कुछ तीखे सवाल
भड़काऊ भाषण देने पर मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन के विधायक अकबरुद्दीन ओवैसी की गिरफ़्तारी, गंभीर आरोपों के अंतर्गत उनके ख़िलाफ़ कई नगरों और अनेक पुलिस स्टेशनों में मामले दर्ज होना और अंतत: आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के एक जज की ओर से उन्हें लताड़ा जाना देखकर ऐसा लगता है कि देश में क़ानून, न्यायिक और पुलिस व्यवस्था अब एक बिकुल नए दौर में प्रवेश कर गई है.
ऐसा लग रहा है कि अब किसी भी क़ानून तोड़ने वाले के लिए कोई जगह नहीं है चाहे वो कितना ही शक्तिशाली क्यों न हो.
अकबरुद्दीन और उनकी मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन पार्टी मुस्लिम समुदाय का प्रतिनिधि होने के दावेदार रही है. जब तक वो मुसलमानों की इन शिकायतों को प्रकट कर रहे थे कि उनके साथ अन्याय हो रहा है और पुलिस-प्रशासन उनके साथ भेदभाव करते हैं वहाँ तक तो बात ठीक थी क्योंकि कानून और संविधान भी हर नागरिक को इसका अधिकार देता है.
लेकिन जब कोई इसी बात को ऐसे अंदाज़ में कहने लगे जो हिंसा भड़का सकता है और दो समुदायों के बीच नफ़रत और दूरी पैदा कर सकता है तो फिर वह उसी क़ानून से टकराने लग जाता है.
अकबरुद्दीन के भाषण के जो भाग यू ट्यूब के ज़रिए प्रसारित हुए हैं उससे लगता है कि अकबरुद्दीन ने कानून का कई तरह से उल्लंघन किया.
अकबरुद्दीन की ये शिकायत क़ानून के दायरे में हो सकती है कि मुसलमानों के साथ भेदभाव किया जा रहा है लेकिन पुलिस को हटाकर हिंदुओं को ताक़त दिखाने की चुनौती देने को क़ानून बर्दाश्त नहीं कर सकता. ये बात किसी विधायक के मुंह से अच्छी भी नहीं लगती.
चारमीनार से सटाकर अवैध रूप से मंदिर बनाया जाना और उसके विस्तार की अनुमति देना क़ानून और सुप्रीम कोर्ट दोनों के आदेशों का उल्लंघन है. इस पर आपत्ति समझी जा सकती है लेकिन इसके लिए हिंदू देवी देवताओं का अपमान का हक़ किसी को नहीं दिया जा सकता.
राजनीतिक लड़ाई को सांप्रदायिक रंग देना किसी के हित में नहीं हो सकता.
लेकिन इस मामले ने कई और सवाल खड़े किए हैं जिनका जवाब भी तलाश करना चाहिए.
पहला तो ये कि क्या अकबरुद्दीन पहले व्यक्ति या नेता हैं जिन्होंने भड़काऊ भाषण दिया है? या किसी समुदाय की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाई हो? या कानून और देश को चुनौती दी हो?
ज़ाहिर है कि ऐसा नहीं है. अगर केवल गत एक-दो दशकों की ही बात करें तो बाल ठाकरे, अशोक सिंघल से लेकर प्रवीण तोगड़िया, साध्वी ऋतंभरा, आचार्य धर्मेन्द्र तक न जाने कितने ही नाम हैं जिन्होंने न केवल भड़काऊ भाषण दिए बल्कि कई बार उसका परिणाम बड़े पैमाने पर दंगों और ख़ून ख़राबे की सूरत में निकला. 1990 में लालकृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा ने पूरे देश में कैसी आग भड़काई थी ये देश के राजनीतिक इतिहास के पन्नों में ठीक तरह से दर्ज है.
अगर 'एक्शन-रिएक्शन' की बात अकबरूद्दीन ने की है तो 1984 में राजीव गांधी ने और 2002 में नरेंद्र मोदी ने क्या ऐसी ही बात नहीं कही थी?
तो क्या इस देश में सबके लिए अलग-अलग क़ानून है?
इसी हैदराबाद नगर में गत सप्ताह ही विश्व हिन्दू परिषद के नेता प्रवीण तोगड़िया के ख़िलाफ़ भी भड़काऊ भाषण देने का एक मामला दर्ज किया गया है. तो क्या तोगड़िया को भी हैदराबाद पुलिस उसी तरह गिरफ्तार करेगी और जेल भेजेगी?
इससे पहले आचार्य धर्मेंद्र और साध्वी ऋतंभरा के ख़िलाफ़ दर्ज मामलों में क्या कार्रवाई हुई यह भी आंध्र प्रदेश की पुलिस को बताना चाहिए.
दिलचस्प पहलू ये है कि अकबरुद्दीन के ख़िलाफ़ भी इससे पहले भी इसी तरह के मामले दर्ज हैं तो फिर आज से पहले उन पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
लगता तो ये है कि मामला क़ानून और व्यवस्था, समाज और समरसता से ज़्यादा राजनीतिक है.
जब तक मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन कांग्रेस के साथ थी तब तक अकबरूद्दीन के भड़काऊ भाषण भी अपराध नहीं था अब जबकि मजलिस ने कांग्रेस के ख़िलाफ़ राजनीतिक युद्ध छेड़ रखा है तो सत्तारूढ़ कांग्रेस की सरकार को ये देशद्रोह का मामला दिख रहा है.
दरअसल ये भड़काऊ भाषण, सांप्रदायिक सौहार्द्र को ख़त्म करने की चेष्टा और इसी तरह की दूसरी कोशिशों पर सरकार और उसकी पुलिस के नज़रिए में एक तरह का दोगलापन दिखता है.
इसी दोगलेपन ने कई उन्मादी नेताओं को लोगों की नज़रों में हीरो बनाया है. इस बार वही अकबरुद्दीन के साथ हो रहा है और वो कुछ मुसलमानों के हीरो बन रहे हैं.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें
उमर भाई, आपने अपने इस ब्लॉग में बिल्कुल सही बातें कही हैं. कानून तो सब के लिए बराबर है तो फिर और लोगों के खिलाफ कोई ऐक्शन सरकार और पुलिस ने अभी तक क्यों नहीं लिया?
पहली बात, कट्टरपंथ समाज के लिए घातक है चाहे वो हिन्दू हो या मुस्लिम. दूसरी बात, जिस कानून के तहत अकबरुद्दीन को गिरफ्तार किया गया है, अगर ईमानदारी से बिना किसी भेदभाव के उसको लागू किया जाए तो भाजपा, विहिप, आरए एस, शिवसेना आदि पार्टियों के तमाम नेता जेल में होंगे. रही बात देशद्रोह की तो आज देश का अर्थ जनता नहीँ, सरकार है और सरकार की गलत नीतियों के खिलाफ बोलना या कुछ भी ऐसा करना जिससे उसकी सत्ता को खतरा हो, देशद्रोह है. बल्कि आज तो देशभक्ति ही देशद्रोह है.
उमर साहब, आपकी बात जायज है और ये भी सच है कि हिंदुस्तान में हर बात को राजनीतिक चश्मे से ही देखा जाता है. ओवैसी का मामला भी ऐसा हो सकता है लेकिन उनपर जो कार्रवाई हुई है उसे एक नई शुरुआत भी माना जा सकता है. अगर ओवैसी को ढील दी गई तो कल को ऐसे 10 ओवैसी और खड़े हो सकते हैं जो देश की अखंडता और एकता के लिए चुनौती बन सकते हैं. ओवैसी जैसे नेता लोकतंत्र का तो सम्मान करें जिन्होंने इसकी शपथ ली होगी.
बहुत अच्छा.
सर, आप ये ठीक नहीं कर रहे हैं. ये गलत है.
अच्छी बात कही आपने लेकिन अधूरी, पूरा सच कहने की हिम्मत आप भी नहीं जुटा पाए. लेकिन फिर भी आप तारीफ के हक़दार हैं कि बीबीसी ने कम से कम इस मुद्दे पर कुछ कहा तो वर्ना बाकी मीडिया तो इस दोहरे मापदंड के मामले में छुपी साधे हुए बैठी है. इस देश में बाबरी मस्जिद के गुनाहगार, गुजरात, मुंबई, अयोध्या के जिम्मेदार खुले घूम रहे हैं.
बीबीसी सबसे बुरे दौर से गुजर रहा है. वरुण गाँधी का उदाहरण नहीं दिया?
आप बिल्कुल सही हैं.
फारूख साहब, ओवैसी के बहाने आपने जो सवाल उठाये हैं और इन्हें तीखे सवाल कहा है, आपको ऐसा लग सकता है कि ये सवाल बहुत तीखे हैं लेकिन इनमें कोई तीखापन नहीं है. यह बात मानी जा सकती है कि इनका पूछने का अंदाज तीखा जरूर है. यही अंदाज मोदी, तोगडिया और ओवैसी की राजनीति का है. बीबीसी भी इसी अंदाज में बात करेगी तो हम सच्चाई को कैसे परख सकेगें? आपने कहा है कि राजीव गॉधी और मोदी ने भी इसी तरह की बात कही थी लेकिन उनके खिलाफ कार्यवाही नहीं हुई और ओवैसी के खिलाफ कार्यवाही की गयी है. एक बात तो तय है कि आपने भी यह माना है कि ओवैसी ने गलत कहा है लगभग वैसा ही गलत जैसा कि बहुत से दूसरे नेता कहते आये हैं. इससे यह तय नहीं होता कि ओवैसी के खिलाफ कार्यवाही नहीं होनी चाहिए. जो गलत है उसके खिलाफ कार्यवाही होनी ही चाहिए लेकिन सवाल यह उठता है कि दूसरे गलत लोगों के खिलाफ कार्यवाही क्यों नही की जाती है? हो सकता है कि मेरा सोचना गलत हो लेकिन जो मेरी समझ में आता है उसे आपसे बॉटना उचित होगा, मोदी और ओवैसी में बिल्कुल भी अन्तर नहीं है. दोनों ही जानते है कि इस देश के लोगों के कुछ जज्बात हैं उन्हें छेडते रहो और राजनीति में आगे बढते रहो. ये दोनों ही प्रवृत्तियां देश को बरबाद कर रही हैं, लेकिन मोदी और ओवैसी में जो मूल अन्तर है वह यह कि ओवैसी अपनी जड बाबर में तलाशता है और वह बाबर के अंदाज में अपने को इस देश का स्वाभाविक शासक समझता है. यह किसी को भी बर्दाश्त नहीं. कोई अपने को हुमायॅू का वशंज कहे कोई विवाद नहीं होगा, लेकिन बाबर इस देश की अस्मिता,संस्कृति और स्वाभिमान के खिलाफ है. इसी कारण लोग मोदी जैसों को भी स्वीकार कर रहे है ताकि उनकी इस पीडा का निराकरण हो सके. मोदी इस नब्ज को पहचानता है वह इसका भरपूर दोहन कर रहा है. हमारे देश में बहुत सी जातियों के वंशज हैं. वे इस देश के नागरिक है और कर्णधार हैं. यह देश जितना किसी का है, उतना ही उनका भी है. लेकिन यदि कोई अपना मालिकाना हक बाबर से जोडेगा तो निश्चित ही लोगों की दुखती रग को छेडेगा. मोदी और ओवैसी में कोई अन्तर ना होने के बावजूद यही अन्तर है.
सही बात. यही बात मेरे भी दिमाग में जब मैने यू-ट्यूब पर वीडियो देखी. अकबरउद्दीन का भाषण अनुचित, घटिया और बकवास के आसपास है. लेकिन ये उकसाने वाला नहीं है. ये बात सही है कि भीड़ को उकसाने वाले, भड़काने वाले भाषण बहुत मौजूद हैं.
सच बोलने के लिए शुक्रिया, चाहे वो थोडा सा सच क्यों ना हो. चाहे वो ओवैसी हों, या फिर कोई और, सभी के लिए कानून बराबर होना चाहिए.
बिलकुल इस देश में सबके लिए अलग-अलग क़ानून है. यहाँ सजा सिर्फ मुसलमानों को दी जाती है. भडकाऊ भाषण तो भाजपा और संघ परिवार की जागीर है, भला इसमें कोई अतिक्रमण कैसे कर सकता और वो भी बेचारा मुसलमान? अकबरुद्दीन ओवैसी तुरंत गिरफ्तार हो गए लेकिन बाबरी मस्जिद शहीद करने वाले और उस वक्त भडकाऊ भाषण देने वालो पर कोई कार्यवाई नहीं हुई. मुंबई बम धमाके के लिए सजा मिल गयी लेकिन मुंबई दंगो के लिए किसी को सजा नहीं मिली. गोधरा कांड के मुजरिम मिल गए लेकिन गुजरात के दंगों का कोई गुनाहगार मिल ही नहीं रहा है. मंदिर के नाम पर वोट मांगना जायज़ है और मुसलमानों के भले के लिए कोई घोषणा करना अपराध है. ये कहाँ का इंसाफ है कि मस्जिद ऐ चारमिनार में नमाज़ नहीं पढ़ी जा सकती और उसी से सटे अवैध मंदिर में पूजा की जा सकती है. भारत में सिर्फ कसाब और अफजाल गुरु को फांसी हो सकती है समझौता एक्स., मक्का मस्जिद हैदराबाद, अजमेर शरीफ और मालेगांव के धमाकों के लिए किसी को सजा नहीं होती. दास्ताने ज़ुल्म बहुत लंबी है, शब गुजर जायेगी बयाँ करते करते.
मैं उमर भाई की बात से सहमत नहीं हूँ. इनको गलत भाषण देने के लिए केवल हिंदू राजनीतिज्ञों के ही नाम पता हैं, जबकि दिल्ली के शाही इमाम और ऐसे बहुत मुसलमान है जो गलत बातें बोलते हैं. ये सब इनको याद नहीं रहा अपनी बात कहते हुए?
मै उमर फारूख़ से एक सवाल पूछना चाहता हूं कि दूसरों के बहाने ओवैसी को क्यों बचाना चाहते हैं? क्या इस समय आप राजनीति करना चाहते है. जो-जो दोषी है उनके लिए फांसी की सज़ा क्यों नहीं मांगते? आप केस को कमजोर करना चाहते हैं. मुझे नहीं लगता कि आपकी बातें सही है.
मैं नहीं जानता कि सच्चा कौन है और झूठा कौन. मैं एक गुजराती हिंदुस्तानी हूँ और जो मैंने देखा है महसूस किया है उससे इतना ही समझ पाया हूं कि अकबरुद्दीन ओवैसी चाहे जैसे भी हों, उन्होंने जो बात कही बिलकुल सच कही. यह देशद्रोह और आतंक की बात नहीं है. बात है गुजरात के मुसलमानों की जिन्होंने मौत को बहुत क़रीब से देखा है. सन 2002 में हमने गुजरात में ऐसे दरिंदे देखे हैं जैसे कहीं न होंगे. हमारी औरतों पर ज़ुल्म किए गए. जब भी उस बारे में सोचता हूँ तो काँप जाता हूँ. अगर मेरे पास अकबरुद्दीन जैसी ताकत होती तो आज गुजरात में एक भी दरिंदा नहीं बचता. लेकिन मैं लाचार हूँ. मैं अपने देश से मुहब्बत करता हूँ लेकिन उन दरिंदों से नफरत हैं मुझे.
भारत के सभी ग़ैर-मुसलमान राजनीतिज्ञ डरे हुए हैं कि स्थानीय, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर कहीं कोई दमदार मुस्लिम नेता सामने न आ जाए. सौ साल पहले उन्होंने ऐसी ग़लती की कि एम.ए. जिन्ना पाकिस्तान बनाने में कामयाब हो गए. वो एक और जिन्ना के उदय से डरे हुए हैं. ओवैसी तो अदना है.
मै उमर जी से पूछना चाहता हूँ कि उनको हसन अली, तेलगी, जामा मस्जिद के इमाम, कश्मीर का गिलानी इत्यादि याद क्यों नहीं आते, जो हमेशा देशद्रोह कि ही बातें करते हैं या फिर और क्या आपको कभी साबरमती ट्रेन में जलाये गए लोग याद आये? सैकड़ो बम बिस्फोट जिनमें लाखों लोग अब तक मारे जा चुके हैं, जिनको प्लान करने वाले और बम ब्लास्ट करने वाले दोनों मुसलमान थे वो क्यों नहीं याद आते? पत्रकारिता के नाम पर बिक चुकी बीबीसी से ऐसी ही उम्मीद कि जा सकती है. ये तीखे सवाल हैं इनका जवाब कौन देगा? मुझे मालूम है कि मेरी टिप्पणी प्रकाशित करने की हिम्मत आपमें नहीं है क्योंकि ये मुसलमानों से संबंधित है.
मै सिर्फ इतना ही कहना चाहता हूँ कि मुसलमानों को पहले सीखना पड़ेगा कि शांति क्या है . वो अगर पकिस्तान, अफगानिस्तान, ईरान, इराक, सीरिया, लीबिया आदि आदि देशों में शांति से नहीं रह सकते तो कही कुछ गलत है. उनको अपनी पुस्तकों में देखना होगा. अगर वे वहां शांति से नहीं रह सकते तो भारत में कभी संतुष्ट नहीं रह सकते.
मैं सभीसे कहना चाहता हूँ कि आप ओवैसी का वीडियो यू ट्यूब पर अवश्य देखें फिर टिपण्णी दें.
हद हो गई है उमर साहब शर्म नहीं आती मोदी का नाम लेकर कितने दिनों तक विधवा प्रलाप करेंगें आप लोग. सीबीआई और एसआइटी से जांच हो चुकी है और केंद्र में कांग्रेस है कुछ नहीं निकला नहीं तो फँसी हो चुकी होती. जाकिर नाईक, ओवैसी, गिलानी और बुखारी के पाप कितने दिन छुपाओगे. अगर हिम्मत है तो मीडिया इनके बारे में कुछ लिखने मन बनाये, जिनके मुह से सिर्फ मर काट और देशद्रोह और दुसरे धर्म कि बुराइयाँ ही निकलती है. इनको और जिसको आप समझते हो उनको फासी दिलवाइए. एक मुलायम सरकार उत्तर प्रदेश कि जो आतंकियों को पदम् विभूषण देने कि कोशिश कर रही है उसके बारे में लिख पायेंगे आप.
अतहर जी, अख़बार पढ़ा करें. सभी को सज़ा हुई है और सभी जेल में हैं. किसी भी तरह की सांप्रदायिकता का समर्थन नहीं करना चाहिए.
बाल ठाकरे, अशोक सिंघल से लेकर प्रवीण तोगड़िया, साध्वी ऋतंभरा, आचार्य धर्मेन्द्र तक न जाने कितने ही नाम हैं जिन्होंने न केवल भड़काऊ भाषण दिए बल्कि कई बार उसका परिणाम बड़े पैमाने पर दंगों और ख़ून ख़राबे की सूरत में निकला. 1990 में लालकृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा ने पूरे देश में कैसी आग भड़काई थी ये देश के राजनीतिक इतिहास के पन्नों में ठीक तरह से दर्ज है. उनके खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं हुई. इसका मतलब है कि भारत में मुसलमानों को निशाना बनाया जाता है. है किसी के पास कोई जवाब?
मैं अतहर ख़ान की बात से बिल्कुल सहमत हूं कि यहां क़ानून केवल मुस्लिमों के लिए है.
धन्यवाद मिस्टर उमर, कितनी खूबसूरती से आपने जहर उगला हैं. कोई भी समझ नहीं सकता है. कोई भी मूर्ख हिन्दुस्तानी समझ ही नही पायेगा की आप कितने जहरीले हैं. अगर गलती से भी कोई भारतद्रोही पकड में आजाये तो कोई अलग ही रग आलाप दो और सभी भारतवासी कन्फ्यूज़ हो जाएं.
उमर साहब ने सही चीज़ दर्शाई है. ग़लत तो ग़लत होगा वो औवैसी हो या ठाकरे. लेकिन बात ये है कि क़ानून का डंडा सही वक़्त पर सभी के लिए बराबर होना चाहिए. उमर साहब जो आपने महसूस किया वो हम सभी करते हैं. पर बोल नहीं सकते.
उमर साहब, लगता है आप सठिया गए हैं. ऐसा विचार आप जैसे लोग ही दे सकते हैं. आप बीबीसी को गंदा कर रहे हैं. धर्म से ऊपर उठिए. जागिए. फिर अपने विचार दीजिए.
उमर फ़ारुख़ जी आप इस लेख से क्या कहना चाहते है? क्या देशद्रोही अकबरुद्दीन ओवैसी को गिरफ्तार करना ठीक नहीं है? ऐसा प्रतीत होता है कि आप बाल ठाकरे, अशोक सिंघल से लेकर प्रवीण तोगड़िया, साध्वी ऋतंभरा और आचार्य धर्मेन्द्र के आड़ में ओवैसी की गिरफ्तारी को गैर क़ानूनी ठहराने की नाकाम कोशिश कर रहे है. इस गिरफ्तारी से आप को व्यथित होना समझ में आता है. हम भी आप के इस दुःख में आप के साथ है, क्योकि आप लोग चाहते है कि ऐसी बयानबाजी चलती रहे जिससे देश के निर्दोष युवा आतंक के रास्ता अपनाये और देश का नुकसान हो. ध्यान रहे जो लोग ऐसी भावनाए भड़काते है वो मुसलमानों का सबसे ज्यादा नुकसान करना चाहते है, पहले भी लोग ऐसा कोशिश कर चुके हैं, लेकिन सबसे ज्यादा नुकसान मुसलमानों को ही उठाना पड़ा है.
बीबीसी का तो दीवालियापन बहुत पहले ही हो चुका है जब से उनके चश्मे में केवल मुसलमान ही मुसलमान ही दिखाई देते हैं. इस पावन आर्यावर्त की धारा पर हिंदू सनातन काल से रहते आए हैं. उनकी सुध तो किसी पार्टी के नेता भी नहीं लेते. याद रखें आप जितने मुस्लिम परस्त होते जाएँगे हम ओवैसी और उसके चाटुकारों को हाशिए पर डालते जाएँगे. यहाँ इस्लाम का राग नहीं राम की तान बजेगी. मंदिर चार मीनार के पास नहीं बने इसका फ़ैसला देश की बहुसंख्य जनता करेगी, कट्टरपंथी नहीं, क्योंकि कोई भी मुस्लिम दिखावे के लिए भी धर्मनिरपेक्ष नहीं हो सकता.
अपना नाम बेनाम इसीलिए लिखा क्योंकि नाम लिखने से लोग हमें एक विचारधारा से जोड़ देंगे। साधारण सी बात है, देश के बहुसंख्यक हिन्दू डरे हैं। दो ही पीढ़ी पहले ओवैसी की तरह ही आदरणीय जिन्ना जी ने 1940 से 1944 के बीच में ऐसा जहर घोला कि देश के ही दो टुकड़े कर डाले। और हाँ, आप यो कोई भी मुसलमान इतिहास से इंकार नहीं कर पाएगा कि बहुतेरे मुसलमानों का समर्थन मिला जिन्ना साहेब को। इसीलिए ओवैसी का इतना विरोध हुआ। नहीं तो, बुखारी पर करीब दर्जन भर ऐसे मामले हैं पर बहुसंख्यक उनके बारे में इतने गुस्से में नहीं हैं। जहाँ तक इसी तरह के अपराधों में सजा मिलने या नहीं मिलने की बात है तो दोनों ही तरफ कई छूटे हैं। कई को सजा भी मिली है। जब जिसका जैसा संयोग रहा है। पर एक बात और है, मुसलमानों से आज दुनिया डरी हुई है। और खासतौर से उसमें गोरी, बाबर और औरंगजेब का घोल, जिहाद का जिक्र, बहुत डराता है। फिर पाकिस्तान से आती खबरें, सूफियों की कमजोर होती पकड़। हिन्दू धीरे-धीरे इन सबों को अपने अस्तित्व पर खतरा मान रहा है। इस देश में फिर भी सबों को ठीकठाक ही अधिकार मिले हैं। हम सबों को सोचना पड़ेगा। जवाब किसी एक के पास नहीं पर है सबों के पास।
ओवैसी के मामले में शायद पुलिस ने जल्दबा़ज़ी कर दी है. एक तरफ़ मोदी, राज ठाकरे, उमा भारती, ऋतंभरा और तोगड़िया सहित की नेता हैं जो मुसलमानों के ख़िलाफ़ भड़काऊ भाषण देने में अपनी शान समझते हैं. लेकिन न कानून उनका कुछ बिगाड़ पाया है और न ही पुलिस इस पर रोक लगा सकी है. इंसाफ़ पसंद और संस्कारी मुस्ल में आख़िर इस दोग़ली नीति का शिकार सिर्फ़ मुसलमान ही क्यों बनते जा रहे हैं? क्या कानून सिर्फ़ मुसलमानों के लिए ही है? अगर यही इंसाफ़ है तो फिर भारत में महमूद ग़ज़नवी के आने का इंतज़ार रहेगा. जो हिंदुस्तान को इंसाफ़ की कसौटी पर लौटा देगा.
बीबीसी का तो दीवालियापन बहुत पहले ही हो चुका है जब से उनके चश्मे में केवल मुसलमान ही मुसलमान ही दिखाई देते हैं
उमर फारुक जी, मै आपसे पूर्णतया सहमत हूँ I कोई किसी भी धर्म का हो उसे देश की अखंडता के साथ खिलवाड़ करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए I ओवैसी हो या तोगड़िया, इनके बीच किसी प्रकार का अंतर नहीं किया जाना चाहिए I ऐसा लगता है ये चंद लोग अपने अपने धर्म के ठेकेदार हो गए है I ये लोग ऐसा माहोल बनाने की कोशिश में लगे रहते है जैसे कि धर्म के ऊपर बहुत बड़ा संकट आ गया हो जो कि दूसरों को मारने काटने से ही जायेगा I अरे धर्म के ठेकेदारों इतनी ही फिक्र है तो जाओ देखो आप के धर्म के कितने लोग रात में भूखे सोते है, कितनो के पास पहनने के लिए कपडे नहीं है, कितने बच्चो ने स्कूल का मुह नहीं देखा है I इस देश को सांप्रदायिक दंगो के दौर में वापस ले जाने कि कोशिश न करो क्यों कि हमें मालूम है कि उन दंगो में हम निम्नवर्गीय व मध्यवर्गीय ही मारे जायेगे और आप लोग अपनी राजनीति की रोटिया सकेगे I ओवैसी की गिरफ़्तारी का मै स्वागत करता हू पर सरकार से निवेदन है की अन्य नेता जो कि ऐसे ही मामलो में वांछित है, उनको भी तुरंत गिरफ्तार किया जाये I दोहरा मापदंड नहीं चलेगा I
मैं उमर भाई की बात से सहमत हूँ क्यूंकि जब पुलिस और कानून दोगली मानसिकता के चश्मे से देखते हैं तो ऐसे ही उदाहरण सामने आते हैं. मुसलमानों को खुश करने के लिए और यह दिखाने के लिए हमारे देश में मुसलमानों के साथ सोतेल जैसा बर्ताव नहीं होता हैं पुलिस स्वामी कमलानंद जैसे लोगो को गिरफ्तार करती हैं. क्या इस देश में मुस्लिम हक की बात कहना देशद्रोह हैं पुलिस उस समय कहाँ सो जाती हैं जब राज ठाकरे जैसे लोगो क्षेत्रीयता की बात खुले आम करते हैं और पुलिस और कानून लाचार दिखता हैं, जब प्रवीन तोगडिया अप्रत्यक्ष रूप से मुस्लिमो का आर्थिक बहिष्कार करने का कहते हैं, जब आचार्य धर्मेन्द्र जैसे लोग मुस्लिमो को एहसान फरामोश कहते हैं? मैं कोई अकबरुदीन ओवेसी की उस स्पीच को सही नहीं कह रहा हूँ लेकिन अगर मुसलमानों के साथ न्यायपूर्ण बर्ताव नहीं किया जाएगा तो अकबरुद्दीन ओवेसी जैसे लोगो को मुस्लिमों के बीच ऐसे ही लोकप्रियता मिलती रहेगी. आज मुसलमान को इस देश में जगह जगह पर देशभक्ति का सबूत देना पड़ता हैं. क्यों ऐसा माहौल इस देश में पैदा हो गया हैं?
यहाँ की प्रतिक्रियाएँ पढ़के ही पता चल जाएगा कि गलत कौन है और कौन सही है. उम्मीद है सभी मित्र समझ गए होंगे. वैसे बीबीसी केवल वो प्रतिक्रियाएँ ही छापेगा जो उन्हें अच्छी लगेंगी.
मैं आपसे असहमत हूँ.