जाम में माया ध्यान!
अभी कुछ दिन पहले उत्तर प्रदेश के अमरोहा और मेरठ में छुट्टियाँ बिताने के दौरान सरकारी बस से कहीं जाना हुआ और रास्ते में ट्रैफ़िक जाम मिला तो दो घंटे का रास्ता सात घंटे में तय हुआ. जाम के दौरान कुछ और करने को था नहीं इसलिए दिमाग़ के घोड़े दौड़ने लगे - आसपास के माहौल, राजनीतिक स्थिति और लोगों के बीच जिन बातों की चर्चा हो रही थी, उन्हीं विषयों पर..
उन्हीं दिनों ख़बर गरम थी कि बहुजन समाज पार्टी की मुखिया और उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री लोगों को सलाह देती फिर रही थीं कि उनकी ख़ुद की प्रतिमाओं पर अरबों रुपए भले ही ख़र्च हो रहे हैं लेकिन उनसे आख़िरकार आम लोगों ख़ासकर दलितों को फ़ायदा होगा क्योंकि वे उन पार्कों में आकर चैन और फ़ुरसत के कुछ लम्हे गुज़ार सकते हैं. 
मैं उस जाम के दौरान यही सोचता रहा कि जिन लोगों को खाने के लाले पड़े रहते हैं, जिनके स्वास्थ्य की कोई क़ीमत नहीं, जिनके बच्चों को शिक्षा मिलना अब भी एक ख़्बाव बना हुआ है, उन्हें अरबों रुपए की लागत से बनने वाली मायावती और काँशीराम की प्रतिमाएँ किस तरह और कितना फ़ायदा पहुँचाएंगी?
एक सवाल ये भी कौंधा कि अगर दलितों या आम लोगों को ये प्रतिमाएँ देखने जाना भी होगा तो क्या उन्हें हेलीकॉप्टर मिलेगा? वो जाएंगे तो सड़क के ज़रिए ही लेकिन अगर दो घंटे का रास्ता सात या आठ घंटे में तय होगा तो उनका पेट कैसे भरेगा. इस सवाल का जवाब तो मायावती ही दे सकती हैं. बहरहाल, बस में बैठे लोग बेहाल थे, किसी की ख़ुद की तबीयत ख़राब हो रही थी तो किसी को दवाई लेकर जल्दी घर पहुँचना था.
किसी बच्चे की किलकारी और चीख़ से मेरा ध्यान टूटता लेकिन बस में सिर्फ़ सोचते रहने के सिवाय मेरे पास कोई चारा नहीं था. मैं सोचने लगा कि शेरशाह सूरी ने सदियों पहले जब हज़ारों मील लंबा ग्रांट ट्रंक रोड बनवाया था तो उसे क्यों नहीं ख़याल आया कि हर एक मील के फ़ासले पर वो भी अपनी प्रतिमाएँ बनवाता जिससे उस सड़क से गुज़रने वाले लोग उसे हर पल याद करते. पर उसे तो लोग और इतिहास मूर्तियों की वजह से नहीं, सड़क की वजह से याद करते हैं.
मैंने उस जाम में इस उम्मीद के साथ माया (मायावती) ध्यान करने की कोशिश की कि हो सकता है इससे सड़कों और लोगों की हालत अच्छी होने में कुछ मदद मिल सके. बहुत से अन्य लोगों की ही तरह मैं भी उस दिन के इंतज़ार में हूँ जब कोई काला बंदर या स्पाइडरमैन आकर कोई करिश्मा करेगा क्योंकि आम लोगों ने तो सब कुछ, पुलिस, प्रशासन और राजनेताओं पर छोड़ दिया है.








