मुंबई या बंबई...
पहले राज ठाकरे नाराज़ हुए और उसके बाद महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अशोक चह्वाण.
अगर आपके पास ऊँची कुर्सी हो या सिनेमा हॉल की कुर्सियाँ उखड़वाने की ताक़त हो तो आप भी करण जौहर से नाराज़ हो सकते हैं. वे माफ़ी भी माँग लेंगे.
आप बताइए ज़्यादा बड़ी गलती मुंबई को उसके पुराने नाम से बुलाना है या उसके लिए माफ़ी माँगना. वह भी एक ऐसे आदमी से, जो मानता है कि तोड़फोड़ के बिना महाराष्ट्र का 'नवनिर्माण' संभव नहीं है.
अगर आप नागरिकों के अधिकार-कर्तव्य वग़ैरह की बात करने वाले 'भावुक आदमी' हैं तो आपको मुख्यमंत्री की बात सही लगेगी, अगर आप सही टाइम पर सही काम करने वाले 'समझदार आदमी' हैं तो करण जौहर को अशोक चह्वाण से भी माफ़ी माँगकर काम पर जुट जाने की सलाह देंगे.
मुख्यमंत्री अशोक चह्वाण कह रहे हैं कि पुलिस के पास क्यों नहीं गए, मुख्यमंत्री हैं इसलिए कहना उनका काम है. पांडु हवालदार और राज ठाकरे में से किसकी शरण में जाना है, यह हर समझदार आदमी को पता है.
जब तक महाराष्ट्र के 'नवनिर्माण में जुटे सामाजिक कार्यकर्ता' शिव सेना की जड़ें कुतर रहे हैं राज्य के कांग्रेसी मुख्यमंत्री को भला क्या एतराज़ हो सकता है, उन्हें अगर एतराज़ होता तो दो दिन बाद बयान देने के बदले समय पर कार्रवाई न करते?
यह तो इन दिनों की राजनीति की बात है लेकिन समानांतर सेंसर बोर्ड का मुख्यालय 'मातुश्री' में बरसों से रहा है, दूल्हे के बैठने वाली कुर्सी पर साधु जैसे कपड़े पहनकर रुद्राक्ष के मनके फेरने वाले पूर्व कार्टूनिस्ट से कभी माफ़ी, तो कभी आशीर्वाद लेने बीसियों निर्माता-निर्देशक जाते रहे हैं.
करण जौहर ने कुछ नया नहीं किया है, न अपनी फ़िल्मों में, न असलियत में.
क़ायदे-क़ानून से परे दलालों, पूंजीपतियों, महंतो, मठाधीशों और गुंडों के दरबारों में मत्था टेकने का आदी समाज 'वेक अप सिड' से उठे विवाद को 'वेक अप कॉल' की तरह तो नहीं देख रहा है.

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वाह राजेश जी, शानदार लिखा है. आपको शायद ठाकरे या उन जैसे बेईमान नेताओं का डर नहीं लगता है तभी आपने इतना शानदार पाठकों के लिए लिखा है जो शत प्रतिशत सही है.
आज भारत में जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली कहावत सच साबित हो रही है. करण बुजदिल हैं जो दरबार में जा कर मत्था टेक आए, माफी भी माँग आए. इससे यह साबित हो गया कि मुंबई में रहना है तो ठाकरे परिवार का गुलाम बन कर रहना पड़ेगा. रहा सवाल मुख्यमंत्री का तो वो भी नेता ही है. आज कांग्रेस में हैं कल वो भी ठाकरे की शरण में होंगे.
मेरी समझ में आज तक नहीं आया कि बंबई को मुंबई, मद्रास को चैन्नई और बंगलौर को बेंगलूरू कर देने से क्या फायदा हुआ. कनॉट प्लेस, दिल्ली को राजीव चौक कर देने से क्या हुआ. क्या ये संघाई, सिंगापुर या टाइम्स स्कवायर में बदल गया, या हमने कोई अभूतपूर्व काम कर दिया?
सबसे पहले राजेश जी आपको पत्रकारिता में पारदर्शिता के लिए बहुत बधाई. हम चाँद पर जा रहे हैं और सेटेलाइट की बात कर रहे हैं लेकिन वही घिसा पिटा राग अलाप रहे हैं, शहरों का नाम बदल देने से वहाँ रहने वाले लोगों की सोच नहीं बदलती. अगर कुछ बदलने की ज़रूरत है तो भूख, ग़रीबी और भुखमरी का स्तर. .यहाँ तक आने के बाद भी हम अपने देश को मज़बूत बनाने के लिए धर्म और मज़हब से ऊपर उठकर नहीं सोच पा रहे हैं. यह जो कुछ चल रहा है उसका कितना नुक़सान आगे आने वाली पीढ़ी को होगा इसका अंदाज़ा इन नेताओं को नहीं है. नेताओं को अपनी बेहूदा राजनीति से ऊपर उठकर सोचना चाहिए तभी कुछ बेहतर हो सकता है.
इसमें वेक अप कॉल जैसी कोई बात नहीं है, आज हमारा समाज गहरी नींद में सो रहा है, वह इस ढर्रे पर चल रहा है कि जैसे काम चलता है, चलाओ. नैतिकता, सिद्धांत आदि की बात करने वाले बेवकूफ़ थे, क्यों न हम समझदारी से काम लें और देखें कि उल्लू कैसे सीधा हो रहा है. राजदीप सरदेसाई जैसे जाने-माने पत्रकार ने भी लिखा है कि करण जौहर माफ़ी न माँगते तो क्या करते, उन्हें राज ठाकरे से कौन बचाता. अगर ऐसे कद्दावर लोग ऐसी बातें कर रहे हैं तो कौन आम आदमी पानी में रहकर मगर से बैर करेगा. लेकिन सवाल ये है कि उन्नत भारत क्या कर रहा है, क्या हम भी उन्हीं अँधेरों की तरफ़ जा रहे हैं जिसने बाकी दुनिया को अंधा कर रखा है. हम खुश हो रहे हैं हम तरक्की कर रहे हैं लेकिन इस तरक्की की कीमत शायद आज नहीं, आने वाली पीढ़ियों को चुकानी होगी. बात मुंबई या बॉम्बे की नहीं है, इस प्रकरण में राज ठाकरे अकेले गुनाहगार नहीं हैं क्योंकि प्रचार तो करण जौहर भी चाहिए था. चुनाव का मौहाल है, हम भी खुश तुम भी खुश. न्यूज़ चैनल तो ब्रेकिंग भारत नाम के दरिया में ब्रेकिंग न्यूज़ की कटिया लगाए बैठे ही हैं.
मुझे भी इस बात से ख़ासा इत्तेफ़ाक है कि आख़िर नाम बदल देने से कौन सा कमाल हो जाएगा. जिन शहरों को हम लंबे समय से इसी तरह जानते हैं उनका नाम बदलना उनकी ऐतिहासिकता को कमज़ोर नहीं करता? लेकिन हमारी सरकारें जो करती हैं उन पर आदमी का कोई ज़ोर नहीं चलता.
राजेश जी, आपने ये ब्लाग क्यों लिखा है, हम तो सदियों से व्यक्ति पूजा के आदी हैं, आज़ादी के 63 साल बाद भी हमारे देश पर पहले प्रधानमंत्री के नाती की पत्नी का राज चल रहा है. हम तालेबान और एलटीटीई के बारे में तो खूब पढ़ते हैं लेकिन हमारा तथाकथित विकसित लोकतांत्रिक देश अपने गिरेबान में झाँककर नहीं देखता.
भई वाह राजेश जी, काफ़ी दिनों बाद कोई ब्लाग पढ़ने में मज़ा आ गया. सही कहूँ तो ये ब्लाग नहीं एक थप्पड़ है जो आपने सही समय पर मारा है.
राजेश जी, कोई भी दल , संगठन ,व्याक्ति या आराजक तत्व तभी आम जनता पर हावी होता है जब तक इनमे से किसी को भी कहीं न कहीं से राजनितिक आशीर्वाद या सरंक्षण का हाथ न हो. सबूत दुनिया के सामने है, श्रीलंका जैसे नन्हे से देश ने लिट्टे जैसे विकराल अजगर को नेस्तनाबूद कर दिया. यह श्रीलंका की इच्छाशक्ति का जीवंत उदारहण है, एक तरफ मुख्यमंत्री अशोक चह्वाण जी पुलिस की शरण में जाने की सलाह देते नजर आए, वहीं दूसरी तरफ प्रदेश सरकार महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के साथ प्यार की पींगें बढाते दीखते हैं. ऐसे तत्वों को पैदा कौन कौन करता है, करण जौहर , बच्चनजी या औरों ने क्या गलत किया. मंदिर में रहना है तो बाबा-बाबा तो बोलना ही पडेगा न ! सामान्तर सरकारें चलाने का हक़ ऐसे लोगों को देता कौन है. कितना भौंडा लगता सुनकर कि कानून सबके लिए बराबर है. कानून के हाथ बहुत लम्बे होते हैं. यह हाथ क्यों इतने मजबूर होते हैं कि कोई भी अराजकता का नंगा नाच करता रहे व कानून मुँह आँख कान बंद करके मूक दर्शक बना रहे. श्रीलंका से कुछ तो सबक सीखना चाहिए जागो इंडिया (भारत ) जागो, अगर तोड़ -फोड़ का इतना जनून है देश की सीमा पर जाएँ, मुंबई हमलों के दौरान बहुत अच्छा मौका था लेकिन तब यह जनून कहाँ था?
बॉलीवुड स्वतंत्र नहीं है, मीडिया भी स्वतंत्र नहीं है, अगर मीडिया स्वतंत्र नहीं है तो लोग भी स्वतंत्र नहीं हैं, अगर लोग स्वतंत्र नहीं हैं तो महाराष्ट्र स्वतंत्र नहीं है.
राजेश जी धन्यवाद एक सार्थक विषय पर चर्चा शुरू करने के लिए. हमारे देश में नेता गुंडों को बढ़ावा दे रहे हैं. करण जौहर या सही काम करने वाले आम नागरिकों की परवाह करना सरकार ने बहुत पहले छोड़ दिया है, हम सभी लोगों अपराधियों की दया पर निर्भर हैं.
चलिए ये तो स्पष्ट हो गया कि अगर आप शिव सेना और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना से माफ़ी माँग लें तो मुंबई को बंबई कहा जा सकता है.
आपने कितनी चालाकी से शब्दों का प्रयोग किया है दंग रह गया
मसलन :-
तोड़फोड़ के बिना महाराष्ट्र का 'नवनिर्माण' संभव नहीं है
'नवनिर्माण में जुटे सामाजिक कार्यकर्ता'
कुर्सी पर साधु जैसे कपड़े पहनकर रुद्राक्ष के मनके फेरने वाले
आप बधाई के पात्र हैं...
बहरहाल, मामला अब तूल पकड़ रहा है, रामगोपाल वर्मा ने सरकार बनाई थी तो वो कन्विंस करने गए थे, ऐसा ही प्रकाश झा ने गंगाजल बनाई थी तो वो लालू के पास गए... उधर करन जौहर भी समझदार हैं... कोट पैंट वाले चालू शहरी... पैसे दांव पर लगे हो और फ़ायदा कमाना हो तो क्रांति और निर्भयता सिर्फ स्क्रीन पर दिखाना चाहिए यह उनको पता है...
तुम हैरान होते हो दो दुश्मनो को गले मिलते देख कर
लगता है कभी इनामी महफिल से कभी नहीं गुज़रे....
ज़बर्दस्त, ये राजेश जी का सर्वश्रेष्ठ लेख है. जब तक आम आदमी को पुलिस और सरकार पर यकीन नहीं होगा वह नताओं की धौंस सहता रहेगा. ये लोग महाराष्ट्र की जनता के शुभचिंतक नहीं हैं ये तो आम जनता भी जानती है लेकिन जब देश की बड़ी ताक़तें ही उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई नहीं कर रही है तो करण जौहर को क्या पड़ी है कि वे अपना करोड़ों का नुक़सान कराएँ. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से अधिक शांति से जीने की स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है और करण जौहर ये बात अच्छी तरह जानते हैं.
मुझे तो लगता है कि हम गोरों की कैद से आज़ाद होकर कालों की गुलामी में फँस गए हैं. सिर्फ़ गाल बजा सकते हैं, कुछ करना नामुमकिन बात है.
राजेश जी पहली बार आपने कोई निर्भीकता वाली बात कही है. पर समस्या है कि राज ठाकरे से कौन नहीं डरता, जब उन्होंने बिहारियों पर जुल्म ढाना शुरू किया तो अमिताभ बच्चन हों या लालू यादव, वे उनका कुछ नहीं बिगाड़ सके. ऐसे देश में प्रजातंत्र की उम्मीद करना भी बेमानी है. हमारा महान भारत ऐसे ही लोगों के हाथों की कठपुतली बन गया है.
हम आज चीन की तरक्की को देखकर अपना टनों खून जलाते है, लेकिन चीन में अगर ऐसा लोकतंत्र होता , जहाँ के राज ठाकरे और उनके 'साधू' चाचा खुले आम संविधान की भावना के खिलाफ बोलते तो उन्हें इसका ख़ामियाज़ा भुगतना पड़ता..हमारी सरकारे इतनी बेबस क्यों हो गई है कि कोई मंच से,'बिहारियो और यूपी' वालों को मारने की बात करे और हम सिर्फ लाचार उनको ब्रेकिंग न्यूज़ में सुनते रहें ..
.राज ठाकरे इसपे क्या कहेंगे जब कि उनके बच्चे जिनके स्कूल का नाम 'बॉम्बे स्कॉटिश स्कूल' है. राज ठाकरे अपने बच्चों को किसी मराठी स्कूल में क्यों नहीं पढाते, जहाँ पे मराठी भी पढाई जाती होगी. इन बड़े स्कूलों में ज़रूर उनके बच्चे मराठी का ज्ञान नहीं प्राप्त कर रहे होंगे.
शायद उनको लगता है के ये मुद्दे सिर्फ गरीबो के लिए है. लोगो को इस तरह लड़वा कर विकास की बात को अच्छे से छुपा सकते हैं.
वाह राजेश जी !! वाकई आपके विचार काबिल-ए-तारीफ हैं. एक एक शब्द को चुनकर आपने बहुत ही सटीक टिप्पणी की है, इसके लिए आपको साधुवाद. रही बात राज ठाकरे और अशोक चव्हाण की, तो ये सब एक ही थाली के चट्टे बट्टे हैं. ठाकरे की गतिविधियों से अगर चव्हाण को फायदा मिल रहा है, तो क्यों वे ठाकरे को दण्डित करने लगे. मुख्यमंत्री होने को नाते उन्होंने एक नेक सलाह दे दी, ये क्या कम है? अब इस सब में आम आदमी या करण जौहर पिसे तो उनकी बला से. चुनावी फायदा तो दोनों को ही है.
बॉम्बे को मुंबई सॉरी मुंबई को बॉम्बे कहना क्या अपराध है, जो माननीय चह्वाण जी के अनुसार पुलिस में रिपोर्ट करना चाहिए था. हर महीने इस देश में एक शहर का नाम बदलता है, क्या हम इसी उपलब्धि में वर्ल्ड रिकार्ड बनाने वाले हैं, और कोई क्षेत्र नहीं है काम करने के लिए. यह सब नाम बदलने का चक्कर नरसिंह राव ने शुरू किया था.
राजेश जी ज़रा संभल के, कहीं राज को पता चल गया तो वह आपके घर पर भी पत्थर बरसाएँगे और बाहर निकलना मुश्किल कर देंगे.
भई वाह. ब्लॉग पढ़ कर ऐसा लगा कि चलो हम रो और चिल्ला तो सकते हैं. धन्यवाद.