एससीओ क्या अमेरिका विरोधी गुट बन रहा है, भारत के लिए कितनी बड़ी चुनौती?

मोदी और पुतिन

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इमेज कैप्शन, साल 2017 में अस्ताना में हुए एससीओ के सम्मेलन में पुतिन और मोदी
    • Author, इक़बाल अहमद
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) का दो दिवसीय शिखर सम्मेलन शुक्रवार को उज़्बेकिस्तान के शहर समरकंद में समाप्त हो गया.

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सम्मेलन में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और तुर्की के राष्ट्रपति तैय्यप अर्दोआन समेत कई नेताओं से मुलाक़ात की.

लेकिन चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ से उनकी बातचीत नहीं हुई.

कोविड महामारी के बाद पहली बार एससीओ सम्मेलन में सभी सदस्य देशों के नेता मौजूद रहे. इससे पहले 2019 में बिश्केक में हुए सम्मेलन में सभी नेता मौजूद थे.

समरकंद में हुए सम्मेलन में मोदी और पुतिन की मुलाक़ात की चर्चा तो हो रही है लेकिन इस बात को लेकर भी चर्चा तेज़ है कि क्या एससीओ धीरे-धीरे अमेरिका विरोधी देशों का एक गुट बनता जा रहा है और अगर यह बात सच है तो फिर यह भारतीय विदेश नीति के लिए कितनी बड़ी चुनौती है.

अमेरिका विरोधी गुट कहने वाले लोग यह तर्क दे रहे हैं कि अमेरिका विरोधी चीन और रूस तो एससीओ में शामिल प्रमुख देश हैं ही, लेकिन ईरान का भी इस गुट में शामिल होना इस बात का पक्का सबूत है कि एससीओ एक अमेरिका या पश्चिम विरोधी गुट बन रहा है.

ईरान फिलहाल इस संगठन में बतौर पर्यवेक्षक शामिल है. समरकंद में हुए एससीओ के सम्मेलन से पहले ईरान के विदेश मंत्री ने कहा कि संगठन का पूर्ण सदस्य बनने के लिए ईरान के मेमोरेंडम ऑफ़ कमिटमेंन्ट पर दस्तख़त कर दिए हैं. इसके बाद अगले साल वो इस संगठन का पूर्ण सदस्य बन जाएगा.

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शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) क्या है?

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एससीओ की बुनियाद 1996 में रखी गई थी जब चीन, कज़ाख़स्तान, किर्गिस्तान, रूस और ताजिकिस्तान ने मिलकर शंघाई-फ़ाइव का गठन किया था.

बाद में उज़्बेकिस्तान इसमें शामिल हो गया और 2001 में एससीओ ने आधिकारिक रूप से जन्म लिया.

साल 2017 में भारत और पाकिस्तान भी इसमें शामिल हो गए और अब ईरान का भी इसमें पूर्ण सदस्य की हैसियत से शामिल करने की प्रक्रिया शुरू हो गई है.

पूर्ण सदस्य देशों के अलावा कई देश पर्यवेक्षक और डायलॉग पार्टनर की हैसियत से भी इसके हिस्सा हैं.

फिलहाल आठ देश, भारत, चीन, रूस, पाकिस्तान, कज़ाख़स्तान, किर्गिस्तान, ताज़िकिस्तान और उज़्बेकिस्तान इसके पूर्ण सदस्य हैं.

अफ़ग़ानिस्तान, बेलारूस, ईरान और मंगोलिया इसमें देश पर्यवेक्षक के तौर पर शामिल हैं.

अज़रबैजान, आर्मिनिया, कंबोडिया, नेपाल, तुर्की और श्रीलंका छह डॉयलॉग पार्टनर हैं. वहीं सऊदी अरब, मिस्र, क़तर, बहरीन, मालदीव, यूएई, म्यांमार नए डॉयलॉग पार्टनर हैं.

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एससीओ सम्मेलन

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अमेरिका विरोधी कई देश एससीओ के सदस्य

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समरकंद में एससीओ का यह शिखर सम्मेलन ऐसे समय में हुआ है जब रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध जारी है. ताइवान के मुद्दे पर और ख़ासकर अमेरिकी संसद की स्पीकर नैन्सी पेलोसी के विवादास्पद ताइवान दौरे के कारण चीन और अमेरिका के बीच रिश्ते बेहद तनावपूर्ण हो गए हैं. दूसरी तरफ ईरान और अमेरिका में भी परमाणु समझौते को लेकर कोई ख़ास प्रगति नहीं हो पा रही है.

समरकंद सम्मेलन से ठीक एक महीने पहले 19 अगस्त को ताशकंद में एससीओ देशों के सुरक्षा काउंसिल सचिवों की बैठक हुई थी.

इस बैठक में रूस के सुरक्षा काउंसिल के सचिव निकोलाई पेत्रोशेव ने कहा था कि रूस चाहता है कि एससीओ एक संगठन के तौर पर अमेरिका और उसके सहयोगियों के विरोध का केंद्र बने. पेत्रोशेव ने अपने भाषण में बार-बार वैश्विक टकराव का ज़िक्र किया था और उनके अनुसार इस टकराव में रूस और एससीओ के सदस्य देश एक तरफ़ होंगे.

लेकिन क्या इस आधार पर एससीओ को अमेरिका विरोधी गुट कहा जा सकता है?

भारत के पूर्व राजनयिक पिनाक रंजन चक्रवर्ती ऐसा नहीं मानते हैं.

वो बीबीसी से कहते हैं, "पश्चिमी देशों का यह एक रवैया रहा है. वो चाहें जो बना लें. नेटो बना लें. जो मर्ज़ी संगठन बना लें. लेकिन दूसरे लोग अगर कुछ बनाएं तो वो पश्चिम-विरोधी हो जाता है. यह उनकी पुरानी चिंता है जो अब ख़त्म हो जानी चाहिए. दुनिया बदल गई है. एससीओ कोई अमेरिका-विरोधी गुट नहीं है. रूस और चीन उसमें ज़रूर है लेकिन जब एससीओ बना था तब यूक्रेन से किसी का युद्ध नहीं हो रहा था."

ईरान के एससीओ में शामिल होने पर पिनाक कहते हैं, "ईरान को एससीओ में क्यों नहीं लेना चाहिए. ईरान पर प्रतिबंध तो अमेरिका और यूरोप ने लगाए हैं, एससीओ के किसी देश ने तो प्रतिबंध नहीं लगाया है."

ऐसे में भारत का रुख़ क्या होगा, क्या उसके लिए कश्मकश की स्थिति होगी? इस पर वो कहते हैं, "भारत एससीओ में भी रहेगा और पश्चिमी देशों के गुट में भी रहेगा. भारत अपने हित में काम करेगा और पश्चिमी देश यह नहीं बता सकते कि भारत के हित में क्या है."

पिनाक चक्रवर्ती कहते हैं कि अमेरिका इसे लोकतंत्र बनाम तानाशाही का मुद्दा बनाकर पेश करता है और इस आधार पर भारत को अपनी ओर खींचने की कोशिश करता है.

लेकिन उनके अनुसार भारत इस तरह से चीज़ों को नहीं देखता है. वो कहते हैं, "ऐसा करके क्या वो दूसरे शीत युद्ध की तरफ़ जाना चाहते हैं. भारत मानता है कि यह दुनिया मल्टीपोलर है. भारत सबके साथ अच्छे रिश्ते बनाकर रहेगा."

लेकिन क्या भारत के लिए यह सब करना आसान होगा और भारत के सामने यह कितनी बड़ी चुनौती है?

इस सवाल के जवाब में किंग्स कॉलेज लंदन में अंतरराष्ट्रीय संबंधों के प्रोफ़ेसर और फ़िलहाल दिल्ली स्थित ओआरएफ़ से जुड़े हर्ष पंत कहते हैं, "एससीओ हो या ना हो भारत के लिए हमेशा से यह एक चुनौती रही है. यूक्रेन इसकी बेहतरीन मिसाल है."

हर्ष पंत के अनुसार रूस और चीन ऐसा ज़रूर चाहेंगे कि एससीओ को अमेरिका विरोधी गुट की तरह पेश किया जाए लेकिन यह इतना आसान नहीं है क्योंकि एससीओ में मौजूद भारत और सेंट्रल एशिया के कई देश ऐसा नहीं चाहते हैं.

अपनी बात को और स्पष्ट करते हुए प्रोफ़ेसर पंत कहते हैं, "रूस और चीन जब कुछ बोलते हैं तो उनका टोन बहुत ही अमेरिका विरोधी दिखता है लेकिन जब एससीओ का आधिकारिक बयान आता है तो वो उतना अमेरिका विरोधी नहीं होता है."

इब्राहीम रईसी और पुतिन

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इमेज कैप्शन, 15 सितंबर 2022 को समरकंद में ईरान के राषिट्रपति इब्राहीम रईसी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की मुलाक़ात हुई
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एससीओ साल 2001 में बना.ये एक राजनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा संगठन है.

पश्चिमी देशों के संगठनों के मुक़ाबले ये एशियाई देशों का संगठन है.

सबसे पहले संगठन में तीन बातों पर ज़ोर दिया गया था, मध्य एशिया में आतंकवाद, अलगाववाद और चरपमंथ के ख़िलाफ़ मिल कर काम करना. इसमें बाद में आर्थिक सहयोग को भी शामिल किया गया.

साल 2017 में अस्ताना में हुए सम्मेलन में भारत और पाकिस्तान को इसके पूर्ण सदस्य का दर्जा दिया गया.

एससीओ की ऑफ़िशियल वर्किंग लैंग्वेज रूसी और चीनी है.

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भारत के लिए स्थिति जटिल

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कई देशों में राजदूत रह चुके और फ़िलहाल विवेकानंद इंटरनेशल फ़ाउंडेशन से जुड़े पूर्व राजनयिक अनिल त्रिगुनायत भी मानते हैं कि पश्चिमी देशों में ऐसी सोच ज़रूर है कि एससीओ का गठन उनके विरोध में किया गया है लेकिन सच्चाई यह नहीं है.

उनके अनुसार एससीओ एक बढ़ता हुआ मज़बूत क्षेत्रीय संगठन है और अगर आज रूस चीन के बहुत ज़्यादा क़रीब जाता हुआ दिख रहा है तो उनके अनुसार इसके लिए बहुत हद तक अमेरिका ख़ुद ज़िम्मेदार है.

बीबीसी से बातचीत में पूर्व राजनयिक त्रिगुनायत कहते हैं, "एससीओ में रूस, चीन और ईरान के अलावा भी कई देश हैं. इन देशों में अंदरुनी विरोधाभास है. भारत और चीन के संबंध अच्छे नहीं हैं. भारत और पाकिस्तान के संबंध बहुत ख़राब हैं. तुर्की से भी भारत के संबंध में काफ़ी कमी आई है. लेकिन एससीओ को उस वक़्त तक अमेरिका विरोधी गुट नहीं कहा जा सकता है जब तक भारत उसमें है."

अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए त्रिगुनायत कहते हैं, "अगले साल भारत एससीओ और जी-20 के अध्यक्ष होने के नाते इन सम्मेलनों का मेज़बान होगा. भारत सभी देश के नेताओं को दावत देगा. हमें किसी को सफ़ाई देने की ज़रूरत नहीं है. रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध में भारत की कूटनीतिक स्वायत्ता साफ़ दिखती है. भारत समझदारी की बात करने वाला देश है जिसकी बात गंभीरता से सुनी जाती है."

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लेकिन वॉशिंगटन स्थित हडसन इंस्टीट्यूट की रिसर्च फ़ेलो अपर्णा पांडे की राय इससे थोड़ी अलग है.

वे कहती हैं कि जब क्वाड का गठन हुआ था तो चीन उसे 'एशियन नेटो' कहता था.

एससीओ पर सवाल उठाते हुए वो कहती हैं, "एससीओ उस तरह से आगे नहीं बढ़ पाया है जैसा शायद चीन और रूस ने सोचा होगा. एससीओ, कभी नेटो जैसा भी नहीं बन पाया. यूरोपीय यूनियन जितना पैसा देता है एससीओ उतना नहीं देता, एडीबी के बराबर भी नहीं पैसा देता है. यह कोई ऐसा पैक्ट भी नहीं बना है जिससे दुनिया डरती है. हां रूस और चीन के बीच रिश्ते ज़रूर मज़बूत हो रहे हैं."

लेकिन ऐसे में भारत के सामने क्या चुनौती है, इस सवाल के जवाब में वो कहती हैं, "भारत के लिए अपनी कटूनीतिक स्वायत्ता बनाए रखना बहुत बड़ी चुनौती है. शीत युद्ध का समय भारत के लिए ज़्यादा आसान था. दोनों (अमेरिका और सोवियत संघ) में से कोई भी हमारी ज़मीन नहीं चाहता था. लेकिन हमारी ज़मीन चाहता है. सिर्फ़ यही नहीं चीन भारत के आसपास के देशों को पैसा और हथियार दे रहा है. वो चाहता है कि वो उनकी तरफ़ आएं."

उनके अनुसार आज का रूस उतना शक्तिशाली नहीं है जितना सोवियत संघ हुआ करता था और मौजूदा रूस चीन के सामने न तो खड़ा होना चाहता है और न ही ऐसा करने की उसकी स्थिति है.

उनके अनुसार भारत अपने 60-70 फ़ीसद हथियार रूस से ख़रीदता है इसलिए भारत रूस को ख़फ़ा नहीं कर सकता है लेकिन समस्या यह है कि रूस और चीन अच्छे मित्र हैं.

भारत के लिए बेहतर रास्ता क्या होना चाहिए होगा, इस पर वो कहती हैं, "इस समय भारत के पास न आर्थिक मज़बूती है और न ही सैन्य ताक़त है कि वो चीन के ख़िलाफ़ खड़ा हो सके और हम अब पहले की तरह गुटनिरपेक्ष भी नहीं हो सकते. इसलिए शॉर्ट टर्म में तो हमारे पास कोई रास्ता नहीं है. हां, यह ज़रूर है कि हम धीरे-धीरे आत्मनिर्भर बनें."

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