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उफ़! ये डे ड्रीमिंग की आदत

महबूब ख़ानमहबूब ख़ान|शुक्रवार, 16 अक्तूबर 2009, 17:41 IST

मैं ये तो नहीं कह सकता कि अपनी पत्नी की किसी आदत से परेशान हूँ लेकिन वो अक्सर कहती रहती हैं कि वो मेरी डे ड्रीमिंग यानी खुली आँखों से सपने देखने की आदत से बहुत परेशान हैं. वो कहती हैं कि मैं ख़यालों में बहुत खोया रहता हूँ कि काश ऐसा हो जाए तो कितना अच्छा हो या वैसा हो जाए तो क्या ही बात हो!

कुछ दिन पहले मेरे सहयोगी राजेश प्रियदर्शी ने लिखा था कि उन्हें ठंडी बीयर सुकून देती है लेकिन मुझे साइकिल चलाने में बहुत तसल्ली होती है. पर मेरी पत्नी को साइकिल से चिढ़ होने लगी है. वो कहती हैं कि मैं घर में भी उनके बजाय अक्सर साइकिल को ही निहारता रहता हूँ. लेकिन मेरे लिए मेरी साइकिल दुधारू गाय जैसी है जो बुश हाउस जाने के लिए न सिर्फ़ किराया बचाती है बल्कि सुबह की सैर का मज़ा भी देती है. (बुश हाउस, लंदन में बीबीसी वर्ल्ड सर्विस का मुख्यालय है)

घर से बुश हाउस का रास्ता बीस किलोमीटर है जो मैं क़रीब एक-सवा घंटे में पूरा कर लेता हूँ. इस तरह में एक दिन में चालीस किलोमीटर साइकिल चला लेता हूँ. आपमें से जो पाठक ये सोच बैठें हों कि मैं अपनी डींगें मार रहा हूँ तो आपको अपनी पीठ थपथपाने का पूरा अधिकार हैं.

लंदन के मेयर बोरिस जॉन्सन को साइकिल चलाना बहुत पसंद है

ये सिर्फ़ आपको बता रहा हूँ कि मेरी पत्नी को अभी पता नहीं है कि साइकिल चलाते समय भी मैं कुछ डे ड्रीमिंग कर लेता हूँ. मैं ये सोचने पर गदगद होते नहीं थकता कि लंदन में बहुत ही व्यस्त सड़कों पर साइकिल चलाना कितना आसान है और बहुत सी सड़कों पर साइकिल लेन भी बनी होती है. ज़्यादातर वाहन साइकिल चालकों को रास्ता देकर चलते हैं. सरकार बहुत सी रियायतें देती है साइकिल चलाने के लिए.

मैं ख़यालों में डूब जाता हूँ कि क्या ऐसा भारत में हो सकता है क्योंकि भारत में तो साइकिल ग़रीब की सवारी समझी जाती है. लोग न जाने क्यों मोटर के पीछे और मोटर के भीतर भागे जा रहे हैं. ऐसा लगता है कि हर आदमी हवाई जहाज़ को ख़रीदने की तमन्ना के साथ जी रहा है भले ही सेहत और रिश्ते कमज़ोर होते जा रहे हैं, परिवार बिखरते जा रहे हैं, अमीर ग़रीब की खाई बढ़ती जा रही है, हर कोई पैसे के लिए कुछ भी दाँव पर लगाने को तैयार है - अपने सांस्कृतिक मूल्य, परिवार, समाज, रिश्ते. बस धुन है तो अमीर बनने की. जो लोग पैदल चलना या साइकिल चलाना पसंद भी करते हैं वे समाज की हिकारत भरी नज़रों की वजह से छोड़ते जा रहे हैं. लेकिन क्या मैं कोई नई बात कह रहा हूँ?

एक ज़ेब्रा क्रासिंग पर लंदन के मेयर बोरिस जॉन्सन साइकिल पर सवार नज़र आते हैं. उनके बारे में कुछ दिन पहले अख़बारों में पढ़ा था कि एक लाल बत्ती पर रुकने के बजाय उन्होंने फुटपाथ से होकर साइकिल निकाली और आगे निकल गए. एक पुलिसवाला उन्हें देख रहा था और उसने बोरिस जॉन्सन का तीस पाउंड का चालान काट दिया. तब से शायद उन्होंने सबक़ सीख लिया है.

भारत के राजनेता क्या कहीं से कोई सबक़ सीखेंगे, यह शायद खुली आँखों का सपना ही है, फिर भी उम्मीद का दामन क्यों छोड़ूँ. खुली आँख से ही सही, सपने देखने में क्या जाता है.

मैं बुश हाउस के नज़दीक ही पहुँच चुका हूँ और मुझे अपनी डे ड्रीमिंग यहीं रोकनी पड़ेगी नहीं तो किसी लाल बत्ती पर अगर बेख़याली में यूँ ही निकल गया तो मेरा भी तीस पाउंड का चालान कट जाएगा और पत्नी फिर मेरी इस आदत पर मुझे झिड़केंगी क्योंकि पॉकेट ख़र्च तो गिना-चुना ही मिलता है...

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 19:09 IST, 16 अक्तूबर 2009 Lavesh Agrawal:

    महबूब साहब, मुझे आपके सपनों की दाद देनी होगी. अगर हम सभी इसी तरह के सपने देखें और छोटी-छोटी शुरुआत भी करें तो स्थिति बिल्कुल बेहतर होगी और आने वाली नस्लों के लिए हम बेहतर हालात छोड़कर जाएंगे. बेशक, हममें से बहुत से लोग आपकी ही तरह भारत में भी साइकिल चलाना पसंद करते होंगे लेकिन दुर्भाग्य से बहुत सारे सवाल पूछे जाएं - देखो, पैसे बचा रहा है, भाई, इतना पैसा बचाकर क्या साथ ले जाओगे वग़ैरा. लेकिन अगर सिर्फ़ धन बचाने की नज़र से ही देखा जाए तो भारत में लोग साईकिल चलाकर लोग देश के लिए अरबों की विदेशी मुद्रा बचा सकेंगे. वो इस तरह कि मोटर गाड़ियों में जो तेल जलता है, वो तेल के धनी देशों से ख़रीदा जाता है जिस पर भारत की बेतहाशा रक़म ख़र्च होती है. एक बात और जो मैं कहना चाहता हूँ कि हम अगर अब नहीं जागे तो बहुत देर हो जाएगी. अगर हम यूँ ही चूहा दौड़ में लगे रहे तो अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए बहुत ख़राब हालात छोड़कर जाएंगे और संभवतः बेहतर आत्माओं की दुनिया इस तरह की धरती पर जन्म लेने से पहले हज़ारों बार सोचेगी. आप इसी तरह के सपने देखते रहें और उन्हें हमारे साथ बाँटते भी रहें.

  • 2. 19:23 IST, 16 अक्तूबर 2009 Shabbir Khanna, Riyadh, Saudia Arabia:

    महबूब साहब, बहुत अच्छा लिखा है लेकिन क्या वो दिन कभी भारत में आ सकता है जब कोई नेता या अधिकारी साइकिल या पैदल सफ़र करेगा? यह सच है कि साइकिल से कई फ़ायदे हैं, पैसे बचने के साथ-साथ स्वास्थ्य भी अच्छा रहता है लेकिन आप ये सपना देख रहे हैं कि भारत में भी नेता साइकिल पर नज़र आएं तो आपकी बहुत बड़ी भूल है. ये सच है कि ग़रीब के लिए साइकिल ही शानदार साधन है जो उसके जीवन में बहार भर देती है. फिर भी आपने बहुत शानदार तरीक़े से पाठकों को समझाया. ये सच है कि दिखावे की ज़िंदगी ने लोगों का चैन और सुकून छीन लिया है. इंसान को वो ही सपना देखना चाहिए जो उसकी हद तक हो.

  • 3. 19:58 IST, 16 अक्तूबर 2009 Yashi:

    सफल भी वही होते हैं जो सपने देखते हैं. मैं अपनी आँखों से खुले सपने देखती हूँ कि मैं भी एक बीबीसी की श्रेष्ठ पत्रकार बनूँगी, मेरे पास वो सारे पॉवर होंगे जिनका इस्तेमाल मैं उनके लिए करूँगी जिनके पास अपनी बात कहने के लिए ज़ुबान तो होती है पर वो हिम्मत नहीं. पर मेरे मित्र मुझे पागल कहते हैं.

  • 4. 20:26 IST, 16 अक्तूबर 2009 Rameshwar Roz:

    महबूब जी, हमें ये जानकर बहुत ख़ुशी हुई कि आप जैसे लोग ब्रिटेन में रहकर भी अपने देश के बारे में इतना कुछ सोचते हैं. पर रही बात मोटर के पीछे भागने की, रिश्तों की ज़ंजीर कमज़ोर होने की तो आपकी इस बात से हम कुछ सहमत नहीं हुए क्योंकि हमें अभी बहुत स्पीड से चलना होगा उसके बाद हम लोग भी एक समान रफ़्तार से चलेंगे. मैं तो कहता हूँ कि अगर स्पीड कुछ और बढ़ सके तो और भी अच्छा है. इसके बिना हम 2020 तक पूरी तरह विकसित देश बनने का सपना पूरा नहीं कर सकते हैं. रही बात रिश्तों की, आज भी हमारे देश में रिश्तों क ज़ंजीर बहुत मज़बूत है, थोड़ी बहुत नोक-झोंक तो हर जगह होती है. आज भी भारत में लोग संयुक्त परिवार में ही रहकर सारे त्यौहार मनाते हैं. आज के भारत की ये सोच है कि उसका देश पूरे विश्व में सबसे अच्छा हो, सभी लोग उनके बारे में जानें. इसलिए मैं ये कहता हूँ कि आज भारतीय लोगों को भी स्पीड की ज़रूरत है और इसके लिए हमें कुछ क़ुर्बानी भी देनी पड़ेगी तो कोई बात नहीं क्योंकि कुछ पाने के लिए कुछ खोना तो पड़ता ही है.


  • 5. 20:39 IST, 16 अक्तूबर 2009 Maharaj Baniya:

    जनाब, आप इस लेख से बड़े लंबे उद्देश्य को पाने की लोगों को राह दिखा रहे हैं. शायद लोगों की सोच और समझ और आपके लेख की शिक्षा में जो फ़ासला है उसे भी किसी लेख के ज़रिए बता दीजिए. आपने पर्यावरण, प्राकृतिक संसाधनों की बचत, स्वास्थ्य, भ्रष्टाचार और ना जाने कितने मुद्दे इस छोटे से लेख के ज़रिए लोगों के सामने रख दिए हैं. वाक़ई, बीबीसी लंदन में बैठे लोगों को दिल्ली संसद में राजनेताओं के साथ बिठाकर उनकी सोच बदलने वाला सत्र करवा देना चाहिए. यदि उनकी सोच में 20 प्रतिशत परिवर्तन भी आ गया तो भारत की बहुत सी समस्याओं का समाधान निकल आएगा और ग़रीब जनता आपकी शुक्रगुज़ार होगी. यदि दिल्ली के मेयर को लंदन के मेयर के साथ कुछ दिन दिल्ली म्यूनिस्पैलिटी के दफ़्तर में साथ बिठा दिया जाए तो क्या होगा सोचिए. शायद भारत जैसे बड़े देश में समस्याओं की जड़ बहुत गहरी है. पर लंदन ऑफ़िस में बैठकर दिन में सपने देखने से कुछ नहीं होने वाला है. जनाब, जब तक हमारे मूलभूत ढाँचे में बदलाव नहीं आएगा तब तक लंदन और दिल्ली की तुलना करने से कोई फ़ायदा नहीं होने वाला है. जनाब, पीने का शुद्ध पानी, 24 घंटे बिजली, हरे-भरे पेड़ और दो वक़्त की रोटी पेट में पड़ जाए बस यही सब हो जाए तो फिर कोई समस्या ही ना बचे. फिर तो हमारे भारत में आपका भी मन लगेगा, दिल्ली की सड़कों पर साइकिल चलाने का और चाट-पकौड़ी खाने का और सारे त्यौहार अपने रिश्तेदारों के साथ मनाने का. बोलिये, क्या कहते हैं जनाब इस सपने के बारे में...

  • 6. 10:18 IST, 17 अक्तूबर 2009 Sanjay Kumar:

    महबूब जी, आपके इस सपने के पूरा होने की दुआ हम ज़रूर करेंगे. यही वो सपना है जो हम सभी को ज़िंदगी की ख़ुशियाँ आसानी से दे सकता है. आज तरक्की की रेल और सपनों की पटरी पर सवार भारत का मध्यम वर्ग हर क़ीमत पर दुनिया क सभी ऐशो-आराम तलाश रहा है, अमीर और अमीर होने के पीछे पागल है तो ग़रीब दो वक़्त की रोटी के लिए जी तोड़ मेहनत कर रहा है. सरकार आम लोगों को शेयर बाज़ार के आसमान छूते सूचकांक को दिखाकर प्रगति की रफ़्तार दिखाना चाहती है. लेकिन हालात ये हैं कि बीमारू राज्यों में लोग भूखे मरने को विवश हैं. वैसे तो ये आँकड़े आपको कहीं भी मिल जाएंगे लेकिन सरकार की फाइलों में इसे भूख से मौत नहीं माना जाता है. इसके पीछे बीमारी को वजह बताया जाता है. लालफीता शाही के शिकार डॉक्टर भी हो जाते हैं और उन्हें ये बताते शर्म भी नहीं आती की जब किसी को भोजन नहीं मिलेगा तो उसे बीमारी ज़रूर लगेगी. ऐसे में उसकी मौत होना स्वभाविक है. ये तस्वीर हमारे इंडिया की नहीं बल्कि हमारे भारत की है. क्योंकि इंडिया के अमीर लोगों के लिए दुनिया की सभी सुख सुविधाएँ मौजूद हैं लेकिन भारत के लोग भूख से मर रहे हैं. भारत के लोग यदि साइकिल से चलें तो इंडिया के लोगों को वो भी गवारा नहीं होता और उनकी कार और चार पहिया वाहन उसे मौत की मींद सुला देते हैं. उन्हें ऐसा लगता है कि सड़क केवल उनके लिए ही बनी है. उस पर पैदल चलने वालों और साइकिल से चलने वालों का कोई अधिकार नहीं है. इसलिए आपका ये सपना जो आपने खुली आँखों से लंदन में देखा है, उसका भारत में पूरा होना कब तक संभव है ये तो नहीं कहा जा सकता लेकिन दुआ ज़रूर करते हैं कि वो सपना जल्द ही पूरा हो जाए. (आमीन)

  • 7. 16:07 IST, 17 अक्तूबर 2009 Dr. Parveen Chopra:

    आप की यह पोस्ट बहुत बढ़िया लगी. काश, सब लोग यह समझ जाएं कि केवल साइकिल चलाने से ही हम अपने आप को कितने फिट रख सकते हैं. मुझे यह जान कर बहुत आनंद हुआ कि आप रोज़ाना 40 किलोमीटर की दूरी साइकिल पर तय करते हैं. काश, मुझे भी यह सब करने का मौका मिले ----मैं अक्सर सोचता हूं कि वो लोग बहुत खुशक़िस्मत हैं जो अपने काम पर पैदल जाते हैं या फिर रोज़ाना खूब साइकिल चला लेते हैं. बहुत अच्छा.

  • 8. 17:15 IST, 17 अक्तूबर 2009 Balwant Singh, Hoshiyarpur, Punjab:

    खान साहब इस बार आपने ज़रा हट कर विषय चुना है. हमारे यहाँ दो तरह के वर्ग साइकिल सवारी करते हैं. एक तो वे जो दुपहिया वाहन व पेट्रोल का ख़र्च वहन नहीं कर सकते. दूसरा वर्ग प्रतीकात्मक साइकल सवारी करता है और वह भी कुछ खास मौकों पर. कैमरों की चमक के साए में. दूसरे वर्ग में नेता, अतिसंपन्न अभिजात्य वर्ग व मशहूर हस्तियाँ, जिनका कि चलना फिरना, खांसना, छींकना भी एक समाचार बन जाता है. हमारे यहाँ बड़े - बड़े लोग तेल बचाओ पखवाडे के दौरान एक दो दिन तक मीडिया की चमक दमक में साइकल सवारी करते नज़र आते हैं. आम साइकल सवार को हमारी सडकों पर कीड़ा - मकौड़ा ही समझा जाता है. बेचारा चाहे कितना भी सड़क के आख़िरी किनारे पर क्यों न चले, हमेशा उसकी ही ग़लती मानी जाती है. और तो और छोटे से लेकर बड़े वाहन वाला, पुलिस वाला, सभी बेचारे साइकिल सवार को डाँट कर चल देता है. हमारे नेता लन्दन जैसी सीख नहीं ले सकते क्योंकि जब तक लम्बा काफिला न हो, सायरनों की चीं- पौं न हो तो पता कैसे चलेगा कि कोई नेता जी पधार रहे हैं. एक बात और, विकसित देश अपनी विलासिता की असीम सीमा तय कर चुके हैं. अब बारी नए - नए रसूख़दारों की है. जब रुपया शॉर्ट कट बनाकर आता है तो सिर चढ़ कर बोलता है. महाविद्यालयों व पाठशालाओं के साइकल स्टैंड, जो कभी साइकलों से भरे रहते थे, अब पैट्रोल वाले दुपहिया वाहनों के बीच इक्का दुक्का साइकल अपने को बौना सा महसूस करतीं है. दरअसल हम भारतीयों ने अपने हिसाब से कामों को छोटा बड़ा बना लिया है. मिसाल के तौर पर जब रोज़ साहब दफ्तर आते हैं तो कार का दरवाजा खोलने - बंद करने से लेकर साहब का बैग उठाने तक कई लोगों का योगदान रहता है. अगर साइकल सवारी किसी की शान व तरक्की में बाधा होती तो चीन से सीख लेनी चाहिए.

  • 9. 13:52 IST, 18 अक्तूबर 2009 BALWANT SINGH HOSHIARPUR ,PUNJAB:

    खान साहब साईकल का महत्त्व मेरे लिए क्या है यह मैं बताना चाहूंगा | दरअसल मैं 35-36 साल की उम्र में ही 89 किलो वज़न व 40 इंच कमर साइज़ के साथ दैनिक जीवन में बड़ा असहज महसूस करता था | आज 8-9 माह की मेहनत से मैंने 22 किलो वज़न घटाया व कमर साइज़ भी 32 इंच तक मेन्टेन की है | यह मैं इसलिए लिख रहा हूँ क्योंकि वज़न घटाने का सिलसिला मैंने मई 2008 को एक साईकल मात्र 3500 रूपये में खरीदने से शुरू किया | क्योंकि इतने वज़न के साथ मैदान पर दौड़ना मुश्किल हो रहा था | हालाँकि साईकल चलाने के साथ -साथ जिम , स्वीमिंग ,लम्बी दौड़ को हफ्ते में 6 दिन के रूटीन में शामिल किया | आज अगर मैं लगातार 9-10 किलोमीटर तक दौड़ सकता हूँ तो बस मेरी साईकल की बदौलत | और फरवरी 2009 तक मेरा वज़न 22 किलो तक कम हो गया | वैसे यह टिपण्णी यहाँ तर्कसंगत नहीं लगती परन्तु साईकल मेरे लिए क्या मायने रखती है बस यही बताना चाहता हूँ | आलम यह था कि रात को 11 बजे के बाद भी साईकल चलाने निकल जाता था |
    बाकी मेरे ऑनलाइन फिटनेस गुरु Christian Finn (14 Hares Run Mawsley Northamptonshire United Kingdom NN14 1TG) ने काफी मदद की व कई बार व्यक्तिगत तौर पर समस्याओं का ईमेल से निदान किया | यह साहब BBC TV प्रोग्राम Body Hits नामक प्रोग्राम पर भी आ चुके हैं |
    शायद साईकल के बिना मैं अपने लक्ष्य को हासिल नहीं कर सकता था या यूं कहें कि प्रेरित न हो पाता |

  • 10. 20:06 IST, 21 अक्तूबर 2009 तेजपाल सिंह हंसपाल:

    आपके साईकल चलाने का प्रसंग मजेदार,रोचक और प्रेरणादायी है. मेरे छत्तीसगढ़ राज्य के अखबारों ने इस प्रसंग को प्रकाशित नहीं किया है करते तो अच्छा होता. ऐसे सकारात्मक समाचारों की आज के संदर्भ में निहायत जरूरत है. आपने लंदन के मेयर बोरिस जॉन्सन के साइकिल चलाने और उनके द्वारा की गई ग़ल्ती की भी जानकारी दी. ऐसे ही प्रेरणा देने वाले सकारात्मक समाचार और विचार बार - बार आते रहना चाहिए. इसका जनमानस में अच्छा असर पड़ता है. इससे नेताओं पर मनोवैज्ञानिक दबाव पड़ता है.

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