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लंदन में दुर्गा पूजा

राजेश प्रियदर्शीराजेश प्रियदर्शी|रविवार, 27 सितम्बर 2009, 08:36 IST

ऊँची छत वाले हॉल में ढोल और घंटियों की गूँजती आवाज़, तेज़ पीली रोशनी में दमकती मूर्तियाँ, अगरबत्ती-धूप की पावन गंध, सिल्क की चमकदार साड़ियों और गहनों से सजी महिलाएँ, दौड़ते-भागते खिलखिलाते बच्चे. भीड़ थी, लेकिन इतनी नहीं कि धक्का-मुक्की हो.

पहली बार लड़कियों को बड़े-बड़े ढोल बजाते देखा, पास जाने पर लगा कि ये पूरी मंडली थोड़ी अलग है. 'कादिर भाई, की आनंदो...' पता चला, बांग्लादेशी मुसलमानों की टोली पूजा में ढोल बजाने आई है. आयोजकों ने बताया कि इससे पहले नाइजीरिया वाले आए थे, अपने ड्रम लेकर.

चार-छह नाइजीरियाई जवान काफ़ी उत्सुकता से उत्सव का आनंद ले रहे थे, ओलेगु ने कहा, 'गुड फ़न, मैन.' कई गोरे चेहरे दिख रहे थे, दो-एक गोरी महिलाएँ सलवार-सूट पहने घूम रही थीं, बंगाली परिवारों में विवाहित होंगी शायद.

एल्युमिनयम फॉएल के डिब्बे में लोग प्लास्टिक के चम्मच से 'खिचड़ी प्रसाद' खा रहे थे, हर कोने रखे कूड़ेदान डिब्बों, चम्मचों और नैपकिन से भरे हुए थे.

ज्यादातर लोग मूर्ति को बैकग्राउंड में रखकर फोटो खिंचवाने में लगे हुए थे, कैमरे इक्का-दुक्का ही थे, स्मार्टफ़ोन ज्यादा नज़र आ रहे थे.

कोलकाता से आए एक महाशय ने कहा, 'हियाँ शिस्टम बहुत आच्छा है, कोई धोक्का नेई, शोब लाइन में जाता है, कोलकाता जैशा बड़ा पूजो नेई है लेकिन बहुत शिस्टम है, कोलकाता में हम कोबी प्रशाद लेने नहीं सका. उहाँ का अलोग है, हियाँ का अलोग है.'

मिठाईवाले 'गु्प्ता जी' ने अपना स्टॉल लगाया था, माइक्रोवेव अवन में गर्म किए हुए समोसे से खुशबू उड़ रही थी. दीवार पर शादी डॉट कॉम के बड़े-बड़े पोस्टर लगे थे, विवाह योग्य संभावित वर-वधू पोस्टर की तरफ़ नहीं, एक-दूसरे को देख रहे थे.

और भी कई पोस्टर थे. एक में मिथुन दा कोलकाता के सॉल्ट लेक के पास बनने वाली किसी नई टाउनशिप की ओर बहुत उत्साह से उंगली दिखा रहे थे, दूसरे में फटाफट कम कमीशन पर इंडिया पैसा भेजने का इश्तिहार था, अपने प्रियजनों से दो पेंस प्रति मिनट बात करने वाली टेली़फ़ोन सर्विस ने भी इस मौक़े को नहीं गँवाया.

कुछ सदस्य दरवाज़े पर स्टॉल लगाकर बैठे थे, 'पूजा चंदा, प्लीज़.' एक पाउंड के सिक्के से लेकर पचास पाउंड तक के नोट थाली में थे. कुछ लोगों ने पूजा समिति के नीले बैज लगा रखे थे जो कोलकाता से मँगवाए गए थे. चंदा वसूल करने की कोई तत्परता नहीं थी, शायद पोस्टरों और कुछ दिलदार 'फीर भी दिल हाय हिंदुश्तानी' लोगों की बदौलत.

मूर्तियाँ भी कोलकाता से मँगवाई गईं थी जिनके नीचे अँगरेज़ी में लिखा था--शिल्पी, प्रशांत पाल, हाबड़ा, मोबाइल नंबर...आयोजकों ने बताया कि ये मूर्तियाँ दस साल पहले आई थीं. दुर्गा माता के लिए कस्टम का फार्म तो भरा गया था लेकिन वीज़ा नहीं लेना पड़ा था.

विसर्जन की रस्म मूर्ति के पैरों को पानी में डूबोकर पूरी की जाती है, अगले साल पूजा तक उन्हें कहीं कपड़े से ढँककर रख दिया जाता है. यहाँ मूर्तियाँ बन नहीं सकतीं, हर बार कोलकाता से मँगवाई नहीं जा सकतीं, टेम्स नदी में पॉल्युशन फैलाया नहीं जा सकता...

कोलकाता वाले महाशय ने कहा, 'ईधर शिस्टम फरक है, उहाँ ओलोग है, हियाँ ओलोग है, लेकिन मोजा बहुत आया.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 11:03 IST, 27 सितम्बर 2009 Iqbal Fazli, Asansol, India:

    क्या हिंदु 'विसर्जन' और मुसलमान 'ताजिए ठंडे करने' के बारे में पुनर्विचार कर सकते हैं. यदि लंदन में लोग थेम्स नदी में प्रदूषण के बारे में सोच सकते हैं तो हम भी अपने नदी, पोखर और समुद्र को प्रदूषण से बचाने के बारे में सोच सकते हैं. क्या हमारे राजनेता और धार्मिक नेता सुन रहे हैं?

  • 2. 11:28 IST, 27 सितम्बर 2009 MRITUNJAY PANDEY:

    राजेश जी हमारे त्यौहार हमें एक दूसरे को करीब लाते हैं. आस्था तो एक होती हैं. लेकिन मेरा मानना है कि यदि कोई विदेशी हमारे त्यौहार से आकर्षित होता है तो उसके पीछे
    आस्था से ज्यादा आत्मिक आनंद है. एक दिन ये धर्म लोगों की बीच की दूरियों को मिटा देंगे.

  • 3. 11:51 IST, 27 सितम्बर 2009 Ferdinand :

    हमारे समाज को इस ब्लॉग से कुछ सीखना चाहिए कि कैसे एक ही मूर्ति के इस्तेमाल से बार बार पूजा किया जा सकता है और प्रदूषण फैलाने से बचा जा सकता है.

  • 4. 18:29 IST, 27 सितम्बर 2009 Chandra Shekhar:

    मुझे लगता है विदेशों में भारतीय संस्कृति के प्रचार के लिए ही दुर्गापूजा का आयोजन किया जाता है.

  • 5. 21:47 IST, 27 सितम्बर 2009 madhuresh:

    मज़ा आ गया. आपकी कलम कमाल है. इतना सुंदर चित्र खींचा आपने पूजा का. मैं लंदन में ही रहता हूं और पूजा देखने जाता भी हूं लेकिन विसर्जन वाली बात मुझे पता नहीं थी. आपकी नज़र बहुत बारीक है. हैप्पी दुर्गा पूजा.

  • 6. 02:17 IST, 28 सितम्बर 2009 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:

    राजेश जी आपके इस लेख को बार-बार पढ़ने पर भी ये समझ में नहीं आया कि आप इस लेख से हम बीबीसी पाठकों को क्या संदेश देना चाहते हैं या क्या समझाना चाहते हैं?अगर आप ये समझाना चाहते हैं कि किस तरह दुर्गा विसर्जन में मुस्लिम भी शामिल होते हैं तो शायद ये सच नहीं है, क्योंकि जैसे मेरे हिंदू भाई ईद के दिन सेवईयाँ घर पर बना सकते हैं वैसे मुसलमान दीपावली पर दिए घर पर नहीं जला सकते हैं, और ये कट्टर मुल्लाओं के कारण है. भारत में जब तक पंडित और मुल्लाओं के साथ में बेईमान नेताओं की चलती रहेगी ये दो समुदाय चाह कर भी एक नहीं हो सकेंगे.

  • 7. 18:18 IST, 28 सितम्बर 2009 Pankaj Parashar:

    बहुत अच्छा. आपकी भाषा ने लंदन के दशहरे का पूरा बिंब नज़रों के सामने साकार कर दिया. काश, मज़हबी कट्टरता से बुद्धिजीवी कहलाने वाले लोग यदि ऊपर उठ जाएं, तो वाक़ई हम सबका भला होगा. आपके बीबीसी के पाकिस्तान स्थित एक पत्रकार को मैंने एक सप्ताह पहले ईद मुबारक कहा तो उन्होंने बखुशी क़बूल किया, मगर आज जब उन्हें दुर्गा पूजा की बधाई दी दो वे चुप्पी लगा गए.

  • 8. 06:33 IST, 29 सितम्बर 2009 Chandan, Phoenix, USA:

    मेरे विचार से लेखक ने एक महत्वपूर्ण मुद्दे को उठाया है. हमें विक्सित देशों से भारतीय त्योहारों के मनाने के तरीक़ के बारे में बहुत कुछ सीखना है.

    1.भारतीय मंदिर क्रमानुसार नहीं हैं हालांकि वहां हमेशा भीड़ जमा रहती है, और यही कारण है कि वहां अकसर भगदड़ में सैंकड़ों की संख्या में लोग हताहत होते हैं और लोग उसे बहुत जल्दी भूल भी जाते हैं. अगले वर्ष वहां फिर भीड़ जमा होती है और पिछली घटना से कोई सीख नहीं ली जाती है.
    2. हर साल दीपावली के मौक़े से सैंकड़ों लोग जल जाते हैं. हर जगह शोर और हवा में प्रदुषण नज़र आता है. लेकिन कोई भी चीज़ों के सहज और सुरक्षित बनाने के बारे में नहीं सोचता.
    3, होली और नववर्ष के उत्सव बदमाशों को गंदगी फैलाने और महिलाओं को छेड़ने मौक़ा प्रदान करते हैं.
    4. हर त्योहार में रासायनिक पदार्थों से बनी मूर्तीयों का हर साल विसर्जन हमारी पहले से ही प्रदुषित नदियों और झीलों को और भी प्रदुषित कर देता है. ऐसा लगता है कि हम उसे प्रदुषित ही देखना चाहते हैं.
    मेरे विचार से शिक्षित जनता को चाहिए कि वह इन मुद्दों को आम तौर पर उठाएं. यह अच्छा मौक़ा है कि हम अपने आप में बदलाव लाएं और अपने देश को साफ़ करें.

  • 9. 09:28 IST, 29 सितम्बर 2009 BALWANT SINGH ,HOSHIARPUR, PUNJAB:

    राजेश जी बहुत ख़ूब अभी कल ही दुर्गा विसर्जन का ख़ूबसूरत नज़ारा देखने का मौक़ा मिला और आज आप का लेख देखा. मैं पहले ही स्पष्ट करना चाहूंगा व् क्षमा चाहूँगा कि मेरा इरादा किसी की धार्मिक आस्थाओं को ठेस पहुंचाना नहीं है. मेरा तात्पर्य आम लोगों की मन की बात को सबके सामने रखना है. क्योंकि जहाँ धार्मिक उत्सव होते हैं वहां लोगों का हुजूम भी पाया जाता है. इस भीड़ में तीन प्रकार लोग पाए जाते हैं. एक तो आस्था के पक्के व् दूसरे धार्मिक उन्माद पैदा करने वाले. और तीसरे प्रकार के वह लोग हैं जो बेचारे समुदाय में गिने जाने के लिए भारी मन से अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने पर मजबूर पाए जाते हैं. ज़्यादा योगदान दूसरे वर्ग के महानुभाव का है. कल ही देखा कि कुछ अति उत्साही भक्त दुर्गा माँ की प्रतिमा के समक्ष पूरे हफ़्ते अपनी आस्था का निर्वाह करते नज़र आए लेकिन जब विसर्जन की बारी आई तो इन्हीं लोगों का पूरा ध्यान अपनी पतलून व् क़मीज़ की क्रीज़ पर जमा रहा व् हाथों में महंगें कैमरे लहराते रहे. आपको तो मालूम ही है कि हमारे यहाँ तो बड़ी से बड़ी मूर्ती स्थापित करने का प्रचलन है या यूं कहिए कि मुकाबला होता है. लेकिन दुःख का विषय यही है कि जो महानुभाव पहले दिन से मूर्ती के समक्ष नज़र आए वही विसर्जन के समय एक निश्चित दूरी बनाकर अतिथियों की तरह नज़र आए. अच्छी बात देखने में यह आई है कि अब हमारे यहाँ भी लोग मूर्तियों के भूविसर्जन की बात सोचने लगे हैं. बाक़ी तो आज कल हर मौक़े का व्यापारीकरण करना बहुत आसान हो गया है. मेरे विचार से अपने हाथों से मिट्टी द्वारा छोटी -२ मूर्तियाँ बनाकर हल्दी आदि जैसे प्राकृतिक तत्वों से सुस्सजित करके विसर्जन भी आसान हो जाता है व् आस्था में तो कोइ कमी आने का सवाल ही पैदा नहीं होता. एकलव्य से तो हम लोग इतना सीख सकते हैं क्योंकि एकलव्य कोई मूर्तिकार व् शिल्पकार तो था नहीं. एकलव्य ने बस अपने गुरु की छवि को अपने गुरु की भावना से मिट्टी को जो रूप दिया उसी को मन में बसा लिया. छोटी-छोटी मिट्टी की देवी -देवताओं की मूर्तियाँ विसर्जित करके हम धरती माँ की गोद को विभिन्न प्रकार के प्रदूषणों से भरने से बचा सकते हैं. क्योंकि शास्त्रों में भी धरा को देवी की संज्ञा दी गयी है. अक्सर त्योहारों के बाद नदी, नहरों व समुन्द्र के किनारे कई प्रकार की प्लास्टिक के थैलों में भरी पूजा सामग्रियों, मूर्तियों के अवशेष, फूल पते आदि की सडांध से पटे रहते रहते हैं. हमारे यहाँ रात भर जागरण चलते हैं, रात भर जयकारें लगती हैं लेकिन सुबह होने पर फूल व् मालाएं सड़कों पर पैरों में रोंदने और सड़ने के लिए छोड़ दिए जाते हैं. अगर लंदन की टेम्स नदी इस तरह के प्रदूषणों से सुरक्षित है तो हमारे यहाँ तो ज़्यादा ज़िम्मेदारी बनती है क्योंकि हमारे यहाँ जल देवता है, गंगा ,यमुना ,व् अन्य नदियाँ अराध्य देवियाँ हैं तो इनके आंचल को मैला करना तो घोर पाप है. ढोल कोई भी बजाए, मूर्ती कहीं से भी आए, मूर्ती चाहे कितनी ऊँची हो. पुजारी कहीं से भी आएं आस्था तो वही है, वह परम शक्ति तो एक है. अब व्यापारीकरण लोगों को धर्म से दूर कर दे इसमें दो राय नहीं है.

  • 10. 11:42 IST, 29 सितम्बर 2009 Shailendra kumar sah:

    पूरब हो या पश्चिम, हमारा भारत महान है.

  • 11. 18:17 IST, 29 सितम्बर 2009 RONI KEREN:

    राजेश जी नमस्कार,
    आपने जिस प्रकार मूर्ति-विसर्जन के विषय मैं लिखा है. ये अच्छा उदाहरण है परन्तु हमारे यहाँ इन विषयों पर कोई
    अधिक ध्यान नहीं देता .हमारे यहाँ सीधे सीधे स्वर्ग जाने का रास्ता बताने वाले बहुत हैं, लेकिन कोई भी सफाई के महत्त्व तथा उस से जुड़े स्वाथ्य सम्बन्धी फायदों के वारे मैं कोई नहीं बताता,यदि हमारे धार्मिक गुरुजन तथा मीडिया सब मिलकर लोगों को ये सब सिखाएं और स्वयं उसका पालन करें तो हम लोगों को वास्तव में बहुत लाभ हो सकता है .

  • 12. 17:22 IST, 08 अक्तूबर 2009 अफ़लातून:

    मन आनन्द होलो ।

  • 13. 18:34 IST, 09 अक्तूबर 2009 रोहित कुमार हैप्पी:

    पल भर को लगा मैं स्वयं लंदन की दुर्गा-पूजा में सम्मिलित हो गया हूँ। वाह, क्या चलचित्र प्रस्तुत किया है! साधुवाद।
    "मूर्तियाँ भी कोलकाता से मँगवाई गईं थी जिनके नीचे अँगरेज़ी में लिखा था--शिल्पी, प्रशांत पाल, हाबड़ा, मोबाइल नंबर..." ....शायद, शादी डॉट कॉम के पोस्टर भी अँग्रज़ी में ही होंगे! स्वाभाविक है....पर...धार्मिक आयोजनों व साँस्कृतिक कार्यक्रमों में हमारी अपनी भारतीय भाषाएं क्यों अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं करवाती? शिल्पी का नाम अँग्रेज़ी में लिखा हो तो हुआ करे पर अपनी भाषा में भी तो हुआ करे।
    विडंबना! जिस राष्ट्र की कोई राष्ट्रभाषा ही न हो तो क्या किया करें? फिर भी...अपनी प्रांतीय भाषा ही सही...कम से कम वही हो!

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