ठन ठनन ठानाँ ठणन
जितना ऊधम दिल्ली की लोकसभा में उस समय मचा था जब मन मनोहन सिंह ने अमरीका-भारत असैनिक परमाणु संधि संसद से पारित कराने के लिए अपनी राजनीतिक पगड़ी दाँव पर लगा दी थी, उस से दोगुना बवाल उस समय पाकिस्तान में कैरी-लूगर बिल के मामले पर खड़ा हुआ है.
भांत भांत के टीवी चैनल्स पर इतना शोर है कि हर बोलने वाला दूसरे से पूछ रहा है कि मैं ने अभी अभी क्या कहा? इस ऊधम बाज़ी में हैलरी क्लिंटन की यह बात भी दब कर रह गई है कि बिल पर बात करने से पहले उसे पढ़ तो लो.
कैरी-लूगर बिल की निंदा करने वालों का सारा बल उस पर है कि अमेरिका को यह जुर्रत कैसे हुई कि वह सहायता की क़िस्त देने से पहले अमरीकी विदेश मंत्री से यह सर्टिफ़िकेट माँगे कि पाकिस्तानी सेना लोकतंत्र के ख़िलाफ कोई क़दम नहीं उठाएगी. सैनिक पदों पर अफसरों की तरक़्क़ी के फ़ैसलों में असैनिक सरकार भी भागेदार होगी.
पाकिस्तान आतंकवाद और आतंकवादी संगठनों के चोरी-छुप्पे फैलाव में शामिल लोगों के बारे में पूरी जानकारी देगा. और यह सर्टिफ़िकेट शिक्षा, स्वास्थ और सामाजिक विकास के लिए दिए जाने वाले पैसे पर नहीं बल्कि सैनिक सहायता के लिए चाहिए होगा.
लेकिन कैरी-लूगर बिल विरोधियों को इस बात से कोई दिलचस्पी नहीं है कि इस के एक एक शब्द को पढ़ें. सब अपने कान चेक करने के बजाए कुत्ते के पीछे भाग रहे हैं.
"ज़रदारी ने पाकिस्तान को सस्ते में बेच दिया है." "इस बिल के अनुसार मिलने वाली सहायता से पाकिस्तान की संप्रभुता ख़तम हो जाएगी." "यह सर्टिफ़िकेट वाली बात भारतीय लॉबी ने बिल में डलवाई है." "अमेरिका चाहता है कि पाकिस्तानी सेना की शक्ति ही ख़तम हो जाए." "यह पाकिस्तान को बदनाम करने का षडयंत्र है." "हम भूखे मरना पंसद करेंगे लेकिन शर्तों वाली भीख नहीं लेंगे." आदि, आदि, आदि.
लेकिन इस शोर शराबे का एक बड़ा कारण यह भी है कि मीडिया चाहे कहीं का भी हो यह वह वैम्पायर है जिसे हर रात अपने पेट की आग बुझाने के लिए ताज़ा मोटा शिकार चाहिए.
कोई चाल ऐसी चलो यारो अब,
कि समन्दर भी पुल पर चले
फिर वो चले उस पे या मैं चलूँ
शहर हो अपने पैरों तले
कहीं ख़बरें हैं, कहीं क़ब्रें हैं
जो भी सोए हैं क़ब्रों में उनको जगाना नहीं
ठन ठनन ठानाँ ठणन, ठन ठनन ठानाँ ठणन

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें
बहुत ख़ूब, वुसतुल्लाह जी. भारत और पाकिस्तान में इसी बात की तो जंग है. हमें भीख भी चाहिए तो पूरी इज़्ज़त के साथ. अगर भारत और पाकिस्तान में याराना हो जाए तो फ़िरंगियों की भीख की ज़रूरत न पाकिस्तान को होगी न ही भारत को.
मौके के मुताबिक गाना अच्छा गुनगुना लेते हैं आप...
एक शेर मुझे भी याद आ रहा है
रोटियां कच्ची पक्की, कपड़े गंदे धुले
मुझे इसमें पड़ोसियों की चाल नज़र आती हैं...
बशीर बद्र साहब ने यह शेर इंडिया - पाकिस्तान को जेहन में रखकर ही लिखा होगा... वहां तो किसी को नौकरी से हटाया जाता है तो इंडिया, और पाकिस्तान मैच हारता है तो इंडिया... अच्छा है जितना वो खुदा का नाम नहीं लेते इंडिया का नाम लेते हैं...
'लेकिन कैरी-लूगर बिल के विरोधियों को इस बात से कोई दिलचस्पी नहीं है कि इस के एक एक शब्द को पढ़ें. सब अपने कान चेक करने के बजाए कुत्ते के पीछे भाग रहे हैं.'
मगर हमने तो आपके लेख का एक एक शब्द पढ़ लिया वुसतुल्लाह जी मगर बात खास समझ नहीं आई. अपने कान भी सलामत दिख रहे हैं और कोई कुत्ता भी भागता नजर नहीं आ रहा. इसके पहले तो आपके सभी ब्लॉग्स शानदार होते थे.
बिल्कुल सही कहा जी आपने- "ठन ठनन ठानाँ ठणन, ठन ठनन ठानाँ ठणन"
हा हा !! लगता है आपको भी कमीने का गाना बहुत पसंद आया .... क्या लिखते हैं ..जी करता है बस पढता जाऊं .. सची कहूँ तो मैं विषय के बारे में ज्यादा नहीं सोचता ..क्यूंकि खास कर इस तरह के मुद्दों पे ना तो आपके लिखने से कुछ होने वाला है ...न हमारे सोचने से ..जिन्हें करना है वो करेंगे ही ... तो फिर जो बात रह जाती है वो ये कि पढ़ो ..जोर के ठहाके लगाओ ..और हाँ एक बार आपको धन्यवाद देना मत भूलो :)
ख़ान साहब, आप उन लोगों को क्यों भूल रहे हैं जिन्हें इस बिल से काफ़ी नुक़सान हो रहा है. वही लोग है जो मास हिस्टीरिया को हव दे रहे हैं.
हिंदी में कहावत है- दान की बछिया के दाँत नहीं गिने जाते.
वुसत भाई, बेहतरीन. लेकिन क्या आप गुलज़ार की पंक्तियों का इस लेख के साथ संबंध बता सकते हैं.
वुसुतुल्लाह भाई गुलज़ार की पंक्तियों का खूबसूरत इस्तेमाल किया आपने, ऐसे आलेखों से पाकिस्तान की खोज खबर पहुंचाते रहें, पता चलता है दोनों मुल्कों की आवाम के सोच में ज्यादा अंतर नहीं..
वाह वुसतलुल्लाह साहब, क्या कह रहे हैं. ख़ैर पाकिस्तान ही क्या हर जगह जब तक आप शिक्षित नहीं होंगे और हर चीज़ को प्रैक्टिकली नहीं सोचेंगे तो इसी तरह की प्रतिक्रियाएँ आती रहेंगी. पाकिस्तान में तो कुछ तबक़ा ऐसा है कि अगर भारत पाकिस्तान के लिए कितना भी अच्छा काम करना चाहे और उसका कितना भी भला सोचे लेकिन उन्हें यह लगता है कि इसमें ज़रूर भारत का कोई हित छिपा है और इसमें ज़रूर भारत की कोई सोची समझी चाल है. जैसा आपने अपने ब्लॉग में लिखे है, कान देखा नहीं और कुत्ते की तरफ़ भागने लगे कि कान ले गया. किसी भी मसले के लिए बहुत ज़रूरी होता है कि पहले उस मसले पर पूरी तरह से चिंतन किया जाए और उसके हर पहलू पर ग़ौर किया जाए और उसके बाद ही किसी नतीजे पर पहुँचना चाहिए.
वुसत साहब, पहली बात तो यह कि कान लेकर कव्वा गया ता कुत्ता नहीं. क्योंकि अब भी हम में इतनी तहज़ीब है कि अपने रहनुमाओं को कव्वा कह सकते हैं, कुत्ता कहना ज़रा बुरा लगता है. रही बात पाकिस्तान और वहाँ की सियासत की तो पाकिस्तान वह मरीज़ है जिसके लिए डॉक्टर यह कहता है कि अगले 48 घंटे गुज़र जाएँ तो उम्मीद बढ़ेगी और यह सिलसिला हर 48 घंटे बाद दोहराया जाता है. मेरा दावा है कि वहाँ के 90 फ़ीसदी मीडिया को, 95 फ़ीसदी रहनुमाओं को और 100 फ़ीसदी अवाम को इस बात की जानकारी नहीं है कि कैरी-लूगर बिल किस चिड़िया का नाम है. उन्हें तो बस 48 घंटे गुज़ारने के लिए ऑक्सीजन चाहिए. वहाँ 2008 में आटे की क़िल्लत से शोर हुआ, जो बिजली-बरसात, राहे रास्त से होते हुए शक्कर तर पहुँचा और अब यह एक नया ड्रामा है. दरअसल पाकिस्तान की हुकूमत और यहाँ तक कि अवाम की बहुत बड़ी तादाद गूँगी और बहरी हो चुकी है और उसकी सोच का दायरा अपने घर की चारदीवारी तक ही है. शायद यही वजह है कि लोग कव्वे के पीछे दौड़ने में ही समझदारी समझते हैं. कान तो अपना ही है न, कभी भी चेक कर लेंगे.
यह तो मलाई समेटने का समय है | 2041 बहुत दूर है | 75 अरब रुपयों का सवाल है | कल की सोचने के लिए अभी बहुत वक़्त है | देखिये न पेंटागन कहता रहा , बुश साहब अनसुना करते रहे | और जनाब मुशर्रफ साहब ने अमरीकी आर्थिक सहायता को भारत विरोधी इस्तेमाल को स्वीकार करने के लिए पूर्व राष्ट्रपति होने का इन्तजार किया | तो जरदारी साहब को कहाँ की जल्दी हो सकती है | इस बिल को पारित करने वाली समिती ने बिना शर्त यह बिल पारित किया | जब जॉन कैरी और रिचर्ड होल ब्रुक व 26 देशों के प्रतिनिधियों को परेशानी नहीं हुई | तो सांप के जाने पहले ही लीक पीटने से क्या फायदा | सांप को आने दो और जाने तो दो भाई | जब शक्तिशाली देश अपने नागरिकों की सुरक्षा ,सुख - सुविधाओं के चलते किसी तरह का समझौता नहीं कर सकते | इसके लिए भले ही दुनिया के किसी भी कोने में अनायास ही आक्रमण क्यों न करना पड़े | तो मीडिया को भी पेट पालना है |
सनसनी नहीं होगी तो सामान बिकेगा कैसे ? दूकान कैसे चलेगी ?औरों की तनख्वाहों के ऊपर घंटों एक्सक्लूसिव रिपोर्टें दिखाने वाले कोई छोटे - मोटे खबरची थोड़े न हो सकते हैं | बाप बड़ा न भैया सबसे बड़ा रुपया |
ख़ान साहब, बहुत लंबे समय के बाद आपने अपना लेख लिखा वह भी एक अच्छे मुद्दे पर. यह हक़ीक़त है कि पाकिस्तान में कुछ भी घटता है तो भारत को ज़िम्मेदार और भारत में कुछ भी हो तो पाकिस्तान को ज़िम्मेदार ठहराया जाता है. और इसमें कुछ हद तक काफ़ी सच्चाई भी है जैसे मुंबई का हमला आदि. लेकिन एक सच जो 100 फ़ीसदी सही है मेरे अपने ख़्याल से कि दोनों देशों की अधिकतर जनता एक दूसरे को शक की निगाह से ही देखती है. यह मैंने अपनी आँखों से देखा और महसूस किया है. रहा सवाल दोनों देशों का अमरीका के साथ संबंधों का तो दोनों ही देशों के बेईमान नेता अमरीका की ग़ुलामी में कोई भी कसर नहीं छोड़ रहे हैं. एक दिन ऐसा आएगा कि अमरीका अपना मतलब पूरा कर दोनों देशों को लात मार देगा क्योंकि अमरीका का कोई भी दोस्त नहीं हो सकता. आप का लेख बहुत अच्छा है. भाई सुरेश का लिखना बिलकुल सच है लेकिन वह दिन इन दोनों देशों में कभी नहीं आएगा इन बेईमान नेताओं की वजह से.
कृपया मेरी 11. 18:14 IST, 08 अक्तूबर 2009 वाली टिप्पणी में सन 2041 को सन 2014 पढ़ा जाए | टाइपिंग त्रुटि के लिए क्षमा करें |
ख़ान साहब आपकी भारत पाक के नेताओं के बारे में समझ कमाल की है !
महापात्रा जी थोड़ा अपना सामान्य ज्ञान बढ़ाएँ और भारत को पाकिस्तान जैसे देश के समकक्ष न रखें. आज भारत भीख नहीं मांगता बल्कि देता है. अपनी ग़ुलामी की मानसिकता बदलें.
यह वही लोग हैं जो पहले चाहते थे कि जम्हूरियत पाकिस्तान में अपने पैर पक्की तरह धंसा ले पर जब अमरीका पाकिस्तान की नेक दिली से मदद करना चाह रहा है तब इतना हल्ला क्यों मच रहा है. पहले हल्ला था कि सेना का 'स्टेट विदन ए स्टेट' वाला दर्जा ख़त्म करो. अब हल्ला है कि पाकिस्तान को शर्तों से शर्मिंदा किया जा रहा है.
आपने बहुत सही बात कही है. पाकिस्तान जैसे अस्थिर देश में राजनीतिक स्थिरता बढ़ाने की दिशा में ये एक अच्छा क़दम है.