« पिछला|मुख्य पोस्ट|अगला »

कब वयस्क होगा 62 साल का नाबालिग़?

ज़ुबैर अहमदज़ुबैर अहमद|रविवार, 18 अक्तूबर 2009, 08:00 IST

हाल ही में महाराष्ट्र विधान सभा चुनावी प्रचार के दौरान मैं मध्य नासिक चुनावी चेत्र में था. मैं एक कच्ची मुस्लिम बस्ती वडाला गया हुआ था जहां एक तंग सड़क के दोनों तरफ दुकाने थीं, कच्चे घर थे और ढेर सारे रेहड़ी वालों ने सड़क को और भी तंग बना दिया था.

हज्जाम, मालिश करने वाले, क़साई, सब्ज़ी वाले, फल वाले और चाय-पान की दुकान के मालिक -- सभी को इंतज़ार था उस काफिले का जिसका नेतृत्व कर रही थीं कांग्रेस पार्टी की उम्मीदवार, शोभा बच्चव.

लहराते झंडों और लाउडस्पीकर से गूंजते गानों ने इस बाज़ार नुमा मोहल्ले में पल भर के लिए एक मेले जैसा माहौल पैदा कर दिया था.

खैर शोभा जी आईं, जीत कर, गद्दी पर लौटने के बाद (वो स्वास्थ्य कल्याण उपमंत्री हैं) मुसलामानों की ग़रीबी दूर करने की कोशिश के वादे किए, सेक्युलर ताक़तों को मज़बूत करने को कहा और साम्प्रदायिक तत्वों से बचने की अपील की. इसके बाद अगले मुस्लिम मोहल्ले के लिए रवाना हो गईं.

उनके जाने के बाद भी माहौल मेले जैसा बना रहा क्योंकि वहाँ लोगों की नज़र उस रेस्तरां के सामने टिकी थीं जहां खीर के दो बड़े बड़े मटके रखे हुए थे और जो शोभाजी के जाने के बाद ही लोगों में बांटा जाना था. और हुआ भी वही, केवल फर्क इतना था कि लाइन में लगे खीर खाने वाले लोगों के बीच दो तीन बार लाइन तोड़ने पर झड़पें हुईं.

मैं यह सब तमाशा देख रहा था और तस्वीरें खींच रहा था की एक बूढ़े आदमी ने पीछे से मेरे कंधे पर हाथ रखा और बोला शोभाजी पांच साल पहले यहाँ आई थीं वोट मांगने तब भी यही बातें कही थीं, लेकिन इस बस्ती में कोई विकास नहीं हुआ. उसने कहा उस दिन भी खीर बाँटी गई थी. पिछली बार की तरह इस बार भी यह लोग खीर खाने के बाद उन्हें वोट देने जाएँगे और इस बस्ती की ग़रीबी इसी तरह शायद कभी ख़त्म नहीं होगी.

यह कहकर वह चला तो गया लेकिन मेरे ज़हन में एक सवाल छोड़ गया. क्या वोट बैंक की सियासत आजादी के 62 साल बाद भी इतना खुलकर होती है?

मैं अभी यह सोच ही रहा था की मुझे इस मोहल्ले तक लाने वाले एक नेक आदमी ने आवाज़ दी और कहा कि वो मुझे इस बस्ती से वापस मेन रोड जाने का रास्ता बता सकते हैं.

वह शोभाजी के भतीजे थे और उन्हीं की तरह एक पढ़े लिखे पेशेवर डॉक्टर भी. मैंने उनसे पूछा आपकी आंटी की जीत कितनी यक़ीनी है? उन्होंने पलक झपकने से पहले कहा, सौ फ़ीसद यक़ीनी है. मैं ने पूछा आप यह कैसे कह सकते हैं, उन्हों ने कहा: "इस मोहल्ले से लगे मीलों तक मुसलामानों की कई बस्तियां हैं. वो मध्य नासिक के तमाम वोटरों का चालीस प्रतिशत हैं. वे सारे वोट हमारी झोली में हैं."

अगले दिन मुंबई में मुख्य मंत्री अशोक च्वहाण के एक पत्रकार सम्मलेन में गया. किस विषय पर बात होगी यह नहीं बताया गया था. सम्मलेन को सबसे पहले संबोधित किया अजमेर के एक बड़े पीर ने. उन्होंने मुसलामानों से अपील की के वह सेक्युलर ताक़तों को वोट देकर उनके हाथ मज़बूत करें. उन्होंने आगे कहा कि चूँकि कांग्रेस और राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टियां सेकुलर हैं इसलिए मुसलमान इन्हीं को वोट दें.

इसके बाद मुख्यमंत्री ने उनका शुक्रिया अदा किया और मुसलामानों के विकास के लिए कुछ क़दम उठाने का एलान किया उनमें ख़ास थे मदरसों को मदद, उर्दू भाषा का प्रचार और मुसलमानों को पुलिस फोर्स में भरती करना.

मुझे याद आई 2004 के चुनाव के पहले शिव सेना प्रमुख बाल ठाकरे से एक मुलाक़ात जिसमें उन्होंने लगभग वही वायदे किए थे जो मुख्यमंत्री ने पत्रकार सम्मलेन में किए.

स्पष्ट है कि 62 साल से इन बस्तियों में रहने वाले मुसलमान अब तक बाहर क्यों नहीं निकल पाए हैं और भारत की सबसे बड़ी अल्पसंख्यक आबादी इन बस्तियों में अब तक क्यों रहती है.

लेकिन क्या यह बात इन बस्तियों को की समझ में नहीं आती? यह 62 साल के नाबालिग़ से कौन पूछे?

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 15:30 IST, 18 अक्तूबर 2009 Abdul Karim.S.Aybani:

    आपने बेहतरीन ब्लॉग लिखा है. ये बहुत ही अफसोस की बात है कि आज भी मुसलमान ऐसे पीर बाबा की बात के पीछे चले जाते हैं. उनकी अपनी कोई सोच नहीं है. यदि हर मुसलमान अपनी सोच रखे तो फिर इन पार्टियों के मेहरबानी की कोई जरूरत नहीं रहेगी. सब पार्टी वोट बैंक के लिए झूठे वादे करती है.

  • 2. 15:42 IST, 18 अक्तूबर 2009 dr parveen chopra:

    आप की यह पोस्ट बड़ों-बड़ों को बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करने के साथ-साथ बहुतों की तो बोलती बंद करने वाली है.

  • 3. 20:06 IST, 18 अक्तूबर 2009 Mahadeb Murmu:

    ग़रीबी हमारे देश की सबसे बड़ी समस्या रही है. इसका राजनीति के ज़रिए समाधान नहीं हो सकता है. सिर्फ़ ग़ैर-सरकारी संगठनों की सहायता के साथ-साथ हम सबको भी इसके ख़िलाफ़ लड़ना होगा.

  • 4. 20:50 IST, 18 अक्तूबर 2009 Mohammad Intekhab Alam:

    सच में आपका ब्लॉग दिल को छूने वाला है. भारत की कोई भी पार्टी मुस्लिम समाज की प्रगति नहीं चाहती है. सिर्फ़ उसका शोषण चाहती है. लेकिन इसमें किसी पार्टी की भी ग़लती नहीं है. अगर लोग अपनी घर की कुंडी खुली रखेंगे तो उनके घर में चोरी होना लाज़मी है. अगर आज का मुसलमान सब काम अपनी क़िस्मत और सरकार के ऊपर छोड़ देगा और ख़ुद के लिए कोई कोशिश नहीं करेगा तो उसका वही हाल होगा जैसे कि आपने लिखा है.
    मै समझता हूँ कि आज के मुसलमान को अपनी तक़दीर ख़ुद लिखनी चाहिए या उसके लिए ख़ुद कोशिश करनी चाहिए.

  • 5. 21:11 IST, 18 अक्तूबर 2009 yousuf khan:

    आप ने इस दुखती रग को पकड़ा ज़रूर है ज़ुबैर भाई लेकिन इस समस्या का समाधान करने वाला तो ख़ुद मुसलमान भी नहीं है. अब कर ही क्या सकते हैं. राजस्थान में तो मुसलमानों के लिए वसुंधरा सरकार अच्छी थी लेकिन गहलोट ने मदरसे के टीचरों को तनख़्वाह तक नहीं दी.

  • 6. 21:21 IST, 18 अक्तूबर 2009 satnam singh:

    आपका ब्लॉग बहुत अच्छा लगा. ख़ुसी हुई कि अब भी ऐसे पत्रकार हैं जो सच लिखते हैं. आपने मुसलमानों की बात की पर हर कमज़ोर वर्ग क यही हाल है. हर राज्य में यही हाल है, हर बार नेता आते हैं, वायदे करते हैं, जीत कर बस पाँच साल फिर नहीं आते. इसकी वजह वे ख़ुद हैं क्योंकि वे अपने आप को बदलने की कोशिश नहीं करते. कुछ लोग है जो आवाज़ उठाते हैं, उनकी आवाज़ दब कर रह जाती है. जब तक सभी लोग जागृत नहीं होंगे, हमारा समाज नहीं बदल सकता. आप ने तो 62 साल की बात की है आने वाले 100 साल भी यही हाल होगा. क्योंकि ख़ुदा ने आज तक उस क़ौम की तक़दीर नहीं बदली है जो ख़ुद अपना हालात बदलने की कोशिश नहीं करता.

  • 7. 22:21 IST, 18 अक्तूबर 2009 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:

    दुख इस बात का है कि देश की आज़ादी के बाद भारत में कॉंग्रेस ने अधिक समय तक हुकूमत की लेकिन सबसे पीछे मुसलमान को रखने में भी कॉंग्रेस का ही हाथ है. यह बात आज का मुसलमान समझने या मानने को तैयार नहीं है. जिस दिन यह बात मुसलमान समझेगा उस दिन 62 साल की इस कहानी का अंत हो जाएगा और इस क़ौम की क़द्र ह जाएगी.

  • 8. 00:30 IST, 19 अक्तूबर 2009 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:

    ज़ुबैर साहब, बहुत सुंदर और सच लिखा है आपने. यह नाबालिग़ 62 साल तो क्या 120 साल के बाद भी वयस्क नहीं हो सकेगा जब तक यह समाज नहीं समझ लेता कि एक छोटी सी मिसाल के तौर पर...अगर किसी मुसलमान का ट्रक या टेम्पो पुलिस ने रोक लिया तो वह भाग कर नेता जी के पास जाता है या फिर नेता जी को पुलिस स्टेशन फ़ोन करके कहता है कि भाई इस गाड़ी को छुड़वाओ, आपको जो प्रसाद (सुविधा शुल्क) चाहिए वह ले लो. बस, मियाँ जी ने पैसा भी दिया और नेता जी की सिफ़ारिश भी. जिस दिन यह बात समझ में आ जाएगी मेरा दावा है कि भारत में मुसलमान पूरी तरह वयस्क ही नहीं जवान हो जाएगा.
    मुसलमान का भला यह कॉंग्रेसी नेता कभी भी नहीं कर सकते हैं. आज़ादी के बाद सिर्फ़ वोटों के लिए इस्तेमाल किया है और करेंगे. जब तक मुसलमान ख़ुद नहीं समझेगा.

  • 9. 03:12 IST, 19 अक्तूबर 2009 Arunesh, California, USA:

    बड़े दिनों बाद आप का ब्लॉग बीबीसी पर पढ़ कर लगा कि बीबीसी में वास्तव में अच्छे ब्लॉग लिखने वाले मौजूद हैं. आपक ब्लॉग तथार्थपूर्ण है साथ ही यह सोचने पर मजबूर करता है कि आज भी इतनी बड़ी तादाद में लोग अपने वोट किसी धर्मगुरू के आह्वान पर डालते हैं. निसंदेह लोग इस ग़ुलामी के ख़ुद ज़िम्मेदार हैं. जब तक लोग ऐसे ही नाबालिग़ों की तरह आचरण करते रहेंगे, सत्ता के गलियारों में उन्हें इसी की खीर खिला कर बेवक़ूफ़ बनाया जाता रहेगा. मैं आपने भविष्य में इसी तरह के उमदा, विचारोत्तेजक ब्लॉग्स की उम्मीद रखता हूँ. वर्तमान राजनीति में आज के लोगों की मानसिकता का यह बेहतरीन उदाहरण है.

  • 10. 03:37 IST, 19 अक्तूबर 2009 Shashank Singh:

    ज़ुबैर अहमद साहब ने इन राजनेताओं के असली रूप का एक परिचय दिया है और ऊन्होने जो सवाल पूछा है उसका जवाब शायद इस देश के नेताओं के पास भी नहीं होगा.
    काश यह चुनावी खीर शोभा बच्चव ने पिछले पॉँच सालों में कीसी ज़रुरतमंदों को खिलाई होती तो उन्हें और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री को चुनावों के ठीक पहले किसी पीर की सहायता नहीं लेनी पड़ती.

  • 11. 06:20 IST, 19 अक्तूबर 2009 pankaj kumar singh 09951879247:

    ज़ुबैर जी, आपकी बातें सही हैं पर बुद्धिजीवियों की कौन सुनता है. भारत में चुनाव सुधार के इतिहास रचने वाला शख़्स एमपी तक नहीं बन सकता, किसे दोष देंगे?
    लोकतंत्र कहाँ है, शायद ब्लॉग में ही...मीडिया में भी दम तोड़ रहा है. किसी मीडिया हाउज़ में आंतरिक लोकतंत्र है?

  • 12. 12:24 IST, 19 अक्तूबर 2009 BALWANT SINGH ,HOSHIARPUR ,PUNJAB:

    जुबैर साहब इस बार अपने दुखती राग पर हाथ रखा है | यह आजादी के बाद के इतिहास का एक दागनुमा पन्ना है और इसे हर राजनितिक दल ने पलटा लेकिन इसकी पृष्ठभूमि में वोट बैंक के अलावा कुछ न देखा | इस में भी कोई दो राय नहीं की हर राजनितिक सौदागर ने ऐसी बस्तियों को गरीबी और मुफलिसी की खाद-पानी डालकर खूब सींचा है | दरअसल कबूतर आँख बंद करके बैठा है तो बिल्ली भी घात लगाकर बैठी है | बिल्ली की फितरत तो शिकार करना है | मैं यह नहीं समझ पाया की एक तरफ सियासी पार्टियां अपने आपको धर्मनिरपेक्ष कहतीं नहीं थकतीं और दूसरी तरफ धार्मिक नुमाइंदों व् धर्म गुरुओं को सियासी अखाडे में क्यों धकेल दिया जाता हैं ?यह बात अब तो आम जनता को समझनी चाहिए क्योंकि ६२ साल का बहुत बड़ा अरसा था इसकी जड़ों तक जाने के लिए | अगर ऐसी बस्तियां फलफूल रहीं हैं ,धर्म और भाषा के नाम पर गुमराह किया जाता रहा है तो यह धार्मिक नुमाइंदे बहुत बड़े कसूरवार हैं | या फिर चुनावों के बाद अपने एक -एक शब्द का धर्म और ईमान के नाम पर मांगे गये वोटों का हिसाब सरकार व् राजनितिक नुमाईन्दों से मांगे ताकि यह तंग बदहाल बस्तियां भी एक आदर्श कस्बा बन सकें | कुल मिलाकर इस बदहाली के लिए राजनेता ,धर्मगुरु व् जनता बराबर तरीके से कसूरवार हैं | यह सीधा -सीधा चारा डालो व् शिकार फसाओ और अगले आखेट तक भूल जाओ वाला खेल है | बड़ा दुखद पहलू है की आज भी इस इलेक्ट्रोनिक व् चाँद पर घर बसाने वाले युग में भी एक आम इंसान तथाकथित पीर ,बाबाओं , धर्माधिकारियों के बहकावे में आकर बच्चों को पोलियो जैसी बीमारी के ड्रोप्स पिलाने से कतराता है | यह सब क्या है ?वास्तव में इसकी जड़ में अशिक्षा व् अनभिज्ञता है | जो की सियासी सौदागर नहीं चाहते हैं वरन वोट बैंक हाथ से गया समझो | इस नासमझी के कुम्भकर्ण को अब जाग जाना होगा नहीं तो ऐसे ही अनजान शिकारियों के चुंगल में फंसे रहना होगा | और इस चक्रव्यूह से निकालने के लिए कोई नहीं आने वाला है | सालों - साल यह सिलसिला चलने वाला है | बेशक राजनितिक उतराधिकारियों की पीढियां बदलती रहेगीं लेकिन इन मलीन बस्तियों की तकदीर नहीं बदलने वाली | खुद को ही संभालना होगा | कहते हैं न कि "खुदा भी उन्हीं की मदद करता है जो अपनी मदद खुद करते है" | इसलिए भेडचाल, बहेलियों व् बहुरूपियों से सावधान होकर अपनी अगली पुश्तों का भविष्य सुनहरी बनाने के लिए शिक्षा व् जागरूकता के हथियार से पुख्ता बनाने की दरकार है न कि नारे बाजी ,भाषणों व् छोटे -मोटे लालचों में आकर अपने अमूल्य वोट को बेचने की | जब जागो तभी सवेरा है |

  • 13. 21:00 IST, 19 अक्तूबर 2009 rahul priyadarshi:

    यह एक आम बात है,जिसे शायद हर कोई जानता है लेकिन कोई मुँह नही खोलता...बड़े बड़े लोगो के सामने ज़बान खोलने पर आगे भी ज़बान चलती रहे,इसका चांस बहुत कम होता है.
    आप जैसे लोग सवाल उठाएँ तो बात जमती है, वरना ज़हन तो सबका धिक्कारता है, पर क्या करे पावर भी पावर वाले के पास ही है.

  • 14. 01:10 IST, 20 अक्तूबर 2009 Gaurav Shrivastava:

    ज़ुबैर साहब, आपने बहुत अच्छा लेख लिखा है. मैं सोचता हूँ कि जब तक एक आम मुसलमान भारत से जुड़ाव महसूस नहीं करेगा, उसे पार्टियाँ धर्मनिरपेक्षता के नाम पर इस्तेमाल करती रहेंगी. आज आम मुसलमान पाकिस्तान और अन्य मुस्लिम देशों की ओर अधिक आकर्षित होता है. जब तक मुसमलान भारत को अपनी जन्मभूमि नहीं मानने लगेगें उन्हें ऐसे ही इस्तेमाल किया जाता रहेगा. उसे भारत की मुख्यधारा में शामिल होना ही चाहिए. मुसलमानों को स्वयं चाहिए कि वे अपने लिए अलग क़ानून और रवैये का विरोध करें.

  • 15. 19:19 IST, 21 अक्तूबर 2009 ABRAR AHMED JEDDAH:

    ज़ुबैर साहब, यह बात नासिक की एक बस्ती की नहीं है या किसी समाज की बात नहीं है बल्कि भारत के अधिकतर गाँवों या बस्तियों की यही हाल है. आप ने कभ ट्रक के पीछे लिखा देखा होगा, मेरा भारत महान, भारत मेरा देश है. ये नाबालिग़ आज तक अपने आप को ख़ानदानी कॉंग्रेसी समझते आए हैं. फिर अगर कॉंग्रेस को वोट नहीं डाले तो किसको डालेंगे. यह तो ख़ानदान वालों को चाहिए कि इसके लिए मदरसा या उर्दू के बजाय अंग्रेज़ी का मॉडर्न स्कूल खोलें ताकि वे लोग मुख्यधारा से जुड़ें.

  • 16. 13:13 IST, 22 अक्तूबर 2009 GAUTAM SACHDEV, NOIDA:

    जुबैर अहमद साहब भारतीय राजनीति में सिर्फ एक चीज बहुतायत में है | जो है व्यक्तिगत सोच यहाँ तो सभी अपने लिए मरते हैं वो कोई भी हो , किसी ने आज तक किसी के बारे में नहीं सोचा है |यहाँ तो वादों के साथ संवेदनाओं के भी रकम मिलते हैं |लोग इसे पाकर भी काफी खुश होते हैं , आम आदमी ने अपना जमीर बेच दिया है नहीं तो हमारा देश आज भी विकासशील देशों की कतार में नहीं खडा होता |आप जैसी सोच रखने वाले लोगों की बहुत कमी है शायद आपको पढ़ के भी लोग अपनी सोच में थोडा बहुत परिवर्तन ला सके तो मानव समाज के बहुत हित में होगा

इस ब्लॉग में और पढ़ें

विषय

इस ब्लॉग में शामिल कुछ प्रमुख विषय.

BBC © 2014बाहरी वेबसाइटों की विषय सामग्री के लिए बीबीसी ज़िम्मेदार नहीं है.

यदि आप अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करते हुए इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरूप कर लें तो आप इस पेज को ठीक तरह से देख सकेंगे. अपने मौजूदा ब्राउज़र की मदद से यदि आप इस पेज की सामग्री देख भी पा रहे हैं तो भी इस पेज को पूरा नहीं देख सकेंगे. कृपया अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करने या फिर संभव हो तो इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरुप बनाने पर विचार करें.