कुछ मेरी कुछ आपकी बात
बीबीसी हिंदी सेवा प्रमुख के रूप में आज आपसे रूबरू हूँ. हिंदी ऑनलाइन पर यह मेरा पहला ब्लॉग है और आप से संपर्क क़ायम करने का एक मौक़ा भी. लेकिन ज़रूरी है कि पहले आप को अपना थोड़ा सा परिचय दे दूँ.
मैं वर्ष 1986 से पत्रकार हूँ. जब से मैंने कॉलेज छोड़ा तब से ही मैं पत्रकारिता कर रहा हूँ. और कुछ करने का कभी मन ही नहीं किया. इसी में खुश था और खुश हूँ. पत्रकारिता एक तरह से मेरी ज़िंदगी है.
मैं तक़रीबन बीस साल तक "दी हिन्दू" के साथ जुड़ा रहा. इस अख़बार में मैंने हर तरह की रिपोर्टिंग की -- चाहे वो दिल्ली शहर के मसले हों, कश्मीर में बग़ावत, बस्तर में नक्सली हिंसा या देश में प्राइवेट एयरलाइन्स का आगमन. 1995 में मैं श्रीलंका संवाददाता बन कर कोलम्बो चला गया. फिर 1997 में पाकिस्तान और 2000 में सिंगापुर.
भारतीय अख़बार के लिए विदेशी कॉरेस्पॉंडेंट का रोल मैंने एक दशक तक निभाया. फिर मन किया कि दिल्ली लौट जाऊं. जुलाई 2002 से लेकर जुलाई 2009 तक मैंने भारत की विदेश नीति और देश की अंतरराष्ट्रीय छवि पर अनगिनत लेख लिखे.
एक अगस्त से मैंने बीबीसी की हिंदी सेवा के प्रमुख का कार्यभार संभाला.
अब बहुत हुई अपनी बातें. अब आप की बात.
मेरी समझ में पत्रकरिता का उद्देश्य लोगों की समस्याओं को उजागर करना है. यही पत्रकारिता का दायित्व है और यही उसका औचित्य. अगर हम लोगों के साथ जुडेंगे नहीं तो हमारी पत्रकारिता फीकी-सी ही रह जाएगी.
हमारी यह कोशिश रही है और रहेगी कि देश-दुनिया की ख़बरें आप तक पहुँचाते रहें. लेकिन यह आप के सहयोग के बिना मुमकिन नहीं है. आप किस तरह के समाचार और विश्लेषण चाहते हैं? क्या इसका संबंध राजनीति से हो या फिर सीधे आप की ज़िंदगी से? क्या हमें अंतरराष्ट्रीय समाचारों पर ज़्यादा ज़ोर देना चाहिए या क्षेत्रीय पर?
इस बारे में आपके सुझावों, आपकी फ़ीडबैक का इंतज़ार रहेगा.

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स्वागतम, काफ़ी अच्छा लगा आपके बारे में जानकर. लेकिन जिस तरह आप के अंदर के पत्रकार ने आपको कुछ और नहीं बनने दिया, उसी तरह बीबीसी हिंदी के जो श्रोता और पाठक हैं, वो किसी भी तरह एक पत्रकार से कम नहीं हैं. बात यहाँ अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय की नहीं है, जो भी मुद्दे हमारे जीवन को छूते हैं, वो हमारे लिए महत्वपूर्ण हैं. बीबीसी का श्रोता जो गाँवों में रहता है, आप उस पर कभी भी संदेह नहीं कर सकते. रही बात हिंदी ऑनलाइन की, तो अभी हिंदी का सबसे अच्छा समाचार ब्लॉग है और हमारी पाठकों की पूरी शुभकामनाएँ आपके साथ है कि आप इसे और बुलंदियों पर लेकर जाएँ.
अमित जी, पहले तो आपको इस पद के लिए बधाई. मैं भारतीय जन संचार संस्थान में हिन्दी पत्रकारिता का छात्र हूँ और मैं आपसे जानना चाहता हूँ कि क्या हमारे जैसे लोगों के लेख को आप जगह देंगे. मैं ये सवाल आपसे इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि अख़बार वालों से तो कह कर थक चुका हूँ, आपसे उम्मीद है.
पुराने ज़माने फिर से लौट रहे हैं लगता है. राजा-महाराजा वेश बदल कर प्रजाओं के बीच जा कर उनका हाल चल लेते थे और अपने प्रशासन की कमियाँ सुधारते थे, विद्रोह की भनक लेते थे. राहुल गाँधी भी सीधे जनता से जुड़ने का प्रयास कर रहे हैं और राज्य में औचक आगमन से सरकारों को हलकान किये हुए हैं. और अब आप...खुद को सुधारने की यह कवायद सराहनीय है. आपका परिचय काबिल-ए-गौर है और अंतिम पैरा में पूछा गया सवाल असरदार. अमित जी, बीबीसी का दीवाना बचपन से हूँ, कहूँ तो पिता जी से विरासत में मिली थी. रेडियो पर सारे कार्यक्रम सुनता था. अब इंटरनेट के माध्यम से साइट पढता हूँ. मैं पत्रकारिता का छात्र हूँ. सो आपने कुछ महीने पहले विभिन्न हस्तियों से इंटरव्यू लेकर हमारा ज्ञान बढाया था. इस दौरान बीबीसी हिंदी पत्रकारिता पाठशाला भी लाई गई थी. अनुरोध है कि उसमें कुछ अंश और ज़रूर जोड़े और उसे अपडेट करते रहें.
अभी हाल ही में इंडियन एक्सप्रेस वालों ने पत्रकारिता पर वर्कशॉप आयोजित किया था. कुछ आप भी करें तो हम जैसों का भला हो. जिस प्रकार से मीडिया मंथन हो रहा है. समाचार और उसका विश्लेषण दोनों ज़रूरी है. साथ ही एक आदर्श और सहमत विचारधारा बनाने की. समाचार राजनीति से हों और सीधे हमारी ज़िंदगी से जुड़े. एक बात और...
ब्लॉग पर अगर कोई पाठक सवाल करे तो उससे रु-ब-रु होकर जवाब भी दीजिए. सिर्फ़ टिपण्णी संग्रहण से कुछ विचारधारा नहीं बदलती शायद. अंत में, अमित जी, आपको आपने काम के लिए शुभकामनाएँ. मज़ाक मज़ाक में हमने बचपन में बीबीसी का फुल फ़ॉर्म बुद्धिवर्धक चूर्ण रखा था जो आज भी बदस्तूर क़ायम है. इसे बनाए रखें और स्तरीय पत्रकारिता के नए आयाम हासिल करें- मेरी शुभकामनाएँ आपके साथ हैं.
अमितजी. हमारी बीबीसी में आपका हार्दिक स्वागत है.
स्वागत है आपका. बीबीसी हिंदी को और हम सबको बहुत उम्मीद है कि बीबीसी हमेशा की तरह समाचार को हम तक पहुँचाए.
मैं बिहार से हूं और बीबीसी का नियमित श्रोता हूं छात्र जीवन है. मैंने देखा है जब थाने में कई नया इंस्पेक्टर आता है तो वो अपनी ताकत से कई बातें बदल देता है या फिर जब नई सरकार आती है तो पुरानी सरकार के फ़ैसले बदल देती है. जब मैं बीबीसी पर सुनता हूं कि करियर क्या करुं और हमसे पूछिए बंद होने वाला है तो मुझे लगता है कि बीबीसी में भी कोई इंस्पेक्टर आ गया है. मैं तो बचपन से श्रोता हूं और अब मेरे लिए बीबीसी ज़रुरत बन गया है. अमित जी को पता हो कि छात्र और कंपीटिशन में बैठने वालों के लिए ये कार्यक्रम बहुत ज़रुरी होते हैं. मैं इतना ही कहूंगा अगर आपने ये दोनों कार्यक्रम बंद किए तो लंबे समय में ये बीबीसी के श्रोताओं के लिए सही नहीं होगा.
अमित जी, बीबीसी परिवार में शामिल होने पर आपका स्वागत है. लेकिन आपने ज्वाइन करते ही आपने बीबीसी के सबसे शानदार कार्यक्रम हमसे पूछिए और करियर क्या करूँ को बंद कर दिया. आपने करोड़ों बीबीसी श्रोताओं की तौहीन की है. क्योंकि 100 फ़ीसदी श्रोता इसको पसंद करते हैं. साथ में फ़ायदा भी है. लेकिन 99 प्रतिशत श्रोता टेव वन, आपकी बात बीबीसी के साथ, एक मुलाक़ात बीबीसी के साथ जैसे बकवास कार्यक्रम को बंद करना चाहते थे. मेरा दावा है कि इससे बीबीसी श्रोता जुड़ेंगे नहीं बल्कि बीबीसी को छोड़कर जाएँगे. अगर आप बीबीसी के श्रोताओं का सम्मान करते हैं तो आप अपना ये फ़ैसला वापस लें, नहीं तो बीबीसी का श्रोता आप को कभी माफ़ नहीं करेगा.
अमित जी सर्वप्रथम आपको बीबीसी हिंदी सेवा प्रमुख के पद की शुभ कामनाएं | बहुत अच्छा लगा आपके विचारों को पढ़कर | आपके अनुभव और क्षमताओं से बीबीसी हिंदी सेवा और श्रोता दोनों निश्चित तौर पर लाभान्वित होंगे ऐसा मेरा सोचना है | सच कहूँ तो कई दिनों से मेरे मन में बीबीसी हिंदी सेवा से सम्बंधित कुछ विचारों, कुछ सवालों का आना जाना सा लगा था | मुझे यह भी पता था की हर सवाल का जबाब देने के लिए बीबीसी हिंदी सेवा की टीम सक्षम है | लेकिन आज अच्छा मंच मिला है मन की बात कहने का |
क्या हम बीबीसी हिंदी सेवा के श्रोतागण रेडियो के साथ -साथ बीबीसी हिंदी टीवी चैनल की उम्मीद कर सकते हैं ? और हाँ तो कब तक ?
दूसरी बात आज भी रेडियो ही आम जनमानस तक पहुँच रखता है और बाकी दुनिया से जुड़ने का एकमात्र सशक्त जरिया है ,इसमें दो राय नहीं हो सकती | देश -विदेश, गाँव -देहात , शहर ,कस्बों यानि कि दुनिया के हर कोने में बीबीसी हिंदी सेवा के कद्रदान हैं | मेरा यह सोचना है कि बीबीसी हिंदी सेवा और इसके श्रोताओं को एक संगठन के तौर पर जोड़ने के लिए पंजीकृत श्रोता क्लब बनाकर ,संगठित करके ,विदेश ,स्वदेश, राज्य ,शहर ,कस्बे ,गाँव आदि स्तर पर संगोष्ठियाँ आयोजित करके स्वयं व् राष्ट्र के प्रति सजग बनाया जा सकता है | हो सकता कि यह प्रक्रिया पहले से ही चल रही तो इसको और उच्च दर्जे का आयाम देकर श्रोता से श्रोता की कड़ी को जोड़कर और बेहतर बनाया जा सकता है | वैसे आजकल बीबीसी हिंदी सेवा का बीबीसी बोल इंडिया एक अच्छी शुरुआत है | हो सकता है कि मैं गलत हूँ लेकिन इन्टरनेट तक गाँव देहात व् छोटे कस्बों के श्रोताओं की पहुँच अभी भी बहुत कम है | और क्षेत्रीय तथा स्थानीय श्रोता से अच्छा पत्रकार भला कौन हो सकता है. कृपया मौके उपलब्ध करवायें |अगर श्रोता से श्रोता की कड़ी जुड़े तो बीबीसी हिंदी के माध्यम से दूर दराज का श्रोता ऐसे क्लबों से जुड़कर बहुत योगदान दे सकता तथा राष्ट्रहित में बदलाब की बहुत गुंजाईश बनती है | यही सीधी और सच्ची पत्रकारिता का तकाजा है |
आपने बिलकुल सही फरमाया है कि सही मायनों में पत्रकारिता वही है जो तथ्यों के आधार पर, खबर की तह तक , राष्ट्र एवं जनमानस के हित में , कलम से सीधे दिल तक उतरने वाली हो न कि आधे अधूरे सच , तथ्यविहीन एवं सनसनी युक्त विचारों वाली |
समाचारों के चयन के विषय में तो इतना कहूंगा कि बीबीसी हिंदी में हमेशा से एक संतुलन का वातावरण रहा है फिर भी सुधार की हमेशा संभभावना रहती है | देखिये असली श्रोता देश के गाँव देहात ,दूरदराज इलाकों एवं विदेशों के सुदूर कोनों में बैठे हैं | क्षेत्रीय और आम जनमानस के जीवन से सरोकार रखने वाले समाचारों को प्राथमिकता देते हुए राजनीतिक ,राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय समाचारों का ताल मेल एवं संतुलन उपयुक्त होगा | जहाँ आम जिन्दगी से जुड़े मुद्दे होंगे वहां राजनीति का पदार्पण हो ही जाएगा |
बीबीसी बोल इंडिया जैसे दिल से दिल तक सीधी सच्ची बात सबके समक्ष रखने वाले कार्यक्रम सफल रहेंगे | इसी तरह से स्थानीय एवं क्षेत्रीय आम जीवन से सरोकार रखने वाले अन्य मुद्दों पर भी बहस हो तो अच्छा है | अमित जी अंत में फिर वही बात कहना चाहूँगा कि बीबीसी और श्रोता से श्रोता की कड़ी टूटने न पाए | एक भी श्रोता छूटने न पाए |
अमित जी मैं भी शशि भूषण जी के विचारों से सहमत हूँ. सही बात है, कलम की मेहनत यों ही कब तक दूसरों की रद्दी की टोकरियों में धूल फांके या फिर दूसरों के हस्ताक्षरों की शोभा बनाए. कृपया इस विषय पर अवश्य गौर फरमाएं.
बीबीसी में आपका स्वागत है. सर, सवाल ये नहीं है की खबर किस तरह की हो. सवाल ये है की ख़बर में सच कितना है. जो बीबीसी हिंदी के श्रोता हैं उन्हें सिर्फ बीबीसी पर ही भरोसा है क्योंकि हमें जो ख़बर बीबीसी से मिलती है वो 100% भरोसे लायक होती है, और आगे भी हम बीबीसी से यही उम्मीद रखते हैं.
अमित जी स्वागत है हमारे बीबीसी परिवार में. बुरा मत मानिएगा, जिस परिवार के आप मुखिया है उसे मैं अपना कह रहा हूं और आप ही के परिवार में आपका स्वागत भी कर रहा हूं. जाहिर है, अब तक आप समझ गए होंगे कि आप कितने बड़े परिवार के मुखिया बने हैं. उम्मीदें बहुत हैं सर और उसे पूरा करने में आप सर्वथा समर्थ भी हैं. अब परिवार में ही हैं तो दुख-सुख और तमाम बातें समय-समय पर होती ही रहेंगी. शुभकामनाएं.
मैंने आपके लेख 'द हिंदू' में १० साल तक पढे हैं, यहाँ आपको अचानक पाकर काफ़ी हर्ष हुआ और आश्चर्य भी कि अंग्रेजी के साथ साथ आपकी हिंदी भी अच्छी है. मैं चाहूँगा लोग समाचारों द्वारा विदेशों के बारे में और जानें.
आपसे अपेक्षा है कि मार्क टली के ज़माने की गहराई बीबीसी में वापस लाने की कोशिश करेंगे.
मैं आपका स्वागत करता हूं. मैं अप्रवासी भारतीय हूं और भारत के बारे में जानने के लिए बीबीसी हिंदी पर आता हूं. मैं ब्लॉग्स से खुश नहीं हूं क्योंकि वो बहुत छोटे और साधारण होते हैं. मुझे लगता है कि हिंदी मीडिया अच्छी रिपोर्टिंग नहीं कर रहा है. मैंने कश्मीर के लोगों से बात की है और पता चला कि कई बातें मीडिया रिपोर्ट ही नहीं करता है.
हार्दिक स्वागत है बीबीसी में. जीवन पत्रकारिता के आगे भी बहुत कुछ है.
अमित जी आपका स्वागत है. आशा है आप बीबीसी को और अधिक पारदर्शी और निष्पक्ष बनाएंगे. हर तरह के विचारों को प्रकाशित करेंगे चाहे वो बीबीसी की आलोचना ही क्यों न करता हो.
अमितजी. बीबीसी में आपका हार्दिक स्वागत है मेरी शुभकामनाएँ आपके साथ हैं.
शायद ख़ुशी और आश्चर्य के सम्मिश्रण जैसा कुछ भाव महसूस कर रहा हूँ. बचपन से बीबीसी से जुड़ा हुआ था, बीच में पांच छह वर्ष हिन्दू का पाठक रहा.
आपकी लेखनी का शुरू से कायल रहा हूँ. लेकिन पिछले कुछ वर्षों से अमरीका आ जाने के बाद, बीबीसी हिंदी ही वेबसाइट ही है जो मुझे अपनी जड़ों से जोड़े रख रही है. बीबीसी परिवार के मुखिया के रूप में आपको पाकर बहुत खुश हूँ. आशा है उच्च स्तर की पत्रकारिता को उच्चतम तक पहुंचाएंगे.
आदरणीय अमित जी....
स्वागत प्रणाम स्वीकार करें....मुझे खुशी है कि आज भी जिस इकलौती संस्था पर लोग पत्रकारिता के मानदंडो के लिये विश्वास करते हैं..उसकी बागडोर आपके हाथ में आई है...मुझे विश्वास है कि आप अपनी काबिल टीम के साथ इसे और भी ऊंचाईयों तक ले जायेंगे...शुभकामनायें...
मैं आशा करता हूं कि आप द हिंदू की तर्ज़ पर रिपोर्टिंग नहीं करेंगे. हिंदू के मालिकों को अब भारत की ज़मीनी सच्चाई का पता नहीं रहा. मैं चेन्नई से हूं इसलिए इस अख़बार को जानता समझता हूं. मैं समझता हूं कि आप बीबीसी में बिना किसी का पक्ष लिए रिपोर्टिंग करेंगे.
बीबीसी परिवार में आपका स्वागत है. मैं पुराना श्रोता हूं और बीबीसी को सबसे विश्वसनीय मानता हूं. बिना बीबीसी के ख़बरें अधूरी लगती हैं. लेकिन मैं चाहता हूं कि बीबीसी पर अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय ख़बरों का एक बढ़िया सम्मिश्रण हो.
स्वागतम, हिंदी पत्रकारिता इंटरनेट के माध्यम से आज भी एक चुनौती है. उम्मीद है कि आप इस चुनौती को स्वीकार करते हुए . उम्मीद है कि आप इस चुनौती को स्वीकार करते हुए हिंदी पत्रकारिता को इंटरनेट पर भी विश्वसनीयता दिलाएंगे.
बहुत-बहुत स्वागत है बीबीसी की दुनिया में. मैं बचपन से बीबीसी हिंदी का फ़ैन हूँ. मधुकर उपाध्याय, रेहान फ़ज़ल वग़ैरह को सुनता रहा हूँ. सच कहूँ तो बीबीसी हिंदी से ही पत्रकारिता के क्षेत्र में आने की प्रेरणा मिली. परिवार के विरोध के बावजूद ये पेशा चुना. मेरा भी सपना है कि बीबीसी हिंदी में काम करूँ. उम्मीद है देर-सबेर ये सपना भी पूरा हो ही जाएगा. जहाँ तक बीबीसी के कार्यक्रमों की बात है, तो मुझे बीबीसी एक मुलाक़ात बहुत पसंद है.
बीबीसी में आपका स्वागत. परिवर्तन का एक और नाम उन्नति है, लेकिन परिवर्तन अच्छे परिणाम के लिए हो. बीबीसी अपने श्रोताओं को अच्छी तरह जानती है और इसके श्रोता भी इसको उसी तरह से जानते हैं. ज़ाहिर है जो भी परिवर्तन होंगे, इस बात को भाँप कर ही किया जाएगा. मैं पत्रकारिता का छात्र हूँ और बीबीसी मेरे जीवन की प्रेरणा स्रोत है. हमने आपको हिंदू में पढ़ा है और बीबीसी पर ख़ास विषयों पर बोलते हुए सुना है. तो ये हमारे लिए ख़ुशी की बात है. मैं ये भी कहना चाहूँगा कि आप हमारे लिए नए नहीं है. और अक्सर हमारे टीचर मीडिया की चर्चा करते हुए अमित बरुआ, मधुकर उपाध्याय, संजीव श्रीवास्तव, विजय राणा, मार्क टली, सिद्धार्थ वरदराजन, ए राम जैसे बड़े नामों की चर्चा करते हैं.
अमित जी स्वागत है. मैं हिन्दू अख़बार के समय से (यानि कोई 2001 से) आपका नाम जानता हूँ और उस समय आप सिंगापुर से रिपोर्ट करते थे (अगर मेरी याददाश्त सही है तो). जब आपने नए प्रमुख का पदभार संभाला है जो बता दूँ कि क्षेत्रीय ख़बरें तो प्रमुख रहेंगी ही पर अंतरराष्ट्रीय ख़बरों के बिना बीबीसी, बीबीसी नहीं. अंतरराष्ट्रीय ख़बरों को प्रमुखता देने का समय तो नहीं बचेगा पर संक्षेप में ही सही पर अगर दुनिया भर (सिर्फ़ पश्चिमी यूरोप और अमरीका नहीं) की ख़बरों को एकदम संक्षेप में पाँच मिनट में भी सुना दिया जाए तो अच्छा लगेगा. पर क्षेत्रीय ख़बरों की बलि चढ़ाकर ऐसा करना मेरे ख़्याल से बहुमत को रुष्ट करना होगा. तो आइए और अपने अनुभव से हमें भी सँवारिए. एक बार पुनः स्वागत है.
अमित जी, बीबीसी हिंदी में आपका स्वागत है. आप कोई अनजाना नाम नहीं हैं. बीबीसी के श्रोता अब भी मार्क टली और सतीश जैकब को भूले नहीं हैं. अब समय बदल गया है और कई चैनल्स आ गए हैं, इसमें बीबीसी हिंदी को अपना क़द बनाए रखना है.
आपको बधाई. पत्रकारिता काँटों पर चलना ही है, पर लोगों को इसमें दूर से सिर्फ़ ग्लैमर दिखता है. इसके दायित्व और इसकी प्रतिबद्धता एक सच्चे पत्रकार को चैन से बैठने नहीं देती. तमाम तोहमत भी झेलनी पड़ती है. बीबीसी से लोगों को अपेक्षाएँ और आकांक्षाएँ कुछ ज़्यादा ही रहती है. पुराने पत्रकार हैं, आशा है खरे उतरेंगे. इन्हीं शुभकामनाओं के साथ काँटों के सबसे अहम ताज के लिए फिर से बधाई. स्वागत.
मुझे बीबीसी हिंदी के प्रमुख के तौर पर आपकी नियुक्ति पर हैरत हुई थी. क्योंकि अचला जी मुझे बहुत पसंद थी. मेरे अनगिनत पत्रों को उन्होंने आवाज़ दी थी. आपके नाम की रिपोर्टें मैंने हिंदू में ख़ूब देखी है. बीबीसी हिंदी से एक-एक कर मेरे पसंदीदा लोग बाहर हो गए. इनमें आलोक जोशी और नागेंदर शर्मा भी हैं. इसलिए धीरे-धीरे मैंने बीबीसी हिंदी सुनना ही छोड़ दिया. पहले मैं कहीं भी रहता था, शाम की सभा ज़रूर सुनता था. ऐसा दिल्ली में पत्रकारिता के दौरान ज़्यादा हुआ. सही कहूँ तो मैं इस क्षेत्र में अचला जी, आलोक जी और नागेंदर जी की वजह से हूँ. मेरी माँ की तमन्ना है कि एक दिन मेरी आवाज़ वो बीबीसी हिंदी से सुनें.
रही बात ख़बरों की तो बीबीसी हिंदी देश-विदेश की ख़बरों को गाँवों तक पहुँचाती रहे. ठीक उसी तरह जिसके लिए भारत के गाँवों में उसकी पहचान बनी है. हाल के वर्षों में उस साख में कमी आई है. वेबसाइट पर ना जाने क्यों इतने साधारण तरीक़े से ख़बरें लिखी जा रही हैं. महंगाई सही तरीक़े से नहीं लिख पा रहे हैं लोग. ओलंपिक 2008 में सुशील और विजेंदर को रजत पदक जीतने वाला खिलाड़ी बताया गया, जब उन्हें खेल रत्न पुरस्कार दिया गया था. अगर इन सब चीज़ों को सुधार पाएँ, तो ख़ुशी होगी.
बीबीसी हिंदी में आपका स्वागत है. आपसे मिलकर बहुत अच्छा लगा. बीबीसी हिंदी का नियमित पाठक हूँ और आपसे मिलकर बहुत ख़ुशी हुई. धन्यवाद.
आपका स्वागत है. एक पत्रकार दुनिया बदल सकता है. दुर्भाग्य से इनमें से ज़्यादातर लोगों का एक छिपा हुआ एजेंडा होता है और वे अपना काम ठीक से नहीं करते हैं. मैं हिंदी समाचार पत्रों से ज़्यादा उम्मीद करता हूँ, क्योंकि ये भारत की असली तस्वीर पेश करते हैं.
आपका स्वागत है सर. चूँकि आप द हिंदू से जुड़े रहे हैं, आपको ख़बरों को परखने और उनकी गहराई में जाने की आदत होगी. उम्मीद है कि बीबीसी हिंदी समाचार और आगे बढ़ेगा. मैंने आपको बीबीसी पर सुना है और आपकी भाषा पर अच्छी पकड़ है.
सर्वप्रथम आपको बीबीसी हिंदी का पदभार ग्रहण करने पर बधाई. मैं आपके कथन से पूरी तरह से सहमत हूँ कि पत्रकारिका का लक्ष्य लोगों की समस्याओं को उजागर करना है. लेकिन मेरे विचार में उसे वहां पर रुककर अपने कार्य को सम्पन्न नहीं समझना चाहिए वरन समस्याओं का हल निकालने में भी सहायता करनी चाहिए. इसके लिए अगर पत्रकारों को राजनेताओं और अन्य महत्वपूर्ण व्यक्तियों से कठिन प्रश्न भी पूछना पड़े तो उससे उन्हें झिझकना नहीं चाहिए. लेकिन यह सब तभी संभव है जब आपको बीबीसी हिंदी की मातृ संस्थान बीबीसी वर्ल्ड सर्विस से भी यही मेंडेट (आज्ञा-पत्र) मिला हो. इसलिए मैं आपसे पूछना चाहता हूँ कि आपको अपने बॉस से क्या मेंडेट मिला है? क्योंकि आख़िर में जो बीबीसी हिंदी चला रहा है उसका हित आपके लिए सर्वोपरि हो जाता है.
फिर भी आपने पूछा है तो मैं कहता हूँ कि मैं कैसी ख़बरें पढ़ना पसंद करूँगा. बीबीसी हिंदी के रूप में आपके पास ऐसा मंच है जिसमें आप व्यावसायिक हितों से बाधित नहीं है तो मैं चाहूँगा की आप इस स्वतंत्रता का भरपूर फायदा उठाएँ और ऐसी ख़बरें छापें जिनका व्यावसायिक मूल्य तो कम है लेकिन जो देश की मूलभूत समस्याओं को उजागर करती हैं और जिनमें थोड़े से सुधार के दूरगामी परिणाम हो सकते हैं. मिसाल के तौर पर आपने थोड़े दिनों पहले 'आओ स्कूल चले' के नाम से बहुत अच्छी श्रृंखला प्रस्तुत की थी जिसमें आपने कुछ सरकारी स्कूलों की दुर्दशा को बखूबी उजागर किया था. भारत का मेनस्ट्रीम (मुख्यधारा) मीडिया ऐसी ख़बरें कभी नहीं छापेगा. उसे तो शाहरुख़ ख़ान , राखी सावंत और सचिन तेंदुलकर के पीछे भागने से फुर्सत कहाँ है. इसी तरह शिक्षा, पर्यावरण, स्वच्छता, परिवहन से जुडी समस्याएँ, भ्रष्टाचार, सरकारी संसाधनों की बर्बादी से जुडी ख़बरें ज़्यादा प्रकाशित करें और जब नेताओं को अपने मंच पर लाएँ तो उनसे इन समस्याओं के बारें में कठिन सवाल पूछें. उनसे साफ़ साफ़ पूछें कि वे इन समस्याओं के समाधान के लिए क्या कर रहें है. संजीव श्रीवास्तव नेताओं को अपने मंच पर लातें तो हैं लेकिन उनसे बहुत ही आसान सवाल पूछ कर छोड़ देते हैं. व्यावसायिक मीडिया ऐसा करे तो समझ में आता हैं क्योंकि वे पानी में रहकर मगरमच्छ से बैर नहीं करना चाहते पर आपको तो वो डर भी नहीं है. मुझे बहुत खुशी होगी अगर आप कपिल सिब्बल को अपने मंच पर बुलाएं और उन्हें 'आओ स्कूल चलें' की वो टेप्स सुनाएँ और उनसे पूछें कि वे बिहार और मध्य प्रदेश के उन सरकारी स्कूलों की दशा सुधारने के लिए क्या कर रहें है. और मैं चाहूँगा कि आप इन समस्याओं पर काम कर रही ग़ैर सरकारी संस्थाओं को और उनके अच्छे कार्यों को समय समय पर अपनी ख़बरों में जगह दें. इससे लोग उनके बारें में जानेगे और हो सकता है उनकी मदद में आगे भी आएँ. लेकिन इससे भी ज्यादा ज़रूरी यह हैं कि आने वाली पीढ़ी शाहरुख़ ख़ान, ऐश्वर्या राय के साथ साथ प्रकाश आम्टे, दीप जोशी, डॉक्टर चंद्रा, संदीप पांडे को भी आपना आदर्श बनाए. मैं नहीं जानता कि यह सब करने से बीबीसी वर्ल्ड सर्विस और उसके मालिकों को क्या लाभ होगा लेकिन इतना अवश्य मानता हूँ कि अच्छे कर्मों का फल एक दिन अवश्य मिलता है.
मेरी यही कामना है कि ईश्वर आपको आपके नए काम में भरपूर सफलता प्रदान करे और आपको बीबीसी हिंदी के माध्यम से उस परिवर्तन का अग्रदूत बनाये जिसकी इस देश को सख़्त आवश्यकता है.
प्रिय अमित जी, बीबीसी हिंदी प्रमुख के रूप में आपका स्वागत है. कुछ ऐसा करें कि लोग आप को याद रख सकें.
बरूआभाई, जय रामजी की
आपका हिंदी ब्लॉगिंग दुनिया में स्वागत है. मैं दैनिक भास्कर से 1996 से जुड़ा हुआ हूँ. राजस्थान के ग्रामीण क्षेत्र से होने से मेरे समाचारों का फोकस पश्चिम राजस्थान का थार रेगिस्तान ज्यादा रहा है. आपसे निवेदन है कि आप हिंदुस्तान के मुख्य हिंदी अखबारों के ग्रामीण क्षेत्रों की विशेष खबरों का प्रकाशन करावें. उसका मुख्य कारण यह है कि हिंदुस्तान में बीबीसी 70 फ़ीसदी से ज्यादा ग्रामीण क्षेत्र में लोकप्रिय है. शहरी क्षेत्रों से रेडियो तो गायब हो रहे हैं. दूसरी बात यह है कि देश के ग्रामीण क्षेत्र के अधिकांश लोग नौकरी व व्यवसाय में शहरों में रहते हैं. शहरों में व्यस्त जीवन दिन चर्र्या होने से वे लोग रेडियो से दूर रहते हैं, परंतु इंटरनेट सुविधा होने से वे लोग प्रयोग करते हैं. इसलिए ग्रामीण क्षेत्र के समाचार आवश्यक हैं.
राव गुमानसिंह
संवाददाता, दैनिक भास्कर
गांव-रानीवाड़ा जिला-जालोर राजस्थान
०९८२९४४१४८७
https://jaloretoday.blogspot.com
अमित जी, काफ़ी अच्छा लगा कि आप जैसे अच्छे पत्रकार हैं. वैसे आज के समाचार पत्रों में ज़्यादातर संपादक थोड़ी सी मेहनत और ज़्यादा चापलूसी से अच्छी पोस्ट पा लेते हैं और पत्रकारिता को नष्ट कर रहे हैं. आपसे आशा है कि आप अपनी तरह के पत्रकारों को मौक़ा देंगे और अच्छा काम करेंगे. धन्यावद.
स्वागतम, सुस्वागतम.
अमित जी, बीबीसी हिंदी प्रमुख के रूप में आपका स्वागत है बीबीसी हिंदी का पदभार ग्रहण करने पर बधाई. बीबीसी अंतरराष्ट्रीय समाचारों पर ज़्यादा ज़ोर देना चाहिए सर आप द हिंदू से जुड़े रहे हैं आपको ख़बरों को परखने और उनकी गहराई में जाने की आदत है. उम्मीद है कि बीबीसी हिंदी समाचार और आगे बढ़ेगा. मैं बीबीसी के पुराना श्रोता हूं और बीबीसी को सबसे विश्वसनीय मानता हूं.
हलाकि मै कोई पत्रकार नही हूँ मगर मुझे लगता है कि पत्रकारिता को जहाँ तक आपने समझा है भारतीय राजनेताओं का यह एक आदर्श वाक्य है! इसलिए पत्रकारिता के उद्देश्यों को कृपया फिर से परिभाषित करें। मेरी समझ से यादि पाठकों को भी बीबीसी पर अपने ब्लॉग या लेख लिखने की सुविधा दिया जाए एवं उनमे से कुछ चुने हुए स्तरीय लेखों को प्रकाशित भी किया जाए तो संभवतः पत्रकरिता के उद्देश्यों की काफी हद तक पूर्ति होगी।
अमित जी, स्वागत और बधाई. मैं बीबीसी हिंदी का 1989 से नियमित श्रोता हूँ और लंबे समय से आपके लेख भी पढ़ता आ रहा हूँ. आप बीबीसी हिंदी की श्रेष्ठ परंपरा को क़ायम रखेंगे इसमें कोई शक नहीं है. शुभकामनाएँ.
आपका स्वागत है. मैं ज़्यूरिख (स्विट्ज़रलैंड) में रहता हूँ. आज आपने बहुत बड़ी बात पूछी तो लिखना ज़रूरी है. बीबीसी को हम ( मोतिहारी, बिहार में मेरे गाँव के लोग) काफ़ी दिनों से सुनते आ रहे हैं. हमने बीबीसी को एक विरासत की तरह अपनाया है. मेरा मानना है कि अंतरराष्ट्रीय समाचार ज़्यादा होने चाहिएं. राष्ट्रीय ख़बरों के पीछे तो भारत का सारा मीडिया पड़ा है.
कई साल पहले की बात है. अचला शर्मा जी आपका पत्र मिला कार्यक्रम प्रस्तुत कर रही थी. उन्होंने कहा कि एक समय ऐसा भी आएगा जब हम भी कहेगें कि वो भी क्या दिन थे जब हम आपका पत्र मिला प्रस्तुत करते थे. मैंने उसी वर्तमान में उस भविष्य की कल्पना की तो एक अद्भुत अनुभव हुआ. आप आएं है तो उस भविष्य की कल्पना को देखने की कोशिश की पर देख नहीं पा रहा हूं. कारण यह है कि अचला जी से नागपुर और भोपाल में और कैलाश बुधवार जी रायपुर में मिलने और बतियाने का अवसर मिला था. पर आपसे आने वाले दिनों में मुलाकातें होगी तब बात बनेगी. आपने श्रोताओं से सुझाव मांगे है. मेरे जैसे श्रोता आपसे आपका USP जानना चाहते हैं. पहले आप अपने अन्दर का सारा कौशल हम पर उड़ेल दीजिए हम जानना चाहते हैं कि आप हमें क्या नया दे सकते हैं. हमारे पास सुनने और प्रतिक्रिया देने का कौशल है लेकिन कुछ कहेगें तब जब आपकी गाड़ी चल पडेगी. दरअसल परीक्षा आपकी है और परीक्षक हम.
एक बार का प्रसंग है कि विजय राणा जो इतिहास विषय से थे समाचार, विवेचना व विश्लेषण करते थे उन्हे खेल और खिलाड़ी के कार्यक्रम की जिम्मेदारी दी गई. वे समाचार की शैली में खेल और खिलाड़ी प्रस्तुत करते रहे. बात जमी नहीं दरअसल खेल और खिलाड़ी की प्रस्तुति में उत्साह और रफ्तार की कमी खल रही थी. यही बात हमने पत्र के माध्यम से भेजी तो कुछ दिन बाद विजय राणा के स्थान पर एक नए प्रसारक ने मोर्चा संभाल लिया. इसलिए ऐसे कई प्रसंग है जिसने बीबीसी को श्रोताओं से जोडे रखा है. आप अपनी पारी तो शुरु कीजिए. हमारी शुभकामनाएं आपके साथ है.
अमित जी, मेरी राय है कि भारत की आम जनता अभी तक सोई हुई है. उसका कितना भी शोषण हो, उफ़ तक नहीं निकलती. उसे इस तरह से शिक्षित किया जाए कि सही-ग़लत को वह समझने लगे, जागरूकता बढ़े, शोषित न हो, मीडिया भी अपने मतलब की बातें करता है, छपता है, मुझे मीडिया, नेता, पुलिस की साफ़ छवि कभी नज़र नहीं आई. मीडिया ग़लत पक्ष को हमेश छिपाने में मदद करता हुआ दिखाई दिया.