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आख़िर उम्मीद पर दुनिया क़ायम है

सुशील झासुशील झा|सोमवार, 12 अक्तूबर 2009, 09:00 IST

आम तौर पर अच्छा प्रदर्शन करने पर ईनाम और सम्मान मिलने की परंपरा है..लेकिन अब क्या परंपरा बदल रही है?

शायद तभी बराक ओबामा को नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया ताकि सम्मान के आधार पर वो आगे और अच्छा काम कर सकें.

मुझे लगता है कि अगर इस तर्क पर चला जाए तो मुझे भी पत्रकार होने के नाते ( जिसमें बहुत संभावनाएं हैं और वो सबमें होती हैं) पुलित्ज़र पुरस्कार मिल सकता है. इस पुरस्कार के आधार पर मैं भी और अच्छी पत्रकारिता कर पाऊंगा. आखिर उम्मीद पर दुनिया कायम है.

इस दलील का कोई ठोस आधार दिखता नहीं है इसलिए ओबामा को पुरस्कार दिए जाने की आलोचनाओं पर नोबेल पुरस्कार समिति ने बचाव में बयान दिया है.

लेकिन अब ये इतिहास में दर्ज हो चुका है कि ओबामा को ये पुरस्कार मिला है लेकिन क्यों... इसकी पड़ताल ज़रुरी है और उन कारणों की भी जो नोबेल समिति के गिनाए कारणों से अलग हैं.

पहले नोबेल समिति की बात करें. डायनामाइट की खोज करने वाले अल्फ्रेड नोबेल की वसीयत के अनुसार इन पुरस्कारों का गठन हुआ था. वसीयत के अनुसार पुरस्कार का एक हिस्सा उस व्यक्ति को जाएगा जिसने पिछले एक वर्ष में देशों के बीच भाईचारा स्थापित करने के लिए, सेनाओं को कम करने या हटाने तथा शांति स्थापना और शांति फैलाने की दिशा में सबसे अच्छा काम किया हो.

पिछले कुछ महीनों में ओबामा ने इस दिशा में छोटी शुरुआत ज़रुर की है. चाहे वो पूर्वी यूरोप में लगने वाले मिसाईल डिफेंस प्रणाली की योजना को रोकने की बात हो या फिर मध्य पूर्व में शांति वार्ताओं को शुरु करने की कोशिश.. लेकिन अभी इनके परिणाम आने में समय लगेगा.

वैसे भी नोबेल पुरस्कार हमेशा से राजनीति से प्रेरित माने जाते रहे हैं. चाहे रुज़वेल्ट हों, हेनरी किसिंगर या फिर यासिर अराफ़ात हो, जब ये पुरस्कार इन नेताओं को दिए गए तो विवाद हुआ था. तो फिर अब ऐसा हुआ तो क्या नया हुआ.

अब मेरी समझ. मुझे लगता है कि इसके लिए थोड़ा पीछे जाने की ज़रुरत है. महात्मा गांधी को उनके जीते जी दो बार नोबेल पुरस्कार के लिए नामित किया गया लेकिन उन्हें ये पुरस्कार उन्हें कभी नहीं दिया गया.

नोबेल समिति को अब भी यह बात खटकती है कि वो गांधीजी को पहचानने में ( नोबेल शांति पुरस्कार देने में ) देरी कर गए.

आगे चलकर नोबेल समिति ने माना कि गांधीजी को पहले ही नोबेल न देना एक ग़लती थी.

वैसे भी नोबेल पुरस्कार किसी को भी मरणोपरांत नहीं दिए जाते. ऐसा मात्र एक बार हुआ था जब स्वीडन के डैग्स हैमर्सकोल्ड को मरणोपरांत यह सम्मान दिया गया था.

अब किसी को भी मरणोपरांत यह सम्मान नहीं दिया जाता है.

शायद इसी कारण ओबामा को बिना किसी ठोस काम के पहले ही नोबेल पुरस्कार दे दिया गया ताकि बाद में नोबेल समिति को दोबारा न कहना पड़े कि वो ओबामा को पहचानने में पीछे रह गए.

दूसरा कारण...(मेरे हिसाब से)... ओबामा जब पुरस्कार लेंगे तो धन्यवाद भाषण देंगे और उसमें शायद उस व्यक्ति का ज़िक्र न हो जिसके कारण उन्हें ये पुरस्कार मिला है. वो होंगे जॉर्ज डब्ल्यू बुश...

जी हां बुश... चूंकि बुश साहब ने अपने आठ वर्ष के कार्यकाल में दुनिया भर को इतना नाराज़ किया कि उसके सामने ओबामा तो क्या कोई भी राष्ट्रपति होता ( जो शांति की मात्र बात करता ) तो अच्छा लगता.....इराक़, अफ़गानिस्तान और हो सकता था ईरान....बुश में क्षमता थी दुनिया का भविष्य भयावह कर देने की..

इतने ख़तरनाक दिन देखने के बाद दुनिया अगर ये सुने कि कोई अमरीकी राष्ट्रपति युद्ध की बात नहीं कर रहा है तो वो उसे अच्छा लगने लगता है और नोबेल शांति पुरस्कार के योग्य लग ही सकता है.

इनमें से जो कारण आपको सही लगे वो आप मान सकते हैं लेकिन एक बात सभी को माननी पड़ेगी....नोबेल समिति ने अपना काम कर दिया और अब गेंद ओबामा के पाले में है.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 14:10 IST, 12 अक्तूबर 2009 Afsar Abbas Rizvi "Anjum":

    वाह सुशील जी क्या ब्लॉग लिखा है. यह बात बिलकुल सही है कि इस पुरस्कार के लिए अपने भाषण में सबसे पहले ओबामा को बुश का शुक्रिया अदा करना चाहिए. जैसाकि आपने लिखा है कि बुश से पूरे विश्व में हर कोई नाराज़ था इसलिए ओबामा अगर कुछ भी ख़ास न करके सिर्फ़ शांति की बात करते हैं तो लोगों को यह पसंद आएगा. लेकिन हमें यह भी याद रखना होगा कि ओबामा एशिया के साथ भी अच्छी नीतियाँ अपनाएँ क्योंकि सबसे अधिक समस्याएँ यहीं हैं जिनका समाधान होना चाहिए. हम तो सिर्फ़ यह उम्मीद कर सकते हैं कि आने वाले समय में ओबामा अवॉर्ड का सम्मान रखते हुए शांति की और अधिक योजनाओं को अमल में लाएँगे और पूरे विश्व को शांति का संदेश पहुँचाएँगे.

  • 2. 16:54 IST, 12 अक्तूबर 2009 Shaheer A. Mirza, Sana'a - Yemen:

    झा साहब, पहली बात तो आप अमरीकी राष्ट्रपति नहीं हैं और न ही आपसे पहले किसी पत्रकार ने दुनिया को बर्बाद करने की कोशिश की. इसलिए आप पुलित्ज़र का मोह छोड़ दें, या फिर नोबेल कमेटी को ये यक़ीन दिला दीजिए कि आप अपने क्षेत्र में इंक़लाब लाने की क्षमता रखते हैं.

  • 3. 17:57 IST, 12 अक्तूबर 2009 AKRAM, KSA:

    बहुत अच्छा लिखा है झा जी आपने. इन कारणों की जाँच होनी चाहिए जिस कारण ओबामा को नोबेल पुरस्कार दिया जा रहा है. अगर सिर्फ़ कोशिश करने की सोचने से ही पुरस्कार मिल जाता है तो अमरीका का हर राष्ट्रपति कम से कम दस-दस नोबेल का अधिकार रखता है. अमरीका ऐसी कोशिश एक लाख बार कर चुका है लेकिन नतीजा क्या हुआ. अब तक मुझे कोई भी ऐसा देश बताइए जिसमें अमरीका ने शांति स्थापित करने की कोशिश की हो और उस देश की हालत किसी तरह भी ठीक की हो. वह सिर्फ़ अपना ही फ़ायदा देखता है.

  • 4. 18:22 IST, 12 अक्तूबर 2009 suresh mahapatra:

    सुशील जी, इस ब्लॉग में नया कुछ नहीं है. जो बातें लिखी गई हैं वे पूरी दुनिया को पहले से ही मालूम हैं. रही बात नोबेल पुरस्कार की तो यह जान लेना ज़रूरी है कि दुनिया में भारत की ग़रीबी, अमरीका की परमाणु शक्ति और पाकिस्तान का आतंकवाद बिक रहा है. महात्मा गांधी को शांतिदूत साबित करने में दिक़्क़त थी क्योंकि वह भारत के राष्ट्रनायक थे. ओबामा उस राष्ट्र के नायक हैं जहाँ से शक्तिशाली होने की गिनती शुरू होती है. तो ओबामा को बधाई देने में हर्ज ही क्या है.

  • 5. 19:47 IST, 12 अक्तूबर 2009 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:

    मैं मुसलमान हूँ और हमारे मज़हब में कहा जाता है कि दोनों कंधों पर दो फ़रिश्ते रहते हैं. बाएँ कंधे वाला बुरे कामों का हिसाब रखता है जबकि दाहिने वाला अच्छे काम की नीयत होने पर ही उसे अच्छाई के रूप में दर्ज कर लेता है. ओबामा के साथ यही हुआ है. अच्छे काम की नीयत करने पर ही नोबेल मिल गया. अब बीबीसी इस मुद्दे को बंद कर दे तो अच्छा रहेगा वरना ओबामा की शान में जाने कितने क़सीदे पढ़े जाएँगे.

  • 6. 20:11 IST, 12 अक्तूबर 2009 Chandra Shekhar:

    सबसे महत्वपूर्ण सवाल ये है कि क्या वहां और भी योग्य व्यक्ति थे कि नहीं. बिल क्लिंटन को देखिए, हिलेरी क्लिंटन के पति और बुश से पहले अमरीका के राष्ट्रपति. उन्होंने विश्व शांति के लिए बहुत से काम किए जो कि ओबामा कभी कर पाएंगे, पता नहीं. चाहे वो मध्य पूर्व में शांतिपूर्ण हल निकालने का मामला हो या फिर उत्तर कोरिया से दो पत्रकारों की रिहाई की बातचीत या एनपीटी या सीटीबीटी की ज़मीन तैयार करना. ये सब उनके कामों की बानगी भर है. फिर भी उनके काम नोबेल पुरस्कार के लिए पर्याप्त नहीं समझे गए. निश्चित तौर पर वह ओबामा से कहीं ज़्यादा इस पुरस्कार के हक़दार थे.

  • 7. 23:37 IST, 12 अक्तूबर 2009 JG:

    सुशील, कम से कम मामले का इतना सतहीकरण तो न ही कीजिए. यह तो हर कोई जानता है कि पुरस्कारों के पीछे राजनीति होती है. आप अब पत्रकार हैं, इसलिए बरखा दत्त का मामला आपको याद होगा. खैर. मामला यह है कि इस विषय का सैद्धांतीकरण करते हुए किस तरह विश्लेषण किया जाए. यदि विऱोधी उदाहरण बताना हो, सोवियत लैंड पुरस्कार का जिक्र कर लीजिए. मामला यह है कि जब ओबामा अफगानिस्तान में फौज बढ़ाने की बात करता है, कोरिया के विरूद्ध नीति अपनाता है, पाकिस्तान की सार्वभौमिकता का उल्लंघन करते हुए हमला करता है, तृतीय दुनिया के किसी भी देश को अपनी जागीर से ज्यादा नहीं समझता है, उस समय नोबेल............. मामला यह है कि आखिर इस तरह के पुरस्कार वैधता कैसे पाते हैं, और वैश्विक जनमत को किस तरह वास्तविकता से विमुख करते हैं. मौका है, यह सब सोच कर फिर से लिखो.

  • 8. 00:19 IST, 13 अक्तूबर 2009 BALWANT SINGH , HOSHIARPUR , PUNJAB:

    सुशील जी इस समय पूरा संसार राजनीति एक आखाडा मात्र बन कर रह गया है. नोबल पुरूस्कार समिति भी इसका एक अंश है. तीर कमान से निकल चुका है. लेकिन एक बात तो पक्की है अब ओबामा साहब की अग्नि परीक्षा होने वाली है. अब सही मायनों में दुनिया के दरोगा को विश्व शांती दूत की भूमिका निभानी है . एक तरह से सोचा जाये तो यह जल्दबाजी में लिया गया उपयोगी फैसला हो सकता है. और इस फैसले की कसौटी पर बराक ओबामा को खरा उतरना ही होगा.
    अमरीकी इतिहास के पन्ने पलटे जाएँ तो देखा जाता है कि वहां की जनता के सुख सकून व ऐशो आराम का दारोमदार राष्ट्रपति की क्षमताओं पर टिका होता है. फिर भले ही इसके लिए कोइ भी सीमा क्यों न लांघनी पड़े, इसके लिए किसी भी देश की मर्यादों का चीरहरन क्यों न करना पड़े. इस दृष्टि से गौर फरमाया जाए तो यह नोबल शांति पुरस्कार अब किसी देश को केवल शक के आधार पर व बिना सबूतों के इराक जैसे दिन नहीं देखने पडेगें. अब देखना यह होगा कि दुनिया को शांती का पाठ पढाने वाला अपने घर में कितनी शांती बनाये रखता है.

  • 9. 02:02 IST, 13 अक्तूबर 2009 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:

    सुशील जी, एक बार बीबीसी को लिखना पड़ रहा है कि बीबीसी अपना समय ओबामा पर अधिक न दे तो ठीक है. आखिर बीबीसी क्या संदेश देना चाहती है. सबको पता है कि दुनिया का थानेदार है.

  • 10. 04:13 IST, 13 अक्तूबर 2009 Amit Sharma:

    नोबेल शांति पुरस्कार फ़र्ज़ी है. इसका कोई मतलब नहीं है.

  • 11. 06:58 IST, 13 अक्तूबर 2009 Pallav Pareek:

    सुशील जी
    बहुत अच्छा एवं सटीक लेख लिखा है.
    उपरोक्त कुछ लोगों से मैं शायद सहमत नहीं हूँ ( सबको पहले से मालूम था आदि आदि.)
    क्यूंकि ज्यादातर बातें शायद हमें मालूम होती हैं, इस तर्क को देखें तो हर तरह के
    बहस बंद ही हो जाने चाहियें, चूँकि हम पहले से बहुत कुछ (शायद ? ) जानते हैं . मेरा मानना ये है की हमको इस तरह के मंच से शायद अलग अलग पहलुओं को देखने और समझाने का मौका मिलता है.
    बहरहाल कारणों की खोज जारी रहे पर ऐसा प्रतीत नहीं होता कि हाल फिलहाल या शायद
    भविष्य में भी कभी कोई कारण ज्ञात होगा कि ओबामा जी शांति के इतने बड़े दूत कैसे बन गए .
    एक ही कारण अब तक वाजिब लगा : शायद नोबेल समिति एक और गलती न करने का प्रयास कर रही है
    कौन जाने ओबामा जी में भी एक महायुग्पुरुष छुपा हो ................

  • 12. 15:03 IST, 13 अक्तूबर 2009 Guru:

    वाह वाह, क्या ब्लॉग है. कमाल का है. लगता है हर वाक्य दस बार सोचने के बाद लिखा गया है. सुशील जी, बहुत अच्छा काम कर रहे हैं. ऐसे ही करते रहिए.

  • 13. 21:25 IST, 14 अक्तूबर 2009 तेजपाल सिंह हंसपाल:

    जैसा मैंने सुना है कि यह पूरा मामला नोबल प्राइज का नहीं वरन नोबल सरप्राइज का है. मुझे भी यह लगता है कि यह नोबल सरप्राइज ही है.

  • 14. 10:48 IST, 03 नवम्बर 2009 vidhi:

    लेख काफ़ी अच्छा है.

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