पेशाब पिशूब करना मना है
सामान्य देशों में लोग सुबह दफ़्तर जाने से पहले नाश्ता करते हुए इसलिए टीवी ऑन करते हैं कि कोई सुंदर चहरा देखें. किसी हल्की फुल्की बात पर हंसें. किसी राग का मज़ा लें और दिन की शुरुआत ख़ुशगवार अंदाज़ में करें.
लेकिन पाकिस्तान में अब लोग सुबह, दोपहर या शाम टीवी ऑन करने के पहले कई बार सोचते हैं. कहीं कोई धमाका न हो गया हो, कहीं आतंकवादी किसी बिल्डिंग में न घुस गए हों, कहीं कोई बड़ा आदमी मारा न गया हो, कहीं कोई छोटा आदमी ग़ायब न गया हो....
आज भी जब दफतर से मेरी पत्नी का एसएमएस आया कि ज़रा टीवी ऑन तो कीजिए. मैं समझ गया कि फिर कोई बुरा या बड़ा हो गया है. लेकिन अब सब लोगों की आदत सी हो गई है कि धमाका, लाशें, सैन्य कार्रवाई कोई ख़बर नहीं है. अगर मज़ा है तो बौखलाए हुए टीवी ऐंकर्स, अनाड़ी रिपोर्टर्स और गृह मंत्री रहमान मलिक को देखने में है. यह वह मख़लूक़ है जो हर ट्रेजडी को ब्लैक कॉमेडी में बदल देती है.
ऐंकर... सूचना के अनुसार हमलावर "सशस्त्र बंदूक़ें" लेकर पुलिस प्रशिक्षण केंद्र में दाख़िल हो गए हैं.
ऐंकर (रिपोर्टर से) आप ने अभी कहा कि इमारत के अंदर से गोलीबारी हो रही है. क्या आप बता सकते हैं कि इस समय कितने लोग फंसे हुए हैं और इन में घायल कितने हैं.
रिपोर्ट... अभी अभी एक आतंकवादी निकल कर भागा है. भागने के अंदाज़ से लगता है कि वह दक्षिण वज़ीरिस्तान से आया है.
ऐंकर... आइए दर्शको, हम आप को गंगाराम अस्पताल लेकर चलते हैं जहाँ हमारे रिपोर्टर मिस्टर फलाँ फलाँ मौजूद हैं. मिस्टर फलाँ फलाँ यह बताइए कि इस समय यहाँ पर लाए गए घायलों की क्या स्थिति है? क्या उन्हें ठीक तरह से चिकित्सा की सुविधाएँ मिल रही हैं. क्या दवाएँ पूरी हैं?
ऐंकर (रिपोर्टर से) अच्छा यह बताईए कि मोहम्मद रशीद नामी आतंकवादी जो गिरफ्तार हुआ है, उन के बारे में क्या जानकारी है.
रिपोर्टर... जी, मोहम्मद रशीद ने पुलिस को बताया है कि उन असली नाम मोहम्मद सिद्दीक़ है.
ऐंकर (पुलिस चीफ से) सुना है कि आंतकवादियों में कुछ महिलाएँ भी हैं.
पुलिस चीफ... जी, अभी इस बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता.
ऐंकर... तो इस की कोई संभावना है कि महिलाएँ भी हो सकती हैं??
फिर इंतेज़ार रहता है टीवी के सामने बैठने वालों को कि गृह मंत्री रहमान मलिक आज क्या कहेंगे.
रहमान मलिक... देखें जी, यह बहुत बड़ी सफलता है कि हमला करने वाले सभी आतंकवादियों को मार दिया गया है. यह आतंकवादी मानवता के दुशमन हैं. यह पैसे लेकर ऐसी कार्रवाईयाँ कर रहे हैं. यह विदेशी इशारों पर नाच रहे हैं. अगर आज यह अपने इरादों में कामयाब हो जाते तो बहुत बड़ी तबाही होती और मीडिया के अनुरोध करता हूँ कि वह जिम्मेदारी का प्रदर्शन करे और ऐसी घटनाओँ को ज़्यादा न उछाले.
रिपोर्ट (रहमान मलिक से) पिछले हफ्ते इस्लामाबाद में विश्व खाद्य कार्यक्रम के कार्यालय पर जो हमला हुआ था. उस के बारे में कुछ पता चला?
रहमान मलिक... जी हाँ, उस की जांच हो रही है. अभी तक यही पता चला है कि एक आत्मघाती जो सुरक्षाकर्मियों को वरदी में था उस ने दफतर के बाहर मौजूद एक संतरी से कहा कि वह "पेशाब पिशूब" करना चाहता है. सुरक्षाकर्मी ने उसे अंदर का बाथरूम इस्तेमाल करने की इजाज़त दे दी और वह घुस गया . सुरक्षा संबंधी संस्थाओँ को आदेश दिया है कि आइंदा किसी अज्ञात को चाहे उस ने वरदी ही पहनी हुई हो पेशाब करने के लिए अंदर न छोड़ें.

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ख़ान साहब आप जो फरमा रहे हैं वह काफ़ी हद तक ठीक है.
ख़ान साहब जबरदस्त लिखा है आपने. लेकिन ऐसा लगता है कि यह लड़ाई पाकिस्तान कि नहीं बल्कि दूसरे मुल्कों की है जिसे बस पाकिस्तानी जनता भुगत रही है.
मीडिया का ऐसा ही कुछ हाल यहां भी यानि भारत में दिखता है...
यह न केवल पाकिस्तानी मीडिया का मामला है, यह भारत में भी होता है.
वुसतुल्लाह साहब आपकी शैली और कद को देखते हुए ये ब्लॉग काफी अटपटा सा लगा. शायद आधे दिल से लिखा है आपने. खैर सही है बुरी बातें अच्छी तरह से लिखें भी तो कैसे. उनकी हकीकत तो वहीं रहेगी. बेहद अफसोस की बात है कि पत्रकारिता कला न होकर एक पेशा रह गई है जिसमें ब्रेकिंग न्यूज़ का महत्व उतना ही रह गया है जितना कि एक साबुन के विज्ञापन का. कहीं न कहीं आज टीवी पत्रकारिता खबर देने के बजाय खबर बनाने में लग गया है. रही बात रहमान मल्लिक की तो उनकी हालत उस रिकॉर्ड प्लेयर की है जो बार बार एक जगह पर अटक जाती है.
बहुत सही कहा जनाब. बिल्कुल सही सूरत ए हाल बयान कर दी आपने लेकिन क्या यह सब इसलिए नहीं हो रहा कि जो दूसरों के लिए गड्ढे खोदता है उसे खुद भी उसमें गिरना पड़ता है? पाकिस्तान ने दहशतगर्दी को पनाह दी और अब उसकी कीमत चुका रहा है.
आजकल मुझे आपके ब्लॉग का इंतज़ार रहता है. ये तो नहीं कह सकते कि आपका ब्लॉग पाकिस्तान में पढ़ा जाता है कि नहीं, मगर भारत और भारत के बाहर रहने वाले भारतीय आपके ब्लॉग का आनंद उठाते हैं.
ख़ान साहब आप बिलकुल सही हैं. इन रिपोर्टरों, एंकरों ने रिपोर्टिंग को कॉमेडी शो बना कर रख दिया है. हर ख़बर को ये सनसनीखेज बना कर प्रस्तुत करते हैं. हम चाहते हैं कि दोनों ही देश का प्रसारण मंत्रालय हम दर्शकों को इनसे बचाए और इन पर लगाम कसे. हर बार कि तरह इस बार भी आपका ब्लॉग बेहतरीन है. हमें उम्मीद है कि एक दिन खबरों के प्रस्तुतीकरण में बदलाव आएगा और हम संवेदनशील होंगे.
खान साहब यह बहुत ही संवेदनशील मुद्दा है लेकिन आज का इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अपनी दुकानदारी के चक्र में असली पत्रकारिता के पथ से भटक चुका है. सिक्के के दो पहलूओं में से यह आजादी का पहलू किसी भी देश या व्यक्ति विशेष की अस्मिता के लिए खतरा हो सकता है. बात चाहे मुंबई आतंकवादी हमले की हो या पाकिस्तान में हमले की कुछ चैनल गैर जिम्मेदाराना रवैया अपनाए रखते हैं. कई बार आधी-अधूरी व सतही जानकारी लोगों तक पहुँचते ही विपरीत परिस्तिथियाँ पैदा करती है. विघटनकारी ताकतों के लिए आसान रास्ते व अति महत्वपूर्ण जानकारियाँ सीधे प्रसारण के दौरान ऐसे ही मिल जातीं है जैसे की अंधे को पकड़ कर रास्ता दिखाना हो. यह भी सच है कि कई बार निपुण मीडिया की बदौलत बहुत सारे अनदेखे समाचार व अनछुए मुद्दों पर प्रकाश डाला जाता है. लेकिन दुःख तब होता जब सनसनी के वेग में किसी की हानि हो जाती है जैसा कि दिल्ली के एक डॉक्टर की बेटी के हत्याकांड में शुरू में मीडिया ने माँ -बाप को दोषी करार दिया. दुःख तब भी होता है जब कुछ समाचारों को एक दो दिनों तक सनसनी बनाकर फिर कभी उनकी सुध नहीं ली जाती. सबसे पहले व सबसे आगे की सनक में असली खबर पीछे छूट जाती है. हमारे यहाँ लोकतंत्र का चौथा स्तंभ राजनेताओं , पूंजीपतियों व संपन्न लोगों की बपौती बन कर रह गया है. आतंकवादी व दहशतगर्दी गतिविधियों के दौरान सीधे प्रसारण व खबरों पर विशेष ध्यान देना चाहिए ताकि अराजक तत्वों तक महत्वपूर्ण जानकारियाँ न पहुंचें. कुछ साल पहले राजस्थान में बाढ़ के चलते कार में फंसे परिवार को मीडिया सीधा प्रसारित करता रहा व सरकारी सहायता में देरी के लिए सरकार को कोसता रहा. उस समय मीडिया हेलिकॉप्टर का प्रबंध करके इस परिवार को काल के मुँह में जाने से बचा सकता था लेकिन ऐसा हो न सका. किसी को मुसीबत से बचाने के लिए किसी प्रमाण पत्र की जरूरत नहीं होती न ही इन्तजार की गुंजाइश. आखिर जनता वही समझती है जो दिखाया जाता है. मीडिया किसी भी देश की सुरक्षा का सख्त प्रहरी होता है. एक स्वस्थ व पक्षपात रहित पत्रकारिता ही जनमानस में एकजुटता का माहौल पैदा कर सकती है.
हर कोई जानता है भारत और पाकिस्तान जैसे समाज और संस्कृति में खबरों की बेहद महत्वपूर्ण भूमिका है. हाल के वर्षों में दोनों ही देशों में खबरों के कई नए माध्यम उभर कर सामने आए हैं लेकिन ज्यादातर पत्रकार अपनी भूमिका को नहीं जानते उन्हें सिर्फ पैसे और प्रचार से मतलब है.
बेहद अफसोस की बात है कि पत्रकारिता कला न होकर एक पेशा रह गई है.पाकिस्तान में हमले की कुछ चैनल गैर जिम्मेदाराना रवैया अपनाए रखते हैं. इन रिपोर्टरों, एंकरों ने रिपोर्टिंग को कॉमेडी शो बना कर रख दिया है
वुसत साहब आप जो लिख रहे हैं आजकल उसे देखते हुए ये ब्लॉग आपका कुछ कमजोर लगा. लेकिन सच्चाई यही है कि मीडिया भारत का हो या पाकिस्तान का उसे चटखारे लेकर खबर परोसने की आदत हो गई है. सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने की जरूरत है क्योंकि इतनी बड़ा वारदात आंतकवादी कितनी आसानी से कर जाते हैं.
पाकिस्तान, भारत, श्रीलंका, बर्मा, चीन और बांग्लादेश सभी किसी न किसी रूप में आतंकवाद का सामना कर रहे हैं. वे क्यों नहीं एकजुट हो कर इसके बारे में बात करते और अपने दम पर मुक़ाबला करके इसके समापन का प्रयास करके इसमें और विलंब कर रहे हैं. इसका ख़ामियाज़ा आम लोगों, पुलिस और सेना को भुगतना पड़ता है. राजनीतिज्ञों को इसका कम ही सामना करना पड़ता है. हालाँकि इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, मुजीबुर्रहमान और बेनज़ीर भुट्टो जैसे लोग चरमपंथ का निशाना बने हैं.
मेरा मानना है कि इंसानियत को बढ़ाओ, मेरे भाई, जानवर तो हर जीव में पैदायशी होता है...ज़्यादा नहीं, सिर्फ़ एक पूरे इंसान बनो बस. चारों ओर शांति अपने आप हो जाएगी. यहाँ भी, वहाँ भी...