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क्या जनता 'गाइडेड मिसाइल' है?

Pawan NaraPawan Nara|शुक्रवार, 04 जनवरी 2013, 13:41 IST

दिल्ली में चलती बस में हुए सामूहिक बलात्कार को लेकर मन में कई सवाल उठे.

इन सवालों को सुनने के बाद आप मुझ पर संवेदनहीन होने का आरोप लगा सकते हैं लेकिन फिर भी मैं वो सवाल आपके साथ साझा करना चाहता हूं.

पहला सवाल मेरे मन में आया कि क्या जनता कोई 'गाइडेड मिसाइल' है, जिसे एक घटना ने आंदोलन करने के लिए सुलगा दिया और फिर मीडिया ने उसकी दिशा और दशा तय की.

बलात्कार के प्रति ये गुस्सा साल के 365 दिन कहां होता है? 16 दिसंबर के बाद कितने ही बलात्कार और हुए. क्या मीडिया ने उन्हें इतनी ही गंभीरता से उठाया और क्या जनता ने उनको इतनी गंभीरता से लिया?

सवाल राजनीतिक पार्टियों के रवैये पर भी हैं. राजनीतिक पार्टियां क्या अपनी भी सोच या दिशा रखती हैं या फिर जहां जनता है वहीं राजनीतिक पार्टियां चल देती हैं?

दिल्ली के माहौल में राजनीतिक पार्टियां सोच बदलने का आह्वान करती हैं, जनता की सोच के साथ समर्थन करती हैं. लेकिन ठीक उसके उलट दिल्ली के दायरे से निकलते ही इन्हीं पार्टियों के नेता लड़कियों के पहरावों पर आपत्ति जताते हैं.

तो क्या दिल्ली की जनता और उनके चुनाव क्षेत्र की जनता अलग-अलग है और क्या लड़कियों की सुरक्षा और अस्मिता के पैमाने अलग-अलग हैं?

क्यों हमारे नेता अपने चुनाव क्षेत्र में खुलकर लड़कियों की आज़ादी की वकालत नहीं कर पाते हैं.

राजनीतिक पार्टियों के बयानों पर भी मन में सवाल उठे. एक पार्टी के नेता ने पीड़ित के नाम से क़ानून बनाने की बात की और दूसरी पार्टी के नेता ने पीड़ित को अशोक चक्र देने की मांग की. ये मांग लोगों की वाहवाही लूटने के लिए हैं या इसके कोई मायने भी हैं.

अब दिल्ली से उठाकर उत्तर प्रदेश ले चलते हैं. दिल्ली बलात्कार पीड़ित की मौत के शोक में सेना और सरकार ने नए साल के कार्यक्रम रद्द कर दिए. लेकिन जब देश पीड़ित के गम में शोक में डूबा था तब उत्तर प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के पैतृक गांव सैफई में जश्न हो रहा था जिसमें कई बॉलीवुड की हस्तियों ने कार्यक्रम पेश किए.

मैं ये नहीं कहता कि शोक किसी पर थोपा जा सकता है लेकिन सवाल ये ज़रुर उठा कि जब देश शोक में रो रहा था तो क्या सफैई में महोत्सव आयोजित करना असंवेदनशीलता नहीं थी?

सवाल दिल्ली सरकार द्वारा आयोजित मार्च पर भी उठे.

जनता जब बलात्कार पीड़ित के समर्थन में मार्च करना चाहती थी तो प्रशासन ने लोगों को मार्च नहीं करने दिया. धारा 144 लगा दी गई और मेट्रो स्टेशन बंद कर दिए गए. लेकिन ठीक इसके उलट जब बारी सरकार की आई तो ना सिर्फ मार्च बेरोकटोक हुआ बल्कि बाक़ायदा उस मार्च के प्रचार के लिए अख़बार में विज्ञापन भी छपवाए गए.

तो क्या विरोध भी अब हम तभी कर सकते हैं जब सरकार उसका समर्थन करे?

सवाल और भी हैं लेकिन इनके जवाब बड़े विस्फोटक हो सकते हैं.

ना जनता अपनी बुराई सुनना चाहती है और ना सरकार और ना राजनेता और ना पुलिस.... लेकिन आप मेरी बुराई कर सकते हैं.

उम्मीद करता हूं कि आप दिल्ली में बलात्कार और बाकी किसी बलात्कार के बीच कोई फर्क नहीं करेंगे. हमारी मीडिया और नेताओं की तरह.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 15:10 IST, 04 जनवरी 2013 Saif:

    सही कहा है आपने पवन...हम सब पाखंडी हैं. हम दूसरों पर दोष लगाना पसंद करते हैं लेकिन खुद पर आरोप लगना किसी को अच्छा नहीं लगता. हम सभी जवाबदेही चाहते हैं लेकिन अपनी ज़िम्मेदारी को नज़रअंदाज़ कर देते हैं. जाति, धर्म, भ्रष्ट पुलिस, पंगु राजनेता...हम इन शब्दों का इस्तेमाल करते हैं लेकिन इस सब में अपने बारे में भूल जाते हैं कि हमें क्या करना और क्या नहीं करना चाहिए.

  • 2. 15:16 IST, 04 जनवरी 2013 संतोष :

    आपके सारे सवाल लाज़मी हैं.

  • 3. 17:07 IST, 04 जनवरी 2013 Pramod Shukla:

    पवन जी, पहली बार लगा कि किसी ने हिम्मत करके सच लिखने की कोशिश की है. अन्यथा ज्यादातर लोग किसी न किसी नेता या पार्टी की वाहवाही और खिदमत करने के हिसाब से ही लिख रहे हैं. मैं आपसे पूरी तरह सहमत हूं. मैं दिल्ली में पला-बढ़ा हूं और अब इंग्लैंड में रहता हूं. जब मैं वहां था तो किसी लड़के को किसी भी लड़की को छड़ते हुए देख कर खून खौल जाता था. बहुत बार लड़ाई की. बहुतों को समझाने की कोशिश की. लेकिन मैं एक आम नागरिक हूं. चाह कर भी कुछ नहीं कर पाता.

  • 4. 17:49 IST, 04 जनवरी 2013 ashish yadav,hyderabad:

    पवन जी जनता निक्कमें नेताओं से तंग हो चुकी है, इसलिए वर्षों से दबा गुस्सा सामूहिक बलात्कार जैसी क्रूर घटना से फट पड़ा. लेकिन अफसोस इसके बाद भी मोटी खाल वालों की सेहत पर कोई फर्क नही पड़ा. बस कुछ घड़ियाली आंसू बहाने के बाद अपने बिलों में छिप गए. एक मौनी बाबा हैं जिनकी नजर में सब ठीक है.

  • 5. 18:33 IST, 04 जनवरी 2013 dipendra mishra:

    यही तो समस्या है हमारी जनता में, हम खुद क्या सोचते हैं , क्या करते हैं नही पता. पता नही हम लोग कब जागेंगे? हन खुद ही सुधरें या नेताओं को सुधारें. उम्मीद है कि नए साल में ऐसा नही होगा. अच्छे ब्लॉग के लिए धन्यवाद.

  • 6. 18:43 IST, 04 जनवरी 2013 himmat singh bhati:

    बहुत खूब पवन जी, रेप ही नही सभी होने वाले अपराधों को भी देखना चाहिए. पर उन्हें देखे कौन. जब कोई घटना सुर्खियों में आ जाती है तो कोई उस पर लगाम कसना चाहता है और कोई उसे हवा देना चाहता है. ऐसा किसी भी अपराध के होने के बाद होता है. ऐसे किसी अपराध को रोकने की कोशिश कोई नही करता है.

  • 7. 03:11 IST, 05 जनवरी 2013 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:

    पवन जी, इन बेईमान नेताओं को कौन चुनता है तो आखिर कौन जमीरदार है. इसलिए इंडिया के बेईमान नेताओं पर कुछ लिख कर अपना कीमती समय बरबाद मत कीजिए , ये ही बेहतर होगा.

  • 8. 14:12 IST, 05 जनवरी 2013 ankit gupta:

    मेरे हिसाब से ये बहुत ही सतही बात कह डाली आपने श्री पवन जी. बीबीसी हिन्दी के ब्लॉग और उनका स्तर मेरे ह्सिब से कहीं बेहतर और दार्शनिक और दिल को छू लेने वाला हुआ करता था. रेहान फज़ल, पंकज प्रियदर्शी, राजेश जोशी और प्रियदर्शी, रूपा झा, वुसत भाई और कई अन्य जब ब्लॉग लिखते हैं तो किसी दायरे में सिमट कर नहीं रह जाते. सादर विनती करना चाहूँगा कि आप इतनी मेहनत करके भी अपनी बात में उलझ कर रह गए हैं बस. इसलिए कृपा करके आगे इस तरह के कष्ट करना बंद कर दें . बीबीसी के पाठकों पर भारी एहसान रहेगा श्री पवन जी. ये काम वरिष्ठ और संवेदनशील लोगो के लिए ही रहने दें तो बड़ी मेहेरबानी होगी. क्योंकि जो आप कहना चाहते हैं उसका आपने मन में चल रहे विचार और आपकी लेखनी से कोई नाता नहीं है.

  • 9. 17:18 IST, 05 जनवरी 2013 BHEEMAL Dildarnagar:

    मुझे किसी की बुराई करना अच्छा नहीं लगता. मुझे सच्चाई के बारे में कोई जानकारी नहीं फिर भी टीवी मीडिया, समाचार पत्र और पुलिस-सरकार के बयान जानकर जहन में एक ही बात आती है 'ऑनर किलिंग'. कहीं न कहीं राजनीतिक दल और नेताओं का रवैय्या अपरोक्ष या मौन स्वीकृति वाला लगता है. सरकार 120 करोड़ लोगों को मूर्ख बनाती लगती है.

  • 10. 17:19 IST, 05 जनवरी 2013 iqbal Fazli, Rampur (UP):

    बिल्कुल सही. अरुंधति रॉय का भी बीबीसी हिंदी पर छपा लेख प्रासंगिक है.

  • 11. 18:26 IST, 06 जनवरी 2013 ANIL YADAV:

    भारत में जो भी चुनाव होता है उसमें जीतने वाली पार्टी दरअसल अल्पमत मे होती है. वास्तव में कोई पार्टी 50 फ़ीसदी से ज़्यादा वोट हासिल करे ऐसा कोई कानून नहीं.
    अगर अबकी बार जनता की बात सुनी गई तो पूरे देश में कड़ा कानून लागू होगा. इस से न्याय तो सबको मिलेगा लोग पता नहीं क्यों जो अच्छा हो सकता है उसकी टांग खींचना चाहते हैं.

  • 12. 20:14 IST, 06 जनवरी 2013 Satyendra Mishra:

    भारत के नेताओं की धूर्तता जगजाहिर है. इनका तो इतिहास ही पाखण्ड से भरा है.
    क्या आपको कभी दिल से यह महसूस हुआ है कि यह नेता भी हमारे और आपके बीच के हैं. यह बिलकुल ही अंग्रेजों की तरह हैं. केवल चमड़ी का अंतर है.

  • 13. 11:43 IST, 07 जनवरी 2013 E.A.khan, Jamshedpur:

    जब इस तरह का अत्याचार देश में हो तो शर्म से झुक जाना चाहिए न की यहाँ के बेहया नेता बयान बाज़ी करें या यहाँ के न्यूज़ चैनल चटखारे लेकर हर दिन सनसनीखेज़ खबर फ़्लैश करें.

    हर आम व खास दम साध कर एक जुट हो जाईए और सरकार पर दबाव डालिए कि अत्याचारियों को एक महीने के अन्दर फांसी पर लटका दिया जाये जिस से की दोबारा कोई इस तरह का अत्याचार करने की हिम्मत न करे.

    जो कानून में लिखा है वह अंग्रेजों का बनाया हुआ है उसमें बहुत खामियां हैं और अगर अत्याचारियों को फांसी पर लटकाने में आड़े आता है तो और बहुत रास्ते हैं पुलिस बखूबी जानती है. बहुत हो चुका. हम आम जनता इस से कम में समझौता करने पर तैयार नहीं हैं.

  • 14. 22:26 IST, 09 जनवरी 2013 Balwan Singh:

    हमें दूसरों पर उंगली उठाने की बजाय अपने बारे में सोचना चाहिए.
    क्या हमने नहीं तय कर रखा की लड़की को क्या पहनना चाहिए और लड़के को क्या? क्या हमने नहीं तय कर रखा की लड़के के क्या क्या काम हैं और लड़की के क्या? क्या हमारे समाज में माँ बहिन की गालियाँ प्रचलित नहीं हैं? क्या हम अपनी बहिन की रक्षा करने के लिए उससे राखी नहीं बंधवाते? क्या पति अपनी दीर्घायु के लिए पत्नी से करवा चौथ का व्रत नहीं रखवाते? हमें जानना अति आवश्यक हैं की ऐसा करने के लिए जनता को कौन भ्रमित करता है ?

    जब हम समाज में इतनी सारी और न जाने कितनी गलत चीजे बड़े ही गर्व के साथ चलाते हैं तब हम दिल्ली में हुए इस कांड पर क्यों आश्चर्य करते हैं ?

  • 15. 15:16 IST, 11 जनवरी 2013 Dastgeer:

    आप सही हैं सर.

  • 16. 21:12 IST, 27 जनवरी 2013 अजय: भारतीय संविधान, लोकतंत्र, भ्रष्टा:

    कोशिश करने वालों की हार नहीं होती, करते रहिये कोशिश ! "कौन कहता है कि आसमान में छेद नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों". अगर अपने ही कर्मों में खोट हो तो ज़माने से लड़ने कि हिम्मत कहाँ से आयेगी ? सबसे पहले खुद का आचार-विचार-व्यवहार देखो, लोक और उसका तंत्र अपने आप ठीक हो जायेगा. खुद पर आन पड़े तो चींटी भी काटती है मरते दम तक, अगर सूड़ में घुस जाय तो हाथी भी तड़प उठता है !

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