भारतीय और मूलतः भारतीय
वेंकटरामण रामकृष्णन को नोबेल क्या मिला भारतीय ख़ुशी से झूम उठे. अगले दिन भारत के हर अख़बार और टेलिविज़न चैनल की सुर्खी थी की एक भारतीय वेंकटरामण रामकृष्णन ने इस साल का रसायन शास्त्र का नोबेल पुरुस्कार जीत लिया.
आइए देखें कितने भारतीय हैं रामाकृष्णन.
उन्होंने बरोडा के एमएस विश्वविद्यालय से स्नातक की डिग्री लेने के बाद अमरीका से अपनी पीएचडी की और इस समय वह कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में पढ़ा रहे हैं.
हालाँकि अब तक 12 नोबेल पुरस्कार विजेता ऐसे हुए हैं जिनका कुछ न कुछ संबंध भारत से रहा है.
लेकिन इनमें से सिर्फ रबिन्द्रनाथ टैगोर और सर सीवी रमण को ही सही मानो में भारतीय कहा जा सकता है.
हरगोविंद खुराना को 1968 में मेडिसिन का नोबेल मिला. अविभाजित भारत के रायपुर (अब पाकिस्तान) में जन्मे खुराना 1945 में लाहौर विश्वविद्यालय से एमएससी करने के बाद अमरीका चले गए.
1983 में नोबेल पाने वाले एस चंद्रशेखर भी लाहौर में जन्मे थे लेकिन वह भी चेन्नई से स्नातक की डिग्री लेने के बाद अमरीका जाकर वहीं बस गए.
1998 में अर्थशास्त्र के लिए नोबेल पुरस्कार पाने वाले अमर्त्य सेन भी शांतिनिकेतन और प्रेसिडेंसी कॉलेज से पढ़ाई करने के बाद पहले ब्रिटेन और फिर अमरीका चले गए.
1979 में नोबेल शांति पुरस्कार पाने वाली मदर टेरेसा ने हालाँकि अपनी ज़िंदगी का बहुत बड़ा हिस्सा भारत में बिताया लेकिन वह जन्मी अल्बानिया में थीं.
सर सीवी रमण के बाद भारत को अब भी एक ऐसे व्यक्ति का इंतज़ार है जिसने भारत में रहते और काम करते हुए नोबेल पुरस्कार जीता हो.
नोबेल पुरस्कार के 108 वर्षों के इतिहास में सिर्फ बारह पुरस्कार विजेताओं का संबंध भारत से रहा है जबकि सिर्फ कैम्ब्रिज की मोलेकुलर बायोलोजी प्रयोगशाला ने अब तक तेरह नोबेल पुरुस्कार विजेता दिए हैं.
रामकृष्णन ट्रिनिटी कॉलेज के फ़ेलो हैं. अमर्त्य सेन का सम्बन्ध भी ट्रिनिटी कॉलेज से रहा है.
एक मज़ाक प्रचलित है कि अगर आप इस कॉलेज पर पत्थर फेकें तो वो किसी न किसी नोबेल पुरस्कार विजेता को लगेगा. क्या कारण है कि 1947 के बाद भारत में काम कर रहे किसी भी व्यक्ति को विज्ञान से सम्बंधित नोबेल पुरस्कार नहीं मिला है?
क्या वजह है भारत की आईआईटीज़ जिनकी आध्यात्मिक जगत में तूती बोलती है-एक भी नोबेल पुरस्कार विजेता नहीं पैदा कर सकी हैं.
एक रोचक तथ्य ये भी है कि भारत में नोबेल पुरस्कार जीतने में तमिलनाडु और बंगाल में होड़ लगी हुई है.
रामकृष्णन, सुब्रमनियम चंद्रशेखर और सीवी रमण अगर तमिलनाडु से हैं तो टैगोर, अमर्त्य सेन और मदर टेरेसा बंगाल का प्रतिनिधित्व करते हैं.
बंगाल से ये तर्क भी आता है कि जगदीश चंद्र बोस और सत्येन्द्रनाथ बोस भी नोबेल पुरस्कार के हक़दार थे लेकिन उन्हें ये पुरस्कार कभी नहीं मिला.
अगर आप बांग्लादेश के नोबेल शांति पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस को भी शामिल कर लें तो वह भी बंगाली ही हैं.
नोबेल पुरस्कार न पाने वाले भारतीयों की लिस्ट भी काफी लंबी है. कमला दास, महाश्वेता देवी और फैज़ अहमद फैज़ को अगर आप छोड़ भी दें तो इसको आप क्या कहेंगे कि महात्मा गांधी को पांच बार नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया लेकिन एक बार भी उन्हें पुरस्कार पाने योग्य नहीं समझा गया.
यही हश्र नेहरू का भी हुआ. उन्हें ग्यारह बार नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया लेकिन उन्हें एक बार भी पुरस्कार लेने के लिए स्टॉकहोम जाने का सौभाग्य नहीं मिला.
रामाकृष्णन के नोबेल पुरस्कार पर भारतीयों को नाज़ हो सकता है और होना भी चाहिए लेकिन ज़रुरत है नौकरशाही के चंगुल में फंसे शोध संस्थानों को आज़ादी देने, बेहतरीन दिमागों के पलायन को रोकने और वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देने की.

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नोबेल पुरस्कार भेदभाव करते हुए दिए जाते हैं. अब बराक ओबामा को नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया है. इसका क्या आधार है? समझ से परे है. जैसाकि आपने लिखा महात्मा गांधी को नोबेल पुरस्कार नहीं मिल सका.
मैं आपसे सहमत हूँ कि डॉ वेंकटरमन भारतीय नहीं और उन्होंने बतौर अमरीकी नागरिक ये पुरस्कार हासिल किया है. जहाँ तक रिसर्च का सवाल है तो भारत में हालात बदल रहे हैं और अनुसंधान के क्षेत्र में सुधार के लिए लगातार कोशिशें हो रही हैं. लेकिन जब तक शैक्षणिक संस्थान राजनेताओं के नियंत्रण में रहेंगे, तब तक भविष्य बहुत उज्जवल नहीं है. इसकी मिसाल हाल ही में आईआईटी के प्रोफेसरों का हड़ताल पर जाना रहा. हैरानी की बात ये है कि इस ख़बर को मीडिया में उचित कवरेज नहीं मिला.
बहुत ज़बर्दस्त लिखा है आपने. और भी ऐसे कितने ही लोग होंगे जिन्हें आप इस सूची में शामिल नहीं कर पाए. सिर्फ़ भारतीय मूल का होने से भारत को गर्व नहीं होना चाहिए, सोचना ये है कि उन लोगों ने भारत के लिए क्या किया है, वो तो शायद भारत में रहना ही पसंद नहीं करते होंगे.
मिर्ज़ा ग़ालिब ने क्या खूब कहा है, 'दिल को खुश रखने को ग़ालिब ये ख़्याल अच्छा है'. तो चलिए हम भी खुश हो लें कि भारतीय मूल के एक वैज्ञानिक को नोबेल पुरस्कार मिल गया. वरना इसमें खुश होने की कोई बात नहीं है. एक बार फिर से यह प्रमाणित हो गया है कि भारतीयों में तो दमखम है लेकिन हमारे संस्थान उन्हें ऐसा माहौल देने में सक्षम नहीं हैं जहां वे बेहतर काम कर सकें. वास्तव में तो यह हमारे लिए लज्जित और चिंतित होने का मौका है.
इसमें कोई दोराय नहीं कि बापू का जीवन दर्शन इन सभी भारतीय नोबेल पुरस्कार विजेताओं से कहीं अलग और निराला था. हमारे देश में एक कहावत मशहूर है कि 'घर का जोगी जोगड़ा, आन गांव का सिद्ध' यानी किसी विद्वान व्यक्ति की उसके अपने देश में उतनी प्रतिष्ठा नहीं होती जितनी कि दूसरे देशों में होती है. दुर्भाग्यवश महात्मा गांधी जैसा महान व्यक्ति भी इस कहावत से अलग नहीं रह सका. दुनिया के सामने शांति और अहिंसा का महान आदर्श पेश करने वाले गांधीजी को बावजूद इसके कि 1937, 1938, 1939 और 1947 और उनकी हत्या के कुछ दिन पहले 1948 में भी नोबेल पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया, लेकिन पांचों बार ये सम्मान इसलिए नहीं दिया जा सका क्योंकि सही मायनों में गांधीजी न ही राजनेता थे और न ही एक समर्पित राहतकर्मी.
नोबेल समिति का बापू को नोबेल पुरस्कार नहीं दिए जाने के लिए दिया गया तर्क कितना उचित था और कितना अनुचित यह तो नहीं कह सकता, लेकिन नोबेल फाउंडेशन के कार्यकारी अध्यक्ष माइकल सोहलम द्वारा गांधीजी को नोबेल पुरस्कार नहीं दिए जाने के संबंध में अफसोस जताना इस बात की दलील जरूर है कि गांधीजी को नोबेल शांति पुरस्कार नहीं दिए जाने का फैसला सही कतई नहीं था.
अभी तक जितने भी नोबेल पुरस्कार भारतीयों को मिले है उनमें सही मायने में कितने भारतीय हैं? कितनो को अपने देश से प्यार है? रामकृष्णन अपना देश बहुत पहले छोड़ चुके हैं तो हम कैसे कह सकते हैं कि वो भारतीय हैं.
भारतीयता और भारतीय मूल इस मानसिकता के द्वंद्व में फंसकर हम ये भूल जाते हैं कि वैश्वीकरण के दौर में क्या हम किसी से पीछे हैं. नहीं, आज तकनीक और विज्ञान के क्षेत्र में हम एक नई शक्ति के रूप में उभर रहे हैं. तो क्यों नहीं हमारे यहाँ ऐसी एक सोच बनती है कि ऐसी सरकारें बनें जो कैंब्रिज जैसी यूनीवर्सिटी स्थापित करने की प्रतिबद्धता दिखाएँ और जो भारतीयों को नोबेल पुरस्कार के उस पायदान तक पहुँचाए जहाँ हम गर्व से कह सकें कि ये नोबेल पुरस्कार विजेता भारतीय हैं.
महात्मा गांधी पुरस्कारों की श्रेणी से परे हैं. उनकी महानता सिद्ध करने के लिए पुरस्कार से नवाजा जाना ज़रूरी नहीं है, लेकिन नोबेल पुरस्कार समिति द्वारा उन्हें नामित किया जाना और पुरस्कार योग्य न समझना दुखद है.
बराक ओबामा ने आखिर किया क्या है. एक तरह से देखा जाए तो अमरीका ने बग़दाद को बर्बाद कर दुनिया के सबसे बड़े आतंकवादी का ख़िताब लिया है. अगर ऐसे ही शांति स्थापना के लिए अब नोबेल पुरस्कार दिया जाता है तो बहुत अच्छा हुआ कि हमारे महान शांति दूत महात्मा और नेहरू को ऐसा पुरस्कार नहीं मिला.
राष्ट्रपिता साबित करने के लिए पुरस्कार ज़रूरी नहीं हैं. लेकिन हमें तकलीफ़ तो होती ही है कि उन्हें नामांकित किया गया, लेकिन उन्हें पुरस्कार नहीं मिला.
भारतीय वैज्ञानिकों को नोबल पुरूस्कार क्यों नहीं या फिर भारतीय मूल के वैज्ञानिकों के नोबल पुरुस्कारों से ही हमें अपने आपको सांत्वना देनी पड़ेगी ? इस सवाल का ज़वाब हमारे शोध संस्थानों व् तकनीकी संस्थानों में फैले भाई भतीजावाद , राजनितिक षड़यंत्र ,पाखंड का माहौल , उभरती प्रतिभाओं का दमन ,आगे बढने वालों की टांग खिचाई , और अन्ततः महत्वपूर्ण स्थानों पर अयोग्य प्रार्थक आदि कारकों के पीछे छिपा है .नोबल पुरूस्कार पाने वाले यह वही भारतीय हैं जो इस देश की उसी मिट्टी की देन है. अगर इनमें कुछ अलग है तो वह है इनको सही स्थान् पर सही मौका व् मूलभूत सुविधाएं . लगता है कि नोबल पुरस्कार समिती किसी राष्ट्र विशेष को नाखुश नहीं करना चाहती है .उगते सूर्य को ही दुनिया प्रणाम करती है . इतनी बड़ी प्रतिष्ठत संस्था को ऐसे निर्णय शोभा नहीं देते.
जहां तक मुझे पता है इन पुरस्कारों के लिए तगड़ी लॉबिंग चलती है. हालांकि ये वैसे लोगों को नहीं मिलता जो इसके हक़दार नहीं लेकिन अपने आदमी को पुरस्कार दिलाने के लिए दवा कंपनियां, विश्वविद्यालय, राजनेता, लॉबी करते हैं ताकि नोबेल समिति के सदस्यों को अपने पक्ष में कर सकें.
रेहान जी आपका ब्लॉग अच्छा है.
किसी भी भारतीय वैज्ञानिक को कई दशकों से नोबेल पुरस्कार नहीं मिला है और कई दशकों तक मिलेगा भी नहीं. भारत में प्रतिभा की पहचान नहीं है. इसलिए भारत से प्रतिभाओं का पलायन होता है और अमरीका ऐसे लोगों का स्वागत करता है. इसलिए अमरीका के वैज्ञानिकों को नोबेल पुरस्कार मिलता रहेगा.
नोबेल पुरस्कारों की जड़ों को अंततः भारत में किसी सूत्र से जोड़ देने की हमारी पुरानी आदत का मैं तो बहुत कायल नहीं, पर विज्ञान के नोबेल पुरस्कारों का भारतीय संस्थानों के प्रोफ़ेसरों या शोधकर्ताओं को ना मिल पाने पर कुछ कहना चाहता हूँ इसलिए भी कि मैं आइआइटी खड़गपुर का छात्र रहा हूँ . मेरे विचार में आईआईटीज़ तकनीकी संस्थान हैं, न कि विज्ञान संस्थान. यहाँ शुद्ध विज्ञान में काम बहुत कम होता है. ऐसा नहीं है कि तकनीक के छात्रों और प्रोफेसरों को नोबेल मिलने की संभावना कम है पर सच यह है कि शोध के लिए यहाँ बहुत कम उच्च स्तरीय सुविधाएँ हैं तथा अब राजनीति के सरकार द्वारा प्रवेश करा देने के बाद मुझे डर है कि ये संस्थान भी एक और सरकारी दफ़्तर बनकर रह जाएंगे .
आईआईटी....मैंने टॉप आईआईटी से पढ़ाई की है लेकिन मैं कह सकता हूं कि आईआईटी वालों को नोबेल कभी नहीं मिलेगा क्योंकि सिस्टम सही नहीं है. आईआईटी में कुछ बहुत अच्छे प्रोफेसर हैं लेकिन माहौल ठीक नहीं है. इसे ठीक करना होगा.सरकार अपने डायरेक्टर नियुक्त करना चाहती है. यह विवाद हाल में सबको दिखा होगा जब प्रोफेसर भूख हड़ताल पर बैठे.....
नोबल पुरस्कार वितरित करने वाली इस विश्वस्तरीय मंडी में घोड़ो व गधों के भाव एक ही है. दुनिया में हिंदुस्तान की प्रतिभाएं कही छुपी हुई नही है। चाहे वो साहित्य, संचार क्रांति, कॉर्पोरेट जगत सहित कई जगत हो। फिर भी महात्मा गांधी व नेहरू जैसी हस्तियों को नजर अंदाज करना दुर्भाग्य है.पुरस्कार की चयन समिति को खुली आंखों से निर्णय लेना चाहिए.
आपके सवाल लाजमी हैं लेकिन जहां सवाल ऐसे उठ रहे हों कि पैमाना क्या है नोबेल का या दिये जाते वक्त किन बातों का ख्याल रखा जाता है (ओबामा ताजा उदाहरण हैं या कुछ आलोचकों की नजर में गांधी की उपेक्षा) वहां नहीं ही मिला तो क्या हमारे वैज्ञानिक किसी से कम है क्या? या जिन भारतीय फिरंगियों को मिल ही गया वो हमारे (भारत) लिए ही क्या करते नजर आते हैं..सिवाय टीवी पर छायावादी कवियों की तरह हर समस्या पर कटाक्ष करते हुए निकल लेते हैं. हम अपने वैज्ञानिकों के स्वाइन फ्लू के टीके ढ़ूंढ़ निकालने की अपेक्षा रखते हैं या विश्व को शून्य देने या चांद पर पानी के सबूत देने से...नहीं चाहिए हमें नोबेल
यही है भारतीय मीडिया जो तिल का ताड़ बनाने में बेशक नंबर वन है. रामाकृष्णन तो किसी मायने में भारतीय हैं ही नहीं क्योंकि उन्होंने उच्च शिक्षा के बाद देश को इस लायक़ ही नहीं समझा कि उसे जन्मभूमि के साथ कर्मभूमि भी बनाएँ.
मेरे विचार में अब समय आ गया है कि भारतीयों और अन्य लोगों के काम को सम्मान देने के लिए भारत स्वयं पुरस्कार देने की शुरूआत करे.
आप की बात बिलकुल सही है.
पूर्णत: सहमत! सबसे बड़ी बात यह है कि आखिर पश्चिम से सम्मानित होने में हमें इतनी खुशी क्यों मिलती है? और गंभीर तथ्य यह कि जिन प्रतिभाओं को हम अपने देश में काम करने और आगे बढने का अवसर नहीं दे पाते अक्सर वे विदेशों में जाकर अपने देश का नाम रोशन करते हैं। यह इस बात की सीख भी है कि प्रतिभाओं को अपने देश में ही रख सकें तो खालिस देसी पुरस्कार विजेता भी सामने आएंगे।
रेहान जी, ऐसा लगता है बीबीसी को सच लिखना पसंद नहीं है. इसीलिए मेरे दो बार भेजे पत्र आप के इस मुद्दे पर जगह नहीं बना पाए. बीबीसी की मर्जी वो चाहे वैसा करे.
ये बहस का एक अच्छा विषय है. मेरा मानना है कि जो लोग भी अपनी पढ़ाई, नौकरी अथवा किसी और उद्देश्य की प्राप्ति के लिए अपने मूल देश को छोड़ देते हैं तो उस समय वे ऐसा नहीं सोचते कि वो देश नोबेल पुरस्कार पाने के लिए छोड़ रहे हैं. ये आश्चर्यजनक बात है कि विज्ञान विषय में जो लोग भी विदेशों में काम करते हैं अक्सर इस तरह के बड़े पुरस्कार या सम्मान पाते दिखते हैं. तो हमें भारतीय या भारतीय मूल जैसी तुलनात्मक बातों को छोड़कर उनका सम्मान करना चाहिए, और यही सोचना चाहिए कि आखिर वो ऐसा काम कर रहे हैं जो कि पूरी दुनिया के साथ भारत के भी हित में है.
एक सवाल जो नहीं पूछा गया है वो यह कि स्वयं डॉक्टर रामकृष्णन अपनी भारतीयता के बारे में क्या सोचते हैं?
भारतीय कौन है और कौन नहीं, क्या इसकी परीक्षा सिर्फ नागरिकता के कागजातों से होती है? क्या खून के रिश्ते सिर्फ कागजों से बनते हैं? जो लोग अमरीकी या बर्तानी पासपोर्ट लेते हैं, उनकी रोटी, परिवार, बच्चों की क्या मजबूरी है, यह कोई नहीं सोचता.
इस ब्लॉग पर सभी पूर्वाग्रह से ग्रस्त हैं कि क्योंकि डॉक्टर रामकृष्णन के पास भारतीय नागरिकता नहीं है तो वो भारतीय नहीं हो सकते. भारतीय होना एक सोच है, एक सभ्यता से जुडाव है, एक मिटटी से प्यार है, उसे किसी नागरिकता के कागजों की आवश्यकता नहीं. भारत में जन्मे और इतने साल भारत में पढ़े व्यक्ति की भारतीयता पर सवाल उठाना उचित नहीं. बेहतर यह है कि हमारे अफसरशाह और राजनेता जागें, और डॉक्टर रामकृष्णन जैसे लोगों को गर्व से अपने को भारतीय व अमरीकी साथ साथ कहने दें. और वसुधैव कुटुम्बकम को साकार करें.
एक सवाल जो नहीं पूछा गया है वो यह कि स्वयं डॉक्टर रामकृष्णन अपनी भारतीयता के बारे में क्या सोचते हैं?
भारतीय कौन है और कौन नहीं, क्या इसकी परीक्षा सिर्फ नागरिकता के कागजातों से होती है? क्या खून के रिश्ते सिर्फ कागजों से बनते हैं? जो लोग अमरीकी या बर्तानी पासपोर्ट लेते हैं, उनकी रोटी, परिवार, बच्चों की क्या मजबूरी है, यह कोई नहीं सोचता.
इस ब्लॉग पर सभी पूर्वाग्रह से ग्रस्त हैं क्योंकि डॉक्टर रामकृष्णन के पास भारतीय नागरिकता नहीं है तो वो भारतीय नहीं हो सकते. भारतीय होना एक सोच है, एक सभ्यता से जुडाव है, एक मिटटी से प्यार है, उसे किसी नागरिकता के कागजों की आवश्यकता नहीं. भारत में जन्मे और इतने साल भारत में पढ़े व्यक्ति की भारतीयता पर सवाल उठाना उचित नहीं. बेहतर यह है कि हमारे अफसरशाह और राजनेता जागें, और डॉक्टर रामकृष्णन जैसे लोगों को गर्व से अपने को भारतीय व अमरीकी साथ साथ कहने दें. और वसुधैव कुटुम्बकम को साकार करें.
* रेहान जी बहुत बढ़िया लेख | * डॉक्टर दुर्गा प्रसाद अग्रवाल जी पूरी तरह सहमत |
असल में तो सिर्फ टैगोर और रमण ही दो असली भारतीय हैं जो नोबेल ले चुके हैं |
मैंने पूर्व में कभी एक किताब पढ़ी थी जो नोबेल प्राप्त भारतीयों को सूचीबद्ध करती हुई उनकी जानकारी देती थी | ये बड़े मजे की बात है की उसमे और सामान्यतः सभी लोग, टेरेसा को भी इस लिस्ट में जोड़ लेते हैं और वी. एस. नायपाल को भी जोड़ लेते हैं | यदि आप विदेशी को जोड़ते हैं तो फिर नायपाल को निकाल दीजिये क्योंकि अब उनको वो लिस्ट में जोडेंगे जहाँ वो रह रहे हैं, या फिर टेरेसा को निकाल दीजिये क्योंकि वो अल्बानिया में जन्मी थीं इसलिए उनको लिस्ट में जोड़ने का अधिकार सिर्फ अल्बानिया को होना चाहिए | लेकिन हमने दोनों को जोड़ लिया है, झूठे गर्व को प्राप्त करने के लिए |
राजीव सेठिया, इस ब्लॉग पर सभी पूर्वाग्रह से ग्रस्त हैं क्योंकि.......
राजीव जी, मैं आपकी बात से सहमत नहीं हूँ. आज के असली युग में आदर्श जैसा कुछ भी नहीं है. ये मुझे भी पता है और आपको भी पता है कि इस धरती पर प्राकृतिक रूप से ज़मीन पर कहीं ये नहीं लिखा है की ये अमरीका है और ये चीन है. सब जगह आदमी ही रहते हैं. परन्तु वसुधैव....वाली बात असल जिंदगी में आज नहीं है. आपने जो कहा है उस आधार से तो पुरस्कार, नाम, काम सबके दायरे मिट जाते हैं. फिर तो वीजा,पासपोर्ट की भी जरूरत नहीं है. इस देश की प्रगति, उस देश की अवनति आदि का भी कोई मतलब नहीं. परन्तु ऐसा है क्या?