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'घबराए' हुए चरमपंथियों ने क़हर ढाया

वुसतुल्लाह ख़ानवुसतुल्लाह ख़ान|मंगलवार, 13 अक्तूबर 2009, 19:25 IST

आत्मघाती चाहे मिलेशिया बैरेक, पेशावर के ख़ैबर बाज़ार या इस्लामाबाद में विश्व खाद्य कार्यक्रम के कार्यालय में फटे, बारूदी ट्रक चाहे मैरियट इस्लामाबाद या पर्ल कॉंटिनेंटल होटल में घुसे, कमांडो स्टाइल आतंकवादी एक्शन मनावाँ पुलिस केंद्र और श्रीलंकाई टीम के ख़िलाफ हो, सरकारी वक्तव्य एक ही होता है.

"आतंकवादी घबरा गए हैं और बदहवासी में यह आक्रमण अपनी कमज़ोरी छिपाने के लिए कर रहे हैं. आतंकवादियों को अच्छी तरह मालूम है कि अब उन के गिर्द सुरक्षाबलों का घेरा तंग हो चुका है. पूरा देश उन के ख़िलाफ उठ खड़ा है. इसलिए उन की यह कार्रवाईयाँ बुझे हुए चराग़ की आख़री भड़कती हुई लौ हैं. उन से घबराना नहीं चाहिए, ऐसे आक्रमण अभी और भी होंगे लेकिन आतंकवाद को पूरी तरह जड़ से उखाड़ दिया जाएगा."

यदि ऐसे सरकारी वक्तव्यों पर यक़ीन कर लिया जाए तो फिर जीएचक्यू रावलपिंडी पर होने वाला हमला समझने में कोई मुश्किल नहीं होनी चाहिए. यानी दर्जन भर आतंकवादियों ने एक महीने पहले इस्लामाबाद के करीब आवान टाउन में "घबरा" कर एक घर कराए पर लिया.

बीस पच्चीस दिन तक "बदहवासी" के आलम में घटनास्थल के नक़्शे बनाए और जीएचक्यू का सर्वेक्षण किया. "इंतेहाई कायर" हो कर सैन्य वरदियाँ पहनीं और "दहशतज़दा" हो कर एक मोटर साईकल और सुज़ूकी वैन में जीएचक्यू की दो सुरक्षा चौकियाँ पार कीं और कांपते हाथों से दो ग्रेनेड फेंक कर छह सैन्य अफसरों और जवानों को मार दिया.

इस दौरान आतंकवादियों के कुछ साथी भी मारे गए. यह दृश्य देख कर बाक़ी आतंकवादियों के "हाथ पावँ फूल गए" और उन्हों ने दो फौजी इमारतों में घुस कर चालीस के लगभग लोगों को उन्नीस घंटे केलिए बंधक बना लिया.

आतंकवादियों की इस "बदहवासाना दनदनाहट" पर सरकारी तसल्लियाँ सुन कर मुझे वह कहानी याद आ रही है कि एक हकीम साहब के पास डायरिया का मरीज़ आया.

हकीम साहब ने कहा यह गोलियाँ इस्तेमाल करो इंशाअल्लाह फ़ायदा होगा. हिकमत में चूँकि मर्ज़ को दबा कर नहीं बल्कि उभार कर ख़त्म किया जाता है इसलिए दवा के इस्तेमाल से अगर और दस्त आएँ तो घबराना नहीं.

दो दिन बाद मरीज़ का बेटा हकीम साहब के पास आ कर शिकायती लहजे में बोला कि अब्बा को तो दवा के इस्तेमाल के बाद इतने दस्त आए हैं कि चारपाई से लग गए हैं. हकीम साहब ने कहा, "घबराओ नहीं दवा अपना असर कर रही है और मर्ज़ बाहर निकाल रही है, अभी दस्त आएँगे फिर फ़ायदा दिखना शुरु हो जाएगा".

तीन दिन बाद मरीज़ का बेटा फिर हकीम साहब के पास आया यह बताने के लिए कि अब्बा इंतक़ाल फ़रमा गए हैं. हकीम साहब ने एक आह भरते हुए कहा, "मरना तो एक दिन हर एक है. शुक्र है दस्त बंद हो गए".

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 12:14 IST, 14 अक्तूबर 2009 प्रतीक जैन:

    बहुत खू़ब. बहुत सुंदर पोस्‍ट है.

  • 2. 12:31 IST, 14 अक्तूबर 2009 Sandeep:

    आपने सही लिखा है वुसत जी. एक दिन यही होना है. अभी मरीज़ को दुनिया में उसकी बांटी दवा वापस उसके ख़ुद के बनाए हकीमों से मिल रही है. जिससे उसका मर्ज़ ख़ूब उभरेगा, और एक दिन दुनिया कहेगी, "शुक्र है... मर्ज़ तो ख़त्म हो गया" तब यक़ीनन संसार में शांति होगी.

  • 3. 12:49 IST, 14 अक्तूबर 2009 भूपेश गुप्ता :

    वुसत साहब, बहुत ही बजा फ़रमाया आपने. एक कहानी मुझे भी याद आ गई - ''एक बनिए की तीन ख़ूबसूरत लेकिन तुतलाने वाली बेटियाँ थीं. लड़के वालों को बनिया तीनों बेटियाँ दिखाता और कहता कि जो पसंद आ जाए उससे शादी पक्की, साथ में दहेज भी. कई लड़के उन्हें देखने आते, लेकिन लड़कियों के मुंह खोलते ही बिदक जाते. आख़िर बनिए ने एक रईस लड़के वाले के आने पर तीनों लड़कियों को हिदायत दी की अबकी बार कोइ लड़की अपना मुंह ना खोले. लड़के ने देखा और बड़ी लड़की पसंद कर ली. तभी एक चूहा वहां से गुजरा. छोटी लड़की डरपोक थी इसलिए बोल बैठी - ''तुआ-तुआ''. बीच वाली से भी रहा नहीं गया और बोली - ''तहाँ है - तहाँ है''. बड़ी ने खेल बिगड़ते देखा तो बोल पड़ी - ''तुप-तुप''. यहाँ साफ़ कर दूँ कि लड़के वाला ''अमेरिका'' है. बनिया ''दक्षिण एशिया'' है औए तीन बेटियाँ - ''पाकिस्तान, तालिबान और अफ़ग़ानिस्तान'' हैं.

  • 4. 12:51 IST, 14 अक्तूबर 2009 suresh mahapatra:

    वुसत जी, शब्द नहीं हैं मेरे पास, आतंकीयों के कायर करतूत के ये सड़े-गले शब्द भारत के गृह मंत्री शिवराज पाटिल भी ख़ूब बोला करते थे. लिबास बदल-बदल कर एक ही बात को दोहराने में उन्हें महारत थी. भारत हो या पाकिस्तान मर्ज़ एक है. दवा भी एक है पर डॉक्टर बदले हुए हैं. यही बड़ी बीमारी है.

  • 5. 13:24 IST, 14 अक्तूबर 2009 Afsar Abbas Rizvi "Anjum":

    वाह वुसतुल्लाह साहब, मान गए आपको, मिसाल क्या बेहतर दी है. आपने बिल्कुल ठीक कहा है कि इस वक़्त पाकिस्तान की सरकार का यही हाल है वो हकीम जी वाला नुस्ख़ा अपना रहे हैं इससे चाहे देश के हालात और ख़राब क्यों न हो जाएं उन लोगों को यही लगता रहेगा कि आतंकवादी अब घबरा गए हैं और अब सब कुछ ठीक हो जाएगा, लेकिन सच इसके बिल्कुल उल्टा है ये बातें आप भी जानते है, हम भी और पूरी की पूरी पाकिस्तानी जनता भी, लेकिन अब वक़्त आ गया है कि इस आतंकवाद से अगर बिल्कुल छुटकारा पाना है तो पाकिस्तानी भाईयों को सड़कों पर उतर कर वहां की सरकार को चेतावनी देनी होगी तभी वहां के सपूत अपनी माओं से जुदा नहीं होंगे, वरना इसी तरह से कई माओं की गोद उजड़ती रहेंगी, चाहे वह आतंकवादियों की शक्ल में हो या उनके द्वारा मारे गए मासूम लोगों की शक्ल में, नुक़सान हमेशा से मासूम लोगों का और उनकी निर्दोष माओं का ही होता आया है. इसलिए अब वक़्त है कि पूरी दुनिया को एक जुट होकर और पाकिस्तानी अवाम को पूरी एकजुटता के साथ इस ख़तरनाक आतंकवाद नामक बीमारी से हमेशा के लिए निजात पाने का वक़्त आ गया है. वरना कभी इतनी देर न हो जाए कि लौटने में काफ़ी दिक़्क़तें हों और बहुत देर हो चुकी हो.

  • 6. 13:25 IST, 14 अक्तूबर 2009 rashmi rai,lucknow:

    आप का ब्लॉग पढ़ के तो ऐसा लगता है कि डरे हुए आतंकवाद भी हमारी सरकारों से ज़्यादा साहसी है. मुझे तो लगता है कि आतंकवादियों को डरा हुआ कह कर सरकार अपने डर छिपाने का काम करती है. सर आपका ब्लॉग आतंकवादियों के प्रति सरकारों के रवैये पर बहुत सटीक कटाक्ष है.

  • 7. 13:50 IST, 14 अक्तूबर 2009 Rajeev Sharma:

    मैं सिर्फ़ इस घटना पर हंस सकता हूँ. व्यवस्था इतनी भ्रष्ट हो चुकी है कि उन्हें इससे भी कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि किस मौक़े से वे क्या बोल रहे हैं. वे बोलने के इतने आदी हो चुके हैं कि वे कुछ भी बोलने को बुरा नहीं मानते हैं. और यहां कुछ का मतलब कुछ भी है. वे बोलते रहेंगे बस बोलते रहेंगे और कभी रुकेंगे नहीं. ऐसे हैं हमारे नेता.

  • 8. 14:51 IST, 14 अक्तूबर 2009 jaiprakash tanwar:

    ये तो हुई आपके देश की सरकारी बयानबाज़ी की बात, अब ज़रा हमारे नेताओं के वक्तव्यों पर नज़र डालिए, किसी भी हमले के बाद यहां कुछ इस प्रकार गरजा जाता है आतंकवाद अब किसी भी हाल में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा, हम कड़ी कार्रवाई करेंगे, हमें कमज़ोर न समझें वग़रह.. जो भी देश आतंकवाद से निपटने में असफल है वहां कोई भी कार्रवाई की जगह सिर्फ़ बाते सुनने को मिलती हैं. दुख की बात ये है कि भारत भी उन असफल देशों में से एक है.

  • 9. 15:15 IST, 14 अक्तूबर 2009 Mayank Tyagi:

    भई वाह, बहुत अच्छा है जी. आप भी मुझे हकीम लगते हैं. बिल्कुल सही नब्ज़ पकड़ते हैं आप.

  • 10. 19:04 IST, 14 अक्तूबर 2009 Maneesh Kumar Sinha:

    भई वाह. वुसत साहब आपने मामले को बड़े सहज और सरल ढंग से समझा दिया. पाकिस्तान में आतंकवाद को बढ़ावा देना एक चलन बन गया है. लगता है यह भारत को परेशान करने का एक एजेंडा है. इस तरह से पाकिस्तान को अमरीका से और अधिक डॉलर हासिल करने का एक मौक़ा मिलता है. बेचारे नागरिक इस बारे में कर भी क्या सकते हैं.

  • 11. 19:24 IST, 14 अक्तूबर 2009 रवि शंकर:

    ज्यादा कुछ तो नहीं कहूँगा इस पर क्योंकि पाकिस्तान क्या करता रहा है चाहे मुज़हिदीनो का मसला हो या निशाने इम्तियाज़ पाने वाले परमाणु वैज्ञानिक का परमाणु प्रौद्योगिकी को यहाँ वहाँ से चुराना और फिर सब्जी-भाजी की तरह को हर ठग राष्ट्र को बेचना. ये सबको मालूम है. अभी तक आजादी और मुजहिदीगिरी का जो चूरन नुस्खा पाकिस्तान इधर उधर बाँट कर खुश हो रहा था अभी वह चूरन खुद उसे उसके नीम हाकिम ही उसको खिला रहे हैं तो कुछ बुरा नहीं है.

    पर ये बात मानने पड़ेगी के लिखा बहुत शानदार है पद कर मजा आगया साचा मैं .. :-)

  • 12. 19:38 IST, 14 अक्तूबर 2009 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:

    ख़ान साहब बहुत सच लिखा है आप ने. हक़ीक़त यह है कि आतंकवाद कमज़ोर नहीं अधिक ताक़तवर हो रहा है. बहुत सुंदर हकीम की दवा की मिसाल दे कर समझाया है. जैसे कि पहलवान वाली बात कि कुश्ती में चित हो गया लेकिन टांग ऊपर है.
    हक़ीक़त यह है कि थानेदार बना अमरीका इस मुद्दे पर बुरी तरह विफल हो गया कि अपनी कमज़ोरी छिपाने के लिए दूसरों के कंधों पर बंदूक़ चला रहा है. आज तक सिवाय ग़रीब के कोई भी नहीं मर रहा है. ज़िम्मेदार कौन है? हर देश की मौजूदा सरकार. और इस बीमारी का कोई भी इलाज नहीं है जैसा आप ने लिखा है मरीज़ मर जाएगा हकीम साहब की दवा से. जिस दिन हर देश की जनता समझ जाएगी हकीम साहब को दवा देना मुश्किल हो जाएगा.

  • 13. 23:42 IST, 14 अक्तूबर 2009 N.K.Tiwari:

    लिखा तो आपने सही है पर बात की जड़ पर जाने की हिम्मत तो दिखाइए.

  • 14. 00:19 IST, 15 अक्तूबर 2009 Shaheer A. Mirza, Sana'a - Yemen:

    यही कहानी दहशतगर्दी की शिकार अवाम पर पूरी होती है.
    आपने जो फ़रमाया वह दुरस्त है और सरकारी मशीनरी इसी तरह अख़बारी बयान देकर अपनी जान छुड़ा लेती है. लेकिन अब मामला इतनी दूर जा चुका है कि बहस अब इस सवाल पर होनी चाहिए कि यह सब रुकेगा कहाँ. इस वक़्त यह सवाल मायने नहीं रखता कि कौन यह कर रहा है या किसने तरबीयत दी या कहाँ से पैसा आ रहा है. या कौन लोग हैं जो आतंकवाद को आख़िरी रास्ता मान बैठे हैं. अब तो बात देखने की यह हो गई है कि आख़िर मुल्क भी रहेगा या नहीं यह सब करने के लिए या घर फूंक के ही दीवाली मना ली जाएगी.
    पाकिस्तानी हुकूमत कहती है कि तालेबान हमारे दुश्मन हैं, तालेबान कहते हैं कि अमरीका हमारा दुश्मन है, अमरीका कहता है कि तालेबान हमारे दुश्मन हैं. यानी लौट के बुद्धू घर को आए. सवाल यह उठता है कि इस चक्र में पाकिस्तानी फ़ौज किसके साथ है. हूकूमत दरअसल चाहती क्या है.

  • 15. 08:56 IST, 15 अक्तूबर 2009 BALWANT SINGH, HOSHIARPUR ,PUNJAB:

    खान साहब बिलकुल दुरुस्त फरमाया है आपने | सिपाही तो बस सिपाही होता है | सिपाही की कोई जात नहीं होती |यह तो सिर्फ नेता एक ऐसी प्रजाति है जिसकी पूरी दुनिया में एक ही जात है | लाखों सिपाहियों व् करोडों लोगों के खून से धरती लहूलुहान होती रही है | लेकिन इनके सफ़ेद व सर्द खून में गर्माहट न आ सकी | यह जात करोडों बलियां लेकर भी खुश नहीं है |
    दरअसल चूहे बिल छोड़कर भाग रहे हैं | आबादी में घुसेगें तो मारे ही जायेंगे | हुकुमरानों को चाहिए कि नींद से जागें व् यह जान ले कि चूहे भी महामारी फैलाने में माहिर हैं | इस महामारी से निजात दिलाना हुकुमरानों का फर्ज बनता है | वरन बहुत देर हो जायेगी | न दवा काम आयेगी न तो दुआ |गैरों के बहकावे में आकर पडोसी के साथ तकरार भी बाजिब नहीं है | अगर गैर किसी देश को निजी स्वार्थ के लिए लालच व बहकावा देकर इस्तेमाल करता है तो इह्तिहास गवाह है परिणाम क्या निकल कर आये हैं | अब आम जनता को भी सचेत होना चाहिए व अपने मुल्क की हिफाजत के लिए एकजुट होना चाहिए | अलगाववाद में कुछ नहीं रखा है |

  • 16. 10:16 IST, 15 अक्तूबर 2009 Amit Prabhakar:

    यह सभी घटनाएँ पूरी तरह सोचविचार कर की गई हैं. ब्लॉग अच्छा है.

  • 17. 11:17 IST, 15 अक्तूबर 2009 pskandhala:

    बेहतरीन. भारत सरकार भी नक्सलियों के मामले में इसी स्थिति में है. वह मर्ज़ को फैलने दे रही है और उम्मीद कर रही है कि यह कभी न कभी ख़त्म हो ही जाएगा.

  • 18. 13:45 IST, 15 अक्तूबर 2009 Pappu Kasai:

    वुसत साहब, पाकिस्तान अपनी ही दवा चख रहा है. भारत में एक कहावत है कि जो दूसरे के लिए कुआँ खोदता है ईश्वर उसके लिए खाई खोद देता है.

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