राहुल, जेएनयू और सवाल..
राहुल गांधी उत्तर प्रदेश में दलितों की बस्ती से अब सीधे जेएनयू यानी जवाहरलाल नेहरू विश्विद्यालय पहुंचे हैं. शायद ग़रीबों के साथ साथ बुद्धिजीवियों में भी पैठ बनाना चाहते हों. दलितों की बस्ती तो चुपचाप गए लेकिन जेएनयू पूरी सुरक्षा के साथ...
बुद्धिजीवियों से ख़तरा तो नहीं था... वैसे नेताओं को जेएनयू में हमेशा ख़तरा रहता है लेकिन जान का नहीं..बल्कि सवालों का...और उस ख़तरे से सामना राहुल का भी हुआ.
जैसाकि कहते हैं, जेएनयू वाले ताउम्र जेएनयू वाले रहते हैं. पत्रकारिता में आने के बाद भी मेरा इस संस्थान से नाता टूटा नहीं है और संयोग से उस दिन मैं वहीं मौजूद था.
तो पहले ये बता दूं कि राहुल के आने से पहले कैंपस में इतने पुलिसवाले पहुंच चुके थे जितने उनकी सभा में भी न पहुंचे थे. पार्टी वालों ने बड़ा सा पंडाल बनवाया था राहुल के लिए जो जेएनयू में कम ही होता है.
यहां बड़े बड़े नेता.. यहां तक कि दलाई लामा जैसी हस्तियां भी खुले में बात करती हैं... हां लेकिन फिर दलाई लामा या सीताराम येचुरी कांग्रेस पार्टी के युवराज भी तो नहीं हैं...
राहुल आए... एक छात्रावास में खाना खाने की इच्छा जताई... झेलम के छात्रावास में खाया और फिर पहुंचे छात्रों से मिलने...भाषण देने... भाषण भी दिया सवालों के जवाब भी दिए....लेकिन जेएनयू के छात्रों को प्रभावित करना इतना आसान शायद नहीं है.
राहुल को भी काले झंडे दिखाए गए लेकिन ये कोई नई बात नहीं थी क्योंकि यहां तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को भी काले झंडे दिखाए गए हैं.
जेएनयू की रवायत सवाल पूछने की रही है और राहुल को शायद ये पता था सो उन्होंने भी भाषण बीच में ही छोड़ा और बोले --- सवाल पूछो....जवाब देने के लिए मंच से उतर भी आए..
सवालों की झड़ी लगी.. कारपोरेट को टैक्स में छूट से लेकर गुटनिरपेक्षता, विदेश नीति, लातिन अमरीका पर भारत की नीति से लेकर वंशवाद पर भी सवाल पूछे गए...
विदेश नीति और आर्थिक मामलों से जुड़े सवालों पर वो कुछ गोल मोल सा ही जवाब देते रह गए... हर दिन मार्क्स, एडम स्मिथ और गॉलब्रेथ पढ़ने वालों को आप यूं ही कोई जवाब तो दे नहीं सकते सो ज़ाहिर था जवाबों से सवाल पूछने वाले असंतुष्ट ही रह गए....
फिर बारी आई कैंपस के एक चिर क्रांतिकारी की. उन्होंने तीखे अंदाज़ में सवाल दागा.... आपने कितने झंडे उठाए कहां नारे लगाए.. बस नेता बन गए.. परिवार की बदौलत.
राहुल थोड़ा रुके......कुछ सेकंड शांति हुई फिर बोले --- हां मैं परिवार से राजनीति में आया हूं लेकिन इस प्रथा को बदलने की पूरी कोशिश कर रहा हूं.
बदलाव की बात उनके पिता राजीव गांधी ने भी की थी लेकिन आगे वो नहीं कर पाए जो वो करना चाहते थे. क्या करते राजनीति के पेच में फंस जो गए......राहुल शायद अभी राजनीति के उन पेचों खम से अछूते हैं ...तभी सवाल सुनते हैं और जवाब देने की कोशिश भी करते हैं..
सवाल सुनने की ये आदत राजनीति में छूट जाती है.....देखते हैं राहुल कब तक ये आदत बरकरार रख पाते हैं.

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इस ब्लॉग में मैं राहुल गांधी और जेएनयू के छात्रों की बातचीत की तह तक पहुंचने वाले विचार पढ़ने की अपेक्षा कर रहा था लेकिन मेरी अपेक्षाएँ पूरी नहीं हुईं. ब्लॉग में केवल ऊपरी सतर का ही उल्लेख है.
अच्छा है लेकिन और बेहतर हो सकता था.
जेएनयू में जिस तरह की राजनीति होती है और जिस तरह का युवा वहाँ है उसका ज़िक्र नहीं हुआ. बहुत ही सतही और सामान्य बातों की चर्चा की गई है.
राहुल गांधी चाहे गरीब दलितों की झोपडियों में फटी पुरानी खाट पर डेरा जमाये या जेएनयू जैसी प्रतिष्ठित शिक्षा संस्थान में पंडाल लगाएं उन्हें यह समझ लेना चाहिए कि राजनीति बच्चों का खेल नहीं है बेशक वंशवादी प्रथा ने उनके लिए चांदी का पालना पहले से ही तैयार कर रखा है. मैं राहुल जी से इतना जानना चाहूंगा कि इन्होंने और कांग्रेस की अध्यक्षा ने गरीबों की बस्तियों और झोपडियों में कई रातें कैमरों की चमक और अखवारों की सुर्खियों के साए में बिताई | नतीजा क्या निकला | कितनी कलावातियों के जीवन स्तर में उत्थान हुआ है ? अमेठी व रायबरेली के लोगों के जीवन से विपन्नता दूर हुई है ? अगर वे यह कहते हैं कि यह स्थान गैरकांग्रेसी सरकार के प्रदेश में आते हैं तो जिन राज्यों में कांग्रेसी सरकार काबिज है तो वहां लोगों का जीवन स्तर भी इतना उच्कोटि का नहीं है | इन्हें जमीनी हालात पर ध्यान करना चाहिए | गैर कांग्रेसी राज्यों में बिना सूचना गरीबों व दलितों के घास -फूस के झोपड़ों में फोटो - सभाएँ करने से कब तक गरीबों के नाम पर ,कभी गरीबी दूर न करने के प्रण के साथ गरीबी व गरीबों के साथ खिलवाड़ करते रहोगे | गरीब बेचारा सवाल पूछने के लिए तो बना ही नहीं है वह तो बेचारा फरियादों के साए में ही अपने जीवन - मरण का चक्र पूरा कर लेने पर मजबूर है | जेएनयू जैसे संस्थान में बुद्धिजीवियों व राजनीति के महाध्यापकों के सामने राहुल जैसे राजनीती में अपरिपक्व नेता कैसे टिक सकते हैं | लेकिन नेता लोग तो हर जगह कलावातियों की तालाश में रहते हैं | इन नेताओं के चिरपरिचित शब्द विकास , गरीब ,गरीबी ,किसान भाईयों के हित के लिए , मजलूमों की भलाई के लिए जो कि चुनावों से पहले या चुनावी माहौल बनाने के लिए प्रयोग करते हैं बहुत बेतुके लगते हैं | पिछले 62 सालों से यह सब राग गा कर न तो गरीबी गई न गरीबों को अपने मूलाधिकारों को जानने लायक बनाने का प्रयत्न किया | राहुल जी यह आलाप छोड़िए , युवाशक्ति के नाम पर गिने चुने वंशवादी राजनितिक परिवारों के उतराधिकारियों के जमावडे की नौटंकी करना छोडिये | जमीनी हकीकत पहचान कर विकसित होने का पाठ सीखो और सिखाओ न कि गरीब और गरीबी का |वंशवाद के बदलाव की बात इनके मुंह से बेमानी लगती है अप्रत्यक्ष रूप से चौथी पीढी का राज चल रहा है व पांचवीं पीढी की तैयारी चरम सीमा पर है.
सुशील जी आप का लेख तो अच्छा है लेकिन मेरे जैसे शायद कई बीबीसी श्रोत होंगे जो कि जेएनयू के बार में न तो यह जानते हैं कि यह क्या है और न ही यह कि यह कहाँ है. बेहतर होता यदि आप इस बारे में थोड़ी जानकारी देते और फिर लिखते.
रहा सवाल राहुल गांधी का तो कॉंग्रेस के इस युवराज को सब कुछ विरासत से मिल रहा है. बदक़िस्मती जनता की है जो सोच रही है कि यह युवराज ग़रीबों का हमदर्द बनेगा. ग़रीबों का दुख-दर्द वही समझ सकता है जिसने ग़रीबी देखी हो. जिसके पड़नाना सुना है लंदन के कॉलेज में हमेशा नए जूते पहन कर जाते थे ताकि जूतों पर पॉलिश न करनी पड़े. कितना सच है यह पता नहीं लेकिन जो औलाद धनवान होगी वह ग़रीबों की कभी हमदर्द नहीं हो सकती यह सिर्फ़ राजनीतिक दिखावा है.
अगर राहुल इतने ही ग़रीबों या दलितों के हितैषी है तो राजनीति छोड़ कर दूसरे प्लेटफ़ॉर्म से उनका भला करने की सोचें तो बेहतर होगा. आप का लेख बहुत सुंदर है लेकिन कृपया जेएनयू के बारे में ज़रूर बताएँ कि यह क्या है.
राहुल गांधी के जे.एन.यू आगमन के कई निहितार्थ हो सकते हैं जिनमे शायद सर्वप्रमुख ये है कि इस विश्विद्यालय में उनके मृतप्रायः छात्र संघठन को कुछ ऑक्सीजन मिल जाए. ध्यातव्य है कि इस विश्विद्यालय में वामपंथी राजनितिक विचारधारा प्रभावी है. राहुल गांधी ये सोचते होंगे कि वे यहाँ के छात्रों व छात्राओं को व्यवहारिक राजनीति के कुछ पाठ सिखा पायेंगे. लेकिन ये उनकी भूल है कि उन्हें कुछ सफलता मिलेगी. इस विश्विद्यालय के छात्र-छात्राओं ने कभी भी ऐसे लोगों को तरजीह नहीं दिया है जो महज 'बड़े' और 'चमत्कारी' हैं.
सुशील जी, फिर वही शिकायत, बहुत छोटा ब्लॉग लिखा.संयोग से मैं भी वहां था. ये बात सही है कि बातों के खिलाड़ी वामपंथियों और विशेषज्ञों की तरह राहुल जवाब नहीं दे पाए लेकिन उन्होंने पूरे कार्यक्रम में विचलित हुए बिना सवालों को झेला और एक स्तर तक उनका प्रयास सराहनीय था. संक्षेप में ही सही आपने सटीक बातें लिखी हैं.
दरअसल राहुल गाँधी को इन्ही सब जगहों पर जाना चाहिए,जहाँ उनके उम्र के लोग हो.पर पता नहीं क्योँ वो अब तक इन जगहों पर नहीं गए.जेएनयू के बाद उम्मीद करता हूँ की वो इस तरह के संस्थानों में आने का सिलसिला बनाये रखेंगे.
दलित के घर रुकना अच्छी बात है,पर राहुल गाँधी सिर्फ दलितों में खास कर यूपी के दलितों के घर ही जाते है.जो की सिर्फ और सिर्फ राजनीती से प्रेरित है.मायावती के दलित वोट बैंक में सेंध लगाने के अलावा राहुल गाँधी का कोई और मकसद नहीं है.उन्हें बिहार,और देश के अन्य दलितों के घरो में भी जाना चाहिए.पर ऐसा कुछ करने की उनकी कोई मंशा नहीं है वो सिर्फ यूपी में अपने पार्टी को पुनर्जीवित भर करना चाहते है,इससे अधिक कुछ नहीं.मध्य प्रदेश में पिछले साल चुनाव विधान सभा के चुनाव होने के ठीक एक साल पहले वे प्रदेश के आदिवाशी बहुल इलाको में जाना शुरू किये थे.अब जब वहा बीजेपी की सरकार बन चुकी है,तो वो पिछले ९ महीनो में एक बार भी वहा के आदिवासी बहुल इलाको में नहीं गए है. अब कहा गया उनका आदिवासी प्रेम?
सुशील बाबू...आप क्या साबित करना चाहते हैं...जेएनयू विद्वानों का गढ़ है...किसी को काला झंडा दिखाना गलत नहीं है..मगर उसकी वजह भी तो होनी चाहिए...अगर जेएनयू इतना ही सैंद्धांतिक है...तो अब तक भारत ने कितने बदलाव देख लिए होते....इत्तेफाक से मैं जेएनयू के 4 पूर्व छात्र अध्यक्ष को जानता हूं..जो आजकल मल्टीनेशनल कम्पनी में न सिर्फ कार्य करते हैं बल्कि अनकी नीतियों को अमलीजामा पहनाने के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं....मुझे लगता है...पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर किसी का विरोध करना कतई उचित नहीं है...जेएनयू के छात्र अंतर्विरोध के शिकार होते हैं... इसीलिए अनकी सारी सैद्धांतिक बातें या तो मार्कस के किताबों में बंद हो जाती है या फिर बौद्धिक जुगाली करने में खर्च हो जाती है....इससे आप ये मत समझिएगा कि मैं कांग्रेसी हूं या राहुल का समर्थक हू...लेकिन विरोध की वजह तो होनी ही चाहिए...आशा है आप भी अपने जेएनयू के प्रभाव से सिर्फ सैद्धांतिक तौर पर ही सहमत होंगे.......
सुशील जी ,भावना और तर्क दो अलग चीजे है.इक दलित बस्ती मैं रत बिताना, उनसे बाते करना उनकी जरुरतो को जानना उनका निदान करना ये सब चीजे सेवा के भाव को दिखाती है .
लेकिन जवाहरलाल नेहरू विश्विद्यालय में जाके अपनी बात रखना इक अलग मसला है.राहुल जी अभी नादान है.मुझे लगता है वो केवल वहां यानी जेएनयू मैं विद्यार्थियो से मिलने गए थे.अपनी योग्यता को सिद्ध करने नहीं.
जवाहरलाल नेहरू विश्विद्यालय विद्यार्थियो को यह समझना चाहिए की वो अभी किसी प्रशासनिक पद पर नही है
.कारपोरेट को टैक्स में छूट से लेकर गुटनिरपेक्षता, विदेश नीति, लातिन अमरीका पर भारत की नीति आदि पर सवाल पूछना इक बचकाना हरकत है.
मुझे लगता है वहा के विद्यार्थी अपने को जादा सिद्ध करने मैं लगे थे
खन्ना जी नमस्कार | जे .एन. यू. का विस्तृत नाम जवाहर लाल नेहरु यूनिवर्सिटी ( जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय ) है जो की नई दिल्ली में महरौली रोड पर स्थित है. इसकी स्थापना सन 1969 में भारत के पहले प्रधानमंत्री के नाम पर हुई| इस विश्वविद्यालय ने बड़े -बड़े राजनेता, पत्रकार, वैजानिक व महान शख्सियतें पैदा की हैं. यहाँ लगभग 5 से 6 हज़ार छात्र अलग अलग विषयों जैसे की समाज शास्त्र , विज्ञान , भौतिक विज्ञान, राजनीति शास्त्र , भाषा, कानून , जीव विज्ञान, पर्यावरण ,अन्तरराष्ट्रीय अध्यन ,संस्कृत व् अन्य बहुत सारे विषयों पर अध्यन करते हैं व् इस का कैम्पस 1000 एकड़ में फैला है .इसका नाम विश्व की 200 उच्च शिक्षा संस्थाओं में शुमार होता है . मुझे सन 1997 में यहाँ जाने सौभाग्य प्राप्त हुआ जब मैं रूडकी विश्वविद्यालय ( अब आई .आई .टी रूडकी .- इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्निलोजी रूडकी ) में पड़ रहा था व् मैं यहाँ पी. एच डी. का साक्षत्कार देने गया बहुत अच्छा कैम्पस है लेकिन किन्ही कारणों से मेरा चयन यहाँ नहीं हुआ.
सुशील,
पोस्ट के लिए शुक्रिया, सही है, जे.एन.यू वाले हमेशा जे.एन.यू वाले ही रहते हैं. इस संस्थान में प्रशिक्षण ही ऐसा होता है कि बस हम कहीं के नहीं रहते, बस चिर क्रांतिकारी रहते हैं. फिर क्या बिसात राहुल की, या किसी और की.
सुशील जी आपके ब्लॉग पर बहुत सी प्रतिक्रियाएं हैं आप भी राहुल के भाषण और जवाब से बहुत संतुष्ट नज़र नहीं आते हैं. सभी ने राहुल की खिंचाई कर दी लेकिन किसी ने ये बताने की कोशिश नहीं की कि राहुल को करना क्या चाहिए. मैं आप सभी से पूछना चाहता हूं कि इतनी सारी पार्टियों के देश में क्या आप लोगों को कोई युवा नेता दिखता है जो भारत की तस्वीर बदल दे अगर ऐसा है तो इस ब्लॉग पर कृपया बताने की कोशिश करेंगे.
आप कहना क्या चाहते हैं? क्या ग़रीब लोग बुद्धिजीवी नहीं हो सकते? केवल जेएनयू वालों को ही बुद्धिजीवी होने का अधिकार है?
सबसे पहले सुशील झा को मेरा नमस्कार । मेरा नाम आशीष मिश्रा है । मैं पूर्णिया बिहार से हूँ. फिलहाल मै भी जेएनयू में पढ़ाई कर रहा हूँ. मुझे नही लगता कि राहुल बाबा को अभी जेएनयू जैसे जगह पर आके राजनीति करनी चाहिए, कारण, शायद अभी जेएनयू जैसे जगह में बहस के लिए उनका कद काफी छोटा है. वरना ये कहना कि पढ़ोगे तो पैसा देना परेगा, जैसे शिक्षा का केन्द्र न हो के बनिए की दुकान बनाने की कोशिश की जा रही हो विश्वविद्यालयों को. और फिर वो तामझाम. बापरे वो एनएसजी कमांडो, स्टेट पुलिस, मीडियाकारो का काफिला, शायद दो घंटे के प्रोग्राम के लिए इतने लाब्बोहुवा का नाम ही AUSTERITY है. भाई ये समीकरण समझ में नही आता एक तरफ़ तो आम आदमी के पास आने का स्वांग और दूसरे तरफ़ इतनी दूरी वो भी तथाकथित आम आदमी से? सोचिये
कल JNUSU की तरफ़ से MHRD मार्च है देखते है सरकार स्टूडेंट्स के लिए क्या करती है?
मैं भी जेएनयू का एक छात्र हूँ. मैंने जब आपका ब्लॉग पढ़ा तो मुझे निराशा हुई कि आपने इस में कुछ ज्यादा नही बताया. मैं उस रात राहुल गाँधी को काला झंडा दिखाना को ग़लत मनाता हूँ. जब भी कैंपस में कोई कम्यूनिस्ट नेता आता है तो यहाँ की कम्यूनिस्ट पार्टियां उनके सिर आँखों पर बिठा लेती है और गैर क्मयूनिस्ट नेता के आने पर इन्हें विरोध के आलावा कुछ नही दिखाई देता.