संस्कृति का प्रतीक है कुंभ
इलाहाबाद को मैं दो चीज़ों के लिए जानता हूं कुंभ और नेतराम की कचौड़ी. अर्धकुंभ में पहली बार इलाहाबाद आया था और दूसरी बार जब बीबीसी की ट्रेन में आया तो नेतराम की कचौड़ियां यादों की पोटली में बंध कर चली आई थीं.
एक बार फिर इलाहाबाद में हूं. मौसम साफ है शायद कुंभ के लिए. एक दो दिन पहले तक सर्दी सूरज को आंखें दिखा रही थी. लेकिन अब सूरज दिन में आंखें दिखाने लगा है.
महाकुंभ की तैयारियां लगभग पूरी हैं. कुछ सड़कों की सफाई और तंबूओं की सुविधाएं ठीक होनी बाकी हैं. आस्था का मेला लग चुका है.
इलाहाबाद शहर में प्रवेश करते ही बड़े बड़े विशालकाय बैनर दिखते हैं. नेताओं के, बाबाओं के, स्वयंसेवी संगठनों के और विभागों के. कोई गंगा की सफाई के लिए दौड़ रहा है तो कोई कसम खा रहा है पॉलीथीन नहीं लाएंगे. संगम में कुल्ला नहीं करेंगे.
हर तीसरे पोस्टर में मुख्यमंत्री अखिलेश मुस्कुराते दिखते हैं. नीचे छोटे नेताओं की तस्वीरें हैं. लगता है मानो पीआर की होड़ लगी है. सबको अपना पीआर करना है.
पीआर से याद आया. मीडिया के लिए बनने वाला पास लेने गए तो फाइल में नाम नहीं था. इससे पहले कि हम ज़िद करते कोई बड़े अधिकारी आए और बोले किसी से कोई बद्तमीजी नहीं होगी.
हमारी तरफ देखकर बोले. ऑनलाइन फॉर्म भर दीजिए. पास बन जाएगा. फॉर्म भरे और अधिकारी ने हाथो हाथ ओके किया. इतने सजग और तेज़ सरकारी पीआर के लोगों से कम पाला पड़ा है हमारा. दिल्ली में काम शायद ही इतना तेज़ होता हो.
आस्था लोगों को तेज़ कर देती है. इस तेज़ी से सरकारों में आस्था बन सकती है बशर्ते ये तेज़ी हमेशा हो.
देशी विदेशी सब पहुंच रहे हैं मेला में. इलाहाबाद के बड़े शास्त्री पुल से मेला विहंगम दिखता है. एक छोटा सा कस्बा बसा है मानो. ..ये न गांव है न शहर.....तंबूओं का एक जाल है...जहां बीच में पानी है...पीपे का पुल है...बाबा है....सरकार है....पुलिस है....गरीब हैं ....अमीर हैं.....और इन सबमें घूमती विचरती आस्था है.
मेरी आस्था मेले में है. मॉल के ज़माने में मेले कम ही लगते हैं. ऐसे में इस मेले में देश और विदेश की रुचि से रोमांचित होता हूं. तभी बार बार कुंभ आता हूं.
सोनपुर, पुष्कर और नौचंदी के मेलों का ज़िक्र सुना है लेकिन कुंभ का मेला पहले भी देखा है और इस बार भी देख रहा हूं. बदलते हुए समय में ये मेले केवल आस्था के ही प्रतीक नहीं हैं ये संस्कृति के प्रतीक भी हैं जहां जाति और धर्म से ऊपर उठकर लोग सेवा में लगते हैं.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें
झा साहब, आपकी जानकारी के लिये नेतराम के बारे मेँ एक रोचक तथ्य बता दूँ कि यह वही हलवाई है जिसने चन्द्रशेखर आजाद को पकडवाने मेँ , मुखबरी कर अंग्रेजो का साथ दिया था.
कुंभ में क्या है ये तो यहाँ आने वालों को पता है, तभी तो इसका नाम एक जगह सबसे अधिक लोगों के इकट्ठे होने के आधार पर गिंनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज है.
सच झा जी, हम कुंभ मेले में गंगा-जमनी तहज़ीब और संस्कृतियों का मिलन देख सकते हैं.
क्या झा साहब,,, लग रहा है नेतराम की दुकान पर आपको डिस्काउंट मिल रहा है या कुछ और.....अच्छा तरीका है उसके प्रचार का.......बीबीसी से ऐसी उम्मीद नहीं थी ...
सुशील जी माल के ज़माने में कुम्भ का मेला हमारी धार्मिक विरासत को जिन्दा रखता है.जात पात के इस दौर में हम मेले में मानवता को मजबूत पाते हैं.
अच्छा, कुम्भ में क्या सूरज दिन में आँखे दिखाता है , रात में कभी नहीं?
पहली बार आपकी लेखनी से कुछ रचनात्मक निकला. साधुवाद. तनिक और गहराई से कुंभ में ग़ोता लगाएँ (पानी में नहीं) आपको इस कुंभ में श्री विष्णु जी, ब्रह्मा जी और महेश जी या तीनों लोक के दर्शन हो जाएँगे. कृपया कोशिश करें. फिर लिखिएगा.
मुझे अच्छा लगा. मैं इलाहाबाद जरूर जाना चाहूँगा.
आप बहुत ही अच्छा लिखते हैं. प्रशंसनीय!
जब आप किसी चीज़ पर विश्वास करते हैं तो उसमें सच्चाई के अलावा कुछ नहीं दिखाई देता है. सभी धर्मों की प्रक्रिया काफ़ी कुछ आस्था पर ही है जबकि इसका सच्चाई से कुछ वास्ता नहीं है.
अच्छा लगा आपका लेखन. पढ़ कर पुराने दिनों की याद ताज़ा हो गई.