सत्ता की वंशवादी सूबेदारी
महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में प्रत्याशियों की सूची पर नज़र डालें तो जिस तरह राज्य के बड़े नेताओं ने अपने सगे-संबंधियों को टिकट देने की बंदरबांट मचाई है, उसे देखकर तो यही लगता है कि भारतीय लोकतंत्र का भविष्य जैसे इन नेताओं के परिजनों के लिए आरक्षित है.
सबसे ज़्यादा अति तो तब हो गई जब राष्ट्रपति के बेटे को विधानसभा चुनाव का टिकट दे दिया गया.
कुल मिलाकर लगने यह लगा है कि एक अरब से भी ज़्यादा जनसंख्या वाले, विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में क्या चुनावी राजनीति सिर्फ़ 400-500 परिवारों की बपौती बनकर रह जाएगी. बाकी का पूरा देश क्या इन अलग अलग वंशों के ताज़ातरीन उत्तराधिकारियों का मात्र झंडाबरदार, वफादार सैनिक या कभी भी बराबरी का स्थान चाहने की हिमाक़त न कर सकने वाला समर्थक बनकर रह जाएगा.
बात इन प्रत्याशियों के अच्छे या बुरे होने की नहीं है, न ही यह है कि अगर इनके पिता राजनीति में थे तो इसका ख़ामियाजा ये क्यों भुगतें.
वैसे यह ख़ामियाजा वाला तर्क है बड़ा दिलचस्प. किसी भी पायलट, प्रसाद, देवड़ा, यादव या अन्य किसी भी अति प्रतिभावान और सर्वगुण संपन्न राजनीतिक वंश के चमकते हुए मौजूदा सितारे से जैसे ही राजनीति में परिवारवाद की चर्चा आप शुरू करेंगे, वो फ़ौरन पलटवार कर दो बातें कहते हैं.
पहली, कि अगर उनके पूर्वज राजनीति में थे तो इसमें उनकी क्या ग़लती. दूसरी यह कि वे अपने दमखम पर चुनाव जीतकर आए हैं. कोई पीछे के दरवाज़े से चुपचाप आकर सत्ता पर काबिज नहीं हो गए हैं. सही है कि वे चुनाव जीतकर आते हैं. पर वे यह बताना भूल जाते हैं कि पार्टी टिकट तो जैसे उन्हें वसीयत में मिला था.
भारतीय चुनावी प्रणाली में असली मोर्चा तो पार्टी का टिकट हासिल करना है.
फिर इन सूरमाओं ने अपने पूर्वजों की सीट को दशकों तक सींचा-संजोया है, वफादारों को आगे बढ़ाया है. पनपाया है, स्थानीय रकीबों को तरह तरह से निपटाया है, मनपसंद स्कीमें लागू करवाई हैं. पसंद के अधिकारी नियुक्त करवाए हैं. कुल मिलाकर अपनी सीट को खानदानी सूबेदारी की तरह से दशकों चलाया है तो फिर पार्टी का टिकट हासिल करने के बाद तो कोई बहुत बड़ा सूरमा सामने आ जाए, तभी इन वर्तमान के सूर्यवंशियों और चंद्रवंशियों को चुनावी समर में निपटा सकता है.
महाराष्ट्र की ही बात पर लौटें तो शरद पवार के एक हाल के बयान पर ध्यान जाता है और हंसी भी आती है और रोना भी. उन्होंने कहा कि समय आ गया है कि अब युवा पीढ़ी आगे आए. उनकी पार्टी में इस युवा पीढ़ी का नेतृत्व कौन करेगा, यह पहले से तय है. केंद्र में एनसीपी की नेता होंगी उनकी बेटी सुप्रिया और राज्य में उनके भतीजे अजीत पवार.
वंशवाद के लिए सिर्फ़ नेहरू-गांधी परिवार या कांग्रेस को कोसते रहें, यह सही नहीं होगा. वामदलों के अलावा कोई भी इस बीमारी से अछूता नहीं. भाजपा में कुछ कम है वंशवाद का ज़हर पर अब वहाँ भी बढ़ रहा है.
क्षेत्रीय दल तो हैं ही कुछ परिवारों की बपौती. मुलायम का परिवार और भाई सरीखे अमर सिंह समाजवादी पार्टी हैं, अजीत सिंह जी की विरासत आरएलडी है, करुणानिधि और उनका कुनबा डीएमके है, लालू एवं परिवार का मतलब आरजेडी है, बीएसपी, एआईएडीएमके और बीजेडी तो सिर्फ़ एक ही व्यक्ति की पार्टियां हैं कि इन दलों के नेताओं ने शादी न करके सारी शक्ति का केंद्र बिंदु सिर्फ और सिर्फ स्वयं को ही बनाकर रखा हुआ है.
आखिर में एक बात और... जब अमरीका में बराक ओबामा राष्ट्रपति बने तो भारत में भी रोमांटिक्स की एक बड़ी टोली खड़ी हो गई और लगी तलाशने देसी ओबामा को. पर परिवार और वंश के चक्रव्युह में फंसे भारतीय लोकतंत्र में शायद ही कभी किसी ओबामा का उदय हो पाए.

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आपने इस ब्लॉग में जो सवाल उठाये हैं वो काफी हद तक सही हैं, लेकिन हम भूल जाते हैं की हम दक्षिण एशियाई देशों में रहने वाले हैं, जहां क्षेत्रफल के मान से जनसंख्या का प्रतिशत ज़्यादा होता है. स्वाभाविक है कि अधिकाँश लोग गरीबी के चलते रोजी रोटी की जुगाड़ में ही दिन बिताते हैं. ये गरीबी राजनीति का चुनाव तो कर सकती है, लेकिन राजनीति नहीं कर सकती, इसीलिये चुनावों में इनका उपयोग किया जाता है. चूंकि ये बड़ी आबादी रोजी-रोटी की जुगाड़ में जो अनुभव ग्रहण करती है, उसमें अंधविश्वास, धर्म और जातियों का आधार उनमें ऊर्जा भरता है. यही कारण है कि उनमें राजनीति करने का सामर्थ्य ही नहीं रहता.
आप और हम खुद को ही ले लें - ख़बरों के बीच रहकर उनका विश्लेषण करते-करते उसे ही जिंदगी का हिस्सा बना लेते हैं. हम भी राजनीति के उपयोग का एक सामान हो सकते हैं, राजनीति नहीं कर सकते. फिर इन गरीबों को तो ये भी पता नहीं होता कि दुसरे दिन चूल्हा जलेगा या नहीं? राजनीतिक लोग इसका लाभ नहीं उठाते, बल्कि दक्षिण एशियाई देशों में गरीबी और अशिक्षा उनकी स्वाभाविक खुराक होते हैं. जो अगर नहीं हो तो सारी व्यवस्था ख़त्म होने का ख़तरा रहता है.
अगर राजाओं और बादशाहों में वंशवाद चले तो कोई ताज्जुब की बात नहीं है लेकिन प्रजातंत्र में चले तो ग़ौर करने वाली बात है. इन सब के लिए ज़िम्मेदार कौन...नेता कम और जनता अधिक जो आज़ादी के बाद भी अभी तक यह नहीं समझ पाई कि देश में कई तरह के वंशवाद एक लाइलाज बीमारी की तरह फैले हुए हैं. सिर्फ़ राजनीति में ही नहीं फ़िल्मों और क्रिकेट में भी ऐसा ही हो रहा है. दुख इस बात का है कि फ़िल्म और खेल में तो जनता के हाथ में कुछ नहीं होता लेकिन बेईमान नेताओं के वंशवाद को जनता चाहे तो रोक सकती है.
भारत की जनता भी परिवारवाद में ज़्यादा रुचि लेती है. इसीलिए सूर्यवंशी और चंद्रवंशी चुन कर लोकसभा और विधानसभा तक पहुँचते हैं.
बहुत ही तीखा कटाक्ष किया आपने संजीव जी, साधुवाद के पात्र हैं आप.
विश्व के सबसे लोकतन्त्र का वर्तमान, भूत व भविष्य इसी मे उलझ कर रह गया है.
हम 'स्लमडौग मिलियनर' देश है और हमारा भाई-भतीजावाद हमे इसी मे धसाता रहेगा.
जीवन का प्रत्येक क्षेत्र प्रदूषित हो चुका है इस देश मे और हम इसके आदी हो चुके है. अतः कोई क्रान्ति का सूत्रपात नही करेगा अपने आकाओ के विरुद्ध.
संजीव जी,
आपकी एक अन्य पोस्ट पर भी मैंने कुछ यही कहा था कि प्रतीत ही नहीं होता कि भारत में लोकतंत्र है भी. खैर रोम भी इसी स्थिति से गुजरा और फिर पतन का शिकार हुआ. 19 वीं शताब्दी के दौरान इस तरह की लाखों बहसें यूरोप और एशिया में प्रभावी थीं कि एशिया प्रजातंत्रात्मक शासन के लिए उपयुक्त नहीं, यहाँ केवल तानाशाहियाँ या राजशाहियों का ही अस्तित्व हो सकता है. मुझे इस बहस में निहित श्वेत नस्लीयता की सर्वोच्चता से एतराज है. लेकिन यदि इस तथ्य को पूरी बहस से ज़ुदा कर दिया जाए..... जी हाँ परंपरा तो अब दिखाई दे रही है. राहुल कितने अच्छे काम कर रहे हो, लेकिन सवाल केवल एक है कि यदि वह राजकुमार न होते तो क्या उनके विचार इतने संग्रहणीय होते. कभी नहीं.
राजनीति एक कैरियर है, और कैरियर की तरह ही निभाया जाता है. खैर पोस्ट के लिए शुक्रिया.
मेरी समझ से इस तरह की बहस में अपनी प्रतिक्रिया देकर कागजी काजी बनने का कुछ भी फायदा नही है जब तक कुछ कर गुजरने की हिम्मत न हो सब व्यर्थ है.
यह लेख बेहतरीन है और मैं बहुत ख़ुश हूँ कि लोग इस तरह की मूर्खतापूर्ण परिवारोन्मुख राजनीति के बारे में सोचने लगे हैं. यह भी एक तरह का भ्रष्टाचार है जो किसी अन्य के आगे बढ़ने के अवसर छीन लेता है. मैं नहीं जानता कि निकट भविष्य में परिस्थितियाँ बदलेंगी या नहीं लेकिन इसकी आशा ज़रूर है कि हालात बेहतर होंगे.
आजकल भारत में नेता एक पारिवारिक 'प्रोडक्ट' का नाम है जो राजनीतिक परिवारों से सही समय पर और सुनियोजित तरीके से 'लॉन्च' किया जाता है. हम कह सकते हैं की अधिकाँश नेता बनते नहीं बल्कि बनाए जाते हैं. हालांकि नेता के बेटे का नेता बनना गलत नहीं कहा जा सकता पर तमाम प्रतिभाशाली और अनुभवी ज़मीनी नेताओं को दरकिनार करना सही नहीं है. भूपेश जी का विश्लेषण काबिले-तारीफ लगा.
भाई भूपेश गुप्ता साहब,
काश आपके जैसा दिमाग इन श्रीवास्तव जी का भी होता, यह अभी तक ड्राइंग रूम के वीर बने हुऐ है. चाय की चुस्की और एसी की हवा मे ब्लॉग लिखने वाले बस लिखने के लिए लिखते है... है वंशवाद तो फिर? फिर क्या? क्या बकवास है...
भूपेश साहब आपने ठीक लिखा, रोटी और चूल्हे वाले लोग बीबीसी नहीं पढ़ते ... न ही वोह यह जानते है कि वंशवाद के होने और न होने से उनकी जिंदगी मे कुछ फ़र्क़ पड़ेगा...
आपने मुद्दा तो सही उठाया है लेकिन जब तक सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग इसका विरोध नहीं करते तब तक इसका समाधान निकालना मुश्किल है. ऐसा कह कर मैं आम आदमी की ज़िम्मेदारी से भाग नहीं रहा, लेकिन क्या आपको नहीं लगता की राष्ट्रपति को खुद इस मामले में हस्तक्षेप करना चाहिए था जब उनके बेटे को टिकट दिया गया. मुझे लगता है ये परिवारवाद सिर्फ राजनीती की समस्या नहीं है. आप फिल्म इंडस्ट्री को देखिये, एक स्टार का बेटा या बेटी ही स्टार बनते हैं. कारोबार जगत का भी यही हाल है और हद तो तब हो जाती है जब स्वतंत्र माने जाने वाले लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ प्रेस में भी परिवारवाद चलता है. हिंदी के कुछ अख़बारों में भी संपादक की कुर्सी भी खानदानी बन गयी है. मेरा ये मानना है की ये समस्या बनी रहेगी क्योंकि अमरीका के राष्ट्रपति के बेटा भी राष्ट्रपति बनता है और राष्ट्रपति की पत्नी विदेश मंत्री बन जाती है.
ब्रितानियों ने लोकतंत्र सिखाया और लागू कराया. हमारे सामाजिक ढांचे में परिवार पर आधारित राजनीति को पसंद किया जाता है. भारतीय समाज और जनता लोकतंत्र से अधिक साम्राज्यवाद को पसंद करती है. हरेक वंशवाद की आलोचना करता है और अपने वंश को नेहरू परिवार की तर्ज़ पर ढालना चाहता है. यह सभी राजनीतिक दल इस का उदाहरण हैं कि इन्होंने कैसे पहले कॉंग्रेस की परिवार संस्कृति की आलोचना की और फिर बाद में उसी रंग में रंग गए.
संजीव जी,
अत्यंत सटीक व हृदयस्पर्शी बात लिखी है आपने। मैं आपका बहुत बड़ा प्रशंसक हूँ, और राजनीति पर इतनी अच्छी और सही बात आप ही लिख सकते हैं। सच मायनों में आप जैसे पत्रकार ही बीबीसी की निष्पक्ष छवि को बचाए हुए हैं साथ में हम जनता की आशाओं को भी।
परिवारवाद का तो कहना ही क्या है विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश में। मैं बिहार का हूँ और मैं छोटा सा था तभी लालू की सरकार आई, और बिहार को पिछड़ते देखकर मैं बड़ा हुआ। कभी-कभी मैं सोचा करता था कि क्या हम सचमुच लोकतंत्र में जी रहे हैं, अगर यह राजतंत्र नहीं तो क्या है। यह परिवारवाद ठीक दहेज-प्रथा की तरह है जो यहाँ नस-नस में बस गया है।
हाँ मगर उम्मीद की किरण हमेशा रहती है। नीतीश कुमार के आने के बाद यह उम्मीद की किरण फिर से उम्मीद का सूरज बन गई है। यह बात तो आपको भी माननी होगी कि भारत में घोर परिवारवाद के बीच वे एक ऐसे नेता हैं जो एक क्षेत्रीय दल के अध्यक्ष हैं पर इस कुप्रथा के घोर विरोधी हैं।
काश! सभी दलों में कुछ ऐसा ही हो पाता।
पहले मुझे भी लगता था कि परिवारवाद काफ़ी बुरा है. लोकतंत्र में ऐसी किसी भी परिपाटी के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए लेकिन अगर हम अपने भारतीय परिवेश की बात करें तो शायद परिवारवाद ही हमारी ताक़त है. अगर हम बहुत पीछे अपने इतिहास को देखें तो शायद यह वर्णव्यवस्था का आधुनिक रूप है. अगर उद्योगपति का बेटा हज़ारों करोड़ की कंपनी संभाल सकता है, अभिनेता की संतान सफलता के झंडे गाड़ सकता है, तो राजनेताओं से नफ़रत क्यों...
बात तो आपने पते की कही है लेकिन जिस देश में शासन करने वाले नहीं चाहते कि आम जनता शासन में भागीदार बने. कुल मिला कर राजनीति में वंशवाद के लिए जनता ज़िम्मेदार है. जनता को चाहिए कि नेताओं के रिश्तेदारों को वोट ही न दे. रही बात टिकेट की तो निर्दलीय उम्मीदवार चुनाव जीत कर भी सत्ता में आ सकते हैं.
आपने तथ्यों और तर्कों से लाजवाब कर दिया है. नेता-पुत्रों की थोथी दलीलों की भी अच्छी खबर ली है. मान गया आपको और आपकी कलम की धार को. बधाई.
संजीव जी;
आप हमेशा ऐसा विषय चुनते हैं जो मीडिया में अछूता हो लेकिन महत्वपूर्ण. लेकिन मुद्दे की बात ये है, कि आप भी राहुल गाँधी का नाम लेते हुए डरते हैं. वरना वंशवाद पर इतने बड़े ब्लोग में राहुल गांधी का नाम क्यों नहीं. साथ में आपने ये भी दिखा दिया "राष्ट्रपति के बेटा" का कद रहुल गाँधी से कितना छोटा है. बीबीसी वाले तो ऐसा नही थे.
लगता है मेरी टिप्पणी मोडेरेट हो जाएगी.
क्या बात है संजीव श्रीवास्तव जी. आपने न केवल एक अनकहे-अनसुलझे पहलू को उजागर किया है, बल्कि एक कड़वे सच को भी बयान कर दिया. यकीनन वंशवाद और परिवारवाद भारतीय राजनीति का हिस्सा हैं. नितिन श्रीवास्तव ने भी परिवारवाद की सच्चाई को उजागर किया था अपनी लेखनी से. ये ज़रूर बताएँ कि आप दोनों में से कौन एक दूसरे से प्रेरित होकर इस ज्वलंत मुद्दे पर लिख रहा है?
संजीव जी क्या ख़ूब लिखते हैं आप. ये परिवारवाद हमारी राजनीति में ऐसे घुसा हुआ है कि इससे पार पाना मुश्किल है. हर पार्टी में ये नज़र आता है. किसी आम आदमी को राजनीति में आने का मौक़ा नहीं मिलता. इसका सीधा असर भ्रष्टाचार पर पड़ता है. जो घोटाले करते हैं, उसे छिपाने के लिए उसकी जगह उसकी के घर का कोई आ जाता है. इस तरह सच कभी सामने नहीं आ पाता. इसे जनता ही दूर कर सकती है. उसे चाहिए कि ऐसे लोगों को राजनीति में आने से रोके. तभी इस देश का भला होगा.
बहुत खूब संजीव जी, सारे राजनीतिक दलों में इस बात पर भी एकता है की शिक्षा का अधिकार जो कि संविधान में हैं, उस पर चर्चा न हो. भाई, एक पढ़े लिखे सवाल उठाने वाले मतदाता की ज़रुरत किसे है. मैं एक बड़े भारतीय मेडिकल कॉलेज में पढाता था. मेरे साथी अध्यापकों के बच्चे अपने माता पिता द्वारा पढ़ाए जाने वाले विषयों में बहुत अच्छा प्रदर्शन करते थे, ना केवल आगे पढ़ने का अवसर पाते थे, बल्कि कॉलेज में ही पढ़ाने भी लगते थे. इसलिए हम लोगों को अपने भीतर भी झांकना चाहिए.
कौन ! महात्मा गाँधी
हम नहीं जानते हैं,
हम तो राहुल गाँधी को
अपना आदर्श मानते हैं,
एक यही गाँधी हमें
सत्ता का स्वाद चखाएगा,
महात्मा तो बुत है,
तस्वीर है,विचार है,
यूँ ही
पड़ा,खड़ा सड़ जाएगा।
भारतीय राजनीति हर किसी के बस का रोग नहीं हैं. यहाँ लोग जाति, प्रांत के आधार पर चुने जाते हैं. वैसे भी पढ़े लिखे लोग राजनीति में घुसने की हिम्मत नहीं करते. अगर आप राजनीति में चले भी जाते हैं तो आप अपनी काबलियत के आधार पर आगे नहीं बढ़ सकते. आपको भीतर और बाहर दोनों तरफ से समर्थन चाहिए होता है. किसमें शक्ति है की वो राजनीति में करोड़ों रूपये खर्च कर सके, हाँ अगर वो उस पैसे से पैसा बनाना जनाता हो, या उसके पास दो नंबर का पैसा हो तो अलग बात है.
संजीव जी,
आप के लेख और उस पर टिप्पणियों को ब्लॉग अंश मानते हुए सम्मिलित टिप्पणी कर रहा हूँ. नवीन सिन्हा जी ने कहा है, '' शायद यह वर्णव्यवस्था का आधुनिक रूप है.'' जहाँ तक मैं समझ पा रहा हूँ नवीन जी संभवतः ''शायद यह सामंतशाही अथवा सामंत वादी (जमींदारी , नव्वाबी , तालुक्केदारी ) व्यवस्था का ही आधुनिक रूप है'' कहना चाह रहे थे ,क्योंकि वर्ण व्यवस्था अपने आप में एक अलग क्षेत्र और विषय हो जाता है. हाँ यह अवश्य है कि इस को ' विद्रूप ' करने का श्रेय सामंतवादी विचार-धारा के लोगों को उसी प्रकार दिया जा सकता है जिस प्रकार आजकल वे ''जनतांत्रिक, गणतांत्रिक अथवा लोकतांत्रिक या लोकशाही को आधुनिक लोकतंत्र में वंशवाद के बीजछोड़ कर सामंतवाद की नई फसल रोपने की कोशिश करा रहे हैं , कर काया रहे है ,ग्रीन हौस लेवल पर कर चुके है {सभवतः बिजली जाने का समय हो रहा है अतः इतना पोस्ट कर रहा हूँ शेष बाद में करूँगा |}
संजीव जी मुझे तो राहुल गांधी के बयानों पर हंसी आती जो की उन्होंने इसी वर्ष कुछ माह पहले चुनावी हलचल के दौरान वंशवादी राजनीती को आलोक्तान्त्रिक बताया था व् अब जे. एन. यू. दौरे के दौरान वंशवाद को बदलने की बात कर रहे हैं | दरअसल यह बयानबाजी भी वंशवाद का ही नतीजा है | इससे पहले स्व. राजीव गांधी भी ऐसे ही आम जनमानस के दिलोदिमाग में घर करने वाली बातें करते थे जबकि असल जीवन से उनका दूर दूर तक कोई सरोकार नहीं | सर्वविदित है की वंशवाद किसकी देन है | नेहरु जी ने १७ साल तक राज किया ,इंदिरा जी ने १५ साल ,राजीव जी ने ५ साल व् अब वंशवादी राजनीती का अप्रत्यक्ष रूप से छठा साल चल रहा है | लगभग एक ही परिवार की वंशवादी प्रथा के ४०-४२ सालों में कुछ बदला नहीं तो अब राहुल जी कौन सी दुनिया की बात करते हैं | या तो राहुल जी यह कहना चाह रहे हैं की वे इस प्रथा को बदलने के लिए पारिवारिक परमपरा का निर्वाह न करते हुए मनमोहन सिंह जी के बाद पद ठुकरा देंगें | चिकनी चुपडी बातें करना बहुत आसान है | सच तो यह है की अभी तक राहुल जी राजनीती के अखाडे में अपरिपक्व खिलाड़ी हैं व् अनुभवहीन हैं वरन मनमोहन जी को कहाँ मौका मिलता, स्व. पी. वी नरसिंह राव को इस लिए मौका मिला क्योंकि सोनिया जी को लगभग सात साल राजीव जी की ह्त्या के शोक से उबरने में लगे , नेहरु जी के बाद शास्त्री जी को पद इंदिरा जी के राजनीती में अपरिपक्व व् अनुभव हीन होने के कारण मिला | अगर आजादी के बाद का भारतीय इतिहास पर गौर फरमाएं तो पता चलता है की पिछले ६२ सालों में कांग्रेस के सत्ता में रहते हुए गैर नेहरु - गांधी परिवारों को प्रधानमंत्री का पद अति विशेष कारणों से ही थोड़े ही समय के लिए दिए गए | इन ६२ सालों में कोइ भी राजनितिक दल वंशवादी बीमारी से अछूता नहीं रहा | शायद हर कोई सरदार वल्लभ भाई पटेल नहीं हो सकता |
संजीव जी दुःख इस बात का होता है की बेचारा आम कार्यकर्ता अपने जीवन के सुनहरे पल पार्टी के नाम न्योछावर कर देता है , वह पार्टी के राजनितिक पौधे को अपने खून पसीने से सींचता रहता है कि यह पौधा पेड़ बनकर उसे फल देगा लिकिन अफ़सोस तब तक वंशवादी आकाओं के नौनिहाल विदेशों में रुपये के बल पर राजनीती का पाठ पढने के बाद वंशवादी विरासत के उतराधिकारी बनकर बेचारे आम कार्यकर्ता के हक पर कुण्डली मारकर बैठ जाते हैं | कार्यकर्ता बेचारा मन मार कर रह जाता क्योंकि आम आदमी की बारी तो कभी आती ही नहीं है |
वंशवाद के वटवृक्ष को विराट बनाने में इन वंशवादी सर्मायाकारों ऐसा ताना - बाना बुना कि जनता जनार्दन को समझने में देर लगी | मदारी आया डुग्गडुगी बजाई और बन्दर नाचा ,खेल ख़त्म | युवाशक्ति को मौका देने के नाम वंशवादी राजनितिक आकाओं ने अपने परिवारों , बेटे ,बेटियों , दामादों ,भी भतीजों , साले - सालियों , और कई रिश्तेदारों को राजनितिक विरासत के उतराधिकारियों के लिए रास्ता निकाल लिया | और आम जनता को इस तरह से बेवकूफ बनाया गया और यह सिलसिला अब तक चालू है |
इस बंदरबांट के जो परिणाम सामने आये उस के लिए सिर्फ और सिर्फ मतदाता व् आम जनता ही जिम्मेवार है ऐसे राजनैतिक विसात के सौदागरों को क्यों सत्ता के सिंघासन पर पहुंचाया | आम युवा कार्यकर्ता भी तो इस युवाओं के देश में बसते हैं |
क्या युवा शक्ति केवल नेताओं के घरों में ही बस्ती है ? क्या नेता सिर्फ राजनैतिक घरानों में ही पैदा होते हैं ?
भारत में ओबामा तलाशने की कवायद तब तक सटीक नहीं बैठती जब तक कि हमारे यहाँ सिर्फ और सिर्फ दो राजनितिक दल हों व् बाकी अन्य दलों की मान्यता समाप्त कर दी जाए |
वैसे राजनीती के वंशवाद लिए केवल कांग्रेस ही जिम्मेवार नहीं बल्कि कम्यूनिस्ट व् कुछ हिंदूवादी दलों को छोड़कर सब दल इस वंशवादी वट वृक्ष के जड़, टहनी लताएँ , फल, पत्ते ,हैं | एक गांधी जी का वंशवाद था की उन्होंने अपना भरा - पूरा परिवार जो की विदेश में रह रहा था राष्ट्रवाद के आन्दोलन में समर्पित कर दिया व् यही क्रम बाकी महाविभूतियों जैसे नेता जी सुभाष चन्द्र बोस , सरदार भगत सिंह ,लोहिया जी आदि ने अपनाया | इस वंशवाद का मकसद था देश के लिए मर मिटने का जज्बा न कि सत्ता के भोग के लिए | एक वह आन्दोलन था कि ज्यादा से ज्यादा परिवार के सदस्यों को राष्ट्रहित में समर्पित करना अब आज का वंशवाद है कि एक बार राजनितिक विसात में चाल मिले तो कम से कम सात पुश्तों का हिसाब -किताब बन जाए | वंशवादी राजनीती जड़ों में मटठा डालने का समय आ चुका है वरन यह हमारे लोकतान्त्रिक ढांचे को खोखला करके छोडेगा | यह बात आम कार्यकर्ता को समझ लेनी चाहिए कि इस लोकतान्त्रिक स्तंभ को स्थिर रखने में आपका विवेक व् फैसला ही सबसे बड़ा कदम होगा |
लोकतंत्र व् विचारधारा दोनों राजनीति के सिक्के के दो पहलू हैं | जब वंशवाद लोकतंत्र के आड़े आने लगता है तो विचारधारा का अस्तित्व ख़त्म हो जाता है | वंशवाद व् लोकतंत्र नदी के दो किनारे हैं जो एक दूसरे से कदापि नहीं मिलते | वंशवाद एक नासूर है जो कि बदले , द्वेष , आतंकवाद , शत्रुताओं व् हत्याओं के तौर फलीभूत होता आया है | व्यक्तिवाद से व्यक्ति ख़त्म विचारधारा ख़त्म | सिर्फ दो राष्ट्रिय राजनितिक दलों को मान्यता या फिर लोकतान्त्रिक ढांचे में बदलाव ही वंशवाद के जहर से बचा सकता है |
आज राहुल गांधी भी जेएनयू में जाकर अपनी हाज़री लगाते हैं, इसलिए नहीं कि वहां राजनीतिज्ञों के सपूत पढ़ते हैं, रहते हैं. बल्कि इसलिए जाते हैं कि क्योंकि वहां राजनीति की दशा और दिशा बदलने में काब़िल लोग वहां रहते हैं. उनको भी शायद इस बात का पता है कि अगर आज राजनीति करनी है तो उनको साथ लेकर चलना पड़ेगा. इनकी समझ में ये बात तो आ गई लेकिन ये बात कब आएगी कि ये लोग भी राजनीति करने में सक्षम हैं सिर्फ़ टीका-टिप्पणी करने में ही नहीं.
यह तो आम बात है. आज की राजनीति में वही टिक सकता है जिसके पास पैसा है, जैक है जिसका पिता या नज़दीकी रिश्तेदार किसी पार्टी में अच्छे पद पर हैं. असली और ईमानदार नेता तो अब गुज़रे ज़माने की बात हो चुके हैं. अगर आप सोचते हैं कि आप जनता के बीच में जा कर अच्छे से अच्छे काम करके पार्टी का टिकट पा लेंगे तो ये आपकी बेवक़ूफ़ी है. महाराष्ट्र के सुनिल देशमुख इसका सबूत हैं चाहे वह जन नेता हों. लेकिन राजेंद्र सिंह पाटिल की तरह क़िस्मत वाले नहीं हैं कि उनकी मां भारत की राष्ट्रपति हैं.
लोकतांत्रिक राजनीति में वंशवाद जैसी कोई चीज नहीं होती. हम भी एक माहौल में पैदा हुए हैं और उस कारण से राजनीति और अपने निर्वाचन क्षेत्र को बेहतर समझते हैं. किसी भी अन्य प्रोफेशनल्स जैसे डॉक्टर या वकील की संतान की तरह हमारा भी झुकाव अपने परिवार के प्रोफेशन को चुनने का है. पर पार्टी से टिकट तो क्षेत्र में किए गए काम के आधार पर ही मिलता है.
ये वक्तव्य उस राज्य के मुखिया और संभावित जनप्रतिनिधियों की सोच की बानगी हैं जो कि अपने को देश के सर्वाधिक विकसित और औद्योगिक राज्यों में से एक मानता है। इस सूची में न तो कोई एक-दो नाम हैं और न ही यह कोई अचानक प्रकट हो गया फिनामिना है। यूं तो पूरे देश में ही राजनीति वंशवाद का शिकार है पर महाराष्ट्र में इस बार के विधानसभा के चुनाव में यह जितने व्यापक स्तर पर देखी जा रही है और जिस बेशर्मी से इसका समर्थन किया जा रहा है वह चिंताजनक है। इसके पीछे सिर्फ भारत की पारंपरिक सामाजिक संरचना ही जिम्मेदार नहीं है वरन् महाराष्ट्र की राजनीति का स्वरूप भी इसके लिए जिम्मेदार है.
महाराष्ट्र में इस समय मुख्य रूप से चार प्रमुख राजनीतिक दल हैं और चारों वंशवाद की राजनीति से बुरी तरह ग्रस्त हैं. ’मराठी मानुष’ की राजनीति करने वाली शिव सेना और अपने को बाल ठाकरे का वारिस बताने वाले उनके पुत्र उद्धव ठाकरे और भतीजे राज ठाकरे का किस्सा तो जगजाहिर है, भाजपा का भी यही हाल है. चुनाव प्रभारी गोपीनाथ मुंडे के तीन करीबी रिश्तेदार इस बार चुनाव मैदान में हैं. खुद गोपीनाथ मुंडे की पुत्री पंकजा इस बार पार्ली से चुनाव मैदान में हैं. भाजपा के प्रभावशाली नेता और गोपीनाथ मुंडे के साले स्वर्गीय प्रमोद महाजन की पुत्री पूनम महाजन को घाटकोपार से टिकट दिया गया है. मुंडे के बड़े भाई के दामाद मधुसूदन माणिकराव भी गंगाखेड़ से टिकट पाने में सफल हो गए हैं. मुंडे के भतीजे धनंजय का नाम भी दावेदारों में था, पर उनको टिकट नहीं मिल सका. इसको देखते हुए लोगों ने महाराष्ट्र में बीजेपी को ’बच्चा जनता पार्टी’ भी कहना शुरू कर दिया है.
उधर कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस भी वंशवाद की बीमारी में बुरी तरह से जकड़ी हुई हैं. खुद राज्य के कांग्रेसी मुख्यमंत्री अषोक चव्हाण राज्य के भूतपूर्व मुख्यमंत्री और भूतपूर्व केंद्रीय मंत्री रह चुके एसबी चव्हाण के बेटे हैं.
अशोक चव्हाण के पूर्व राज्य के मुख्यमंत्री रहे विलासराव देशमुख का केंद्र की राजनीति में भारी उद्योग मंत्री के रूप में पुनर्वास हो चुका है और महाराष्ट्र की राजनीति उनके सुपुत्र अमित देषमुख संभाल चुके हैं. उनके बेटे को लातूर से टिकट मिला है. यूं विलासराव देशमुख के बड़े भाई दिलीप देशमुख वर्तमान महाराष्ट्र सरकार में खेल मंत्री हैं. दिलीप महाराष्ट्र विधानसभा से नहीं आ सके तो क्या हुआ, उन्होंने महाराष्ट्र विधान परिषद के रास्ते मंत्रिमंडल में जगह बना ली. जिन प्रनीति का ऊपर वक्तव्य दिया गया है वे कंद्रीय ऊर्जा मंत्री सुशील कुमार शिंदे की सुपुत्री हैं। मालूम हो कि शिंदे की पत्नी उज्जवला 2004 में शोलापुर से लोकसभा का चुनाव भी लड़ चुकी हैं, पर हार गई थीं. वैसे कांग्रेस में तो वैसे इस बार स्वयं महामहिम राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल के बेटे राजेन्द्र उर्फ रावसाहेब शेखावत को अमरावती से टिकट मिला ह, सबसे चर्चित नाम यही है.
शरद पवार की एनसीपी का दामन भी इस मामले में कतई पाक-साफ नहीं है। शरद पवार के भतीजे अजित अनंतराव पवार चैथी बार चुनाव लड़ रहे हैं, बारामती से विधायक अजित अभी महाराष्ट्र सरकार में जल संसाधन मंत्री हैं. शरद पवार की सुपुत्री सुप्रिया सुले पहले ही बारामती से ही संसद पहुंच चुकी है. एनसीपी नेता छगन भुजबल के सुपुत्र पंकज नंदगांव से और खुद भुजबल येवला से चुनाव लड़ रहे है. छगन भुजबल के भतीजे समीर भी पहले ही नासिक से जीत कर लोकसभा पहंच चुके हैं.
ये सिर्फ कुछ उदाहरण हैं. जनता के नाम पर राजनीति करने वाले पक्ष -विपक्ष का कोई नेता इस परिवार मोह मुक्त नहीं है, चाहे वो नारायण राणे हों या मनोहर जोषी या फिर माणिक राव या गणेष नाइक. कुछ लोग इस बार अपने परिवार को जनता की सेवा का मौका देने में सफल हो गए हैं तो कुछ लोग अगली बार हो जाएंगे.
वंशवाद की इस बीमारी की व्यापकता, इसका बेशर्म समर्थन और इसकी बेबस स्वीकार्यता को देखते हुए जरूरी है कि इसको सही परिप्रेक्ष्य में रखकर समझा जाए.
नेताओं के ऊपर दिए गए सफाईनुमा वक्तव्य ही इसका गवाह हैं कि जनता राजनीति में इस परिवारवाद को बीमारी के रूप में देख रही है. इसलिए नेताओं को अपने इस कृत्य के लिए सफाई देने की भी जरूरत पड़ रही है.
पर इस सफाई देने के क्रम में नेता खुद नंगे होते जा रहे हैं. इन सारे सफाईनुमा वक्तव्यों का एक ही आशय है कि अगर बाकि प्रोफेशन के लोग अपने परिवार के प्रोफेशन का अनुसरण कर सकते हैं तो नेताओं की संतान क्यों नहीं. यह कहते हुए ये समस्त माननीय नेतागण ये भूल जाते हैं कि वकील या डॉक्टर एक व्यावसायिक गतिविधियां हैं. इनका घोषित उद्देष्य होता है प्रफेशनली अपनी श्रेष्ठता साबित करते हुए बेहतर से बेहतर कैरियर बनाना. पर आज भी तमाम भ्रष्टाचार के बावजूद भारतीय लोकतंत्र इतना मजबूत है कि कोई नेता सार्वजनिक रूप से यह कहने की हिम्मत नहीं कर सकता कि वह कैरियर बनाने और पैसा कमाने नेता बना है. यह मुद्दा महाराष्ट्र के संदर्भ में जहां आउटसाइडर और इनसाइडर का भेद मानती है वहीं महाराष्ट्र की अंदरूनी राजनीति के संदर्भ में इसकी तार्किक परिणति यह होती है कि अपने (महा)परिवार और बाहरी लोगों में भेदभाव किया जाए. अर्थात टिकट बंटवारे में पहले अपने परिवार को प्राथमिकता दी जाए. फिर शेष मराठी मानुषों की दावेदारी पर विचार किया जाए.
मुझे भारतीय नेताओं से नफरत है. बोलने में अच्छे हैं लेकिन दिल से खराब.