इस विषय के अंतर्गत रखें अक्तूबर 2009

जाम में माया ध्यान!

महबूब ख़ानमहबूब ख़ान|बुधवार, 28 अक्तूबर 2009, 19:14

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अभी कुछ दिन पहले उत्तर प्रदेश के अमरोहा और मेरठ में छुट्टियाँ बिताने के दौरान सरकारी बस से कहीं जाना हुआ और रास्ते में ट्रैफ़िक जाम मिला तो दो घंटे का रास्ता सात घंटे में तय हुआ. जाम के दौरान कुछ और करने को था नहीं इसलिए दिमाग़ के घोड़े दौड़ने लगे - आसपास के माहौल, राजनीतिक स्थिति और लोगों के बीच जिन बातों की चर्चा हो रही थी, उन्हीं विषयों पर..

उन्हीं दिनों ख़बर गरम थी कि बहुजन समाज पार्टी की मुखिया और उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री लोगों को सलाह देती फिर रही थीं कि उनकी ख़ुद की प्रतिमाओं पर अरबों रुपए भले ही ख़र्च हो रहे हैं लेकिन उनसे आख़िरकार आम लोगों ख़ासकर दलितों को फ़ायदा होगा क्योंकि वे उन पार्कों में आकर चैन और फ़ुरसत के कुछ लम्हे गुज़ार सकते हैं. भारत में ट्रैफ़िक जाम के कारण समय और काम के नुकसान के बारे में शायद ही कोई सोचता है

मैं उस जाम के दौरान यही सोचता रहा कि जिन लोगों को खाने के लाले पड़े रहते हैं, जिनके स्वास्थ्य की कोई क़ीमत नहीं, जिनके बच्चों को शिक्षा मिलना अब भी एक ख़्बाव बना हुआ है, उन्हें अरबों रुपए की लागत से बनने वाली मायावती और काँशीराम की प्रतिमाएँ किस तरह और कितना फ़ायदा पहुँचाएंगी?

एक सवाल ये भी कौंधा कि अगर दलितों या आम लोगों को ये प्रतिमाएँ देखने जाना भी होगा तो क्या उन्हें हेलीकॉप्टर मिलेगा? वो जाएंगे तो सड़क के ज़रिए ही लेकिन अगर दो घंटे का रास्ता सात या आठ घंटे में तय होगा तो उनका पेट कैसे भरेगा. इस सवाल का जवाब तो मायावती ही दे सकती हैं. बहरहाल, बस में बैठे लोग बेहाल थे, किसी की ख़ुद की तबीयत ख़राब हो रही थी तो किसी को दवाई लेकर जल्दी घर पहुँचना था.

किसी बच्चे की किलकारी और चीख़ से मेरा ध्यान टूटता लेकिन बस में सिर्फ़ सोचते रहने के सिवाय मेरे पास कोई चारा नहीं था. मैं सोचने लगा कि शेरशाह सूरी ने सदियों पहले जब हज़ारों मील लंबा ग्रांट ट्रंक रोड बनवाया था तो उसे क्यों नहीं ख़याल आया कि हर एक मील के फ़ासले पर वो भी अपनी प्रतिमाएँ बनवाता जिससे उस सड़क से गुज़रने वाले लोग उसे हर पल याद करते. पर उसे तो लोग और इतिहास मूर्तियों की वजह से नहीं, सड़क की वजह से याद करते हैं.

मैंने उस जाम में इस उम्मीद के साथ माया (मायावती) ध्यान करने की कोशिश की कि हो सकता है इससे सड़कों और लोगों की हालत अच्छी होने में कुछ मदद मिल सके. बहुत से अन्य लोगों की ही तरह मैं भी उस दिन के इंतज़ार में हूँ जब कोई काला बंदर या स्पाइडरमैन आकर कोई करिश्मा करेगा क्योंकि आम लोगों ने तो सब कुछ, पुलिस, प्रशासन और राजनेताओं पर छोड़ दिया है.

ज़ात नहीं बदली जाती

वुसतुल्लाह ख़ानवुसतुल्लाह ख़ान|सोमवार, 26 अक्तूबर 2009, 15:59

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जपान और चीन के बाद भारत एशिया की तीसरी बड़ी अर्थ व्यवस्था है. लेकिन राजस्व रिकॉर्ड देखा जाए तो भारत की एक अरब 28 करोड़ की आबादी में से केवल तीन करोड़ 15 लाख लोग टैक्स देते हैं और उन में से 80 हज़ार लोग ऐसे हैं जिन की घोषित वार्षिक आय साढ़े दस लाख रुपये (22,600 अमरीकी डॉलर) है. मगर स्विस बैंकों सहित दुनिया की साठ से अधिक टैक्स बचाव/ छिपाओ संस्थाओं के ख़ुफिया खातों में चीनियों के केवल 9600 करोड़ डॉलर जमा हैं. जबकि इन ख़ुफिया खातों में भारतीयों के 15 हज़ार करोड़ डॉलर के लगभग जमा हैं.

आसान हिंदी में इस का अर्थ यह है कि दुनिया में काले धन का हर 11वाँ डॉलर किसी न किसी भारतीय के ख़ुफिया खाते में जमा है. अगर इस रक़म को भारत के 45 करोड़ इंतिहाई ग़रीब लोगों को बांट दिया जाए तो हर एक को लाख लाख रुपए मिल सकते हैं.

अब से तीन साल पहले स्विस बैंकर्स एसोसिएशन ने प्रस्ताव दिया था कि अगर भारत सरकार अनुरोध करे तो वह स्विस बैंकों के खातों की जानकारी दे सकती है. लेकिन आज तीन साल बाद भी सरकार "करते हैं, देखते हैं, सोचते हैं, बताते हैं," कर रही है.

पी चिदंबरम हों या प्रणव मुखर्जी या एस एम कृष्णा. सब हैरान हैं कि नक्सली इतने आपे से बाहर क्यों हो रहे हैं. कोई इस पर हैरान नहीं है कि दुनिया में मौजूद साढ़े गयारह खरब डॉलर में से डेढ़ खरब डॉलर के मालिक कुछ हज़ार भारतीय कैसे हैं और इतना बड़ा ख़ुफिया धन भारत से बाहर रखने में कैसे कामयाब हैं.

अब आप सोचेंगे कि पाकिस्तान का क्या हाल है. तो भाई पाकिस्तान का हाल इस क़ाबिल नहीं कि बताया जा सके. बस यूँ समझ लें कि 18 करोड़ की जनसंख्या में केवल 22 लाख कंपनियाँ और नागरिक टैक्स देते हैं. पिछले साल सब से ज़्यादा टैक्स एक बैंकर फारूक़ बंगाली ने ग्यारह करोड़ रुपए की घोषित आय पर दिया. नवाज़ शरीफ हर साल करीब बीस हज़ार रुपए और आसिफ ज़रदारी लगभग पच्चीस हज़ार रुपए टैक्स देते हैं. बाक़ी आप ख़ुद समझदार हैं.

मैं यह सारा राग यह ख़बर सुन कर अलापने पर विवश हुआ हूँ कि जर्मनी के 44 सबसे अमीर लोगों ने सरकार से अनुरोध किया है कि देश चूँकि आर्थिक संकट से जूझ रहा है, इसलिए हम जैसे 22 लाख अमीरों पर कि जिन में से हर एक के पास पांच लाख यूरो से ज़्यादा जमा हैं, सरकार पांच प्रतिशत ज़्यादा टैक्स लगा कर एक सौ अरब यूरो जमा कर अमीर और ग़रीब का फर्क़ कम कर सकती है.

देखा आप ने! जर्मनी जैसे खाते पीते बेफि़क्रे देश कभी भी हम जैसे ग़रीब देशों पर व्यंग्य करने से बाज़ नहीं आते.

वह जो कहते हैं कि पैसा आने से ज़ात नहीं बदलती. कमीना कमीना ही रहता है.

ब्रिटेन के 'राज ठाकरे'

राजेश प्रियदर्शीराजेश प्रियदर्शी|शनिवार, 24 अक्तूबर 2009, 23:59

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मैं उन अस्सी लाख लोगों में शामिल था जिन्होंने ब्रिटिश नेशनल पार्टी (बीएनपी) के निक ग्रिफ़िन को गुरुवार की रात टीवी पर देखा, मैं उन लोगों में भी हूँ जिन्हें वे 'अपने देश' से निकाल देने का नारा बुलंद करते रहे हैं.

निक ग्रिफ़िन को देखकर लग रहा था कि राज ठाकरे थोड़े ज्यादा गोरे और मोटे हो गए हैं. दोनों ही मुझ जैसे लोगों को अपनी 'प्रिय मातृभूमि' से भगा देना चाहते हैं.

ग्रिफ़िन अगर 'गंदे भूरे' लोगों से कुछ सीखना चाहें तो महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के राज ठाकरे उन्हें बहुत कुछ सिखा सकते हैं, ख़ास तौर पर तोड़फोड़ और मारधाड़ के मामले में.

ठाकरे की तुलना में ग्रिफ़िन की हालत यूँ भी थोड़ी कमज़ोर रही है क्योंकि ब्रितानी मीडिया ने तय नीति के तहत उन्हें लगभग पूरी तरह 'ब्लैकआउट' कर रखा था, धमकियों के सीधे प्रसारण का ठाकरे वाला सुख उन्हें नसीब नहीं रहा.

जब ग्रिफ़िन को बीबीसी टीवी ने अपने प्रतिष्ठित कार्यक्रम 'क्वेश्चन टाइम' ( प्रश्न काल ) में शामिल होने का न्यौता दिया तो ज़ोरदार बहस छिड़ गई. बहस इतनी तीख़ी हुई कि कई सांसदों ने बीबीसी पर मुकदमा करने की धमकी दी.

ब्रितानी मंत्रिमंडल दो ख़ेमों में बँट गया, एक समूह बहस के ज़रिए उनकी नीतियों की पोलपट्टी खोलने का हामी था, तो दूसरा उन्हें मंच दिए जाने के सख़्त ख़िलाफ़. बीबीसी के दफ़्तर के बाहर तरह-तरह के गुटों, यहाँ तक कि पत्रकारों ने भी उन्हें टीवी पर दिखाए जाने के ख़िलाफ़ प्रदर्शन किया.

ग्रिफ़िन के सही या ग़लत होने पर कोई बहस नहीं थी. वैसी भी उनकी नीतियाँ इतनी ब्लैक एंड व्हाइट हैं कि बहस की कोई गुंजाइश है भी नहीं, बहस इस बात पर थी कि 'गोरे लोगों के वर्चस्व' की घोर अलोकतांत्रिक राजनीति करने वाले व्यक्ति के बहिष्कार का फ़ैसला क्यों बदला जाए?

लोकतंत्र के तकाज़े कई बार उसकी जड़ें खोदने वालों के ज्यादा काम आते हैं.

उन्हें टीवी पर दिखाए जाने की सबसे बड़ी दलील ये थी कि अगर उन्हें चुनाव लड़ने से नहीं रोका जा सकता, चुनाव जीतने से नहीं रोका जा सकता तो फिर एक निर्वाचित जन-प्रतिनिधि को टीवी पर आने से कैसे रोका जा सकता है?

बहरहाल, वे टीवी पर आए. लोगों ने बीसियों बार साबित किया कि वे झूठ बोल रहे हैं, अपनी वीडियो रिकॉर्डिंगों तक से मुकर रहे हैं, उन्हें इतिहास, भूगोल, राजनीति, अर्थशास्त्र, विज्ञान...किसी विषय की समझ नहीं है.

सिर्फ़ गोरे लोगों को अपनी पार्टी की सदस्यता देने वाले ग्रिफ़िन बार-बार यही कहते रहे कि "यह कितने दुख की बात है कि ब्रिटेन जैसे देश में एक गोरे ईसाई का मुँह बंद कराया जा रहा है".

मुख्यधारा की तीनों पार्टियों के नेताओं ने कहा कि ग्रिफ़िन बेनकाब हो गए हैं और अब उनकी राजनीति का अंत हो जाएगा लेकिन अगले दिन ख़बर आई कि तीन हज़ार लोगों ने उसी रात उनकी पार्टी की सदस्यता की अर्ज़ी दी जब वे टीवी पर आए.

मीडिया के 'ऑक्सीजन की सप्लाई' एक बहुत पेचीदा मामला है, यह सप्लाई किसको, किन परिस्थितियों में, कितनी मिलनी चाहिए इसका कोई सीधा या सही-ग़लत जवाब किसी के पास नहीं है.

विधान सभा चुनावों से मिल रहा संदेश

अमित बरुआअमित बरुआ|गुरुवार, 22 अक्तूबर 2009, 15:19

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चुनाव के बाद हमेशा बहुत कुछ कहा जाता रहा है. महाराष्ट्र, अरुणाचल प्रदेश और हरियाणा के चुनावी नतीजे हमारे सामने आ रहे हैं. इन से स्पष्ट होता है कि मतदाता ने कोई जोखिम नहीं उठाया है. उसने कांग्रेस पार्टी (महाराष्ट्र में गठबंधन) को दोबारा इन राज्यों में सत्ता सौंप देने का इरादा किया है.

यह भी स्पष्ट है कि भारतीय जनता पार्टी की राजनीतिक हालत चिंताजनक है. शायद परिणामों के कारण भाजपा के वरिष्ठ नेता मुख्तार अब्बास नकवी ने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन पर ही हल्ला बोल दिया. पर जब उनको अपनी ग़लती का आभास हुआ तो नक़वी साहब दोबारा टेलिविज़न पर आये और उन्होंने अपना बयान वापस ले लिया.

तीनों राज्यों के मतदाताओं ने साफ़ कर दिया है कि वे यथास्थिति को बदलने के मूड में नहीं हैं. अरुणाचल प्रदेश को तो अलग नज़र से देखना ही चाहिए क्योंकि उत्तरपूर्व का राज्य होने की वजह से बाकी देश इसकी राजनीति में अधिक रूचि नहीं दिखाता है.

अगर लोक सभा और अब विधान सभा के चुनावों से कोई सीख मिलती है तो वह यह है कि जनता चाहती है की उनके प्रतिनिधि कुछ कर के दिखाएँ. भाषण बहुत हुए -- इलेक्शन से पहले और इलेक्शन के बाद. अब समय आ गया है कि चुने हुए प्रतिनिधि जनता-जनार्दन की सेवा में जुट जाएँ.

एक बात और. घृणा की राजनीति से भी लोग ऊब गए हैं. तक़रीबन दो दशकों के बाद ऐसा हुआ है. जिन राजनीतिक दलों ने घृणा फैलाने का काम किया वो समझ रहे होंगे कि उनका दबदबा कुछ कम होता नज़र आ रहा है.

अब घृणा की राजनीति बहुत हुई. बेहतर होगा कि अब हमारे विधायक और सांसद ग़रीबी, पानी, बिजली और चिकित्सा जैसे मुद्दों पर ग़ौर करें.

मेरे लिए तो लोक सभा और अब विधान सभा के चुनावों का यह ही मतलब है. आप को जनता ने मौका दिया है, आप कुछ करेंगे या नहीं?

इस बात में कोई दो राय नहीं कि पिछले लोक सभा चुनावों में प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह की छवि की वजह से कांग्रेस पार्टी को फायदा हुआ.

लोगों को यह लगा कि सिंह साहब भले आदमी हैं जो देश के लिए कुछ करना चाहते हैं. राजनीति और सत्ता में इतने साल के बाद भी उन पर किसी तरह का व्यक्तिगत आरोप नहीं लगा है.

मेरी यह अपेक्षा है और आशा भी कि नए (और पुराने) मुख्यमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह को मिसाल बनाकर अपने राज्यों की जनता की ज़िंदगियां बेहतर बनाने के लिए छोटे और बड़े कदम उठाएंगे.

मीडिया और लोकहितः चोली दामन का साथ

सलमा ज़ैदीसलमा ज़ैदी|बुधवार, 21 अक्तूबर 2009, 17:15

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हाल ही में एक बहस में हिस्सा लेने का बुलावा आया. विषय था, मीडिया लोकहित के कितना क़रीब है.

चर्चा में गणमान्य पत्रकार भी शामिल थे और पत्रकारिता कॉलेज के छात्र-छात्राएँ भी.

अधितकर लोगों का तर्क था कि मीडिया पूरी तरह अपने दायित्व का निर्वाह नहीं कर रहा है.

मीडिया वह परोस रहा है जो अशोभनीय है, समाज को नुक़सान पहुँचाने वाला है और अश्लीलता के दायरे में आता है.

सवाल यह उठता है कि मीडिया को इसके लिए प्रोत्साहित करने वाला कौन है? आप और हम जैसे दर्शक या पाठक ही न.

मीडिया वह दिखाता है जो लोग देखना चाहतें हैं. लोग वह देखते हैं जो मीडिया दिखाता है.

यानी कैच 22 की स्थिति. चित भी मेरी, पट भी मेरी.

बहस में हिस्सा लेने वाले कुछ लोगों को एतराज़ था टीवी धारावाहिकों पर. यानी सास-बहू सीरियल, रियैलिटी शो आदि.

लेकिन अगर सोचा जाए तो क्या मनोरंजन जीवन का एक अहम हिस्सा नहीं है?

क्या सिर्फ़ राजनीतिक चर्चा और समाज को आईना दिखाने वाले शो दिन भर के थके-हारे, काम के बोझ से छुटकारा पाने के लिए हलके-फुलके कार्यक्रम देखने के इच्छुक दर्शकों के लिए ज़्यादती नहीं हैं?

लेकिन यह भी सच है कि मनोरंजन ही सब कुछ नहीं है. अगर हमें अपने आसपास या दुनिया के अन्य हिस्सों में घटने वाली बातों की जानकारी ही नहीं है या इस सूचना तक पहुँच ही नहीं है तो फिर हम में और कुएँ के मेढक में क्या फ़र्क़ रहा.

मेरे कहने का मतलब यह है कि संतुलन ज़रूरी है. मीडिया अगर इस बात का ध्यान रखे तो बस यह सोने पर सुहागा है.
बहस में हिस्सा लेने आए विद्यार्थियों ने एक स्वर में यही कहा कि मीडिया को करियर के रूप में चुनने का उनका उद्देश्य था सशक्तीकरण.

यानी कल वे चाहें तो समाज का रुख़ बदलने की क्षमता रख सकते हैं. उनके आगे हर वह व्यक्ति जवाबदेह होगा जो जनहित के विपरीत काम कर रहा है.

यह एक अच्छा संकेत है और पत्रकारों की भावी पीढ़ी से कई अपेक्षाएँ जगाता है.

निजी मीडिया पर तरह-तरह के दबाव हैं इसमें कोई शक नहीं.

स्पॉन्सरशिप, विज्ञापन, टीआरपी और सब से बढ़ कर प्रतिस्पर्द्धा. यानी एक दूसरे से आगे निकलने की होड़.

इस समय ज़रूरत है एक ट्रेंड सेटर की-एक पथ-प्रदर्शक की. एक ऐसा मीडिया चैनेल जो अपने दायित्व को समझे और दर्शकों के हर वर्ग का ध्यान रखे.

अगर इसे आप अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बनना न कहें, तो मैं बड़ी विनम्रता से कहना चाहूँगी कि बीबीसी ने इस परंपरा का साथ निभाने की पूरी कोशिश की है.

और हमसे कोई चूक होती है तो हमारा कान पकड़ने के लिए आप जैसे जागरूक पाठक तो हैं ही.

कब वयस्क होगा 62 साल का नाबालिग़?

ज़ुबैर अहमदज़ुबैर अहमद|रविवार, 18 अक्तूबर 2009, 08:00

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हाल ही में महाराष्ट्र विधान सभा चुनावी प्रचार के दौरान मैं मध्य नासिक चुनावी चेत्र में था. मैं एक कच्ची मुस्लिम बस्ती वडाला गया हुआ था जहां एक तंग सड़क के दोनों तरफ दुकाने थीं, कच्चे घर थे और ढेर सारे रेहड़ी वालों ने सड़क को और भी तंग बना दिया था.

हज्जाम, मालिश करने वाले, क़साई, सब्ज़ी वाले, फल वाले और चाय-पान की दुकान के मालिक -- सभी को इंतज़ार था उस काफिले का जिसका नेतृत्व कर रही थीं कांग्रेस पार्टी की उम्मीदवार, शोभा बच्चव.

लहराते झंडों और लाउडस्पीकर से गूंजते गानों ने इस बाज़ार नुमा मोहल्ले में पल भर के लिए एक मेले जैसा माहौल पैदा कर दिया था.

खैर शोभा जी आईं, जीत कर, गद्दी पर लौटने के बाद (वो स्वास्थ्य कल्याण उपमंत्री हैं) मुसलामानों की ग़रीबी दूर करने की कोशिश के वादे किए, सेक्युलर ताक़तों को मज़बूत करने को कहा और साम्प्रदायिक तत्वों से बचने की अपील की. इसके बाद अगले मुस्लिम मोहल्ले के लिए रवाना हो गईं.

उनके जाने के बाद भी माहौल मेले जैसा बना रहा क्योंकि वहाँ लोगों की नज़र उस रेस्तरां के सामने टिकी थीं जहां खीर के दो बड़े बड़े मटके रखे हुए थे और जो शोभाजी के जाने के बाद ही लोगों में बांटा जाना था. और हुआ भी वही, केवल फर्क इतना था कि लाइन में लगे खीर खाने वाले लोगों के बीच दो तीन बार लाइन तोड़ने पर झड़पें हुईं.

मैं यह सब तमाशा देख रहा था और तस्वीरें खींच रहा था की एक बूढ़े आदमी ने पीछे से मेरे कंधे पर हाथ रखा और बोला शोभाजी पांच साल पहले यहाँ आई थीं वोट मांगने तब भी यही बातें कही थीं, लेकिन इस बस्ती में कोई विकास नहीं हुआ. उसने कहा उस दिन भी खीर बाँटी गई थी. पिछली बार की तरह इस बार भी यह लोग खीर खाने के बाद उन्हें वोट देने जाएँगे और इस बस्ती की ग़रीबी इसी तरह शायद कभी ख़त्म नहीं होगी.

यह कहकर वह चला तो गया लेकिन मेरे ज़हन में एक सवाल छोड़ गया. क्या वोट बैंक की सियासत आजादी के 62 साल बाद भी इतना खुलकर होती है?

मैं अभी यह सोच ही रहा था की मुझे इस मोहल्ले तक लाने वाले एक नेक आदमी ने आवाज़ दी और कहा कि वो मुझे इस बस्ती से वापस मेन रोड जाने का रास्ता बता सकते हैं.

वह शोभाजी के भतीजे थे और उन्हीं की तरह एक पढ़े लिखे पेशेवर डॉक्टर भी. मैंने उनसे पूछा आपकी आंटी की जीत कितनी यक़ीनी है? उन्होंने पलक झपकने से पहले कहा, सौ फ़ीसद यक़ीनी है. मैं ने पूछा आप यह कैसे कह सकते हैं, उन्हों ने कहा: "इस मोहल्ले से लगे मीलों तक मुसलामानों की कई बस्तियां हैं. वो मध्य नासिक के तमाम वोटरों का चालीस प्रतिशत हैं. वे सारे वोट हमारी झोली में हैं."

अगले दिन मुंबई में मुख्य मंत्री अशोक च्वहाण के एक पत्रकार सम्मलेन में गया. किस विषय पर बात होगी यह नहीं बताया गया था. सम्मलेन को सबसे पहले संबोधित किया अजमेर के एक बड़े पीर ने. उन्होंने मुसलामानों से अपील की के वह सेक्युलर ताक़तों को वोट देकर उनके हाथ मज़बूत करें. उन्होंने आगे कहा कि चूँकि कांग्रेस और राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टियां सेकुलर हैं इसलिए मुसलमान इन्हीं को वोट दें.

इसके बाद मुख्यमंत्री ने उनका शुक्रिया अदा किया और मुसलामानों के विकास के लिए कुछ क़दम उठाने का एलान किया उनमें ख़ास थे मदरसों को मदद, उर्दू भाषा का प्रचार और मुसलमानों को पुलिस फोर्स में भरती करना.

मुझे याद आई 2004 के चुनाव के पहले शिव सेना प्रमुख बाल ठाकरे से एक मुलाक़ात जिसमें उन्होंने लगभग वही वायदे किए थे जो मुख्यमंत्री ने पत्रकार सम्मलेन में किए.

स्पष्ट है कि 62 साल से इन बस्तियों में रहने वाले मुसलमान अब तक बाहर क्यों नहीं निकल पाए हैं और भारत की सबसे बड़ी अल्पसंख्यक आबादी इन बस्तियों में अब तक क्यों रहती है.

लेकिन क्या यह बात इन बस्तियों को की समझ में नहीं आती? यह 62 साल के नाबालिग़ से कौन पूछे?

उफ़! ये डे ड्रीमिंग की आदत

महबूब ख़ानमहबूब ख़ान|शुक्रवार, 16 अक्तूबर 2009, 17:41

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मैं ये तो नहीं कह सकता कि अपनी पत्नी की किसी आदत से परेशान हूँ लेकिन वो अक्सर कहती रहती हैं कि वो मेरी डे ड्रीमिंग यानी खुली आँखों से सपने देखने की आदत से बहुत परेशान हैं. वो कहती हैं कि मैं ख़यालों में बहुत खोया रहता हूँ कि काश ऐसा हो जाए तो कितना अच्छा हो या वैसा हो जाए तो क्या ही बात हो!

कुछ दिन पहले मेरे सहयोगी राजेश प्रियदर्शी ने लिखा था कि उन्हें ठंडी बीयर सुकून देती है लेकिन मुझे साइकिल चलाने में बहुत तसल्ली होती है. पर मेरी पत्नी को साइकिल से चिढ़ होने लगी है. वो कहती हैं कि मैं घर में भी उनके बजाय अक्सर साइकिल को ही निहारता रहता हूँ. लेकिन मेरे लिए मेरी साइकिल दुधारू गाय जैसी है जो बुश हाउस जाने के लिए न सिर्फ़ किराया बचाती है बल्कि सुबह की सैर का मज़ा भी देती है. (बुश हाउस, लंदन में बीबीसी वर्ल्ड सर्विस का मुख्यालय है)

घर से बुश हाउस का रास्ता बीस किलोमीटर है जो मैं क़रीब एक-सवा घंटे में पूरा कर लेता हूँ. इस तरह में एक दिन में चालीस किलोमीटर साइकिल चला लेता हूँ. आपमें से जो पाठक ये सोच बैठें हों कि मैं अपनी डींगें मार रहा हूँ तो आपको अपनी पीठ थपथपाने का पूरा अधिकार हैं.

लंदन के मेयर बोरिस जॉन्सन को साइकिल चलाना बहुत पसंद है

ये सिर्फ़ आपको बता रहा हूँ कि मेरी पत्नी को अभी पता नहीं है कि साइकिल चलाते समय भी मैं कुछ डे ड्रीमिंग कर लेता हूँ. मैं ये सोचने पर गदगद होते नहीं थकता कि लंदन में बहुत ही व्यस्त सड़कों पर साइकिल चलाना कितना आसान है और बहुत सी सड़कों पर साइकिल लेन भी बनी होती है. ज़्यादातर वाहन साइकिल चालकों को रास्ता देकर चलते हैं. सरकार बहुत सी रियायतें देती है साइकिल चलाने के लिए.

मैं ख़यालों में डूब जाता हूँ कि क्या ऐसा भारत में हो सकता है क्योंकि भारत में तो साइकिल ग़रीब की सवारी समझी जाती है. लोग न जाने क्यों मोटर के पीछे और मोटर के भीतर भागे जा रहे हैं. ऐसा लगता है कि हर आदमी हवाई जहाज़ को ख़रीदने की तमन्ना के साथ जी रहा है भले ही सेहत और रिश्ते कमज़ोर होते जा रहे हैं, परिवार बिखरते जा रहे हैं, अमीर ग़रीब की खाई बढ़ती जा रही है, हर कोई पैसे के लिए कुछ भी दाँव पर लगाने को तैयार है - अपने सांस्कृतिक मूल्य, परिवार, समाज, रिश्ते. बस धुन है तो अमीर बनने की. जो लोग पैदल चलना या साइकिल चलाना पसंद भी करते हैं वे समाज की हिकारत भरी नज़रों की वजह से छोड़ते जा रहे हैं. लेकिन क्या मैं कोई नई बात कह रहा हूँ?

एक ज़ेब्रा क्रासिंग पर लंदन के मेयर बोरिस जॉन्सन साइकिल पर सवार नज़र आते हैं. उनके बारे में कुछ दिन पहले अख़बारों में पढ़ा था कि एक लाल बत्ती पर रुकने के बजाय उन्होंने फुटपाथ से होकर साइकिल निकाली और आगे निकल गए. एक पुलिसवाला उन्हें देख रहा था और उसने बोरिस जॉन्सन का तीस पाउंड का चालान काट दिया. तब से शायद उन्होंने सबक़ सीख लिया है.

भारत के राजनेता क्या कहीं से कोई सबक़ सीखेंगे, यह शायद खुली आँखों का सपना ही है, फिर भी उम्मीद का दामन क्यों छोड़ूँ. खुली आँख से ही सही, सपने देखने में क्या जाता है.

मैं बुश हाउस के नज़दीक ही पहुँच चुका हूँ और मुझे अपनी डे ड्रीमिंग यहीं रोकनी पड़ेगी नहीं तो किसी लाल बत्ती पर अगर बेख़याली में यूँ ही निकल गया तो मेरा भी तीस पाउंड का चालान कट जाएगा और पत्नी फिर मेरी इस आदत पर मुझे झिड़केंगी क्योंकि पॉकेट ख़र्च तो गिना-चुना ही मिलता है...

पेशाब पिशूब करना मना है

वुसतुल्लाह ख़ानवुसतुल्लाह ख़ान|गुरुवार, 15 अक्तूबर 2009, 17:11

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सामान्य देशों में लोग सुबह दफ़्तर जाने से पहले नाश्ता करते हुए इसलिए टीवी ऑन करते हैं कि कोई सुंदर चहरा देखें. किसी हल्की फुल्की बात पर हंसें. किसी राग का मज़ा लें और दिन की शुरुआत ख़ुशगवार अंदाज़ में करें.

लेकिन पाकिस्तान में अब लोग सुबह, दोपहर या शाम टीवी ऑन करने के पहले कई बार सोचते हैं. कहीं कोई धमाका न हो गया हो, कहीं आतंकवादी किसी बिल्डिंग में न घुस गए हों, कहीं कोई बड़ा आदमी मारा न गया हो, कहीं कोई छोटा आदमी ग़ायब न गया हो....

आज भी जब दफतर से मेरी पत्नी का एसएमएस आया कि ज़रा टीवी ऑन तो कीजिए. मैं समझ गया कि फिर कोई बुरा या बड़ा हो गया है. लेकिन अब सब लोगों की आदत सी हो गई है कि धमाका, लाशें, सैन्य कार्रवाई कोई ख़बर नहीं है. अगर मज़ा है तो बौखलाए हुए टीवी ऐंकर्स, अनाड़ी रिपोर्टर्स और गृह मंत्री रहमान मलिक को देखने में है. यह वह मख़लूक़ है जो हर ट्रेजडी को ब्लैक कॉमेडी में बदल देती है.

ऐंकर... सूचना के अनुसार हमलावर "सशस्त्र बंदूक़ें" लेकर पुलिस प्रशिक्षण केंद्र में दाख़िल हो गए हैं.
ऐंकर (रिपोर्टर से) आप ने अभी कहा कि इमारत के अंदर से गोलीबारी हो रही है. क्या आप बता सकते हैं कि इस समय कितने लोग फंसे हुए हैं और इन में घायल कितने हैं.

रिपोर्ट... अभी अभी एक आतंकवादी निकल कर भागा है. भागने के अंदाज़ से लगता है कि वह दक्षिण वज़ीरिस्तान से आया है.

ऐंकर... आइए दर्शको, हम आप को गंगाराम अस्पताल लेकर चलते हैं जहाँ हमारे रिपोर्टर मिस्टर फलाँ फलाँ मौजूद हैं. मिस्टर फलाँ फलाँ यह बताइए कि इस समय यहाँ पर लाए गए घायलों की क्या स्थिति है? क्या उन्हें ठीक तरह से चिकित्सा की सुविधाएँ मिल रही हैं. क्या दवाएँ पूरी हैं?

ऐंकर (रिपोर्टर से) अच्छा यह बताईए कि मोहम्मद रशीद नामी आतंकवादी जो गिरफ्तार हुआ है, उन के बारे में क्या जानकारी है.

रिपोर्टर... जी, मोहम्मद रशीद ने पुलिस को बताया है कि उन असली नाम मोहम्मद सिद्दीक़ है.

ऐंकर (पुलिस चीफ से) सुना है कि आंतकवादियों में कुछ महिलाएँ भी हैं.
पुलिस चीफ... जी, अभी इस बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता.

ऐंकर... तो इस की कोई संभावना है कि महिलाएँ भी हो सकती हैं??

फिर इंतेज़ार रहता है टीवी के सामने बैठने वालों को कि गृह मंत्री रहमान मलिक आज क्या कहेंगे.

रहमान मलिक... देखें जी, यह बहुत बड़ी सफलता है कि हमला करने वाले सभी आतंकवादियों को मार दिया गया है. यह आतंकवादी मानवता के दुशमन हैं. यह पैसे लेकर ऐसी कार्रवाईयाँ कर रहे हैं. यह विदेशी इशारों पर नाच रहे हैं. अगर आज यह अपने इरादों में कामयाब हो जाते तो बहुत बड़ी तबाही होती और मीडिया के अनुरोध करता हूँ कि वह जिम्मेदारी का प्रदर्शन करे और ऐसी घटनाओँ को ज़्यादा न उछाले.

रिपोर्ट (रहमान मलिक से) पिछले हफ्ते इस्लामाबाद में विश्व खाद्य कार्यक्रम के कार्यालय पर जो हमला हुआ था. उस के बारे में कुछ पता चला?
रहमान मलिक... जी हाँ, उस की जांच हो रही है. अभी तक यही पता चला है कि एक आत्मघाती जो सुरक्षाकर्मियों को वरदी में था उस ने दफतर के बाहर मौजूद एक संतरी से कहा कि वह "पेशाब पिशूब" करना चाहता है. सुरक्षाकर्मी ने उसे अंदर का बाथरूम इस्तेमाल करने की इजाज़त दे दी और वह घुस गया . सुरक्षा संबंधी संस्थाओँ को आदेश दिया है कि आइंदा किसी अज्ञात को चाहे उस ने वरदी ही पहनी हुई हो पेशाब करने के लिए अंदर न छोड़ें.

'घबराए' हुए चरमपंथियों ने क़हर ढाया

वुसतुल्लाह ख़ानवुसतुल्लाह ख़ान|मंगलवार, 13 अक्तूबर 2009, 19:25

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आत्मघाती चाहे मिलेशिया बैरेक, पेशावर के ख़ैबर बाज़ार या इस्लामाबाद में विश्व खाद्य कार्यक्रम के कार्यालय में फटे, बारूदी ट्रक चाहे मैरियट इस्लामाबाद या पर्ल कॉंटिनेंटल होटल में घुसे, कमांडो स्टाइल आतंकवादी एक्शन मनावाँ पुलिस केंद्र और श्रीलंकाई टीम के ख़िलाफ हो, सरकारी वक्तव्य एक ही होता है.

"आतंकवादी घबरा गए हैं और बदहवासी में यह आक्रमण अपनी कमज़ोरी छिपाने के लिए कर रहे हैं. आतंकवादियों को अच्छी तरह मालूम है कि अब उन के गिर्द सुरक्षाबलों का घेरा तंग हो चुका है. पूरा देश उन के ख़िलाफ उठ खड़ा है. इसलिए उन की यह कार्रवाईयाँ बुझे हुए चराग़ की आख़री भड़कती हुई लौ हैं. उन से घबराना नहीं चाहिए, ऐसे आक्रमण अभी और भी होंगे लेकिन आतंकवाद को पूरी तरह जड़ से उखाड़ दिया जाएगा."

यदि ऐसे सरकारी वक्तव्यों पर यक़ीन कर लिया जाए तो फिर जीएचक्यू रावलपिंडी पर होने वाला हमला समझने में कोई मुश्किल नहीं होनी चाहिए. यानी दर्जन भर आतंकवादियों ने एक महीने पहले इस्लामाबाद के करीब आवान टाउन में "घबरा" कर एक घर कराए पर लिया.

बीस पच्चीस दिन तक "बदहवासी" के आलम में घटनास्थल के नक़्शे बनाए और जीएचक्यू का सर्वेक्षण किया. "इंतेहाई कायर" हो कर सैन्य वरदियाँ पहनीं और "दहशतज़दा" हो कर एक मोटर साईकल और सुज़ूकी वैन में जीएचक्यू की दो सुरक्षा चौकियाँ पार कीं और कांपते हाथों से दो ग्रेनेड फेंक कर छह सैन्य अफसरों और जवानों को मार दिया.

इस दौरान आतंकवादियों के कुछ साथी भी मारे गए. यह दृश्य देख कर बाक़ी आतंकवादियों के "हाथ पावँ फूल गए" और उन्हों ने दो फौजी इमारतों में घुस कर चालीस के लगभग लोगों को उन्नीस घंटे केलिए बंधक बना लिया.

आतंकवादियों की इस "बदहवासाना दनदनाहट" पर सरकारी तसल्लियाँ सुन कर मुझे वह कहानी याद आ रही है कि एक हकीम साहब के पास डायरिया का मरीज़ आया.

हकीम साहब ने कहा यह गोलियाँ इस्तेमाल करो इंशाअल्लाह फ़ायदा होगा. हिकमत में चूँकि मर्ज़ को दबा कर नहीं बल्कि उभार कर ख़त्म किया जाता है इसलिए दवा के इस्तेमाल से अगर और दस्त आएँ तो घबराना नहीं.

दो दिन बाद मरीज़ का बेटा हकीम साहब के पास आ कर शिकायती लहजे में बोला कि अब्बा को तो दवा के इस्तेमाल के बाद इतने दस्त आए हैं कि चारपाई से लग गए हैं. हकीम साहब ने कहा, "घबराओ नहीं दवा अपना असर कर रही है और मर्ज़ बाहर निकाल रही है, अभी दस्त आएँगे फिर फ़ायदा दिखना शुरु हो जाएगा".

तीन दिन बाद मरीज़ का बेटा फिर हकीम साहब के पास आया यह बताने के लिए कि अब्बा इंतक़ाल फ़रमा गए हैं. हकीम साहब ने एक आह भरते हुए कहा, "मरना तो एक दिन हर एक है. शुक्र है दस्त बंद हो गए".

आख़िर उम्मीद पर दुनिया क़ायम है

सुशील झासुशील झा|सोमवार, 12 अक्तूबर 2009, 09:00

टिप्पणियाँ (14)

आम तौर पर अच्छा प्रदर्शन करने पर ईनाम और सम्मान मिलने की परंपरा है..लेकिन अब क्या परंपरा बदल रही है?

शायद तभी बराक ओबामा को नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया ताकि सम्मान के आधार पर वो आगे और अच्छा काम कर सकें.

मुझे लगता है कि अगर इस तर्क पर चला जाए तो मुझे भी पत्रकार होने के नाते ( जिसमें बहुत संभावनाएं हैं और वो सबमें होती हैं) पुलित्ज़र पुरस्कार मिल सकता है. इस पुरस्कार के आधार पर मैं भी और अच्छी पत्रकारिता कर पाऊंगा. आखिर उम्मीद पर दुनिया कायम है.

इस दलील का कोई ठोस आधार दिखता नहीं है इसलिए ओबामा को पुरस्कार दिए जाने की आलोचनाओं पर नोबेल पुरस्कार समिति ने बचाव में बयान दिया है.

लेकिन अब ये इतिहास में दर्ज हो चुका है कि ओबामा को ये पुरस्कार मिला है लेकिन क्यों... इसकी पड़ताल ज़रुरी है और उन कारणों की भी जो नोबेल समिति के गिनाए कारणों से अलग हैं.

पहले नोबेल समिति की बात करें. डायनामाइट की खोज करने वाले अल्फ्रेड नोबेल की वसीयत के अनुसार इन पुरस्कारों का गठन हुआ था. वसीयत के अनुसार पुरस्कार का एक हिस्सा उस व्यक्ति को जाएगा जिसने पिछले एक वर्ष में देशों के बीच भाईचारा स्थापित करने के लिए, सेनाओं को कम करने या हटाने तथा शांति स्थापना और शांति फैलाने की दिशा में सबसे अच्छा काम किया हो.

पिछले कुछ महीनों में ओबामा ने इस दिशा में छोटी शुरुआत ज़रुर की है. चाहे वो पूर्वी यूरोप में लगने वाले मिसाईल डिफेंस प्रणाली की योजना को रोकने की बात हो या फिर मध्य पूर्व में शांति वार्ताओं को शुरु करने की कोशिश.. लेकिन अभी इनके परिणाम आने में समय लगेगा.

वैसे भी नोबेल पुरस्कार हमेशा से राजनीति से प्रेरित माने जाते रहे हैं. चाहे रुज़वेल्ट हों, हेनरी किसिंगर या फिर यासिर अराफ़ात हो, जब ये पुरस्कार इन नेताओं को दिए गए तो विवाद हुआ था. तो फिर अब ऐसा हुआ तो क्या नया हुआ.

अब मेरी समझ. मुझे लगता है कि इसके लिए थोड़ा पीछे जाने की ज़रुरत है. महात्मा गांधी को उनके जीते जी दो बार नोबेल पुरस्कार के लिए नामित किया गया लेकिन उन्हें ये पुरस्कार उन्हें कभी नहीं दिया गया.

नोबेल समिति को अब भी यह बात खटकती है कि वो गांधीजी को पहचानने में ( नोबेल शांति पुरस्कार देने में ) देरी कर गए.

आगे चलकर नोबेल समिति ने माना कि गांधीजी को पहले ही नोबेल न देना एक ग़लती थी.

वैसे भी नोबेल पुरस्कार किसी को भी मरणोपरांत नहीं दिए जाते. ऐसा मात्र एक बार हुआ था जब स्वीडन के डैग्स हैमर्सकोल्ड को मरणोपरांत यह सम्मान दिया गया था.

अब किसी को भी मरणोपरांत यह सम्मान नहीं दिया जाता है.

शायद इसी कारण ओबामा को बिना किसी ठोस काम के पहले ही नोबेल पुरस्कार दे दिया गया ताकि बाद में नोबेल समिति को दोबारा न कहना पड़े कि वो ओबामा को पहचानने में पीछे रह गए.

दूसरा कारण...(मेरे हिसाब से)... ओबामा जब पुरस्कार लेंगे तो धन्यवाद भाषण देंगे और उसमें शायद उस व्यक्ति का ज़िक्र न हो जिसके कारण उन्हें ये पुरस्कार मिला है. वो होंगे जॉर्ज डब्ल्यू बुश...

जी हां बुश... चूंकि बुश साहब ने अपने आठ वर्ष के कार्यकाल में दुनिया भर को इतना नाराज़ किया कि उसके सामने ओबामा तो क्या कोई भी राष्ट्रपति होता ( जो शांति की मात्र बात करता ) तो अच्छा लगता.....इराक़, अफ़गानिस्तान और हो सकता था ईरान....बुश में क्षमता थी दुनिया का भविष्य भयावह कर देने की..

इतने ख़तरनाक दिन देखने के बाद दुनिया अगर ये सुने कि कोई अमरीकी राष्ट्रपति युद्ध की बात नहीं कर रहा है तो वो उसे अच्छा लगने लगता है और नोबेल शांति पुरस्कार के योग्य लग ही सकता है.

इनमें से जो कारण आपको सही लगे वो आप मान सकते हैं लेकिन एक बात सभी को माननी पड़ेगी....नोबेल समिति ने अपना काम कर दिया और अब गेंद ओबामा के पाले में है.

भारतीय और मूलतः भारतीय

रेहान फ़ज़लरेहान फ़ज़ल|शुक्रवार, 09 अक्तूबर 2009, 19:43

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वेंकटरामण रामकृष्णन को नोबेल क्या मिला भारतीय ख़ुशी से झूम उठे. अगले दिन भारत के हर अख़बार और टेलिविज़न चैनल की सुर्खी थी की एक भारतीय वेंकटरामण रामकृष्णन ने इस साल का रसायन शास्त्र का नोबेल पुरुस्कार जीत लिया.

आइए देखें कितने भारतीय हैं रामाकृष्णन.

उन्होंने बरोडा के एमएस विश्वविद्यालय से स्नातक की डिग्री लेने के बाद अमरीका से अपनी पीएचडी की और इस समय वह कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में पढ़ा रहे हैं.

हालाँकि अब तक 12 नोबेल पुरस्कार विजेता ऐसे हुए हैं जिनका कुछ न कुछ संबंध भारत से रहा है.

लेकिन इनमें से सिर्फ रबिन्द्रनाथ टैगोर और सर सीवी रमण को ही सही मानो में भारतीय कहा जा सकता है.

हरगोविंद खुराना को 1968 में मेडिसिन का नोबेल मिला. अविभाजित भारत के रायपुर (अब पाकिस्तान) में जन्मे खुराना 1945 में लाहौर विश्वविद्यालय से एमएससी करने के बाद अमरीका चले गए.

1983 में नोबेल पाने वाले एस चंद्रशेखर भी लाहौर में जन्मे थे लेकिन वह भी चेन्नई से स्नातक की डिग्री लेने के बाद अमरीका जाकर वहीं बस गए.

1998 में अर्थशास्त्र के लिए नोबेल पुरस्कार पाने वाले अमर्त्य सेन भी शांतिनिकेतन और प्रेसिडेंसी कॉलेज से पढ़ाई करने के बाद पहले ब्रिटेन और फिर अमरीका चले गए.

1979 में नोबेल शांति पुरस्कार पाने वाली मदर टेरेसा ने हालाँकि अपनी ज़िंदगी का बहुत बड़ा हिस्सा भारत में बिताया लेकिन वह जन्मी अल्बानिया में थीं.

सर सीवी रमण के बाद भारत को अब भी एक ऐसे व्यक्ति का इंतज़ार है जिसने भारत में रहते और काम करते हुए नोबेल पुरस्कार जीता हो.

नोबेल पुरस्कार के 108 वर्षों के इतिहास में सिर्फ बारह पुरस्कार विजेताओं का संबंध भारत से रहा है जबकि सिर्फ कैम्ब्रिज की मोलेकुलर बायोलोजी प्रयोगशाला ने अब तक तेरह नोबेल पुरुस्कार विजेता दिए हैं.

रामकृष्णन ट्रिनिटी कॉलेज के फ़ेलो हैं. अमर्त्य सेन का सम्बन्ध भी ट्रिनिटी कॉलेज से रहा है.

एक मज़ाक प्रचलित है कि अगर आप इस कॉलेज पर पत्थर फेकें तो वो किसी न किसी नोबेल पुरस्कार विजेता को लगेगा. क्या कारण है कि 1947 के बाद भारत में काम कर रहे किसी भी व्यक्ति को विज्ञान से सम्बंधित नोबेल पुरस्कार नहीं मिला है?

क्या वजह है भारत की आईआईटीज़ जिनकी आध्यात्मिक जगत में तूती बोलती है-एक भी नोबेल पुरस्कार विजेता नहीं पैदा कर सकी हैं.

एक रोचक तथ्य ये भी है कि भारत में नोबेल पुरस्कार जीतने में तमिलनाडु और बंगाल में होड़ लगी हुई है.

रामकृष्णन, सुब्रमनियम चंद्रशेखर और सीवी रमण अगर तमिलनाडु से हैं तो टैगोर, अमर्त्य सेन और मदर टेरेसा बंगाल का प्रतिनिधित्व करते हैं.

बंगाल से ये तर्क भी आता है कि जगदीश चंद्र बोस और सत्येन्द्रनाथ बोस भी नोबेल पुरस्कार के हक़दार थे लेकिन उन्हें ये पुरस्कार कभी नहीं मिला.

अगर आप बांग्लादेश के नोबेल शांति पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस को भी शामिल कर लें तो वह भी बंगाली ही हैं.

नोबेल पुरस्कार न पाने वाले भारतीयों की लिस्ट भी काफी लंबी है. कमला दास, महाश्वेता देवी और फैज़ अहमद फैज़ को अगर आप छोड़ भी दें तो इसको आप क्या कहेंगे कि महात्मा गांधी को पांच बार नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया लेकिन एक बार भी उन्हें पुरस्कार पाने योग्य नहीं समझा गया.

यही हश्र नेहरू का भी हुआ. उन्हें ग्यारह बार नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया लेकिन उन्हें एक बार भी पुरस्कार लेने के लिए स्टॉकहोम जाने का सौभाग्य नहीं मिला.

रामाकृष्णन के नोबेल पुरस्कार पर भारतीयों को नाज़ हो सकता है और होना भी चाहिए लेकिन ज़रुरत है नौकरशाही के चंगुल में फंसे शोध संस्थानों को आज़ादी देने, बेहतरीन दिमागों के पलायन को रोकने और वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देने की.

ठन ठनन ठानाँ ठणन

वुसतुल्लाह ख़ानवुसतुल्लाह ख़ान|गुरुवार, 08 अक्तूबर 2009, 12:05

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जितना ऊधम दिल्ली की लोकसभा में उस समय मचा था जब मन मनोहन सिंह ने अमरीका-भारत असैनिक परमाणु संधि संसद से पारित कराने के लिए अपनी राजनीतिक पगड़ी दाँव पर लगा दी थी, उस से दोगुना बवाल उस समय पाकिस्तान में कैरी-लूगर बिल के मामले पर खड़ा हुआ है.

भांत भांत के टीवी चैनल्स पर इतना शोर है कि हर बोलने वाला दूसरे से पूछ रहा है कि मैं ने अभी अभी क्या कहा? इस ऊधम बाज़ी में हैलरी क्लिंटन की यह बात भी दब कर रह गई है कि बिल पर बात करने से पहले उसे पढ़ तो लो.

कैरी-लूगर बिल की निंदा करने वालों का सारा बल उस पर है कि अमेरिका को यह जुर्रत कैसे हुई कि वह सहायता की क़िस्त देने से पहले अमरीकी विदेश मंत्री से यह सर्टिफ़िकेट माँगे कि पाकिस्तानी सेना लोकतंत्र के ख़िलाफ कोई क़दम नहीं उठाएगी. सैनिक पदों पर अफसरों की तरक़्क़ी के फ़ैसलों में असैनिक सरकार भी भागेदार होगी.

पाकिस्तान आतंकवाद और आतंकवादी संगठनों के चोरी-छुप्पे फैलाव में शामिल लोगों के बारे में पूरी जानकारी देगा. और यह सर्टिफ़िकेट शिक्षा, स्वास्थ और सामाजिक विकास के लिए दिए जाने वाले पैसे पर नहीं बल्कि सैनिक सहायता के लिए चाहिए होगा.

लेकिन कैरी-लूगर बिल विरोधियों को इस बात से कोई दिलचस्पी नहीं है कि इस के एक एक शब्द को पढ़ें. सब अपने कान चेक करने के बजाए कुत्ते के पीछे भाग रहे हैं.

"ज़रदारी ने पाकिस्तान को सस्ते में बेच दिया है." "इस बिल के अनुसार मिलने वाली सहायता से पाकिस्तान की संप्रभुता ख़तम हो जाएगी." "यह सर्टिफ़िकेट वाली बात भारतीय लॉबी ने बिल में डलवाई है." "अमेरिका चाहता है कि पाकिस्तानी सेना की शक्ति ही ख़तम हो जाए." "यह पाकिस्तान को बदनाम करने का षडयंत्र है." "हम भूखे मरना पंसद करेंगे लेकिन शर्तों वाली भीख नहीं लेंगे." आदि, आदि, आदि.

लेकिन इस शोर शराबे का एक बड़ा कारण यह भी है कि मीडिया चाहे कहीं का भी हो यह वह वैम्पायर है जिसे हर रात अपने पेट की आग बुझाने के लिए ताज़ा मोटा शिकार चाहिए.

कोई चाल ऐसी चलो यारो अब,
कि समन्दर भी पुल पर चले
फिर वो चले उस पे या मैं चलूँ
शहर हो अपने पैरों तले
कहीं ख़बरें हैं, कहीं क़ब्रें हैं
जो भी सोए हैं क़ब्रों में उनको जगाना नहीं
ठन ठनन ठानाँ ठणन, ठन ठनन ठानाँ ठणन

मुंबई या बंबई...

राजेश प्रियदर्शीराजेश प्रियदर्शी|मंगलवार, 06 अक्तूबर 2009, 05:36

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पहले राज ठाकरे नाराज़ हुए और उसके बाद महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अशोक चह्वाण.

अगर आपके पास ऊँची कुर्सी हो या सिनेमा हॉल की कुर्सियाँ उखड़वाने की ताक़त हो तो आप भी करण जौहर से नाराज़ हो सकते हैं. वे माफ़ी भी माँग लेंगे.

आप बताइए ज़्यादा बड़ी गलती मुंबई को उसके पुराने नाम से बुलाना है या उसके लिए माफ़ी माँगना. वह भी एक ऐसे आदमी से, जो मानता है कि तोड़फोड़ के बिना महाराष्ट्र का 'नवनिर्माण' संभव नहीं है.

अगर आप नागरिकों के अधिकार-कर्तव्य वग़ैरह की बात करने वाले 'भावुक आदमी' हैं तो आपको मुख्यमंत्री की बात सही लगेगी, अगर आप सही टाइम पर सही काम करने वाले 'समझदार आदमी' हैं तो करण जौहर को अशोक चह्वाण से भी माफ़ी माँगकर काम पर जुट जाने की सलाह देंगे.

मुख्यमंत्री अशोक चह्वाण कह रहे हैं कि पुलिस के पास क्यों नहीं गए, मुख्यमंत्री हैं इसलिए कहना उनका काम है. पांडु हवालदार और राज ठाकरे में से किसकी शरण में जाना है, यह हर समझदार आदमी को पता है.

जब तक महाराष्ट्र के 'नवनिर्माण में जुटे सामाजिक कार्यकर्ता' शिव सेना की जड़ें कुतर रहे हैं राज्य के कांग्रेसी मुख्यमंत्री को भला क्या एतराज़ हो सकता है, उन्हें अगर एतराज़ होता तो दो दिन बाद बयान देने के बदले समय पर कार्रवाई न करते?

यह तो इन दिनों की राजनीति की बात है लेकिन समानांतर सेंसर बोर्ड का मुख्यालय 'मातुश्री' में बरसों से रहा है, दूल्हे के बैठने वाली कुर्सी पर साधु जैसे कपड़े पहनकर रुद्राक्ष के मनके फेरने वाले पूर्व कार्टूनिस्ट से कभी माफ़ी, तो कभी आशीर्वाद लेने बीसियों निर्माता-निर्देशक जाते रहे हैं.

करण जौहर ने कुछ नया नहीं किया है, न अपनी फ़िल्मों में, न असलियत में.

क़ायदे-क़ानून से परे दलालों, पूंजीपतियों, महंतो, मठाधीशों और गुंडों के दरबारों में मत्था टेकने का आदी समाज 'वेक अप सिड' से उठे विवाद को 'वेक अप कॉल' की तरह तो नहीं देख रहा है.

कुछ मेरी कुछ आपकी बात

अमित बरुआअमित बरुआ|शुक्रवार, 02 अक्तूबर 2009, 18:13

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बीबीसी हिंदी सेवा प्रमुख के रूप में आज आपसे रूबरू हूँ. हिंदी ऑनलाइन पर यह मेरा पहला ब्लॉग है और आप से संपर्क क़ायम करने का एक मौक़ा भी. लेकिन ज़रूरी है कि पहले आप को अपना थोड़ा सा परिचय दे दूँ.

मैं वर्ष 1986 से पत्रकार हूँ. जब से मैंने कॉलेज छोड़ा तब से ही मैं पत्रकारिता कर रहा हूँ. और कुछ करने का कभी मन ही नहीं किया. इसी में खुश था और खुश हूँ. पत्रकारिता एक तरह से मेरी ज़िंदगी है.

मैं तक़रीबन बीस साल तक "दी हिन्दू" के साथ जुड़ा रहा. इस अख़बार में मैंने हर तरह की रिपोर्टिंग की -- चाहे वो दिल्ली शहर के मसले हों, कश्मीर में बग़ावत, बस्तर में नक्सली हिंसा या देश में प्राइवेट एयरलाइन्स का आगमन. 1995 में मैं श्रीलंका संवाददाता बन कर कोलम्बो चला गया. फिर 1997 में पाकिस्तान और 2000 में सिंगापुर.

भारतीय अख़बार के लिए विदेशी कॉरेस्पॉंडेंट का रोल मैंने एक दशक तक निभाया. फिर मन किया कि दिल्ली लौट जाऊं. जुलाई 2002 से लेकर जुलाई 2009 तक मैंने भारत की विदेश नीति और देश की अंतरराष्ट्रीय छवि पर अनगिनत लेख लिखे.

एक अगस्त से मैंने बीबीसी की हिंदी सेवा के प्रमुख का कार्यभार संभाला.

अब बहुत हुई अपनी बातें. अब आप की बात.

मेरी समझ में पत्रकरिता का उद्देश्य लोगों की समस्याओं को उजागर करना है. यही पत्रकारिता का दायित्व है और यही उसका औचित्य. अगर हम लोगों के साथ जुडेंगे नहीं तो हमारी पत्रकारिता फीकी-सी ही रह जाएगी.

हमारी यह कोशिश रही है और रहेगी कि देश-दुनिया की ख़बरें आप तक पहुँचाते रहें. लेकिन यह आप के सहयोग के बिना मुमकिन नहीं है. आप किस तरह के समाचार और विश्लेषण चाहते हैं? क्या इसका संबंध राजनीति से हो या फिर सीधे आप की ज़िंदगी से? क्या हमें अंतरराष्ट्रीय समाचारों पर ज़्यादा ज़ोर देना चाहिए या क्षेत्रीय पर?

इस बारे में आपके सुझावों, आपकी फ़ीडबैक का इंतज़ार रहेगा.

राहुल, जेएनयू और सवाल..

सुशील झासुशील झा|गुरुवार, 01 अक्तूबर 2009, 22:05

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राहुल गांधी उत्तर प्रदेश में दलितों की बस्ती से अब सीधे जेएनयू यानी जवाहरलाल नेहरू विश्विद्यालय पहुंचे हैं. शायद ग़रीबों के साथ साथ बुद्धिजीवियों में भी पैठ बनाना चाहते हों. दलितों की बस्ती तो चुपचाप गए लेकिन जेएनयू पूरी सुरक्षा के साथ...

बुद्धिजीवियों से ख़तरा तो नहीं था... वैसे नेताओं को जेएनयू में हमेशा ख़तरा रहता है लेकिन जान का नहीं..बल्कि सवालों का...और उस ख़तरे से सामना राहुल का भी हुआ.

जैसाकि कहते हैं, जेएनयू वाले ताउम्र जेएनयू वाले रहते हैं. पत्रकारिता में आने के बाद भी मेरा इस संस्थान से नाता टूटा नहीं है और संयोग से उस दिन मैं वहीं मौजूद था.

तो पहले ये बता दूं कि राहुल के आने से पहले कैंपस में इतने पुलिसवाले पहुंच चुके थे जितने उनकी सभा में भी न पहुंचे थे. पार्टी वालों ने बड़ा सा पंडाल बनवाया था राहुल के लिए जो जेएनयू में कम ही होता है.

यहां बड़े बड़े नेता.. यहां तक कि दलाई लामा जैसी हस्तियां भी खुले में बात करती हैं... हां लेकिन फिर दलाई लामा या सीताराम येचुरी कांग्रेस पार्टी के युवराज भी तो नहीं हैं...

राहुल आए... एक छात्रावास में खाना खाने की इच्छा जताई... झेलम के छात्रावास में खाया और फिर पहुंचे छात्रों से मिलने...भाषण देने... भाषण भी दिया सवालों के जवाब भी दिए....लेकिन जेएनयू के छात्रों को प्रभावित करना इतना आसान शायद नहीं है.

राहुल को भी काले झंडे दिखाए गए लेकिन ये कोई नई बात नहीं थी क्योंकि यहां तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को भी काले झंडे दिखाए गए हैं.

जेएनयू की रवायत सवाल पूछने की रही है और राहुल को शायद ये पता था सो उन्होंने भी भाषण बीच में ही छोड़ा और बोले --- सवाल पूछो....जवाब देने के लिए मंच से उतर भी आए..

सवालों की झड़ी लगी.. कारपोरेट को टैक्स में छूट से लेकर गुटनिरपेक्षता, विदेश नीति, लातिन अमरीका पर भारत की नीति से लेकर वंशवाद पर भी सवाल पूछे गए...

विदेश नीति और आर्थिक मामलों से जुड़े सवालों पर वो कुछ गोल मोल सा ही जवाब देते रह गए... हर दिन मार्क्स, एडम स्मिथ और गॉलब्रेथ पढ़ने वालों को आप यूं ही कोई जवाब तो दे नहीं सकते सो ज़ाहिर था जवाबों से सवाल पूछने वाले असंतुष्ट ही रह गए....

फिर बारी आई कैंपस के एक चिर क्रांतिकारी की. उन्होंने तीखे अंदाज़ में सवाल दागा.... आपने कितने झंडे उठाए कहां नारे लगाए.. बस नेता बन गए.. परिवार की बदौलत.

राहुल थोड़ा रुके......कुछ सेकंड शांति हुई फिर बोले --- हां मैं परिवार से राजनीति में आया हूं लेकिन इस प्रथा को बदलने की पूरी कोशिश कर रहा हूं.

बदलाव की बात उनके पिता राजीव गांधी ने भी की थी लेकिन आगे वो नहीं कर पाए जो वो करना चाहते थे. क्या करते राजनीति के पेच में फंस जो गए......राहुल शायद अभी राजनीति के उन पेचों खम से अछूते हैं ...तभी सवाल सुनते हैं और जवाब देने की कोशिश भी करते हैं..

सवाल सुनने की ये आदत राजनीति में छूट जाती है.....देखते हैं राहुल कब तक ये आदत बरकरार रख पाते हैं.



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