जी-20 शिखर सम्मेलन में साझा बयान जारी करना कैसे भारत के लिए है चुनौती

मोदी

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    • Author, विकास पांडेय
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़, दिल्ली

भारत ने जी-20 को एक ऐसे कूटनीतिक आयोजन में बदल दिया है जो इससे पहले कभी नहीं देखा गया.

बीते साल 60 भारतीय शहरों में 200 बैठकें आयोजित की गईं. जी-20 शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए नेताओं का दिल्ली पहुंचना जारी है. अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन, ब्रितानी प्रधानमंत्री ऋषि सुनक, जापान के प्रधानमंत्री फुमियो किशिदा, बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना और अन्य नेता दिल्ली पहुंच चुके हैं.

इस सम्मेलन के लिए दिल्ली को बड़े-बड़े होर्डिंगों और पोस्टरों से सजाया गया है. इसमें सम्मेलन में भाग लेने वाले प्रतिनिधियों के स्वागत संदेश के साथ-साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की फोटो है. ये दुनिया को गले लगाने की भारत की तत्परता को दिखा रहे हैं.

ये सारे प्रयास शिखर सम्मेलन के अंत में नेताओं की ओर से एक संयुक्त बयान जारी करने की उनकी क्षमता तक पहुंचेगा. यह अंततराष्ट्रीय चिंता के मुद्दों पर व्यापक सहमति का संकेत है.

अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी.

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क्या जारी हो पाएगा साझा बयान?

भारत सम्मेलन के अंत में एक संयुक्त बयान के लिए कड़ी मेहनत कर रहा है. अगर यह शिखर सम्मेलन बिना किसी साझा घोषणा के खत्म होता है, तो ऐसा पहली बार होगा. लेकिन जी20 के लिए यह आसान नहीं होगा, जो कई मुद्दों पर बंटा हुआ है. इनमें सबसे बड़ा मुद्दा है यूक्रेन युद्ध.

रूस-यूक्रेन युद्ध का साया पिछले साल इंडोनेशिया में हुए जी20 शिखर सम्मेलन पर भी मंडरा रहा था, लेकिन जल्दबाजी में ही सही, समूह एक साझा घोषणा जारी करने में सफल रहा था.

उसमें यूक्रेन पर जी-20 में पैदा हुए मतभेदों का ज़िक्र था. लेकिन उसके बाद से स्थितियां बदल गई हैं. रूस और चीन रियायतें देने के लिए सहमत नहीं हैं और अमेरिका के नेतृत्व वाला पश्चिम युद्ध की साफ-साफ निंदा से कम कुछ भी स्वीकार नहीं करने वाला.

रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और उनके चीनी समकक्ष शी जिनपिंग जी-20 शिखर सम्मेल में भाग नहीं ले रहे हैं. इससे फैसला लेना थोड़ा कठिन हो सकता है.

सम्मेलन में रूस का प्रतिनिधित्व उसके विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव और चीन का प्रतिनिधित्व वहां के प्रीमियर ली चियांग करेंगे. लेकिन इनके पास अपने नेताओं से सलाह-मशविरा किए बिना अंतिम समय में कोई रियायत देने की ताकत नहीं हो सकती है.

इस साल के शुरू में जी-20 के विदेश और वित्त मंत्रियों की बैठक भी बिना किसी साझा घोषणा पत्र के खत्म हो गई थी. इसके बाद भी भारत को उम्मीद है कि यूक्रेन का मुद्दा ग्लोबल साउथ और विकासशील देशों की चिंताओं को पटरी से नहीं उतारेगा, जिन पर वह चर्चा करना चाहता है.

तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन और केंद्रीय मंत्री बीके सिंह.

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क्या है विकासशील देशों की ज़रूरतें?

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दुनिया के आर्थिक उत्पादन का 85 फीसदी और अंतरराष्ट्रीय व्यापार का 75 फ़ीसदी हिस्सा जी-20 के सदस्य देशों के पास है. इन देशों में दुनिया की कुल दो-तिहाई आबादी रहती है.

भारत ने बार-बार यह कहा है कि इस समूह की उन देशों के प्रति ज़िम्मेदारी है जो जी-20 में शामिल नहीं हैं. इससे उसने खुद को ग्लोबल साउथ की आवाज़ के रूप में स्थापित किया है.

जी-20 में अफ्रीकी संघ की उपस्थिति ने विकासशील देशों की ज़रूरतों पर भारत की स्थिति को और मज़बूत किया है.

ब्रूकिंग इंस्टिट्यूशन की सीनियर फेलो तन्वी मदान कहती हैं, ''कर्ज, खाद्य पदार्थों और ऊर्जा की बढ़ती कीमतें जैसे मुद्दे युद्ध और महामारी के कारण और भी गंभीर हो गए हैं. भारत और जी-20 में शामिल अन्य विकासशील देश चाहेंगे कि औद्योगिक अर्थव्यवस्थाएं इन मुद्दों के समाधान के लिए पूंजी का योगदान करें."

लेकिन इन मुद्दों पर सहमति भी तय नहीं है. उदाहरण के लिए आप कर्ज़ की शर्तों को और आसान बनाने को ले सकते हैं. भारत और दूसरे विकासशील देश इस बात की वकालत करते रहे हैं कि अमीर देश और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) जैसे संस्थान उन देशों को राहत दें, जो अपने कर्ज़ चुकाने के लिए जूझ रहे हैं.

लेकिन इस पर चीन से चर्चा किए बिना कोई भी बातचीत नहीं हो सकती है. विश्व बैंक के पूर्व अध्यक्ष डेविड मालपास ने दिसंबर में कहा था कि दुनिया के सबसे गरीब देशों पर कर्जदाताओं का 62 अरब डॉलर बकाया है. इसका दो-तिहाई हिस्सा चीन का है.

दिल्ली में जी-20 सम्मेलन की तैयारी.

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गरीब देशों का संकट क्या है?

इससे कई देशों के दिवालिया हो जाने का खतरा पैदा हो गया है. गरीबी बढ़ गई है और खाद्य पदार्थों व ऊर्जा की कीमतें आसमान छू रही हैं. चीन की कर्ज़ देने की नीति को पश्चिमी देश लूट-पाट जैसी बताते रहे हैं. लेकिन चीन इससे इनकार करता रहा है.

तन्वी मदान कहती हैं, ''विकासशील देशों को ज़रूरत इस बात की है कि कर्ज़दाता कर्ज़ चुकाने की समय सीमा को फिर से तय करें और कुछ मामलों में उन्हें और कर्ज़ देकर उनकी मदद करें.''

वो कहती हैं, ''हम नहीं जानते कि इस बैठक का नतीजा क्या निकलेगा. लेकिन विचार यह है कि किसी तरह का समझौता किया जाए.''

जी-20 के सदस्य देशों में 2020 में गरीब देशों के कर्ज़ के पुर्नगठन पर एक साझा फ्रेमवर्क बनाने पर सहमति बनी थी. लेकिन उसकी रफ्तार बहुत धीमी थी. पश्चिमी देश चीन पर इस मामले में पैर पीछे खींचने का आरोप लगाते हैं, हालांकि वो इससे इनकार करता है.

जी-20 सम्मेलन की तैयारी.

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वहीं चीन के साथ सीमा विवाद में उलझा भारत धनी देशों से और आश्वासन चाहता है. वह कर्ज़ के पुनर्गठन पर साझा फ्रेमवर्क को ग्लोबल साउथ के देशों (मध्यम-आय वाले देशों सहित) तक बढ़ाने की वकालत कर रहा है. उसकी इस मांग का पहले यूरोपीय संघ ने भी समर्थन किया है.

लेकिन अगर पश्चिम के देश कर्ज़ संकट के लिए चीन को दोषी ठहराने पर अड़े रहे, तो यह एक रोड़ा बन सकता है.

भारत क्रिप्टोकरेंसी पर अंतरराष्ट्रीय विनियमन और विश्व बैंक और आईएमएफ जैसी संस्थाओं में व्यापक बदलाव भी चाहता है, हालांकि इन मुद्दों पर विवाद की आशंका कम है.

इनके अलावा जलवायु परिवर्तन भी एक मुद्दा है जिसे भारत बार-बार उठाता रहा है. उसका कहना है कि कुछ बहुत अधिक गरीब देश मौसम की घटनाओं के कारण सबसे अधिक असुरक्षित हैं.

जलवायु संकट पर जी-20 का रुख़

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को लिखे एक लेख में लिखा था, ''जलवायु कार्रवाई की महत्वाकांक्षाओं को जलवायु वित्त और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण पर कार्रवाई के साथ मेल खाना चाहिए.''

उनके शब्द जलवायु परिवर्तन वित्त पोषण पर इस समूह के भीतर के मतभेदों को दर्शाते हैं. विकासशील देश ग्रीनहाउस गैसों में कटौती के महत्वाकांक्षी लक्ष्यों पर हस्ताक्षर नहीं करना चाहते हैं.

उन्हें इस बात का डर है कि इससे उनका विकास रुक जाएगा. इसकी जगह वो संकट के लिए औद्योगिक देशों को दोषी ठहराते हैं. उनकी मांग है कि औद्योगिक देश इस बोझ का एक बड़ा हिस्सा वहन करें और ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कटौती में मदद के लिए पैसा, प्रौद्योगिकी और बुनियादी ढांचा दें.

हैप्पीमान जैकब दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में विदेश नीति पढ़ाते हैं. वो कहते हैं, ''जलवायु परिवर्तन पर उन्हें किसी निर्णायक सफलता की उम्मीद नहीं है.''

वो कहते हैं, "लेकिन यह साफ है कि यह जी-20 के प्रमुख एजेंडे में से एक होगा. भारत अमीर देशों को इस उद्देश्य के लिए और अधिक संसाधन देने के लिए प्रेरित करेगा.''

खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा पर भी चर्चा चल रही है. उम्मीद की जा रही है कि इस पर कुछ आम सहमति बन सकती है. हालांकि यह रूस और यूक्रेन के बीच एक समझौते को फिर से शुरू करने के लिए मॉस्को के सहमत होने पर निर्भर है. इसमें यूक्रेनी अनाज को अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंच बनाने की अनुमति दी गई है.

विश्लेषकों का कहना है कि जी-20 में इस समझौत पर किसी तरह की सफलता उम्मीद बेहद कम है.

कृषि, महामारी के ख़िलाफ़ तैयारी, स्वास्थ्य सेवाओं और ग्लोबल सप्लाई चेन पर समझौते होने की उम्मीद है, लेकिन यह साफ नहीं है कि वे संयुक्त घोषणा का हिस्सा होंगे या नहीं.

दिल्ली में जी-20 सम्मेलन की तैयारी.

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जी-20 शिखर सम्मेलन और भारत में मानवाधिकार

जी-20 शिखर सम्मेलन में नरेंद्र मोदी की सरकार में भारत के बिगड़ते मानवाधिकार ट्रैक रिकॉर्ड का मुद्दा भी उठ सकता है. इस पर आलोचक और विपक्षी नेता अक्सर सवाल उठाते हैं.

हालांकि विश्लेषकों का कहना है कि सामाजिक कार्यकर्ताओं और मानवाधिकार संगठनों के दबाव के बाद भी पश्चिमी देशों के नेता भारत में बातचीत के दौरान इस मुद्दे को नहीं उठाएंगे. क्योंकि वो भारत को चीन के उत्थान को रोकने के प्रयासों में एक महत्वपूर्ण सहयोगी के रूप में देखते हैं.

थिंक टैंक विल्सन सेंटर के माइकल कुगेलमैन जैसे कुछ विश्लेषकों का कहना है कि सम्मेलन के अंत में साझा घोषणा का अभाव भारत और नरेंद्र मोदी के साथ-साथ जी20 के लिए भी एक झटका होगा.

लेकिन वो आगे कहते हैं कि भारत के पास उन देशों के साथ काम करने का अच्छा ट्रैक रिकॉर्ड है, जिनकी आपस में नहीं पटती है. यह बताता है कि कैसे उसने रूस और अमेरिका दोनों के साथ अपने संबंधों को सफलतापूर्वक निभाया है.

वो कहते हैं, "ऐसे में भारत ऐसा देश हो सकता है जो अपने मतभेदों को दूर करने में सक्षम है. वह संतुलन बनाने की अपनी प्रतिष्ठा का लाभ उठाना चाहता है, लेकिन यह सब बहुत मुश्किल होने वाला है."

तन्वी मदान कहती हैं कि संयुक्त घोषणा का अभाव सम्मेलन की विफलता नहीं होगी, क्योंकि भारत अध्यक्ष के रूप में संक्षेप में एक बयान जारी कर सकता है (मेज़बान देश ऐसा कर सकता है). इसमें 90 फीसदी मुद्दों पर आम सहमति दिख सकती है. लेकिन बंटा हुआ जी-20 तेज़ी से बदलती दुनिया में इस संगठन की प्रासंगिकता पर सवाल उठाएगा.

चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग.

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क्या कोशिश कर रहा है चीन?

चीन ब्रिक्स (ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका) और शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) को बढ़ावा दे रहा है. ब्रिक्स में अभी हाल ही में अर्जेंटीना, मिस्र, इथोपिया, ईरान, सऊदी अरब और यूएई को इसमें शामिल किया गया है. इन सभी देशों के साथ चीन के अच्छे संबंध हैं.

भारत कुछ उन देशों में शामिल है, जो ब्रिक्स और एससीओ में शामिल हैं. वह पश्चिमी देशों के दबदबे वाले क्वाड, जी-7 (आमंत्रित सदस्य) और जी-20 में भी शामिल है.

इस संदर्भ में भारत के लिए एक सफल शिखर सम्मेलन आयोजित करना महत्वपूर्ण है. यह एक महत्वपूर्ण वैश्विक शक्ति के रूप में उसकी स्थिति और परिणाम देने वाले विश्व नेता के रूप में नरेंद्र मोदी की छवि को और मज़बूत करेगा.

यह न केवल विभिन्न बहुपक्षीय मंचों पर संतुलन बनाने की भारत की क्षमता को दिखाएगा, बल्कि इससे घरेलू स्तर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि को और बड़ा बनाने में भी मदद मिलेगी. वह भी ऐसे समय में जब अगले ही साल भारत में आम चुनाव होने हैं.

जी20 के कार्यक्रमों के ज़रिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विदेश नीति को छोटे कस्बों और शहरों तक में ले गए हैं. ऐसे में घरेलू और वैश्विक राजनीतिक व्यवस्था में उनके लिए जोखिम बहुत अधिक है.

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