  • 26 जनवरी 2023 - हिंडनबर्ग ने कहा कि वो अपनी रिपोर्ट पर क़ायम है और क़ानूनी कार्रवाई का स्वागत करेगी.
  • 27 जनवरी 2023 - अदानी ने 2.5 अरब डॉलर का एफ़पीओ बाज़ार में उतारा.
  • 30 जनवरी 2023 - इस दिन तक एफ़पीओ को केलव 3 फ़ीसदी सब्स्क्रिप्शन मिला. इसी दिन अबू धाबी की कंपनी इंटरनेशनल होल्डिंग कंपनी ने कहा कि वो अपनी सब्सिडियरी ग्रीन ट्रांसमिशन इन्वेस्टमेंट होल्डिंग आरएससी लिमिटेड के ज़रिए अदानी के एफ़पीओ में 40 करोड़ डॉलर का निवेश करेगी.
  • 31 जनवरी 2023 - एफ़पीओ की बिक्री इस दिन बंद होनी थी. इसी दिन ख़बर आई कि नॉन इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर के तौर पर सज्जन जिंदल और सुनील मित्तल समेत कुछ जाने-माने अरबपतियों ने कंपनी के 3.13 करोड़ शेयर खरीदने के लिए बोली लगाई है.
  • 31 जनवरी 2023 - इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू से मुलाक़ात करने के लिए गौतम अदानी हाइफ़ा बंदरगाह पहुंचे थे. हिंडनबर्ग रिपोर्ट आने के बाद पहली बार वो यहां सार्वजनिक तौर पर देखे गए.
  • 1 फ़रवरी 2023 - अदानी कंपनी ने अपना एफ़पीओ वापस ले लिया.
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क़रीब 30 कंपनियों को हिंडनबर्ग ने बनाया निशाना

न्यूयॉर्क टाइम्स ने लिखा है कि बुधवार को एफ़पीओ की बिक्री बंद होनी थी. लेकिन उसी दिन इसे रद्द कर दिया गया. रद्द होने से पहले एफ़पीओ पूरी तरह सब्स्क्राइब हो चुका था और अबू धाबी के शाही परिवार से जुड़ी इंटरनेशनल होल्डिंग कंपनी जैसी सरकारी संस्थाओं और स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया के नियंत्रण में वाले फ़ंड्स ने इसमें निवेश किया था.

बर्नहार्ड वॉर्नर ने न्यूयॉर्क टाइम्स में लिखा कि हिंडनबर्ग एक 'ऐक्टिविस्ट शॉर्ट सेलिंग' निवेशक कंपनी है जिसका दावा है कि वो ऐसी कंपनियों को निशाना बनाती है जिन पर उन्हें धांधली का शक़ होता है और उनके फ़र्जीवाड़े को सामने लाती है.

रिपोर्ट के अनुसार, जब शेयर बाज़ार में कंपनी के शेयरों की क़ीमत हो जाती है तो शॉर्ट सेलर्स इसका फ़ायदा उठाते हैं.

वॉर्नर लिखते हैं कि हिंडनबर्ग अब तक 30 कंपनियों को अपना निशाना बना चुकी है. इनमें इलेक्ट्रिक कार बनाने वाली कंपनी निकोला भी शामिल है. हिंडनबर्ग ने कंपनी में धांधली से जुड़े सबूत सामने रखे थे जिसके बाद ये फ़र्म चर्चा में आई थी.

रिपोर्ट के सामने आने के बाद निकोला के संस्थापक ट्रेवर मिल्टन पर मुक़दमा चला और उन्हें निवेशकों के साथ धोखा करने का दोषी पाया गया. 2022 अक्तूबर में उन्हें कार्यकारी चेयरमैन के पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा था.

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वॉशिंगटन पोस्ट का तंज़- दिखा भाईचारा

वॉशिंगटन पोस्ट ने अपनी रिपोर्ट में अदानी के बचाव में सामने आए अरबपतियों की ख़बर पर लिखा कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में अब अरबपतियों का भाईचारा दिख रहा है. जब एक मुश्किल में फंसता है तो दूसरे उसे बचाने के लिए हाथ बढ़ा देते हैं.

वॉशिंगटन पोस्ट ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि अबू धाबी की कंपनी ने अदानी में 40 करोड़ के निवेश का एलान किया, लेकिन ये कपंनी पहले भी अदानी में निवेश करती रही है. लेकिन इस बार आख़िरी घड़ी में भारत के अरबपति भी अदानी की मदद के लिए साथ आए. इनमें स्टील कंपनी जेएसडब्ल्यू के मालिक सज्जन जिंदल, एयरटेल के मालिक सुनील मित्तल जैसे नाम शामिल थे.

लेख में कहा गया है, "असल संदेश आ रहा है अदानी के बचाव में आए अरबपतियों से. इसके पीछे क्या कारण है ये नहीं पता. अदानी कह सकते हैं कि प्रधानमंत्री से उन्होंने कभी किसी तरह का फ़ेवर नहीं लिया, लेकिन उनके साथ अदानी की नज़दीकी किसी से छिपी नहीं है. अमीर लोग सरकार के साथ बेहतर संबंध बनाकर चलना चाहते हैं."

"जो बात परेशान करने वाली है वो ये है कि ऐसा लगता है कि अदानी के बचाव में कुछ अरबपति सामने आए हैं और उन्हें शायद ये लगता है कि लंबे वक्त में उनके हितों की रक्षा करने का रास्ता ये है कि वो विदेशी एजेंसी के हमले से जूझते अपने लोगों की मदद के लिए खड़े हों."

वॉल स्ट्रीट जर्नल की एक रिपोर्ट के अनुसार, अर्थव्यवस्था को गति देने और सतत ऊर्जा की तरफ़ बढ़ने की मोदी सरकार की योजनाओं में अदानी की महत्वपूर्ण भूमिका है.

अगले एक दशक में गौतम अदानी सतत ऊर्जा के क्षेत्र में 70 अरब डॉलर के निवेश की बात कर चुके हैं. वो सोलर सेल, विंड टरबाइन बनाने वाली तीन कंपनियां बनाने और देश के उत्तर-पश्चिमी रेगिस्तान में सोलर फ़ार्म बनाने की योजना पर काम कर रहे हैं.

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अदानी पर उठ रहे सवाल

फ़ोर्ब्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, अदानी के एफ़पीओ में लंदन की कंपनी की भारतीय शाखा अलारा कैपिटल इंडिया प्राइवेट लिमिटेड और भारत की एक ब्रोकरेज कंपनी मोनार्क नेटवर्थ कैपिटल के नाम गारंटर के तौर पर दिए गए हैं (अंडरराइटर्स).

इनमें से अलारा कैपिटल के इंडिया ऑपर्च्यूनिटीज़ फ़ंड के पास अदानी एंटरप्राइज़ेज़ लिमिटेड समेत अदानी की दूसरी कंपनियों के क़रीब तीन अरब डॉलर के शेयर हैं. हिंडनबर्ग की रिपोर्ट में आरोप है कि भारतीय नियामकों की नज़र से बच कर स्टॉक जमा करने के लिए इस कंपनी का इस्तेमाल किया जाता है.

वहीं हिंडनबर्ग रिपोर्ट के अनुसार, साल 2016 से मोनार्क नेटवर्थ कैपिटल में कुछ हिस्सेदारी अदानी प्रोपर्टीज़ प्राइवेट लिमिटेड की है.

फ़ोर्ब्स की इस रिपोर्ट में जॉन हयात लिखते हैं कि अलारा कैपिटल और मोनार्क नेटवर्थ का नाम इस मामले में जाने के बाद ये सवाल उठ रहे हैं कि क्या एफ़पीओ के 20 हज़ार करोड़ के टार्गेट को पूरा करने में अदानी के निजी फ़ंड्स का भी इस्तेमाल हुआ.

फ़ोर्ब्स लिखता है कि सिटीग्रुप में पूर्व इन्वेस्टमेंट बैंकर रहे टिम बकले कहते हैं, "अदानी इस मामले को केवल एक ही तरीके से सुलझा सकते हैं, उन्हें बताना होगा कि किसने कितने शेयर्स ख़रीदे."

वहीं द गार्डियन ने लिखा है कि एफ़पीओ के रद्द होने के बाद अब ये सवाल उठ खड़ा हुआ है कि ऑस्ट्रेलिया के क्वींसलैंड में में कार्माइकल कोयले की ख़ान और रेल परियोजना चलाने वाली ये कंपनी अपना क़र्ज़ कैसे चुकाएगी.

गार्डियन ने ब्लूमबर्ग के हवाले से लिखा है कि बैंक अब कंपनी के स्थायित्व को लेकर चिंतित हैं और क्रेडिस सुईस अब कोलैटरल के तौर पर अदानी के बॉण्ड्स स्वीकार नहीं कर रही. इसका मतलब ये है कि कंपनी के जारी किए बॉन्ड्स का मूल्य बेहद कम हो गया है और कंपनी के सामने बड़ी मुश्किल मुंह बाए खड़ी है.

वाइब्रेट गुजरात ग्लोबल समिट

इमेज स्रोत, Hindustan Times via Getty Images

इमेज कैप्शन, 18 जनवरी 2019 की ये तस्वीर वाइब्रेट गुजरात ग्लोबल समिट की है

निक्केई एशिया ने रीसर्च कंपनी जेफ़रीज़ के हवाले से लिखा है कि वित्त वर्ष मार्च 2022 के ख़त्म होने तक अदानी के ऊपर कुल 1.6 ट्रिलियन (1600 अरब रुपये) का क़र्ज़ हो चुका है. इनमें से सबसे अधिक 900 अरब से 1200 अरब तक का क़र्ज़ अदानी ग्रीन एनर्जी, अदानी पावर और अदानी पोर्ट्स पर है.

निक्केई की रिपोर्ट के अनुसार, एफ़पीओ से जो पैसा मिलता उसका आधा कंपनी के ग्रीन हाइड्रोजन प्रोजेक्ट्स, एयरपोर्ट सुविधाओं और ग्रीनफ़ील्ड एक्सप्रेस के विकास में इस्तेमाल होना था, जबकि उसके 20 फ़ीसदी का इस्तेमाल क़र्ज़ चुकाने में किया जाना था.

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हिंडनबर्ग की रिपोर्ट में क्या है?

24 जनवरी 2023 को अमेरिकी फ़ॉरेंसिक फ़ाइनेंशियल कंपनी हिंडनबर्ग ने अदानी समूह को लेकर एक रिपोर्ट जारी की जिसमें समूह के काम करने के तरीके को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े किए गए.

'अदानी ग्रुपः हाउ द वर्ल्ड्स थर्ड रिचेस्ट मैन इज़ पुलिंग द लार्जेस्ट कॉन इन कॉर्पोरेट हिस्ट्री' नाम की यह रिपोर्ट 24 जनवरी को प्रकाशित हुई थी.

इसके दो दिन बाद भारतीय शोयर बाज़ार में कंपनी अपना अब तक का सबसे बड़ा 20 हज़ार करोड़ रुपये का एफ़पीओ (सेकेंड्री शेयर यानी फ़ॉलो-ऑन पब्लिक ऑफ़र) जारी करने वाली थी.

रिपोर्ट में अरबपति कारोबारी गौतम अदानी के नेतृत्व वाले अदानी ग्रुप से 88 सवाल पूछे गए थे जिनमें से कई बेहद गंभीर हैं और सीधे-सीधे अदानी ग्रुप की कॉर्पोरेट गवर्नेंस पर निशाना साधते हैं.

अदानी समूह ने इस रिपोर्ट को ख़ारिज करते हुए इसे 'दुर्भावनापूर्ण' और 'चुनिंदा ग़लत जानकारी' पेश करने का . कंपनी ने इसे 'भारत और भारतीय संस्थाओं की स्वतंत्रता, उनकी गुणवत्ता और उनकी ईमानदारी पर सोचा-समझा हमला' कहा था.

रिपोर्ट के सार्वजनिक होते ही अदानी ग्रुप के निवेशकों में खलबली मच गई. ग्रुप के शेयरों पर बिकवाल हावी हो गए और देखते ही देखते अदानी ग्रुप के निवेशकों और प्रमोटर्स के लाखों करोड़ रुपये की बाज़ार पूंजी स्वाहा हो गई.

इसका असर कंपनी के एफ़पीओ पर पड़ा और इसमें खुदरा निवेशकों ने निवेश नहीं किया.

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