मेरी एक आँख फूट जाए
प्रिय प्रभु जी,
नए साल पर मेरी एक प्रार्थना है. आप बोलोगे प्रभु की तू लेट हो गया बे कई दिन बीत गए हेप्पी न्यू ईयर को.
पर हे जगत के स्वामी साल के पहले दो चार दिन तो बड़े लोगों, महान लोगों, भले लोगों के लिए होते हैं. जब इनकी बारी खत्म हुई तो मैं गरीब अपनी अरज लेके हाजिर हूँ भगवान.
तो शुरू हो जाऊं ....
भगवान, इस नए साल में अगर मुझ पर या मेरे परिवार वालों कोई आपत्ती भेजने वाले हो तो प्रभु बस इतना करना की मेरे ऊपर जो घटना दुर्घटना घटे वो दिल्ली में घटे. ऐसे इलाके में घटे जहाँ मध्यम वर्गीय, उच्च वर्गीय रहता हो. अगर हम लाइन में भी खड़े हो या बस में चल रहे हों तो कम से कम वो बस डीलक्स तो हो ही.
और अगर हम पिच्चर विच्चर देख कर लौट रहे हों तो वो 'जय संतोषी माँ' या 'सरकाई ल्यो खटिया', 'धरती की कसम' या कोई भोजपुरी टाईप की ना हो. अंग्रेजी ना हो तो कम से कम अंग्रेजी टाइप तो हो ही.
हाँ प्रभु इस बात का ज़रूर ध्यान रखना कि जिस दिन मेरे ऊपर विपत्ति का पहाड़ टूटे उस दिन वीकेंड हो. शनिवार या रविवार हो और उसके आस पास भारतीय क्रिकेट टीम कोई बड़ा मैच ना जीते, कोई वर्ल्ड कप ना हो, सलमान की कोई पिच्चर ना रिलीज़ हो रही हो और देश की जागरूक जनता और सजग टीवी चैनलों के पास करने के लिए कोई और काम ना हो.
भगवान, अगर इस बात की गारंटी नहीं दे सकता तो इतना वरदान तो दे ही दे तो जितना मुझे देगा उसका दुगना पड़ोसी को देगा. मुझ पर जो भी विपत्ति दे उसकी दुगनी दिल्ली वालों पर दे डालना.
और कुछ नहीं तो कम से कम इतना तो होगा ही की मुझे राहत नहीं मिली तो न्याय तो मिलेगा. और मेरे कारण जो जागरूकता आएगी तो कुछ रिस छीज कर मेरे गाँव घर में तो पहुंचेगी.
और नहीं भी पहुँची तो कम से कम उतने दिन तक तो मेरे या मेरे भाई बन्दों के दुख की कोई न कोई अखबार टीवी चैनल खबर लेगा ही जितने दिन खबर गरम है चर्चा में है.
मेरे साथ दिल्ली में हुई घटना के बाद जब मेरे बारे में सब छप जाएगा तो तो मेरे जैसे कुछ और दुखियारे ढूंढे जायेंगे जिनकी खबर मेरे जैसी ही हो या मुझसे भी दर्दनाक हो.
भगवान् मैं भोला हूँ भारत में यहां वहां अन्याय या अत्याचार के खिलाफ अगरबत्ती, मोमबत्ती जो भी जब भी मुझसे बन पड़ता है जलाता हूँ.
लेकिन प्रभु मैं गधा नहीं हूँ.
मुझे पता है मेरे दुख तकलीफ तब तक दुख तकलीफ नहीं है जब तक उन बड़े लोगों डर ना लगे कि जैसा मेरे साथ हुआ वैसा उनके साथ भी हो सकता है.
मेरी लाश अगर बस्तर मेरी सड़ी तो चील कव्वे खा जायेगें लेकिन अगर दिल्ली में गिर पडी तो उसकी बदबू सबको आयेगी गंदा दिखेगा और कुछ नहीं तो उसका क्रिया कर्म तो होगा ही बाजे गाजे से वीकेंड पर.
अपने ख्वाबों के छीछ्ड़ों के साथ मैं एक आम भारतीय (किसी राजनीतिक पार्टी से कोइ लेना देना नहीं)

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प्रिय अविनाश जी, मेरी आपसे विनम्र निवेदन है कि कृपा करके अपनी क्लिष्ट भाषा को बीबीसी हिंदी के सरल पन्ने पर उतारने के पहले सोच विचार कर लें. सिर्फ भाषा ही वो चीज़ नहीं है जिसका सहारा लेकर कोई भी लेखक या पत्रकार बिना मुद्दे वाली बात कह कर निकल सकता है
बेहद घटिया प्रस्तुति. रेडियो पर आप जितना घटिया बोलते हैं, वैसी ही प्रस्तुति यहां भी है. हिंदी सीख लीजिए फिर बीबीसी हिंदी का भला कीजिए. और ब्लॉग लिखने के गुणकारी तत्व विकसित कीजिए.
दिल्ली में १६ दिसंबर की रात जो हुआ, वह वाकई खौफनाक और दर्दनाक है. उस पर जो गुस्सा फूटा उसे भी सलाम. मगर ऐसी घटनाओं के खिलाफ पूरे हिंदुस्तान में एक जैसी आवाज होनी चाहिए. सिर्फ दिल्ली ही हिंदुस्तान नहीं. अविनाश जी ने हिंदुस्तान भर में दिल्ली से बाहर रहने वाले शहर-देहात के लोगों के मनोभावों को बहुत ही चुटीले अंदाज में शब्द दिए हैं. साधुवाद...
बिल्कुल सटीक और सही टिप्पणी. हिंदुस्तान के मनोभावों को व्यक्त किया है.
सिर्फ दिल्ली को ही हिंदुस्तान मानने वालों और गरीब-मजदूरों को सिर्फ बढ़ती आबादी की समस्या मान लेने वालों पर बेहद सटीक व्यंग्य! सरल और प्रवाह वाली भाषा की वजह से आपकी बात सीधे असर करती है. जारी रहे....
बकवास लिखा है आपने.
अविनाश जी,शानदार और सटीक ब्लाग लिखा है आपने. धन्यवाद!
अच्छा है अविनाश जी!
दर्दनाक पर सही. आलोचना के लिए शुक्रिया.
अति उत्तम, बहुत अच्छा लिखा अविनाश जी. आप तो वैसे भी बीबीसी पाठकों के दोस्त हैं, कहा जाता है कि इसी घटना के बाद ही शुरू हुई थी ये कहावत, अंधों में काना राजा.
अविनाश जी, धन्यवाद. बहुत मार्मिक लेख हैं.
अविनाश जी, बहुत दमदार लिखा है आपने. काफ़ी सटीक, तीखा और चुटीला.
भारतीय सामंतवादी समाजिक ढांचे पर सर्वोत्तम व्यंग्य।