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भ्रष्टाचार का दर्द

राजेश प्रियदर्शीराजेश प्रियदर्शी|रविवार, 20 सितम्बर 2009, 12:28 IST

भारत के भ्रष्टाचार पर जलवायु परिवर्तन की ही तरह अकादमिक चर्चा होती है. कोई अति-उत्साही सुझाव देता है- 'चीन की तरह मौत की सज़ा होनी चाहिए'...फिर अति-व्यावहारिक सुझाव- 'रिश्वत का रेट फ़िक्स होना चाहिए...'

अकादमिक यानी हमारा कोई 'लेना-देना' नहीं है, 'हम तो देश भविष्य के लिए चिंतित हैं'. भ्रष्टाचार पर चर्चा में हमारा अपना आचरण कितना 'भ्रष्ट' है इसका एहसास न होना एक बड़ी समस्या है.

संयोगवश 'लेने' लायक़ हालत मेरी कभी नहीं रही, लेकिन 'देने' का दर्द भूला नहीं हूँ, इसमें 'देने' से मना न कर पाने की ग्लानि भी शामिल है, यानी मैं नहीं कह सकता कि मेरा कोई 'लेना-देना' नहीं है.

भ्रष्टाचार लोकाचार है, ये एहसास पहली बार 21 साल की उम्र में हुआ जब नए बने मकान में पानी का कनेक्शन जुड़वाने के लिए अपने हाथों से घूस दी, अपने उबलते ख़ून से ज्यादा परवाह पीने के पानी की थी. उसूलों की लड़ाई में नया घर करबला बन सकता था.

देशभक्त लोगों को यह जानकर थोड़ा एक्स्ट्रा दुख होगा कि वह तारीख़ थी--पंद्रह अगस्त.

अक्सर सोचता हूँ कि भ्रष्टाचार को लेकर भारतीय लोग इतने सहनशील क्यों हैं? क्यों ऐसा होता है कि टेलीफ़ोन घोटाले में पकड़ा गया नेता टेलीफ़ोन चुनाव चिन्ह के साथ चुनाव लड़कर भारी बहुमत से जीत जाता है.

बचपन में हमें सिखाया जाता था-- 'जो मिल-बाँट खाए, गंगा नहाए'... कहीं ये उसका असर तो नहीं? रोटी के आटे में से कुछ मछलियों के लिए, एक रोटी गाय के लिए, एक रोटी कुत्ते के लिए, एक कौव्वे के लिए...यानी सबका थोड़ा-थोड़ा हिस्सा.

कहीं भ्रष्टाचार को 'सर्वजन सुखाय' की तरह देखने की हमारी आदत तो नहीं. थोड़ी-सी तकलीफ़ सिर्फ़ तब होती है जब 'देना' पड़ता है (बिल्कुल दहेज की तरह) वर्ना यह भी एक व्यवस्था है जिसे कोई अकेले नहीं बदल सकता, और यहाँ आकर महान लोकतंत्र के सभी नागरिक अकेले हो जाते हैं.

भ्रष्टाचार ख़त्म करने के नारे कभी-कभी लगते हैं लेकिन कोई नहीं सोचता कि अगर सदाचार आ गया तो क्या होगा, इसलिए नहीं सोचता क्योंकि ऐसा होने का यक़ीन किसी को नहीं है, लेते हुए पकड़े जाएँगे तो देके छूट जाएँगे, इस बात का पूरा यक़ीन है.

मेरे ही न जाने कितने दोस्त-रिश्तेदार उसी के सहारे अपना घर चला रहे हैं. सरकारी और प्राइवेट की तरह यह रोज़गार देने वाला तीसरा बड़ा सेक्टर है, हर दफ़्तर में जितने कर्मचारी नियुक्त होते हैं वे अपने तीन-चार एजेंट तैनात करते हैं, ये एजेंट कभी एप्लायमेंट एक्सचेंज नहीं जाते, बेरोज़गारी के आंकड़े में वे शामिल नहीं हैं, उनका घर भी चलता रहता है, आपका काम भी हो ही जाता है.

भ्रष्टाचार से बहुत दुखी होकर एक बार मैं अपने एक अनुभवी और व्यावहारिक मित्र के पास गया. उन्होंने कहा, "तो दे दो न, इतना परेशान क्यों हो रहे हो, दोगे भी और ऊपर से परेशान भी हो".

मेरा मन नहीं माना तो उन्होंने मुझे शांत करने के लिए वही कहा जो गौतम बुद्ध ने पुत्रशोक में विह्वल महिला से कहा था. 'ऐसे घर से एक मुट्ठी चावल ले आ आओ जहाँ कभी कोई न मरा हो...' वे बोले, "मुझे एक ऐसे आदमी से मिलवा दो जिसने घूस न ली हो, न दी हो."

मैंने अपना बता दिया, आप अपने दिल पर हाथ रखकर बताइए. वैसे विश्वास करना ज़रा मुश्किल है.
भ्रष्टाचार को ख़त्म करने के बारे में सुझाव देते रहिए, उनका हमेशा स्वागत है.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 18:52 IST, 20 सितम्बर 2009 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:

    राजेश जी, बहुत सुंदर लिखा है आपने. छोटे से लेख में पूरे भारत के भ्रष्टाचार को समझा दिया. यही हक़ीक़त भी है लेकिन आपने जिस ईमानदारी से रिश्वत की को लिखा वह तारीफ़ के क़ाबिल है. ( मेरा भारत महान, जिसमें नहीं कोई ईमान). आज रिश्वत लेना अपना अधिकार समझते हैं जैसे मासिक वेतन लेते हैं वैसे ही. इस देश का क्या होगा इसे भगवान ही जानता है.

  • 2. 19:41 IST, 20 सितम्बर 2009 Rabindra Chauhan,Tezpur,Assam:

    आज के समय में कोई कहे कि उसने घूस लिया या दिया नहीं है, तो यह मुश्किल ही नहीं नामुमकिन बात है. क्या बताऊँ राजेश जी, अबी महीने भर पहले एक एफ़िडेविट बनवाना था, कोर्ट से बीस रूपए का स्टैम्प पेपर खरीदने गया तो उसने 60 रुपए लिए और साथ में हिदायत दी कि सारे काम एक ख़ास टाइपिस्ट से कराना वर्ना महंगा पड़ेगा. इसके बाद टाइपिस्ट ने 100 रुपए चाय-पानी के लिए और ये कहा कि वो सब लोगों के हस्ताक्षर ख़ुद ही कराके ला देगा. मैंने मना किया तो उस टाइपिस्ट गुस्सा हो गया और उसने सारे वकीलों से कहा कि कोर्ट में कोई महात्मा गांधी आ गया और उसे यहाँ का तरीका सिखाने की ज़रूरत है इसके बाद सारे वकील साइन करने का 200-250 रुपया माँगने लगे. अंत में मैंने अपनी भूल के लिए सॉरी कहा और उसी से काम करवाया. इस तरह एक मामूली से काम के लिए पूरे 360 रुपए ख़र्च हुए.

  • 3. 19:43 IST, 20 सितम्बर 2009 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:

    वाह राजेश जी वाह. आपको रिश्वत लेने का दुख नहीं क्योंकि आपका कोई ऐसा काम नहीं पड़ा है लेकिन मैं आपकी इस बात से सहमत नहीं. कारण आपके इस पत्रकारिता में तो सरे बाज़ार रिश्वत लेने का प्रचलन है. जनाब बस लेने वाले में कला होनी चाहिए. आपको रिश्वत देने का दुख है वो भी ग़लत है आपका दुख. क्योंकि मेरे महान भारत में आप ऐसा नहीं करेंगे तो आज कर शायद आपका घर बिना पानी के ही होता. आप बस रिश्वत के भगवान को भोग चढ़ाएँ तो आपके घर में पानी किसी भी समय आ जाए. यही तो रिश्वत का कमाल है.

  • 4. 21:51 IST, 20 सितम्बर 2009 Girish Chandra Newalia:

    आपने जो विषय उठाया है वह बहुत महत्वपूर्ण है. मुझे अपनी कविता याद आती है-हार गया हे देव मुझको माफ़ करना, पास से बादल गुज़र रहे थे...थी आवश्यकता नीर की, आँख मूंद कर बंद कर हाथ कब तक रहता...
    जब मैंने अपने एक निकट संबंधी को किसी ग्राहक को टेंडर दिलवाने के बाद उपहार स्वीकार करते देखा. मुझे यह भी याद है कि मैं अपनी बहन का दाख़िला कराने गया और जब नहीं हुआ तो बाहर किस तरह एजेंट दाख़िले की गारंटी दे रहे थे. यह समस्या कहीं न कहीं हमारी शिक्षा व्यवस्था से जुड़ी है. और यह हर जगह प्रचलित है. मैंने आयकर के उच्चाधिकारियों को रिश्वत लेते देखा है और आप अकसर देखते हैं पुलिस वालों को बिना हेल्मेट के और इसी अपराध में और लोगों का चालान काटते हुए भी.


  • 5. 22:11 IST, 20 सितम्बर 2009 Deepak Tiwari:

    कोई पचास साल पहले एक भारतीय नेता ने कहा था, भ्रष्टाचार एक विश्वव्यापी समस्या है. और आज पचास साल में भ्रष्टाचार जैसी विकास दर किसी की नहीं रही. कुछ लोगों ने इसे और सहज बनाने के लिए सुविधा शुल्क और डोनेशन का भी नाम दिया है. यह एक ऐसा पेड़ है जिसकी जड़ें ऊपर की ओर हैं और शाखाएँ नीचे. हम इतने आदी हो गए हैं कि भ्रष्टाचार का ख़ात्मा असंभव लगता है.

  • 6. 22:15 IST, 20 सितम्बर 2009 vishal:

    राजेश जी आप बहुत अच्छा लिखते हैं. .बहुत सारे लोग विदेश में रहते हैं और सिर्फ़ भ्रष्टाचार के डर से भारत नहीं जाते हैं. अस्पताल, बाजार, मंत्री-संतरी हर जगह रिश्वत का बोलबाला है. मेरी सलाह है कि लोगों को वही करना चाहिए जो अनिल कपूर ने काला बाज़ार में किया था.

  • 7. 23:37 IST, 20 सितम्बर 2009 H S GUPTA:

    जब तक किसी मंत्री को सरेआम चौराहे पर रिश्वत लेने पर गोली नहीं मारी जाएगी, सिलसिला ख़त्म नहीं होगा. वैसे अगर मंत्री से संतरी तक हर कोई रिश्वत लेते पकड़ा जाए तो तीन साल तक ज़मानत ना होने का क़ानून पास होना चाहिए. तब देखिएगा भ्रष्टाचार कितनी जल्दी मिट जाता है.

  • 8. 00:57 IST, 21 सितम्बर 2009 vivek kumar pandey,hyderabad,india:

    राजेश जी, भ्रष्टाचार का संबंध हमारे सिस्टम से है और हमारे सिस्टम का संबंध हमारी सोच से है. सोच को भी बदलना होगा. लेकिन कैसे. सोच कोई एक दिन में बनाने और बदलने वाली वस्तु तो नहीं है. तो फिर क्या कर सकते हैं? यह भ्रष्टाचार तो दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की कर रहा है और ऐसे ही चलता रहा तो ये हमारे जीन में भी आ सकता है. मुझे लगता है कि सोच को देश में समानता लाकर बदला जा सकता है. पश्चिमी देशों में भ्रष्टाचार कम है क्योंकि वहाँ असमानता भी कम है.

  • 9. 02:58 IST, 21 सितम्बर 2009 asha:

    अगर सभी अपना काम ईमानदारी से करें तो भ्रष्टाचार को ख़त्म करना संभव हो सकता है.

  • 10. 07:02 IST, 21 सितम्बर 2009 Amit:

    आपके लेख पर मुझे राजेश खन्ना की एक फ़िल्म का गाना याद आता है..
    जिसने पाप ना किया हो वो पापी ना हो
    इस तर्ज पर मैं कहता हूँ- जिसने लेन-देन ना किया हो और भ्रष्ट न हो

  • 11. 09:21 IST, 21 सितम्बर 2009 AVINASH CHANDRA:

    भारत में भ्रष्टाचार आज की बात नहीं है. यह अब ऑक्सीजन की तरह हवा मे घुला हुआ है, यह हमें अपनी पिछली पीढ़ी से तोहफ़े में मिला है. यह मान लेना ठीक नहीं है कि भ्रष्टाचार हमारी नियती है, अगर हम सोचते हैं कि कोई एक मसीहा आएगा और भ्रष्टाचार से हमें मुक्ति दिला देगा तो ऐसा संभव नहीं है. अगर हम ये सोचते हैं कि कानून इस वायरस से निजात दिला देना तो भी ऐसा नहीं होने वाला है. सबसे पहले हमें अपने आप में सुधार करना होगा तभी कोई परिवर्तन आएगा,

  • 12. 10:05 IST, 21 सितम्बर 2009 भावेश :

    आज देश में भ्रष्टाचार ठीक उसी तरह व्याप्त है जैसे की इंसान की रगों में दौड़ता हुआ खून. लोकतंत्र के चार खंभे अफसरशाही, न्यायपालिका, संसद और पत्रकारिता सभी पूरी तरह भ्रष्टाचार की गिरफ्त में है. आज अदालत में जज को पैसे खिला कर गलत फैसले को सही करवा देना जुर्म नहीं माना जाता लेकिन अदालत में भ्रष्टाचार व्याप्त ये कहने से अदालत की तौहीन हो जाती है. भ्रष्टाचार के इस कैंसर से बहार आने के लिए पूरी एक पीढी को शिक्षित बनाना होगा और कानूनों की हथकडियों को कडा करना होगा. आय से अधिक सम्पति होने वाले सभी भ्रष्टाचारियों को फांसी न सही पर उनकी पूरी सम्पति कुर्क करनी चाहिए और उन्हें भविष्य में कभी किसी सरकारी ओहदे पर न बैठने दिया जाना चाहिए. आज लोग ही नहीं उनकी मानसिकता भी भ्रष्ट हो गई है और इसका नतीजा ये हो गया है की देश के सर्वोच्च स्थानों पर अपराधियों की तूती बोलती है और आम आदमी देश के राष्ट्रपिता गाँधी का बन्दर बन कर रह गया है, जो ईमानदारी से कुछ भी सच कहने, करने, देखने या सुनने को आजाद नहीं है.

  • 13. 12:18 IST, 21 सितम्बर 2009 योगेन्द्र सिंह शेखावत:

    राजेश जी, आपको क्या लगता है क्या सहनशीलता सिर्फ भ्रष्टाचार तक ही सीमित है. मेरे हिसाब से असली जड़ है कि हम वाकई में कायर हैं, नपुंसक हैं, तो किसी भी क्षेत्र की बात कर लीजिए आक्रामक रवैया तो हमारा कभी रहा ही नहीं. कहना तो नहीं चाहिए पर वास्तविकता तो यही है कि पिछले 1000 साल की गुलामी को ढोने के बाद हम लोग अत्यधिक डरपोक और कायर बन चुके हैं और इस सच्चाई को हम हमारे झूठे अंहकार के कारण स्वीकार भी नहीं करते. हम बातों के शूरवीर हैं लेकिन मुक़ाबलों की बात आए तो जीरो हैं. दो-चार मुक़ाबलों में जीत भी गए तो फिर उनका प्रचार शुरू. हम हमेशा अपने महान अतीत की चर्चा में ही डूबे रहते हैं और वर्तमान? उसका क्या, वो तो जब सपनों से जागेंगे तब दिखेगा न.

  • 14. 12:35 IST, 21 सितम्बर 2009 योगेन्द्र सिंह शेखावत:

    राजेश जी, चे ग्वेरा भारत में जन्म नहीं ले सकता. कभी सुभाष चंद्र बोस ने एक प्रयास जरूर किया था लेकिन अब उस बात पर चर्चा करना बेकार है, क्योंकि हम तो सिर्फ गांधीगिरी कर सकते हैं. भाई साहब या मदिर में जाकर भगवान के सामने या अमरीका के सामने जाकर गुहार लगा सकते हैं. अपना हक़ न मिले तो संतोष कर लेंगे कि ऊपर वाला देख लेगा, हक़ न मिले तो छीनकर हासिल कर लेना हमारे बस की बात नहीं. और जो थोड़े बाहुबली लोग इन बातों को समझते हैं वो नेता या गुंडे बन कर आराम का जीवन जीते हैं, मुझे तो उनसे ज्यादा आम जनता की ही गलती ही दिखती है. आप तो लगता है फालतू ही परेशान हो रहे हैं, आप अंधों के देश में आईना लेकर निकल गए हैं. आपने वो उक्ति नहीं पढ़ी 'वीर भोग्य वसुंधरा', या 'समरथ को नहीं दोष गुंसाईं',

  • 15. 15:22 IST, 21 सितम्बर 2009 manju:

    अब तो हम भ्रष्टाचार के इतने आदी हो गए हैं कि लगता ही नहीं है कि ये अपराध है. अगर ये अपराध होता तो बहुत से राजनेता, नौकरशाह, सरकारी कर्मचारी और निजी क्षेत्र के भी बहुत से लोग जेल में होते. लेकिन हमारे देश में तो इन्हें दंडित करने के बजाय महिमामंडित किया जाता है.

  • 16. 18:50 IST, 21 सितम्बर 2009 mk, maharashtra:

    अगर कोई नेता या अफसर थोड़ी-बहुत ईमानदारी से काम करता है तो हमारे यहाँ गांवों मे उसके बारे मे कहते है कि उसे बिल्कुल कमाना नहीं आता, वह पागल है. और इतना ही नहीं, दूसरे किसी नेता या अफसर ने कितने सालों में कितना कमाया है, इसका विवरण्‍ा भी देते हैं. भ्रष्टाचार को जनता ने ही शिष्टाचार बनाया है. हो सकता है कि यह हमारी महान संस्कृति की देन हो जिसकी पूरी दुनिया चर्चा करती है.
    यहाँ ग्रामीण्‍ा इलाके में किसी के दो रुपये अगर खो जाते हैं तो वह सोता नहीं है, खाता नहीं है. लेकिन भ्रष्टाचार में लिप्त करोड़ों रुपयों के बारे में उसे कोई परेशानी महसूस नहीं होती बल्कि आनंद मिलता है. क्योंकि उसे यह मालूम ही नहीं होता कि वह पैसा किसका है. उसे यह सब कुछ समझाने की कोई कोशिश भी नहीं करता. यह सिर्फ़ अनपढ़ लोगों के बारे में नहीं है, बल्कि यह मानसिकता बहुत पढ़े-लिखे नौजवानों की भी है. अब सोचिए देश्‍ा का भविष्य क्या होगा?

  • 17. 21:13 IST, 21 सितम्बर 2009 himmat singh bhati:

    भारत में इस परंपरा की नींव डाली जा चुकी है कि किसी भी सरकारी काम में बिना भेंट के कोई काम नहीं होता, कोई बिना पैसों के काम कराना चाहता है तो उनके पास समय होना चाहिए और नाटकीय धरने का साहस होना चाहिए.

  • 18. 09:30 IST, 22 सितम्बर 2009 BALWANT SINGH , HOSHIARPUR PUNJAB :

    राजेश जी इस विषय पर जितनी चर्चा की जाए उतनी कम है. बेशक भ्रष्टाचार का भूमंडलीकरण हो चुका है, लेकिन इस कैंसर ने जिस प्रकार से हमारे देश को जकड़ रखा है. वह अति चिंता का विषय है. पहली बार रिश्वत का सामना उस समय हुआ जब प्राथमिक पाठशाला के मास्टर जी ने गुरुदक्षिणा के बहाने दूध उनके घर न पहुंचाने पर नाहक ही कान मरोड़ दिए. लेकिन यह बात उस समय बचपन में समझ नहीं आई थी. अब रिश्वत और भ्रष्टाचार का नंगा नाच तब देखा जब कुछ माह पहले तेल क्षेत्र के कर्मचारियों द्वारा वेतनमानों के संदर्भ में हड़ताल बुलाई गई थी. उस समय हमारे देश के नामी समाचार चैनल जो कि सुबह -शाम ईमानदारी, निष्ठा हर क़दम आपके साथ, सबसे आगे आपको रखने, सिर्फ़ सच दिखाने, सबसे आगे और न जाने क्या-क्या वादे करते नज़र आते हैं. लेकिन आपको जानकार हैरानी होगी कि इन्हीं चैनलों में से कुछ ने सही समाचार चलाने के एवज़ में करोड़ों रुपयों की मांग की जो कि कर्मचारियों के बूते के बहार था. हुआ वही जो होना था, इन्हीं चैनलों ने तर्कहीन, तथ्यहीन, अधूरी जानकारी वाले समाचार चलाकर तेल क्षेत्र कर्मचारियों को देशद्रोही और न जाने क्या-क्या अलंकार देकर सारे देश में बदनाम किया. और यह क्यों किया, किसके कहने पर किया यह जगजाहिर है. राजेश जी, भ्रष्टाचार, रिश्वत एक अच्छा-ख़ासा बहुराष्ट्रीय बाज़ार है हम सब लोग इसका हिस्सा है. भले ही हम लोग कितने ही बड़े-बड़े वादे करें, क़समें खाएं, क्योंकि ईमानदारी, सच्चाई का दिखावा करना हमारा मूल अधिकार बन चुका है. मेरे विचार में सर्वप्रथम उन मीडिया चैनलों के भ्रष्टाचार पर नकेल कसी जानी चाहिए जो सनसनी फैलाकर, ख़बरों को तोड़-मरोड़ कर, ब्लैकमेल जैसा माहौल बनाकर, अधूरी जानकारी, आंकडें रहित जानकारियाँ फैलाकर, अंधविश्वास, भ्रांतियाँ फैलाकर, जनमानस की भावनाओं से खिलवाड़ कर रहे हैं. जिस दूरदर्शन ने पचास साल पहले आज के मीडिया को पैदा करने में भूमिका निभाई उस दूरदर्शन के बारे में इन चैनलों को दो मिनट का समय दे पाना भी मुमकिन न हुआ. यह भ्रष्टाचार, अनैतिकता नहीं तो और क्या है. मेरे ख़्याल से इस कलयुग में तो इस नासूर से निजात पाना नामुमकिन है. हम यह स्वीकार कर चुके हैं कि यह हमारे जीवन का अभिन्न अंग है. यह हमारा स्वभाव ही है कि सुबह-शाम भगवान के आगे धूप-अगरबत्ती जलाकर अपनी फ़रियादों का टोकरा खोल के बैठे रहते हैं. चीन की क्या मिसाल है. वहां खदानों में हज़ारों मज़दूर मर भी जाते हैं तो बाहर ख़बर तक निकल कर नहीं आती. जो आवाज़ उठाता है वह आवाज़ ही शांत कर दी जाती है. क्या चीन से हम यह सीखना चाहेगें? अरब देशों से फिर भी कुछ सीखने लायक है. लेकिन सवाल फिर वही है कि हम कब तक दूसरों से सीखते रहेंगे और हम कब ऐसे बनेंगे कि बाक़ी दुनिया हमारा अनुसरण करे. भ्रष्टाचार को ख़त्म करने का एक अच्छा हथियार "सूचना का अधिकार" है लेकिन इसका भी भरपूर उपयोग नहीं हो पा रहा है. कठोर दंड, कारावास की सज़ा, मौत की सज़ा, मूलाधिकारों से वंचित करना, भ्रष्टाचारियों के ओहदे वापस लेना, पदावनति, चुनाव लड़ने पर रोक, भ्रष्टाचारियों के राशन कार्ड, पासपोर्ट न बनाए जाएँ, विदेश जाने पर रोक, फास्ट ट्रैक अदालतों में मुकदमें चलाए जाए, बड़ी-छोटी मछलियों के ओहदों और डिग्रियों को रद्द किया जाए और सामाजिक बहिष्कार आदि उपायों द्वारा भ्रष्टाचार पर लगाम लगाई जा सकती है. अंत में मुझे कवि गोपाल दास नीरज जी की कुछ पंक्तियाँ याद आ रही हैं.

    लूट लिया माली ने उपवन
    लुटी न लेकिन गंध फूल की
    तूफानों तक ने छेड़ा पर
    खिड़की बंद न हुई धूल की
    नफ़रत गले लगाने वालो, सब पर धूल उड़ाने वालों
    कुछ मुखड़ों की नाराजी से दर्पण नहीं मरा करता है.

  • 19. 12:44 IST, 22 सितम्बर 2009 sarfaraz:

    हम भारतीय तभी तक ईमानदार हैं, जब तक बेईमानी करने का मौक़ा नहीं मिलता.

  • 20. 13:21 IST, 22 सितम्बर 2009 Amitsingh Kushwah:

    राजेश जी, भ्रष्टाचार आम भारतीय की पीड़ा है. भ्रष्टाचार को ख़त्म करना आज वाकई बहुत मुश्किल काम है. भ्रष्टाचार के कारण आज आम जनता का खुलेआम शोषण हो रहा है. ये हमारे देश और समाज के लिए चिंता का विषय है.

  • 21. 20:06 IST, 22 सितम्बर 2009 dhiru singh:

    सटीक लिखा है आपने. वैसे ईमानदारी की मायने बदलने का समय आ गया है . एक राष्ट्र व्यापी चर्चा की आवश्यकता है . वैसे मैं ईमानदार हूँ क्योकि मुझे बेईमानी का मौका नहीं मिला है

  • 22. 21:04 IST, 22 सितम्बर 2009 डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल :

    जब भी भारत में भ्रष्टाचार की बात होती है, मुझे प्रख्यात हिंदी व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई की एक टिप्पणी याद आती है. उन्होंने कहा था कि जिस देश में परीक्षा देने जाता हुआ विद्यार्थी हनुमान जी के मंदिर के बाहर रुक कर यह कहता है कि हे भगवान अगर तुम मुझे पास कर दोगे तो मैं तुम्हें सवा पांच आने का प्रसाद चढाऊंगा, उस देश से भ्रष्टाचार कभी दूर नहीं हो सकता. असल में भ्रष्टाचार हमारी रग-रग में समाया हुआ है.हां, यह बात अलग है कि हमें अपना भ्रष्टाचार तो मज़बूरी नज़र आता है और दूसरों की मज़बूरी भी भ्रष्टाचार ही नज़र आती है.

  • 23. 01:12 IST, 23 सितम्बर 2009 Khan, Saudi Arabia.:

    राजेश जी रिश्वत देने की दो घटनाएं बहुत अच्छी तरह याद हैं एक बार जब पासपोर्ट बनवा रहे थे और दूसरी बार जब छुट्टी जाते वक़्त भारतीय एयरपोर्ट पर एक ऑफ़िसर आंटी ने खुलेआम कहा अगर तुम ये चाहते हो कि मैं तुम्हारा ये बड़ा बक्सा खोलकर इसका सामान न बिखेरूं तो कम से कम पांच सौ रुपये देने होंगे. और मुझे ऐसा लग रहा था जैसे वो कह रही हों कि ‘स्वदेश लोटने पर आपका स्वागत है'.
    मेरे बॉक्स मे कुछ भी ऐसा नही था जिसकी वजह से उसे खोला जाता और अगर था भी तो क्या भारत की सुरक्षा की क़ीमत सिर्फ़ 500 रुपये है? मेरा दिल किया कि आंटी जी से कहूं कि कोई बात नही बिखेर ही दीजिये सामान, पर फिर ख्याल आया कि इन लोगों से पंगा लेना मेरे लिये बिल्कुल ठीक नही है ये लोग जिनके कंधों पर या पहचान पत्र पर बने हुए शेरों के नीचे सत्यमेव जयते लिखा हुआ होता है, एक मिनट मे बड़े बड़े तुर्रम खां लोगों को डाकू, चोर या आतंकवादी साबित कर देते हैं फ़िर मेरी औक़ात क्या है इसलिये बिना चूं चपड़ किये आंटी जी को एक सौ रियाल का नोट दिया और उन्होने बडी ईमानदारी के साथ मुझे 500 रुपये वापस कर दिये.
    रिश्वत एक अरबी शब्द है पर यहां छह-सात साल गुज़ारने के बाद भी इस शब्द से प्रैक्टिकल वास्ता नही पड़ा, अगर ये कहूंगा कि यहां लोग ईश्वर से डरते हैं और हराम का माल नही खाना चाह्ते तो ये बात अतिश्योक्ति हो जाएगी ये बात मुझे हज़म नही हो सकती तो जो लोग यहां कभी नही आए उनके लिये हज़म करना कुछ ज़्यादा ही मुश्किल है, इसलिये ये कहना उचित होगा कि शायद यहां अधिकारी लोग खुद इतने संपन्न हैं भारी भरकम वेतन के साथ खुद के बिज़नेस भी हैं शायद इसलिये रिश्वत यहां इतनी आम नही है कि हम जैसे आम लोगों से उसका आमना सामना हो.

  • 24. 11:34 IST, 23 सितम्बर 2009 Khan, Saudi Arabia.:

    पासपोर्ट की इंक्वाययरी के वक़्त पहली बार थाने को अंदर से देखा था, उस पर भी हेड साहब 350 रुपए मांग रहे थे सिर्फ़ यह लिखने के लिए कि मेरा कोई पुलिस रिकार्ड नहीं है, मैं सोच रह था कि यार रिश्वत का भी कोई उसूल होना चाहिए अगर मैने पहले कोई जुर्म किया होता तो 350 के तीन हज़ार देने में भी शायद इतनी तकलीफ़ नहीं होती, पर सफ़ेद को सफ़ेद लिखने कि भी रिश्वत लगती है, यह पहली बार पता चला था पर फिर एहसास हुआ कि हमारे देश में सफ़ेद को सफ़ेद लिखवाने की ही रिश्वत लगती है, काले को सफ़ेद लिखवाने वाले तो काले घोड़े पर बैठ कर आते हैं जिसे देख कर सारे काम बिना रिश्वत के ही पूरे कर दिए जाते हैं. और अगर लगती भी हो तो उन्हें करोड़ों की रिश्वत देने में भी उतनी तकलीफ़ नहीं होती जितनी हमे सिर्फ़ सौ रुपए देने में होती है. पासपोर्ट के लिए मेरे अलावा एक बंदा और भी बैठा हुआ था. हेड साहब मुझसे इतने चिढ़ाने वाले सवाल पूछ रहे थे कि हर सवाल पर गुस्सा आ रहा था किस देश के लिए पासपोर्ट बनवा रहे हो, अरे सर पासपोर्ट तो सभी देशों के लिए होता है, भाई ख़ान विदेश जाने के लिए ही बनवा रहे हो न , 350 तो लगेंगे ही. दिल किया कि पूछ लूं कि दिल्ली जाने वाले पासपोर्ट की फ़ीस कितनी है, इसी तरह की दर्ज़नों बेसर पैर की बातें सुनने के बाद मैने उनसे कहा कि मेरे पास अपको देने के लिए इतने पैसे नही हैं, मै इस ग़लतफ़हमी में था कि साहब वापस बुला कर सम्मानपूर्वक मुझे मेरे पेपर्स दे देंगे पर यहाँ हमने मुँह की खाई थोड़ी देर बाद वो दूसरे भाई साहब बाहर आए उनसे पूछा तो पता चला कि वो तो बिना किसी बहस के पूरे पैसे दे आए हैं. इसलिए अपना बहुमूल्य एक घंटा और अपनी ढेर सारी दलीलों की बली हेड साहब की चर्म बुद्धी पर चढ़ाने के बाद पचास-पचास के सात कड़क नोट भी न्योछावर कर आए. थाने के मुख्य दरवाज़े के पास आकर एक बार मुड़ कर देखा, बड़े बड़े अक्षरों में लिखा था ‘देशभक्ति जनसेवा’.

  • 25. 13:11 IST, 23 सितम्बर 2009 Iqbal Ahmad, Rampur India:

    आर्ट ऑफ़ लिविंग का कहना है कि " परिस्थितियां जैसी भी हों उनका सामना करें."रिश्वत दिए बिना काम चलेगा नहीं. और तो और आप एक बड़ी परेशानी में भी पड़ सकते हैं. एक बुजुर्ग की सलाह है कि रिश्वत का नाम बदलकर कमीशन या पब्लिक टैक्स कर देना चाहिए.

  • 26. 14:54 IST, 23 सितम्बर 2009 Rajendra Prasad Sharma:

    राजेश जी, मैं आप से पूरी तरह सहमत हूँ. भारत में भ्रष्टाचार के बारे में बहुत अच्छा लिखा है.

  • 27. 15:38 IST, 23 सितम्बर 2009 Iqbal Ahmad, Rampur India:

    मैं सऊदी अरब के ख़ान साहब की बात से बिलकुल सहमत नहीं हूँ. मैं कई साल सऊदी में काम करने के बाद घर लौटा. यह बीमारी पाकिस्तानियों और कुछ हद तक भारतीयों की भी वजह से वहाँ भी पैर पसार चुकी है. ख़ान साहब का पाला शायद नहीं पड़ा. जिसका पाला नहीं पड़ा वह ग़ालिब की ज़बान में समझता है कि 'बीमार का हाल अच्छा है'.

  • 28. 11:39 IST, 27 सितम्बर 2009 jawrimal:

    अच्छी रिपोर्ट लिखी है.

  • 29. 23:53 IST, 27 सितम्बर 2009 prashant kumar mishra:

    सचमुच आज भ्रष्टाचार हमारी नियति बन गई है और इसके लिए हम ख़ुद ज़िम्मेदार हैं.

  • 30. 17:27 IST, 10 अक्तूबर 2009 Dr. Purushottam Meena, National President-"Bhrashtachar Avam Atyachar Anveshan Sansthan" (BAAS), 7-T:

    आपका लेख मनोरंजक तो है, लेकिन मार्गदर्शक नहीं जिसकी समाज को सख्त ज़रूरत है.

  • 31. 08:24 IST, 27 अक्तूबर 2009 Rabindra Nath Dwivedi:

    आपने भारत में व्याप्त भ्रष्ट्राचार की ओर प्रश्न उठाया है. भारत में भ्रष्ट्राचार स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद ही अपना जड़ जमा चुका था . भारत के पहले प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरु 1947 के पहले कहा करते थे कि भ्रष्ट्राचारियों और कालाबाजारियों को नजदीक के लैंप पोस्ट से लटका दिया जाएगा परन्तु इन्ही के कार्यकाल में जीप घोटाला, नेक घोटाला, एलआईसी घोटाला हुआ, परन्तु किसी को भी लैंप पोस्ट से नहीं लटकाया गया और नहीं कोई ऐक्शन लिया गया. भ्रष्ट्राचार इन्ही के शासनकाल में फैला और बाद के बर्षों में फैलता गया और एक अपरोक्ष मान्यता मिल गई. सभी संवैधानिक पदों का हनन कर दिया गया और भ्रष्ट्राचार की गंगा सर्वोच्च स्थान से उतारते हुए पुरे समाज में फैल गया. भ्रष्ट्राचारियों के जमात आज भ्रष्ट्राचार मिटने की बात करता है , जो एक विडम्बना नहीं तो क्या है.जब तक सर्वोच्च स्थान से भ्रष्ट्राचार नहीं मिटेगा तब तक बात बनाने से काम नहीं होने वाला. भारत की जनता मूलतः भ्रष्ट्राचार रहित समाज चाहता है लेकिन शासनतंत्र भ्रष्ट्राचार को बढ़ावा देता है.

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