व्लादिमीर पुतिन की जी20 में ग़ैर मौजूदगी क्या गुल खिलाएगी?

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- Author, दिनेश उप्रेती
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
व्लादिमीर पुतिन ने इंडोनेशिया के शहर बाली में चल रहे जी20 नेताओं की बैठक में शामिल नहीं होने का फ़ैसला किया है, लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि उनकी ग़ैरमौजूदगी के बावजूद यूक्रेन के ख़िलाफ़ रूस की जंग का मुद्दा इस बैठक का टॉप एजेंडा होगा. वो मुद्दा जिसने दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक ताकतों को बांट दिया है और दुनिया के सामने बड़ा संकट खड़ा कर दिया है.
दुनिया के सबसे ताक़तवर देशों के अधिकतर राष्ट्र प्रमुख बाली पहुँचे हैं और उनके सामने चर्चा के लिए कई मुद्दे हैं. रूस और यूक्रेन की आठ महीने से चली आ रही जंग को कैसे खत्म किया जाए, ये बड़ा सवाल तो है ही, दुनियाभर में शोर मचाती महंगाई, बेरोज़गारी, अनाज और ऊर्जा की कमी भी अहम मुद्दे हैं.
दुनिया के 20 बड़े देशों का संगठन जी20 को मौजूदा दौर में सबसे कारगार और प्रभावशाली मंच कहा जा सकता है. वो मंच जिसमें दुनिया की बड़ी आर्थिक और सैन्य महाशक्तियां शामिल हैं.
इस मंच में शामिल देशों के पास दुनिया के कुल सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी का 85 फ़ीसदी हिस्सा है. ये देश वैश्विक व्यापार में तीन-चौथाई से अधिक का दखल रखते हैं और कुल मिलाकर दुनिया की 66 फ़ीसदी से अधिक आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं.
चीन और भारत दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले देश तो हैं ही, ये विश्व की छह सबसे ताक़तवर अर्थव्यवस्थाओं में भी शामिल हैं. और इन दोनों देशों ने ही रूस के पूर्वी यूक्रेन पर हमले की खुलकर निंदा नहीं की है.
यही नहीं, जी-20 के कई दूसरे सदस्यों सऊदी अरब, दक्षिण अफ्रीका और तुर्की ने भी यूक्रेन पर हमले के लिए रूस के सबक सिखाने की पश्चिमी देशों की मांग का विरोध किया है.
पुतिन के लिए हालात आठ साल पहले जैसे हैं. क्राइमिया पर रूसी कब्जे के ठीक बाद 2014 में ऑस्ट्रेलिया के शहर ब्रिस्बेन में जी 20 सम्मेलन हुआ था. इस बैठक में पुतिन भी शामिल हुए थे, लेकिन बैठक में किसी ने उनसे सीधे मुंह बात नहीं की और वो इस कदर अलग-थलग रहे कि सम्मेलन खत्म होने से पहले ही उन्होंने मॉस्को की फ्लाइट पकड़ ली.
शायद यही वजह है कि इस बार उन्होंने सम्मेलन में खुद हिस्सा लेने का बजाय अपने विदेश मंत्री सर्गेई लावरोफ़ को बाली भेजने का फ़ैसला किया था.
सम्मेलन में उनकी मौजूदगी को लेकर विरोधाभासी ख़बरें सामने आई हैं. रूस की समाचार एजेंसी तास ने दावा किया कि लावरोफ़ सम्मेलन के बीच से ही स्वदेश लौट गए, जबकि इंडोनेशिया सरकार के प्रवक्ता का कहना है कि लावरोव बाली में ही मौजूद हैं.
85%वैश्विक जीडीपी का हिस्सा, दुनियाभर के व्यापार में तीन-चौथाई भागीदारी, दुनिया की कुल आबादी का 66% प्रतिनिधित्व.
बदला-बदला माहौल
ऐतिहासिक शहर बाली में जब दुनियाभर के ताक़तवर देश जुटे हैं तो माहौल बहुत कुछ बदला हुआ है. संभवत: शीत युद्ध के बाद ये पहला मौका है जब तमाम देशों के गोल पोस्ट बदले हुए दिखाई दे रहे हैं. रूस और पश्चिमी देशों के बीच सैन्य शत्रुता है और ये विरोध बढ़ते-बढ़ते चीन तक पहुँच गया है.
विदेश मामलों के जानकार विनय शुक्ला मानते हैं कि रूस-यूक्रेन संकट तो है ही जिस वजह से पुतिन ने जी20 से खुद को अलग रखा है. ये भी देखने में आ रहा है कि सुरक्षा भी एक वजह हो सकती है, जिससे पुतिन खुद बाली नहीं पहुँचे, बल्कि अपने प्रतिनिधि को वहाँ भेजा.

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यूक्रेन पर हमले के लिए रूस की खुल्लम खुल्ला निंदा की बात तो छोड़िए चीन तो निंदा प्रस्ताव में रूस को लेकर कहे गए शब्दों पर भी सख्त एतराज़ जताता आया है. कंबोडिया में रविवार को हुए पूर्वी एशिया सम्मेलन में भी 18 देश शामिल हुए थे.
इनमें भारत समेत चीन, रूस और अमेरिका भी शामिल थे. लेकिन यहाँ भी रूस-यूक्रेन संकट पर संयुक्त बयान जारी नहीं हो सका. रूस और अमेरिका संयुक्त बयान की भाषा पर एकमत नहीं हो पाए. इस बैठक में भारत की तरफ़ से उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ शामिल हुए थे.
ऐसे में जी20 सम्मेलन में रूस पर कौन और कैसे सीधा निशाना साधेगा?
विनय शुक्ला कहते हैं, "रूस के ख़िलाफ़ अमेरिका की नीति जग जाहिर है. रूस ने कोविड वैक्सीन को रजिस्टर्ड कराया. भारत समेत तमाम देशों में इस वैक्सीन का इस्तेमाल हो रहा है, लेकिन पश्चिमी देशों ने इसे ग्रीन सिग्नल नहीं दिया है.
साफ़ दिखाई दे रहा है कि पश्चिमी देश हर वो हथियार इस्तेमाल कर रहे हैं, जिससे रूस को नुक़सान पहुँचे. चूंकि जी20 सम्मेलन एक ऐसा मंच है जिसका एजेंडा विकास है, ऐसे में यहाँ बैठक में सदस्य देश रूस को कोसें, इस पर भारत और चीन गलत मानेंगे.
मेज़बान इंडोनेशिया तो चाहता ही था कि रूसी राष्ट्रपति इसमें शामिल हों और बाली सम्मेलन का एजेंडा पॉज़िटिव हो."

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पुतिन की ग़ैरमौजूदगी का मतलब है चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग पर फोकस बढ़ जाना. क्योंकि इस सम्मेलन में हिस्सा ले रहे कई सदस्यों को उनकी रूस के साथ मौजूदा रिश्तों पर एतराज़ है.
यहाँ ये नहीं भूलना चाहिए कि सम्मेलन ऐसे वक्त में हो रहा है जब जिनपिंग ने सत्ता पर अपनी पकड़ मज़बूत की है, अमेरिका ने चीन की तरफ़ से ख़तरा बढ़ने का संकेत देते हुए अपने नई सुरक्षा रणनीति तैयार की है और यूरोपीय यूनियन ने चीन के प्रति अपना रवैया और कड़ा किया है.
बाली सम्मेलन में रूस-यूक्रेन संकट के समाधान को लेकर क्या 'साइडलाइन टॉक' हो सकती है या फिर इस संकट को सुलझाने में भारत और चीन की क्या भूमिका हो सकती है?
इस सवाल के जवाब में विनय शुक्ला कहते हैं, "भारत, रूस और चीन अभी बेहद करीब हैं. लेकिन अब चीन और भारत परिपक्व देश हैं और विकास का एजेंडा उनके लिए चोटी पर होगा."
वहीं, जेएनयू में सेंटर फॉर रशियन एंड सेंट्रल एशियन स्टडीज़ में एसोसिएट प्रोफ़ेसर अमिताभ सिंह को लगता है कि जी20 सम्मेलन रूस-यूक्रेन संकट के समाधान की दिशा में कुछ कदम बढ़ सकता है.
अमिताभ कहते हैं, "सब इस बात पर ज़ोर दे रहे हैं कि इस युद्ध से रूस और यूक्रेन ही आहत नहीं हो रहे हैं, बल्कि इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ रहा है. महंगाई और बेरोज़गारी बढ़ रही है."
ज़ेलेंस्की ने भी दिए संकेत

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यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर ज़ेलेंस्की ने जी20 शिखर सम्मेलन में दुनिया के नेताओं से कहा है कि रूस का युद्ध अब समाप्त होना चाहिए. उन्होंने जल्द ही ख़त्म होने वाले एक महत्वपूर्ण अनाज निर्यात सौदे को आगे बढ़ाए जाने का भी अनुरोध किया.
ज़ेलेंस्की ने मंगलवार को वीडियो के ज़रिए बाली में मौजूद नेताओं को संबोधित किया.
समाचार एजेंसी एएफ़पी के मुताबिक ज़ेलेंस्की ने कहा: "मुझे विश्वास है कि अब समय आ चुका है जब रूस के विनाशकारी युद्ध को रोका जाना चाहिए."
ज़ेलेंस्की ने परमाणु और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने, शत्रुता ख़त्म करने समेत कई रणनीतियों की रूपरेखा रखी. महत्वपूर्ण है कि जेलेंस्की ने बार-बार जी20 के नेताओं को 'जी19' के रूप में संबोधित किया. इसका मतलब है कि जेलेंस्की ने इस सूची से जी 20 से रूस को हटा दिया.
क्या होगा प्रस्ताव में?

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ये सही है कि सम्मेलन में हिस्सा ले रहे लगभग सभी देश रूस-यूक्रेन संकट के समाधान की दिशा में बढ़ना चाहेंगे. लेकिन पश्चिमी देशों के नेताओं को इस बात का बखूबी एहसास है कि विकसित देशों (जी-7) के अलावा कई सदस्य देशों के सामने इस संकट से अधिक आर्थिक सुस्ती, खाद्य पदार्थों की कमी और ऊर्जा ज़रूरतों से जुड़ी चिंता है.
ऐसे में विकसित देश चाहेंगे कि सम्मेलन में सिर्फ़ रूस के ख़िलाफ़ निंदा प्रस्ताव के अलावा वो इन सदस्य देशों की चिंताओं को दूर करने की दिशा में भी काम करें.
अमिताभ कहते हैं, "जितने भी नॉन नेटो सदस्य हैं, उनका मानना है कि इस युद्ध का रूस के प्रति समाधान सम्मानजनक होना चाहिए. इसीलिए प्रस्ताव को लेकर मतभेद सामने आ रहे हैं. लेकिन जो मुद्दा सबके सामने है वो है रूस-यूक्रेन युद्ध को समाप्त कराना. पीएम मोदी ने भी कहा है कि इसका सम्मानजनक हल निकालना चाहिए."

जी20 सम्मेलन में शामिल दिग्गज देशों की कोशिश होगी कि इस मंच के भीतर ही अलग मोर्चे न खुल जाएं और शायद अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देश उन देशों के ख़िलाफ़ शायद ही कुछ बोलें जो रूस के ख़िलाफ़ 'कड़े शब्दों वाले प्रस्ताव' का समर्थन नहीं करेंगे.
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