ख़रबूज़ा सिंड्रॉम
क़रीब आठ वर्ष पहले जब हम भारत से बीबीसी लंदन में काम करने आए थे उसके बाद से वैसे तो कई बार छुट्टियाँ बिताने भारत जाना हुआ लेकिन इस बार ये मौक़ा जुलाई-अगस्त में मिला. बारिश के मौसम में बारिश को ना देखना बेहद दुखदाई अनुभव रहा लेकिन उससे भी ज़्यादा टीस ये देखकर हुई कि लोग सादा जीवन - उच्च विचार के मूल्यों को किस तरह से दिखावे और गला काट प्रतियोगिता की भेंट चढ़ाने में लगे हुए हैं.
एक दिन मैंने बड़े शौक से पीले-पके हुए दिखने वाले केले ख़रीदे लेकिन जब उनका छिलका उतारा तो छिलका ज़्यादा मोटा और छिलके के भीतर खाने वाला हिस्सा पतला भी और कच्चा भी. मेरी समझ में नहीं आया कि केला ऐसा क्यों निकला. बिल्कुल सुर्ख़ पका हुआ दिखने वाला पपीता काटा तो अंदर से कच्चा.
मैंने अपने परिजनों और मित्रों के बीच चर्चा छेड़ी तो जैसे भानुमति का पिटारा ही खुल गया. एक मित्र ने कहा कि मेरठ से लखनऊ जाते समय कभी हापुड़ की चाय या कॉफ़ी मत पीजिएगा. मेरे क्यों कहने से पहले ही वो विवरण बताते चले गए कि दरअसल सिंथेटिक दूध का चलन बहुत बढ़ गया है. ये दूध गरमी में ख़राब नहीं होता और चाय में इलायची वग़ैरा डाल देने से इसका स्वाद भी प्राकृतिक ही लगता है.
बात यहीं नहीं रुकी. चर्चा चल पड़ी कि खीरे को इंजेक्शन लगाकर पकाया जाता है और छोटा सा खीरा रात को इंजेक्शन खाकर सुबह तक बाज़ार में पहुँचाने लायक़ बन जाता है. तब पता चला कि केले और पपीते को भी इसी नुस्ख़े से पकाया जाता है. ऊपर से दिखने में तो वो बिल्कुल तैयार लेकिन अंदर से बेकार.
कुछ ने कहा कि सेब को भी इंजेक्शन के ज़रिए सुर्ख़ पकाया जाता है. सड़क किनारे बेचे जाने वाले अनार के जूस में तो रंग मिलने की बात सुनी ही नहीं बल्कि देखा भी था लेकिन साबुत फलों और सब्ज़ियों में अंदर तक मिलावट पहुँचाने की बातें ज़रूर चौंका देने वाली थीं.
अख़बारों में भी पढ़ने को मिला कि खाने-पीने के डिब्बाबंद सामान में किस हुनर के साथ मिलावट की जा रही है. सुनने में आया कि सूखी हुई रोटी जो कूड़े में फेंक दी जाती है, कुछ चक्की वाले उसे भी गेहूँ में मिलाकर पीस देते हैं.
चाय पीने का तो मुझे ज़्यादा शौक़ नहीं है, हाँ मैं जब भी कोई फल, सब्ज़ी या दूध की बनी हुई चीज़ खाता तो मन में ये शंका ज़रूर उठती कि पता नहीं, असल में मैं क्या खा रहा हूँ. मेरी समझ में अभी तक ये नहीं आ सका है कि इन धाँधलियों के लिए कौन ज़िम्मेदार है, धाँधलियाँ करने वाले, या वो अधिकारी जिन पर इस तरह की धाँधलिया रोकने की ज़िम्मेदारी है या फिर वो आम लोग जो चुपचाप इस स्थिति को नियति मानकर स्वीकार कर लेते हैं.
भारत से लौटकर इन मुद्दों पर विचार मंथन चल ही रहा था कि ब्रिटेन के एक अख़बार में छपी एक ख़बर पर नज़र पड़ी जिसमें ज़िक्र था एक ऐसे सर्वे का जो ईमानदारी के बारे में लोगों की राय जानने के लिए किया गया. इस सर्वेक्षण का मक़सद ये जानना था कि क्या समाज में ऐसे लोग अब भी मौजूद हैं जिनके लिए Honesty is the best policy है.
ब्रिटेन का तो जो भी हाल है, भारत में तो ऐसा लगने लगा है जैसेकि ईमानदारी शब्द ही कुछ दिन में ग़ायब हो जाएगा क्योंकि बेईमानी अब बुरी चीज़ नहीं बची है और बहुत से लोग 'ख़रबूज़े को देखकर ख़रबूज़ा रंग बदलता' सिंड्रॉम की चपेट में आने लगे हैं. ईमानदारी को बेवकूफ़ी समझा जाने लगा है और झूठ, छल-कपट, धोखाधड़ी, बेईमानी सभी स्मार्टनैस की निशानियाँ बन गए हैं. कहीं ऐसा ना हो कि ये ख़रबूज़ा सिंड्रॉम हमें ना घर का छोड़े, ना घाट का.

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ये मजबूरी का नाम महात्मा गाँधी की ही तरह लगता है. अगर हम सबको चिंता है तो हमें ऐसी क़िस्में विकसित करनी चाहिए जिनसे आवश्यकतानुसार फल और उपज मिल सकें. हमारे वैज्ञानिक क्या कर रहे हैं? मैं नहीं समझ पा रहा हूँ कि प्रोद्योगिकी मोर्चे पर क्या हो रहा है. किसी विदेशी पत्रिका में कोई लेख प्रकाशित कर देने या किसी पूर्व प्रकाशित विदेशी शोध को फिर से प्रकाशित कराने से समस्या का कोई हल नहीं निकलने वाला है. मैं कोई कृषि वैज्ञानिक तो नहीं हूँ लेकिन एक इंजीनियर ज़रूर हूँ और इस मुद्दे से मैं ख़ुद को जुड़ा समझता हूँ. यह मुझे ये भी याद दिलाता है कि मुझे अपने देश के लिए कुछ करना होगा.
ये भूमंडलीकरण का परिणाम है. पश्चिमी देशों, ख़ासतौर पर अमरीका से नक़ल की गई उपभोक्तावादी संस्कृति ने आध्यात्मिकता, सादगी और इंसानियत को बिल्कुल बेमानी बना दिया है. भारत में इसका चलन बहुत तेज़ी से बढ़ रहा है.
आपने बिल्कुल सटीक बात कही है. यह सचमुच एक चिंताजनक विषय है. भारत में लोग नैतिकता और मूल्यों के बारे में अब सिर्फ़ बातें ही करते हैं. नई दिल्ली रेलवे स्टेशन या हवाई अड्डे पर जाएँ, आपको ऐसे बहुत से लोग मिल जाएंगे जो आपको लूटने के लिए ताक लगाए बैठे रहते हैं. और सिर्फ़ नई दिल्ली ही क्यों, मैं जानता हूँ कि मेरे गाँव में भी बहुत से लोग दूध में यूरिया मिलाते हैं ताकि उससे दूध गाढ़ा लगे और इससे दूध में क्रीम का हिस्सा नापने वाली मशीनों को भी इससे चकमा दिया जा सकता है. यूरिया मिलाने से पहले दूध में पानी भी मिलाया जाता है. मेरा ख़याल है कि हमारे स्कूलों में नैतिक मूल्यों की अनिवार्य शिक्षा-दीक्षा दी जाए ताकि आने वाली पीढ़ियों में कुछ सुधार हो सके.
महबूब साहब, आप क़िस्मत वाले हैं कि भारत में आकर बीमार नहीं हुए नहीं तो अगर गर्मी आप को डॉक्टर ग्लूकोज़ चढ़ाने के लिए लिखता तो ग्लूकोज़ के रूप में भी पानी ही मिलता. मालिक ना करे, लेकिन अगर किसी को ग्लूकोज़ की जगह पानी चढ़ाया जाए तो क्या होगा? आपने बिल्कुल सही कहा है कि हमारे महान भारत का यही हाल हो चुका है. और हो भी क्यों ना, हर तरफ़ तो रिश्वतखोरी का बोलबाला है, ज़हरीली दवाइयों और शराब ख़ूब धड़ल्ले से बिकती हैं. बेईमानी आम हो चुकी है तो असली चीज़ कहाँ से मिलेगी. रहा सवाल सिस्टम का तो चपरासी से लेकर मंत्री तक रिश्वत नामक भगवान को पूजते हैं.
इस सारी मिलावट के पीछे वे लोग हैं जो गाँव से निकलकर या अपने परिवारों से दूर शहरों में आकर रह रहे हैं और जल्दी से जल्दी धनवान बनने की चाहत में सब कुछ कर रहे हैं. इनके ऊपर किसी भी नैतिकता का दवाब नहीं है क्योंकि ये लोग परिवारों से दूर हैं. सभी लोग करोड़पति बनने की दौड में आ गए है, चाहे वे नौकरशाह हो या राजनेता. इसलिए नैतिकता का पाठ तो इन्हें नहीं पढ़ाया जा सकता, बस अब तो जनता ही जागरूक बने और इन पर लगाम कसे तो शायद कोई बदलाव हो.
हम इतनी सारी समस्याओं का सामना इसलिए कर रहे हैं क्योंकि हमारे देश में अब कोई फ़क़ीर नहीं बचा है जो छह महान पापों यानी वासना, लालच, क्रोध, ईर्ष्या, घमंड और पक्षपात से अछूते हों. भगवद गीता कहती है कि ये पाप इंसान को नरक की तरफ़ ले जाते हैं. कोई सा भी वाद हो यानी समाजवाद, पूंजीवाद या फिर साम्यवाद, ये सभी बेकार हैं क्योंकि इनमें वैराग्य और भक्ति नहीं है. इसलिए यह कहना व्यर्थ है कि कुछ नए वादों या विचारधाओं को लागू करके समाज को सुधारा जा सकता है. इसके लिए उन साधू-संतों की पुकार को सुनना होगा जिसने मानवता को हमेशा ही सीधा रास्ता दिखाया है. अगर हम देखें तो पाते हैं कि तमाम समस्याएं इसलिए पैदा हुई हैं क्योंकि हम एक समाज के रूप में और एक व्यक्ति के रूप में बुरी तरह लालच और वासना से भरे हुए हैं. ऐसा लगता है कि हर कोई अपने और सिर्फ़ अपने बारे में सोचने लगा है इसीलिए चाहे वो उद्योग जगत हो, सरकरा या फिर व्यक्ति, सभी सत्ता के भूखे नज़र आने लगे हैं. अमरीका से लेकर चीन तक सभी अपना नियंत्रण बढ़ाने में चूहा दौड़ में लगे हुए हैं. समाज में भौतिक चीज़ों से कोई लगाव रखने वाले साधू-संतों का ख़ात्म हो चुका है और हम सभी वासना, लालच और क्रोध की मूर्तियाँ बन चुके हैं.
ख़ान साहब मुझे तो इस बात की बहुत ख़ुशी हुई कि इस सिंड्रोम के टोकरे में ब्रिटेन जैसा जेंटलमेन की छवि वाला देश भी विराजमान है. नाहक ही हर मसले पर हम लोग अपने देश को कोसते रहते हैं. दरअसल फल, सब्ज़ियाँ, चाय तो बाद की बातें हैं सुबह उठते ही आम देशवासी दूषित पानी पीकर विभिन्न प्रकार के रसायनों युक्त दंत पेस्ट ,दंत मंजन मुहं में डालते ही मिलावटी ज़हरों को अपने शरीर में पहुंचाने का शुभ कार्य कर लेते हैं. ख़ान साहब, मैं भी इसमें शामिल हूँ जबकि आवास के आगे - पीछे कितने ही नीम के पेड़ हैं. आज बाज़ार में आनाज, पानी, फल ,सब्जियाँ, दालें, तिलहन, तेल- घी, मसाले, दूध, औषधियाँ, चाय, गुड़-शक्कर, मिठाईयाँ, पनीर, सौन्दर्य प्रसाधन, डिटर्जेंट, साबुन, विभिन्न प्रकार के पेय पदार्थ और तो और रोगियों की जान बचाने वाला रक्त सब मिलावटी है. यह सूची यहीं ख़त्म नहीं होती है. मिलावट के धंधे में शामिल लोगों को मालामाल करने का सेहरा हमारी सरकार के सर पर ही बांधा जाएगा. सैंया भए कोतवाल तो डर कहे का. क्यों औषधियां व रसायन सरेआम बेचने की छूट दी गई है. आज किसी भी गली में केमिस्ट की दूकान पर कोई भी बिना डॉक्टर के पर्चे के दवाई ख़रीद सकता है. जब तक ओक्सिटोसिन का इंजेक्शन खुलेआम बिकता रहेगा तब तक लौकी ,खीरे, कद्दू, व अन्य सब्जियां ऐसे ही रातों रात वक्त से पहले ही हमारे पेट में जाते रहेगें व दूध उतारने के लिए यह इंजेक्शन मवेशियों की चमड़ी को भेदते रहेगें. वास्तव में यह मिलावट का खेल हमारे सरकारी तंत्र की लापरवाही व ढुलमुल रवैये का परिणाम है. देखने में यह भी आया है कि सिर्फ़ महानगरों में कुछ औषधियों की दूकानें मिलेंगी जो बिना चिकित्सक के नुस्ख़े के दवाईयां नहीं बेचतीं हैं लेकिन देश के अन्य हिस्सों व आसपास नियमों की सरेआम धज्जियां उडाई जाती हैं. इस धंधे में लिप्त लोग छोटे से छोटा व्यापारी व बड़ा से बड़ा उद्यमी शामिल है. यह लोग बेख़ौफ़ अपना धंधा चमकाकर तिजोरियां भर रहे हैं व इसमें किसी एक का फायदा तो है नहीं. स्वास्थ विभाग, खाद्य निरीक्षण विभाग, खाद्य व औषधि नियंत्रण विभाग इतना निर्बल, बेबस व इतना लाचार आख़िर क्यों है? कब इनको अपनी शक्तियों व ज़िम्मेदारियों का अहसास होगा. आख़िर इन गोरखधंधों को कुकुरमुत्ते की तरह फैलने ही क्यों दिया जाता है. इनको जड़ से तब तक ख़त्म नहीं किया जा सकता जब तक कि लचर कानून व्यवस्थाओं पर लगाम ना लगाई जाए, सरकारी तंत्र आँखें मूंदकर बैठे रहने की बजाय इस समस्या की तरफ़ सकारात्मक क़दम उठाए. हमारे यहाँ किसी भी चीज़ का चलन आदत बन जाता है. मुझे इस बुराई में अच्छाई यह दिखती है कि बेचारा ग़रीब आदमी दूषित, मिलावटी खाद्य सामग्री इस्तेमाल करने से रोग रोधक प्रणाली पर विजय पाकर इस दुःख- सुख के मायाजाल से जल्दी ही छुटकारा पा लेता है. नक़ली सामानों में खाद्य पदार्थ ही नहीं बल्कि इलेक्ट्रॉनिक सामान, कपडे, नक़ली नोट, नकली रिश्तेदार, सब कुछ नक़ली कहलाने योग्य उपलब्ध है. मिलावटी व दूषित सामग्री दुनिया के सामने परोसकर कैसे समाज का सृजन करने जा रहे हैं ऐसा करने वाले लोग. ज़रा रात को सोने से पहले अपने बाल-बच्चों, परिवार के बारे में सोचकर तो देखें क्योंकि वे भी तो इसी समाज के अंग हैं. पश्चिम की छींकों से हमारे यहाँ ज़ुकाम होना कोई नई बात नहीं है. सच्चे साधू-संत समाज के सामने आएँ और अपने धन्ना सेठ चेलों को अनुचित धंधों से तौबा करने की शिक्षा दें और न ही ऐसे लोगों से किसी प्रकार का दान न लें और न ऐसे लोगों को दीक्षित करें जो ग़लत कार्यों में लिप्त हैं.
इस सिंड्रॉम के पैदा होने और फैलने के लिए हमारा चरित्र ही ज़िम्मेदार है.
महबूब साहब आपने यह लेख पूरी ईमानदारी और सच्चाई के साथ लिखा है. मेरी दुआ है कि बेईमान राजनेत और नौकरशाह इस लेख को ज़रूर पढ़ें और देश की कुछ सेवा करने की सीख लें. अगर हर आदमी, नेता और अधिकारी अपना काम ईमानदारी के साथ करें तो इस तरह की धांधलियाँ होंगी ही नहीं लेकिन तकलीफ़ की बात ये है कि ईमानदारी अब सिर्फ़ किताबों तक ही सीमित रह गई है. फिर भी यह लेख लिखने के लिए मैं आपका शुक्रगुज़ार हूँ क्योंकि लोगों को इन बुराइयों के प्रति सचेत करना भी तो हम सबका कर्तव्य है.
खान साहब आठ साल में तो हिन्दोस्तान में काफी तब्दीली आई है. IT के अलावा हर क्षेत्र में गिरावट देखी जा सकती हैं. चाहे वो खान पान के चीज़ों में मिलावट हो या फिर बात चीत का तरीका हो. इसके लिए वैश्वीकरण को दोष देना बेमानी है. दर-अ-सल हमारे अन्दर सिविक सेंस के कमी है.
देखने में तो यह एक आम बात लगती है लेकिन अगर हम ज़रा गंभीरता के सोचे तो हमें हिंदी सिनेमा की गीत "देख तेरे इन्सान की हालत क्या हो गई भगवन कितना बदाल गया इन्सान" की याद ताजा हो जाती है.
आज लोग चंद रुपयों के लिए अपने इमान को बेचने को तैयार है.अजी आप तो फल, सब्ज़ी या दूध चीज़ की बात कर रहे है. कल हमने सुना कि सड़े टमाटर से चटनी बना के बाजार मैं बैची जा रही है.यह माना जाता है की एक देशा का विकास उसके निवासियो पर निर्भर करता है तो भला सोचिये मिलावटी सामानों को खाके हमारे राष्ट्र का क्या होगा .मेरा मानना है की इन समस्या का निजाद हमारी सरकार नही कर सकती उसके लिए प्रतेक नागरिक को सोचना होगा.
ये असर दरअसल बढ़ती आर्थिक प्रतिस्पर्धा का है. अब हर कोई रातों रात करोड़पति बनना चाहता है. इसके लिए हमारी नीतियाँ भी ज़िम्मेदार हैं, जैसे दूध का भाव 20 रुपए प्रति लीटर है, जबकि एक लीटर दूध की लागत 45 रुपए प्रति लीटर है. ऐसे ही अनाज का भाव भी तर्कसंगत नहीं है. आज क्वालिटी की बात छोड़ लोगों को पेट भर जाए, इसलिए मात्रा की बात ज़्यादा हो रही है. हमारे यहाँ सब चलता है के प्रति लोग धीरे-धीरे अभ्यस्त हो गए हैं. ये मुर्दों का देश है, यहाँ कुछ नहीं बदलेगा. बदलने की कोशिश करोगे तो पागल करार दे दिए जाओगे. क्या हुआ ऐसे लोगों का जैसे- टीएन शेषन. कई ईमानदार लोग आज पर्दे के पीछे ग़ुमनाम ज़िंदगी जी रहे हैं. इसलिए हमारे देश के लोगों का जमीर जगाने की कोशिश न करें. ये देश अब रसातल की ओर जा रहा है. इसे जाने दीजिए. समय आने पर अपने आप प्रकृति कर देगी.
हम ही इसके लिए ज़िम्मेदार हैं. दूसरों को इसका दोष क्यों दें. जब हम अपनी सरकार चुनते हैं. यही सरकार नीतियाँ बनाती है और देश की सामाजिक-आर्थिक स्थिति पर नियंत्रण रखती है.
हम एक अजीब-से समय में जी रहे हैं. अपने देश के महान अतीत और उससे भी महान आदर्शों की बात करते हुए उससे नितांत विपरीत व्यवहार करते हुए ज़रा भी लज्जित नहीं होते हैं. ईमानदारी सिर्फ शब्दकोश तक सिमट कर रह गई है. सादगी भी, सच्चाई भी,और ऐसी ही तमाम चीज़ें और भावनाएं. अपने नैतिक पतन के लिए हमारे पास तर्कों की भी कोई कमी नहीं है. कभी हम पश्चिम को तो कभी पूंजीवाद को तो कभी भूमण्डलीकरण को ज़िम्मेदार ठहरा कर अपने अपराध बोध को कम करने का प्रयास कर लेते हैं. मैं तो बहुत निराश होता हूं जब भविष्य की कल्पना करता हूं. स्थिति में किसी सुधार की कोई उम्मीद मुझे तो दूर-दूर तक नज़र नहीं आती है.
ख़ान साहब, मिलावट की समस्या भारत में सदियों पुरानी है. यह कोई नई बात नहीं है. बस पहले मीडिया इनता प्रो-ऐक्टिव नहीं था इसलिए पता नहीं चल पाता था. हाँ यह बात ज़रूर है कि मिलावट की तकनीक में भी सुधार हुआ है. रही बात ये कि इसके लिए ज़िम्मेदार कौन है तो ज़ाहिर है यह सरकार की ही ज़िम्मेदारी है. ये बात अलग है कि सरकार नाकारा और नेता दलाल हैं.
बहुत अच्छा लिखा है. इस से मुझे अपने एक पाकिस्तानी दोस्त के साथ हुई बातचीत याद आ गई जब मैंने उनसे पाकिस्तान में देसी घी के बारे में पूछा था. उन्होंने कहा कि वहाँ देसी घी ख़रीदना असंभव है. गाँवों में बस कुछ ही लोग इसे बनाते हैं. दोनों देशों में बहुत ज़्यादा फ़र्क़ नहीं है. हम दोनों ही खेतीबाड़ी की सहज और सरल ज़िंदगी जीने वाले लोग हैं. जहाँ तक समाधान की बात है तो यह तो भगवान की इच्छा से ही हो सकता है.
अरे साहब, इसमें किसी एक का दोष नहीं है. "कुपाही में यहाँ भांग पड़ी है." हर किसी को बस अपना भला सूझ रहा है. बचपन में एक कहानी सुनी थी. एक आदमी को वरदान मिला कि वो अगर एक चीज़ मांगेगा तो पड़ोसी को दो चीज़ें मिल जाएंगी. ईर्ष्या में उसने अपनी एक आँख फुड़वा ली ताकि पड़ोसी की दोनं आँखें फूट जाएँ. यही हाल है आज के भारत का. हर किसी को सिर्फ़ अपनी ही पड़ी है. कोई भी दूसरों के बारे में सोचने की ज़हमत नहीं उठाना चाहता. मिलावट का ये कारोबार दूध से लेकर ख़ून तक फैला हुआ है. स्वार्थ और लालच ने लोगों को विवेकहीन बना दिया है. इस मिलावट की ही देन है कि रोज़ नई-नई बीमारियाँ सामने आ रही हैं. बच्चों को छोटी उमर में चश्मे लग रहे हैं. दरअसल लोगों ने 'हैल्थ इस वैल्थ' की बजाय वैल्थ का फ़ंडा अपना लिया है. भूख, भय और भ्रष्टाचार के निरंतर गहराते दलदल से निकलने को हम जितना छटपटाते हैं, और गहरे धँसते चले जाते हैं. वास्तव में ज़रूरत सिर्फ़ हंगामा खड़ा करने की नहीं बल्कि सूरत बदलने की कोशिशों को अंजाम देने की है.
आपने बिल्कुल सही बात कही है. आजकल लोगों में ईमानदारी बिल्कुल बची ही नहीं है और मेरा ख़याल है कि इसके लिए भ्रष्ट समाज ज़िम्मेदार है. आज के दौर में हम भ्रष्ट लोगों को कुछ बुरा नहीं समझते बल्कि हम उन्हें सफल व्यक्ति के रूप में देखते हैं. दूसरी तरफ़ ईमानदार व्यक्ति को हर जगह तमाम परेशानियों का सामना करना पड़ता है. इसलिए जब तक हम अपने नज़रिए को नहीं बदलेंगे, कुछ भी नहीं बदलने वाला है.
श्री कबीर जी ने कहा था---
चलती चक्की देख कर दिया कबीरा रोए,
दो पाटन के बीच में साबुत बचा न कोए.
आज के संदर्भ में ---
चलती चक्की देखकर
रोता नहीं कबीर,
दो पाटन के बीच में
केवल पिसे ग़रीब.
मैं भी इन सब मिलावटों की पोल अपने हिंदी ब्लाग मीडिया डाक्टर पर खोलता रहता हूं ---- मैं लिख लिख कर थक गया हूं लेकिन ये मिलावट करने वाले पता नहीं इतने हार्ड-कोर किस्म के कैसे हैं!!
आपने अपनी पोस्ट में लिखा है --- मेरी समझ में अभी तक ये नहीं आ सका है कि इन धाँधलियों के लिए कौन ज़िम्मेदार है, धाँधलियाँ करने वाले, या वो अधिकारी जिन पर इस तरह की धाँधलिया रोकने की ज़िम्मेदारी है या फिर वो आम लोग जो चुपचाप इस स्थिति को नियति मानकर स्वीकार कर लेते हैं
मेरे विचार में सब के सब जिम्मेवार हैं।
जब आपने अपनी पोस्ट में honesty के बारे में लिखा तो आपने शुरू ही में यह कहा कि ब्रिटेन का तो जो भी हाल है -----अगर हो सके तो इस का खुलासा करियेगा क्योंकि मैं आप की लिखी इस पंक्ति पर अटक गया था।